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नई दिल्ली। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद द्वारा कर प्रवर्तन व्यवस्था में अपराधमुक्तिकरण और प्रवर्तन शक्तियों को युक्तिसंगत बनाने के लिए लिए गए फैसलों का स्वागत करते हुए इन्हें भारत में विश्वास आधारित आर्थिक सुशासन की दिशा में ऐतिहासिक संस्थागत सुधार बताया है। संगठन का कहना है कि इन निर्णयों से देश की कर व्यवस्था अधिक पारदर्शी, संतुलित, व्यावहारिक और कारोबारियों के अनुकूल बनने की दिशा में आगे बढ़ेगी। इससे विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), छोटे कारोबारियों और पहली पीढ़ी के उद्यमियों को राहत मिलने की उम्मीद है।
सीआईआई के अनुसार, 8 अक्टूबर को जीएसटी परिषद द्वारा लिए गए निर्णय केवल कर कानूनों में बदलाव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये केंद्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद की भावना को भी प्रदर्शित करते हैं। कर प्रवर्तन, राजस्व संरक्षण और करदाताओं के अधिकारों जैसे संवेदनशील विषयों पर व्यापक सहमति बनाना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
संगठन का मानना है कि लंबे समय से उद्योग जगत की ओर से कर प्रशासन में पारदर्शिता, स्पष्टता और प्रक्रियागत सरलता की मांग की जाती रही है। कई बार तकनीकी गलतियों, दस्तावेजी कमियों और वास्तविक कारोबारी विवादों के कारण भी उद्यमियों को गंभीर कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में जीएसटी प्रवर्तन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने का निर्णय कारोबारियों के लिए सकारात्मक बदलाव साबित हो सकता है।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने जीएसटी परिषद के फैसलों को महत्वपूर्ण संस्थागत सुधार बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने इस प्रक्रिया में राज्यों की सरकारों की रचनात्मक भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।
बनर्जी ने कहा कि कर प्रवर्तन, राजस्व संरक्षण और करदाताओं के अधिकारों से जुड़े विषयों पर केंद्र और राज्यों के बीच सहमति बनना सहकारी संघवाद की एक बड़ी उपलब्धि है। इससे यह संदेश मिलता है कि सरकारें वैध कारोबार और उद्यमशीलता के प्रति अधिक विश्वासपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने के लिए पुरानी नियामकीय व्यवस्थाओं में आवश्यक बदलाव करने को तैयार हैं।
उनके अनुसार, किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए ऐसा कर प्रशासन जरूरी है, जिसमें सरकार और करदाता के बीच विश्वास का संबंध बना रहे। कारोबारियों को यह भरोसा होना चाहिए कि कानून का पालन करने पर उन्हें अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई या प्रशासनिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
जीएसटी परिषद के निर्णयों में केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम (सीजीएसटी अधिनियम) के प्रवर्तन और अभियोजन संबंधी प्रावधानों को अधिक तर्कसंगत बनाने पर जोर दिया गया है।
इनमें प्रमुख रूप से धारा 69 के तहत गिरफ्तारी संबंधी शक्तियों को समाप्त करने, अभियोजन की मौद्रिक सीमा को एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने, धारा 132 के अंतर्गत कुछ अपराधों का दायरा सीमित करने और कारावास संबंधी प्रावधानों को युक्तिसंगत बनाने जैसे कदम शामिल हैं।
इसके अलावा सजा निर्धारित करने के मामले में न्यायिक विवेकाधिकार को अधिक महत्व देने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। इन निर्णयों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक विधायी संशोधन किए जाने होंगे।
इन बदलावों का उद्देश्य वास्तविक कारोबारी विवादों, प्रक्रियागत त्रुटियों और जानबूझकर किए गए गंभीर अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना है। इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि सामान्य अनुपालन संबंधी गलतियों को गंभीर आपराधिक मामलों की तरह न देखा जाए, जबकि जानबूझकर की गई धोखाधड़ी और कर चोरी के मामलों में कठोर कार्रवाई जारी रहे।
जीएसटी प्रवर्तन सुधारों में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव अभियोजन की मौद्रिक सीमा बढ़ाने से जुड़ा है। इसके तहत अभियोजन की सीमा एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने का निर्णय लिया गया है।
इस बदलाव से अपेक्षा की जा रही है कि अपेक्षाकृत कम राशि से जुड़े कई मामलों में सीधे आपराधिक अभियोजन की आशंका कम होगी। इससे छोटे और मध्यम कारोबारियों को कानूनी प्रक्रियाओं, वकीलों की फीस और लंबे विवादों से जुड़ी लागत में राहत मिल सकती है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि कर चोरी करने वालों को छूट मिल जाएगी। जानबूझकर धोखाधड़ी, फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट और गंभीर कर चोरी के मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई का प्रावधान बना रहेगा।
इस बदलाव का मूल उद्देश्य आपराधिक कानून का इस्तेमाल अधिक लक्षित और गंभीर मामलों में करना है, ताकि वैध कारोबारियों को अनावश्यक कानूनी दबाव का सामना न करना पड़े।
भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। लाखों छोटे उद्योग, व्यापारिक प्रतिष्ठान, विनिर्माण इकाइयां और सेवा प्रदाता इसी क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे कारोबारी हैं, जिनके पास बड़े उद्योगों की तरह अलग-अलग कर विशेषज्ञों, कानूनी सलाहकारों और अनुपालन प्रबंधन के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते।
कई बार जीएसटी रिटर्न में तकनीकी गलती, दस्तावेजों में अंतर, इनपुट टैक्स क्रेडिट से संबंधित विवाद या किसी कारोबारी लेनदेन की व्याख्या को लेकर विभाग और कारोबारी के बीच विवाद उत्पन्न हो जाता है।
ऐसी परिस्थितियों में छोटे उद्यमियों को नोटिस, सुनवाई, कानूनी खर्च और कारोबारी प्रतिष्ठा से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
सीआईआई का मानना है कि प्रस्तावित सुधारों से एमएसएमई क्षेत्र में अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई की आशंका कम होगी। इससे छोटे कारोबारियों को अपना ध्यान उत्पादन, बिक्री, रोजगार सृजन और कारोबार के विस्तार पर केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।
देश में बड़ी संख्या में ऐसे युवा उद्यमी हैं, जिन्होंने सीमित पूंजी और व्यक्तिगत प्रयासों के आधार पर अपना कारोबार शुरू किया है। इन्हें पहली पीढ़ी के उद्यमी कहा जाता है।
इन उद्यमियों के पास कई बार जटिल कर कानूनों और कानूनी प्रक्रियाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। उन्हें कारोबार चलाने के साथ-साथ जीएसटी पंजीकरण, रिटर्न दाखिल करने, बिलिंग और दस्तावेजों के रखरखाव जैसी जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ती हैं।
सीआईआई के अनुसार, कर प्रवर्तन में संतुलन आने से ऐसे उद्यमियों का नियामकीय जोखिम कम हो सकता है। इससे नए व्यवसाय शुरू करने और मौजूदा कारोबार का विस्तार करने के प्रति उनका विश्वास मजबूत होगा।
यह बदलाव स्टार्टअप और छोटे व्यवसायों के विकास के लिए भी उपयोगी हो सकता है, क्योंकि किसी भी नए उद्यम के लिए स्थिर और पूर्वानुमान योग्य कारोबारी वातावरण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
जीएसटी परिषद के निर्णयों में सीजीएसटी अधिनियम की धारा 69 के तहत गिरफ्तारी संबंधी शक्तियों को समाप्त करने का प्रस्ताव भी शामिल है।
यह प्रावधान जीएसटी कानून के प्रवर्तन ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसके तहत निर्धारित गंभीर अपराधों के मामलों में गिरफ्तारी की कार्रवाई का प्रावधान था।
प्रस्तावित बदलाव के माध्यम से इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया गया है। इसका उद्देश्य कर प्रशासन में आपराधिक कार्रवाई के इस्तेमाल को अधिक संतुलित बनाना और करदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा करना है।
हालांकि इस विषय में अंतिम कानूनी स्थिति लागू होने वाले संशोधनों और संबंधित अधिसूचनाओं पर निर्भर करेगी। गंभीर आर्थिक अपराधों और जानबूझकर की गई धोखाधड़ी के मामलों में अन्य वैधानिक कार्रवाई के प्रावधान अलग से लागू रह सकते हैं।
सीआईआई ने स्पष्ट किया है कि अपराधमुक्तिकरण का अर्थ कर चोरी या धोखाधड़ी को प्रोत्साहित करना नहीं है।
संगठन का मानना है कि ईमानदार कारोबारियों और जानबूझकर कानून का उल्लंघन करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
यदि कोई कारोबारी जानबूझकर फर्जी बिल बनाता है, गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट प्राप्त करता है, राजस्व को नुकसान पहुंचाने के लिए धोखाधड़ी करता है या कर चोरी की संगठित गतिविधियों में शामिल होता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन यदि किसी कारोबारी से तकनीकी या प्रक्रियागत गलती होती है, तो उसके मामले में पहले तथ्यों, दस्तावेजों और गलती की प्रकृति का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
इस तरह सुधारों का उद्देश्य कर प्रशासन को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे अधिक सटीक, निष्पक्ष और प्रभावी बनाना है।
जीएसटी परिषद के फैसलों के बाद केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) द्वारा 26 अक्टूबर को जारी किए गए परिपत्रों को भी सीआईआई ने महत्वपूर्ण बताया है।
इन परिपत्रों में जीएसटी पंजीकरण, नोटिस जारी करने और न्यायनिर्णयन से संबंधित व्यावहारिक समस्याओं पर ध्यान दिया गया है।
संगठन के अनुसार, इन निर्देशों में धोखाधड़ी के आरोपों को ठोस साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित करने, कर नोटिस में स्पष्टता बनाए रखने और न्यायनिर्णयन की प्रक्रिया को तर्कसंगत तथा कारणयुक्त बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
उद्योग जगत लंबे समय से इन विषयों को लेकर चिंता व्यक्त करता रहा है। कारोबारियों की शिकायत रही है कि कई बार नोटिस में लगाए गए आरोप स्पष्ट नहीं होते या दस्तावेजों और लेनदेन से संबंधित पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती।
ऐसी परिस्थितियों में कारोबारी को जवाब तैयार करने, कानूनी सलाह लेने और संबंधित विभागों के समक्ष अपनी बात रखने में अतिरिक्त समय और धन खर्च करना पड़ता है।
सीआईआई के अनुसार, नए निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन से कर प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ सकती है और अनावश्यक विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।
किसी भी कर विवाद में नोटिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि नोटिस में आरोप, संबंधित लेनदेन, दस्तावेज और कानूनी आधार स्पष्ट नहीं हों, तो करदाता के लिए अपना पक्ष रखना कठिन हो जाता है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए सीबीआईसी के निर्देशों में नोटिस जारी करने और आरोपों को प्रमाणित करने की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाने पर जोर दिया गया है।
इससे करदाताओं को यह समझने में सुविधा होगी कि विभाग की आपत्ति किस लेनदेन या किस दस्तावेज से संबंधित है और उसे किस आधार पर उठाया गया है।
इस तरह विवादों के निपटारे में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ने की उम्मीद है।
सीआईआई ने कहा कि जीएसटी व्यवस्था में सुधार का प्रभाव तभी व्यापक होगा, जब प्रवर्तन से जुड़े बदलावों के साथ-साथ रिफंड, इनपुट टैक्स क्रेडिट और अनुपालन प्रक्रियाओं को भी सरल बनाया जाए।
कई कारोबारियों के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट और रिफंड से संबंधित प्रक्रियाएं कार्यशील पूंजी के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
यदि रिफंड में देरी होती है या इनपुट टैक्स क्रेडिट से संबंधित विवाद लंबे समय तक चलते हैं, तो कारोबारियों की पूंजी फंस सकती है। इसका असर उत्पादन, खरीदारी, कर्मचारियों के वेतन और कारोबार के विस्तार पर पड़ सकता है।
ऐसे में तेज रिफंड, स्पष्ट नियम और सरल अनुपालन प्रक्रियाएं उद्योग जगत की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में सहायता कर सकती हैं।
सीआईआई का मानना है कि कर प्रशासन में सुधारों का संयुक्त प्रभाव कारोबारियों की कार्यशील पूंजी को मजबूत करने और विवादों की संख्या घटाने में सहायक हो सकता है।
भारत की जीएसटी व्यवस्था पिछले वर्षों में डिजिटल तकनीक के माध्यम से काफी विकसित हुई है। ई-इनवॉइसिंग, इलेक्ट्रॉनिक रिटर्न, ऑनलाइन पंजीकरण और डेटा एनालिटिक्स जैसी व्यवस्थाओं ने कर प्रशासन को पहले की तुलना में अधिक तकनीक आधारित बनाया है।
इन डिजिटल माध्यमों से सरकार को कारोबारी लेनदेन और कर अनुपालन से संबंधित जानकारी व्यवस्थित रूप से उपलब्ध होती है।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी के अनुसार, आधुनिक कर प्रशासन के लिए हर समय आपराधिक दंड का भय आवश्यक नहीं है। बेहतर सूचना, तकनीक और लक्षित प्रवर्तन के माध्यम से भी राजस्व की सुरक्षा की जा सकती है।
डिजिटल प्रणाली के जरिए संदिग्ध लेनदेन की पहचान, दस्तावेजों का मिलान और गंभीर अनियमितताओं की जांच अधिक प्रभावी तरीके से की जा सकती है।
इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि ईमानदार करदाताओं के लिए नियमों का पालन आसान हो और जानबूझकर कर चोरी करने वालों के लिए ऐसा करना कठिन बने।
किसी भी देश में निवेश का निर्णय लेते समय उद्योगपति केवल बाजार और श्रम उपलब्धता को नहीं देखते, बल्कि वहां के नियामकीय वातावरण, कर व्यवस्था और कानूनी स्थिरता का भी आकलन करते हैं।
यदि किसी देश की कर प्रणाली स्पष्ट, स्थिर और पूर्वानुमान योग्य हो, तो निवेशकों को कारोबार की लागत और संभावित जोखिम का बेहतर अनुमान लगाने में मदद मिलती है।
सीआईआई का मानना है कि जीएसटी प्रवर्तन में सुधार से भारत के कारोबारी वातावरण में विश्वास मजबूत हो सकता है।
इससे घरेलू उद्यमियों के साथ-साथ नए निवेशकों को भी सकारात्मक संदेश मिलेगा। विशेष रूप से विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, लॉजिस्टिक्स और एमएसएमई उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सुधारों को कितनी प्रभावी और समान रूप से लागू किया जाता है।
जब कारोबारियों को स्पष्ट नियमों और सरल प्रक्रियाओं के साथ काम करने का अवसर मिलता है, तो वे उत्पादन और व्यवसाय विस्तार की योजनाओं पर अधिक ध्यान दे सकते हैं।
छोटे उद्योगों के विस्तार से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही आपूर्ति श्रृंखला, परिवहन, पैकेजिंग, विपणन और सेवा क्षेत्र में भी रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
एमएसएमई क्षेत्र विशेष रूप से रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए इस क्षेत्र के लिए अनुपालन लागत और कानूनी जटिलताओं को कम करना व्यापक आर्थिक विकास के लिहाज से उपयोगी हो सकता है।
जीएसटी सुधारों के माध्यम से सरकार और उद्योग जगत के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होने पर उद्यमिता को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
जीएसटी परिषद भारतीय संघीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण संस्थागत मंच है, जहां केंद्र और राज्यों के प्रतिनिधि मिलकर अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था से संबंधित विषयों पर निर्णय लेते हैं।
जीएसटी लागू होने के बाद परिषद ने कर दरों, छूट, अनुपालन प्रक्रियाओं और कानूनी प्रावधानों में विभिन्न बदलावों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय की भूमिका निभाई है।
सीआईआई के अनुसार, प्रवर्तन व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषय पर भी सहमति बनना यह दर्शाता है कि देश में आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए सहकारी संघवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग के बिना कर व्यवस्था में व्यापक बदलाव लागू करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए परिषद के माध्यम से लिए गए निर्णयों को व्यापक आर्थिक सुधारों के लिए एक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।
सीआईआई ने कहा कि भारत में कारोबार करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए अभी कई अन्य क्षेत्रों में भी सुधारों की आवश्यकता है।
इनमें भूमि उपयोग, निर्माण संबंधी अनुमतियां, श्रम प्रशासन, बिजली और पानी के कनेक्शन, लॉजिस्टिक्स तथा स्थानीय नियामकीय स्वीकृतियां प्रमुख हैं।
कई उद्योगों को नया कारखाना स्थापित करने या मौजूदा इकाई का विस्तार करने के लिए अलग-अलग विभागों और प्राधिकरणों से अनुमति लेनी पड़ती है।
कई बार अलग-अलग विभागों की प्रक्रियाओं में समन्वय की कमी के कारण परियोजनाओं में देरी होती है। इससे निवेश की लागत बढ़ती है और उत्पादन शुरू होने में अतिरिक्त समय लगता है।
सीआईआई का मानना है कि जीएसटी परिषद ने जिस प्रकार केंद्र और राज्यों के बीच सहमति के माध्यम से सुधारों का रास्ता तैयार किया है, उसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भी समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए।
भारत में उद्योगों के विकास के लिए कारोबारी लागत कम करना एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
यदि किसी उद्यमी को केवल अनुमति प्राप्त करने, दस्तावेज तैयार करने और विभिन्न विभागों से संपर्क करने में ही अधिक समय लगाना पड़े, तो उसका प्रभाव कारोबार की उत्पादकता पर पड़ता है।
ऐसे में सिंगल विंडो व्यवस्था, डिजिटल स्वीकृतियां, समयबद्ध सेवाएं और स्पष्ट नियामकीय नियम उद्योगों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।
सीआईआई के अनुसार, केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय से कारोबारियों को अनेक स्तरों पर राहत मिल सकती है।
इसका लाभ केवल बड़ी कंपनियों को ही नहीं, बल्कि छोटे उद्यमियों, स्टार्टअप और स्थानीय उद्योगों को भी मिलेगा।
सीआईआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि विश्वास आधारित कर प्रशासन के साथ उद्योग जगत की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
यदि सरकार कारोबारियों के प्रति अधिक विश्वासपूर्ण व्यवस्था अपनाती है, तो कंपनियों को भी स्वैच्छिक अनुपालन और जिम्मेदार कारोबारी व्यवहार को मजबूत करना होगा।
इसके लिए कंपनियों को अपने आंतरिक नियंत्रण तंत्र को बेहतर बनाने, वित्तीय दस्तावेजों का सही रखरखाव करने, समय पर रिटर्न दाखिल करने और कर संबंधी नियमों का पालन करने पर ध्यान देना चाहिए।
विशेष रूप से एमएसएमई इकाइयों में जीएसटी अनुपालन के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।
सीआईआई ने कहा है कि संगठन अपने सदस्यों के साथ मिलकर बेहतर अनुपालन प्रक्रियाओं और कर अधिकारियों के साथ रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करता रहेगा।
सीआईआई के अनुसार, किसी भी आधुनिक कर व्यवस्था की सफलता केवल कठोर कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए करदाताओं का विश्वास, प्रशासन की निष्पक्षता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है।
यदि करदाता को यह भरोसा हो कि उसके दस्तावेजों और स्पष्टीकरण पर निष्पक्ष विचार किया जाएगा, तो स्वैच्छिक अनुपालन की संभावना मजबूत होती है।
दूसरी ओर, यदि जानबूझकर धोखाधड़ी और कर चोरी करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होती है, तो कर व्यवस्था की विश्वसनीयता भी बनी रहती है।
इसलिए कर प्रशासन में सुधार का उद्देश्य विश्वास और जवाबदेही दोनों को साथ लेकर चलना होना चाहिए।
भारत में जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में बड़े बदलाव आए हैं। अलग-अलग केंद्रीय और राज्य स्तरीय अप्रत्यक्ष करों को एक साझा व्यवस्था में शामिल करने से देश में एकीकृत बाजार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
अब कर व्यवस्था के अगले चरण में अनुपालन को आसान बनाने, विवादों को कम करने, डिजिटल प्रक्रियाओं को मजबूत करने और करदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
सीआईआई के अनुसार, प्रवर्तन शक्तियों को युक्तिसंगत बनाने का निर्णय इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा है।
यह केवल तत्काल राहत का मामला नहीं है, बल्कि भारत में आर्थिक प्रशासन की कार्यप्रणाली को अधिक आधुनिक और विश्वास आधारित बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा कि जीएसटी परिषद के निर्णय केवल करदाताओं को तत्काल राहत देने वाले कदम नहीं हैं, बल्कि व्यापक संस्थागत सुधारों के लिए भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्यों ने यह प्रदर्शित किया है कि नियामकीय प्रभावशीलता, करदाताओं का विश्वास और राजस्व संरक्षण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
उन्होंने उद्योग जगत से भी इस विश्वास का जवाब जिम्मेदार कारोबारी व्यवहार और मजबूत स्वैच्छिक अनुपालन के माध्यम से देने की अपील की।
उनके अनुसार, किसी भी नियामकीय व्यवस्था की वास्तविक शक्ति केवल उसके पास मौजूद कठोर अधिकारों में नहीं होती, बल्कि उससे सुनिश्चित होने वाले अनुपालन, निष्पक्ष कार्यप्रणाली और जनता तथा उद्योग जगत के विश्वास में निहित होती है।
जीएसटी परिषद के फैसलों को उद्योग जगत ने महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखा है, लेकिन इनकी वास्तविक सफलता इनके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
इसके लिए आवश्यक होगा कि प्रस्तावित विधायी संशोधन समय पर किए जाएं, नए प्रावधानों को स्पष्ट रूप से लागू किया जाए और राज्यों में कर अधिकारियों को एक समान दिशा-निर्देश उपलब्ध कराए जाएं।
इसके साथ ही कारोबारियों को नए नियमों के बारे में पर्याप्त जानकारी देना, नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना और विवादों का समयबद्ध निपटारा करना भी महत्वपूर्ण होगा।
विशेष रूप से छोटे कारोबारियों के लिए जीएसटी अनुपालन से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम और प्रशिक्षण उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, जीएसटी प्रवर्तन व्यवस्था में अपराधमुक्तिकरण और शक्तियों के युक्तिसंगतीकरण से जुड़े फैसलों को भारतीय कर प्रशासन में विश्वास आधारित सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इनसे ईमानदार कारोबारियों, एमएसएमई और नए उद्यमियों को कानूनी तथा प्रशासनिक परेशानियों से राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं गंभीर धोखाधड़ी और जानबूझकर कर चोरी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने का उद्देश्य भी बरकरार है। यदि इन सुधारों को प्रभावी और समान रूप से लागू किया जाता है, तो इससे भारत में कारोबार करने के माहौल, निवेश, उद्यमिता और औद्योगिक विकास को मजबूती मिल सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


