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- 10h ago
नई दिल्ली। करीब आठ दशकों से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को धरातल पर उतारने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। लंबे समय से विभिन्न स्तरों पर लंबित इस परियोजना को लेकर हुए समझौते को अंतरराज्यीय जल सहयोग, जल सुरक्षा, सिंचाई, पेयजल, ऊर्जा उत्पादन और यमुना के पुनर्जीवीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने समझौते के बाद इसे लगभग आठ दशकों से प्रतीक्षित परियोजना को वास्तविक रूप देने की दिशा में निर्णायक पड़ाव बताया। उन्होंने भारत सरकार के साथ-साथ परियोजना में शामिल सभी राज्य सरकारों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि किशाऊ परियोजना केवल एक बांध के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध कई राज्यों की जल एवं ऊर्जा आवश्यकताओं से है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बताया कि किशाऊ परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1940 में की गई थी। इसके बाद से अलग-अलग समय पर इसे आगे बढ़ाने के प्रयास किए जाते रहे, लेकिन विभिन्न तकनीकी, पर्यावरणीय, प्रशासनिक और अंतरराज्यीय कारणों के चलते परियोजना लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी।
करीब आठ दशक तक फाइलों और बैठकों के बीच अटकी रही इस परियोजना को अब केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच समन्वय के जरिए आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लंबे समय से लंबित महत्वपूर्ण परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है और किशाऊ परियोजना भी इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण परियोजना है।
मुख्यमंत्री धामी ने केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के विशेष सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि 16 जून 2026 को हुई बैठक में किशाऊ परियोजना से जुड़ी कई महत्वपूर्ण अड़चनों के समाधान का रास्ता खुला।
इसके बाद केंद्र सरकार और परियोजना में शामिल राज्यों के बीच लगातार संवाद और समन्वय हुआ। विभिन्न स्तरों पर लंबित मुद्दों को सुलझाने के प्रयास किए गए और परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सहमति बनाने की प्रक्रिया जारी रही। अब छह राज्यों के बीच MoU पर हस्ताक्षर होने से इस दिशा में औपचारिक कदम आगे बढ़ा है।
मुख्यमंत्री ने किशाऊ परियोजना को सामान्य बांध परियोजना के बजाय राष्ट्रीय महत्व की बहुउद्देशीय परियोजना बताया। प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य एक साथ कई क्षेत्रों में लाभ पहुंचाना है।
परियोजना के तहत लगभग 1562 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) क्षमता का विशाल जलाशय विकसित होने की बात कही गई है। इसके साथ करीब 422 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है।
जल भंडारण और बिजली उत्पादन के अलावा परियोजना का संबंध सिंचाई और पेयजल आपूर्ति से भी है। इससे अपर यमुना बेसिन से जुड़े राज्यों में पानी की उपलब्धता को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
किशाऊ परियोजना का प्रभाव केवल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। परियोजना से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान सहित अपर यमुना बेसिन से जुड़े क्षेत्रों को भी लाभ मिलने की संभावना है।
जलाशय में पानी के भंडारण से पानी की उपलब्धता को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद मिल सकती है। वहीं परियोजना से उत्पादित बिजली ऊर्जा क्षेत्र के लिए अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराने में योगदान देगी।
इस प्रकार परियोजना को एक ऐसी अंतरराज्यीय व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें एक राज्य में बनने वाले जल ढांचे का लाभ कई राज्यों तक पहुंच सकता है।
किशाऊ परियोजना का एक महत्वपूर्ण पक्ष यमुना नदी से जुड़ा हुआ है। परियोजना के माध्यम से अपर यमुना बेसिन में जल प्रबंधन को बेहतर बनाने की उम्मीद है।
यमुना नदी का जलस्तर, प्रवाह और उपलब्धता लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में चर्चा का विषय रहा है। ऐसे में जल भंडारण और नियोजित जल प्रबंधन की व्यवस्था नदी बेसिन से जुड़े क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों और सरकारों के सामने चुनौती यह होगी कि जल संसाधन विकास के साथ नदी के पर्यावरणीय प्रवाह और पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं का भी उचित ध्यान रखा जाए।
परियोजना से होने वाले संभावित लाभों के साथ इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं। मुख्यमंत्री धामी ने स्पष्ट किया कि परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों का पुनर्वास उत्तराखंड सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रहेगा।
उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाते समय प्रभावित लोगों के हितों का संरक्षण आवश्यक है। जिन परिवारों को परियोजना के कारण विस्थापन या अन्य प्रभावों का सामना करना पड़ेगा, उनके साथ संवेदनशील और सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित किया जाएगा।
सरकार के सामने चुनौती केवल पुनर्वास की नहीं होगी, बल्कि प्रभावित परिवारों को नए स्थान पर आजीविका, बुनियादी सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने की भी होगी।
परियोजना के लिए लगभग 2500 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण की आवश्यकता बताए जाने से पर्यावरणीय पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वन भूमि के उपयोग के बदले नियमानुसार क्षतिपूरक वनीकरण करना होगा।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय और वनाच्छादित राज्य में इतनी बड़ी मात्रा में क्षतिपूरक वनीकरण के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराना आसान चुनौती नहीं है। मुख्यमंत्री ने इसी मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए केंद्र सरकार और परियोजना में शामिल सभी राज्यों से सहयोग की अपेक्षा की है।
उन्होंने कहा कि क्षतिपूरक वनीकरण के लिए आवश्यक भूमि की पहचान में उत्तराखंड को सहयोग दिया जाना चाहिए, ताकि परियोजना से जुड़े वन संबंधी प्रावधानों को पूरा किया जा सके।
किशाऊ परियोजना के निर्माण के दौरान पर्यावरण संरक्षण एक अहम मुद्दा रहेगा। बड़े जलाशय और बांध निर्माण का प्रभाव आसपास के जंगलों, स्थानीय जैव विविधता, जल स्रोतों और स्थानीय आबादी पर पड़ सकता है।
ऐसे में परियोजना को आगे बढ़ाने के साथ पर्यावरणीय स्वीकृतियों और वन संबंधी नियमों का पालन करना आवश्यक होगा। मुख्यमंत्री ने भी कहा कि उत्तराखंड विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन, वन भूमि से जुड़े प्रावधान, पुनर्वनीकरण तथा प्रभावित परिवारों के पुनर्वास जैसे मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
किशाऊ परियोजना को केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग का उदाहरण भी बताया जा रहा है। परियोजना से सीधे जुड़े राज्यों की संख्या अधिक होने के कारण इसके लिए केवल एक सरकार का निर्णय पर्याप्त नहीं है। जल बंटवारे, भूमि, पुनर्वास, पर्यावरण, वित्तीय हिस्सेदारी और बिजली उत्पादन जैसे विषयों पर राज्यों के बीच समन्वय जरूरी होगा।
मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि यह परियोजना अंतरराज्यीय सहयोग और सहकारी संघवाद का महत्वपूर्ण उदाहरण है। केंद्र तथा राज्य सरकारों के सामूहिक प्रयासों और लगातार संवाद के कारण दशकों से लंबित परियोजना को अब आगे बढ़ाने की स्थिति बनी है।
किशाऊ परियोजना से प्रस्तावित 422 मेगावाट विद्युत उत्पादन इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। जल संसाधन के उपयोग के साथ बिजली उत्पादन होने से परियोजना का महत्व और बढ़ जाता है।
जलविद्युत उत्पादन के माध्यम से बिजली व्यवस्था को अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध हो सकती है। हालांकि वास्तविक उत्पादन और परियोजना के लाभ निर्माण पूरा होने तथा संयंत्र के संचालन पर निर्भर करेंगे।
जलविद्युत परियोजनाओं में निर्माण लागत, पर्यावरणीय स्वीकृतियां, भौगोलिक परिस्थितियां और पुनर्वास जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए परियोजना को निर्धारित समयसीमा में पूरा करना भी बड़ी जिम्मेदारी होगी।
किशाऊ परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य जल का भंडारण और उसका बेहतर उपयोग है। इससे अपर यमुना बेसिन से जुड़े क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
कृषि प्रधान क्षेत्रों के लिए सिंचाई जल की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। वर्षा पर निर्भरता कम करने और जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने की दिशा में जलाशय उपयोगी साबित हो सकता है।
वहीं बढ़ती आबादी और शहरीकरण के बीच पेयजल की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बहुउद्देशीय जल परियोजनाओं के जरिए दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकारों के लिए महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
मुख्यमंत्री धामी ने विश्वास जताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सभी सहभागी राज्य परियोजना को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे।
उन्होंने कहा कि MoU पर हस्ताक्षर महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह दशकों से लंबित परियोजना को धरातल पर उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि परियोजना के पूर्ण होने से आने वाली पीढ़ियों को भी इसका लाभ मिल सकता है। जल, ऊर्जा, सिंचाई और पेयजल से जुड़ी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इसका दीर्घकालिक महत्व है।
MoU पर हस्ताक्षर के बाद परियोजना के सामने अब इसे वास्तविक निर्माण तक पहुंचाने की चुनौती होगी। इसमें विस्तृत परियोजना से जुड़े तकनीकी और वित्तीय पहलुओं को अंतिम रूप देना, आवश्यक पर्यावरण एवं वन स्वीकृतियां प्राप्त करना, भूमि संबंधी प्रक्रिया पूरी करना, प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और परियोजना निर्माण की कार्ययोजना को लागू करना शामिल होगा।
इसके अलावा छह राज्यों के बीच लगातार समन्वय बनाए रखना भी आवश्यक होगा। इतनी बड़ी अंतरराज्यीय परियोजना में किसी एक स्तर पर देरी का प्रभाव पूरी समयसीमा पर पड़ सकता है।
इसलिए समझौते के बाद सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यही होगी कि वर्षों की चर्चा को अब जमीन पर दिखाई देने वाले काम में बदला जाए।
मुख्यमंत्री धामी के अनुसार किशाऊ परियोजना से मिलने वाले लाभ केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित नहीं होंगे। जल संसाधनों का भंडारण, बिजली उत्पादन, सिंचाई और पेयजल आपूर्ति जैसी व्यवस्थाएं आने वाले दशकों में भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
हालांकि परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए इसके क्रियान्वयन में संतुलित दृष्टिकोण जरूरी होगा। प्रभावित परिवारों का पुनर्वास, वन क्षेत्र की भरपाई और पर्यावरणीय मानकों का पालन परियोजना की सफलता के महत्वपूर्ण आधार होंगे।
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह, केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू समेत सहभागी राज्य सरकारों और अधिकारियों का आभार व्यक्त किया।
परियोजना: किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना
परिकल्पना: वर्ष 1940
संबंधित राज्य: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली
जलाशय क्षमता: लगभग 1562 एमसीएम
प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता: 422 मेगावाट
वन भूमि की आवश्यकता: लगभग 2500 हेक्टेयर
प्रमुख उद्देश्य: जल भंडारण, सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन और यमुना बेसिन में जल प्रबंधन
प्रमुख चुनौती: प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भूमि की व्यवस्था
वर्तमान स्थिति: सहभागी राज्यों के बीच MoU पर हस्ताक्षर


