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नई दिल्ली। दुनिया इस समय जिस दौर से गुजर रही है, उसमें युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध, व्यापारिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया की अस्थिरता ने वैश्विक व्यवस्था के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था की दिशा और शक्ति-संतुलन को समझने का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।
भारत मंडपम में होने वाले इस सम्मेलन में ब्रिक्स के 11 सदस्य देश हिस्सा लेंगे। इन देशों की संयुक्त आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी इतनी बड़ी है कि ब्रिक्स का कोई भी बड़ा निर्णय विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। यही वजह है कि इस सम्मेलन पर केवल ब्रिक्स देशों की ही नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप समेत पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत पश्चिमी देशों की निगाहें भी इस बात पर रहेंगी कि ब्रिक्स इस बार वैश्विक व्यापार, डॉलर, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा, युद्ध और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर किस तरह की दिशा तय करता है।
हालांकि ब्रिक्स कोई सैन्य गठबंधन नहीं है और न ही इसके सभी सदस्य देशों के हित एक जैसे हैं। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और चुनौती दोनों है। चीन जहां इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन में पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में अधिक प्रभावशाली बनाना चाहता है, वहीं भारत इसे पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोकते हुए विकास, व्यापार, तकनीक और व्यावहारिक सहयोग का मंच बनाए रखना चाहता है। रूस के लिए यह पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद अपनी वैश्विक स्वीकार्यता दिखाने का माध्यम है, जबकि ईरान इसे क्षेत्रीय संकट के बीच अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रहा है।
ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और यूएई के भी अपने-अपने आर्थिक और रणनीतिक हित हैं। यही वजह है कि एक मंच पर 11 देश होंगे, लेकिन उनके सामने एजेंडे अलग-अलग होंगे।
इस बार सम्मेलन में broadly दस प्रमुख मुद्दे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं—
इन मुद्दों पर सभी देशों के हित पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। इसलिए सम्मेलन का सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि भारत किस तरह अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच सहमति का रास्ता निकालता है।
चीन की कोशिश लंबे समय से ब्रिक्स को पश्चिम केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के मुकाबले एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित करने की रही है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस मंच के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि वैश्विक राजनीति अब केवल अमेरिका और उसके सहयोगियों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद चीन के लिए इस मंच का महत्व और बढ़ गया है। उसके लिए रूस, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, मिस्र, इथियोपिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों का एक ही मंच पर आना वैश्विक शक्ति-संतुलन में बदलाव का संकेत है।
चीन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, भुगतान व्यवस्था को अधिक विविध बनाने और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर देगा। आईएमएफ, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग भी उसके एजेंडे का हिस्सा हो सकती है।
चीन की दूसरी प्राथमिकता ब्रिक्स के विस्तार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। हालांकि भारत समेत कुछ सदस्य देश यह सुनिश्चित करना चाहेंगे कि विस्तार के साथ संगठन की प्रभावशीलता और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर न हो।
मेजबान भारत का दृष्टिकोण सबसे अलग और संतुलित है। भारत एक तरफ अमेरिका के साथ क्वाड का सदस्य है तो दूसरी तरफ ब्रिक्स और एससीओ में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। नई दिल्ली की विदेश नीति का आधार ही रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था है।
भारत ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी संगठन के रूप में पेश करने के पक्ष में नहीं है। उसकी कोशिश है कि ब्रिक्स को विकास, आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने वाले मंच के रूप में स्थापित किया जाए।
भारत के एजेंडे में एमएसएमई, स्टार्टअप, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, यूपीआई जैसे डिजिटल भुगतान मॉडल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे विषय प्रमुख रहेंगे।
भारत यह भी चाहता है कि ब्रिक्स की बैठकों में केवल घोषणाएं न हों, बल्कि ऐसी परियोजनाएं सामने आएं जिनका सीधा लाभ सदस्य देशों के नागरिकों, कारोबारियों और उद्योगों को मिले।
मेजबान देश के रूप में नई दिल्ली की सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग देशों के हितों के बीच सहमति बनाना होगी। खासकर पश्चिम एशिया संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत संतुलित भाषा और व्यावहारिक समाधान पर जोर देगा।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए ब्रिक्स सम्मेलन बेहद महत्वपूर्ण है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच रूस इस मंच के माध्यम से यह संदेश देना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ा है।
मास्को के लिए चीन और भारत जैसे बड़े देशों के साथ निरंतर आर्थिक और राजनीतिक संवाद महत्वपूर्ण है। रूस ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, अनाज व्यापार, रक्षा सहयोग, परिवहन गलियारों और भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाएगा।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का मुद्दा भी रूस के लिए विशेष महत्व रखता है। पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करना उसकी रणनीतिक प्राथमिकता रही है। हालांकि भारत इसे सीधे डॉलर विरोधी अभियान के रूप में बदलने के पक्ष में नहीं है।
पुतिन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय मुलाकात पर भी नजर रहेगी। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, रक्षा, निवेश और परिवहन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की संभावना सम्मेलन की कूटनीतिक अहमियत और बढ़ाएगी।
ईरान के लिए ब्रिक्स सम्मेलन केवल आर्थिक मंच नहीं, बल्कि कूटनीतिक संदेश देने का भी अवसर है। क्षेत्रीय तनाव और पश्चिमी दबाव के बीच तेहरान यह दिखाना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग नहीं है।
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान को बढ़ाने की वकालत कर सकते हैं। भारत के साथ चाबहार बंदरगाह का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा।
ईरान पश्चिम एशिया की स्थिति पर अपना पक्ष मजबूती से रखेगा। वहीं भारत की कोशिश होगी कि इस मुद्दे पर ब्रिक्स में ऐसी भाषा अपनाई जाए, जिस पर अधिकतम सदस्य देशों की सहमति बन सके।
ब्राजील ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज के रूप में मजबूत करना चाहता है। जलवायु परिवर्तन, अमेजन संरक्षण, कृषि निर्यात, खाद्य सुरक्षा और विकासशील देशों के लिए वित्त उसके प्रमुख मुद्दे हैं।
ब्राजील न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका को मजबूत करने और हरित परियोजनाओं के लिए विकासशील देशों को अधिक वित्त उपलब्ध कराने पर जोर दे सकता है।
उसका उद्देश्य यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी और वित्तीय बोझ केवल विकासशील देशों पर न पड़े।
दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स में पूरे अफ्रीकी महाद्वीप की प्राथमिकताओं को अधिक मजबूती से उठाना चाहता है। राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के एजेंडे में औद्योगिक विकास, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा संक्रमण, बुनियादी ढांचा और अफ्रीकी देशों के लिए निवेश प्रमुख रहेंगे।
अफ्रीका के पास कोबाल्ट, प्लैटिनम, मैंगनीज, क्रोमियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार हैं। ऐसे में नई ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में अफ्रीका का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
दक्षिण अफ्रीका चाहता है कि अफ्रीकी देशों को केवल कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता के रूप में न देखा जाए, बल्कि खनिजों के प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन में भी उन्हें हिस्सेदारी मिले।
मिस्र का रणनीतिक महत्व उसकी भौगोलिक स्थिति और स्वेज नहर के कारण बेहद बड़ा है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग पर स्थित मिस्र ब्रिक्स की आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी व्यापार मार्गों, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर देंगे।
पश्चिम एशिया की स्थिति भी मिस्र के लिए महत्वपूर्ण है। गाजा और क्षेत्रीय तनाव का असर व्यापार मार्गों, पर्यटन, ऊर्जा और निवेश पर पड़ता है। इसलिए मिस्र ब्रिक्स में क्षेत्रीय स्थिरता की आवश्यकता को भी प्रमुखता से उठा सकता है।
इथियोपिया ब्रिक्स में अपेक्षाकृत नया सदस्य है, लेकिन अफ्रीका के विकास और औद्योगीकरण के लिहाज से उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री अबी अहमद विकास वित्त, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, कृषि और औद्योगिक निवेश के अवसरों पर जोर दे सकते हैं।
इथियोपिया चाहता है कि ब्रिक्स के वित्तीय संस्थानों और सदस्य देशों के निवेश से अफ्रीकी देशों में सड़क, रेल, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक परियोजनाओं को बढ़ावा मिले।
इंडोनेशिया के लिए यह ब्रिक्स में अपनी नई भूमिका को मजबूत करने का अवसर है। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो व्यापार, समुद्री संपर्क, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे सकते हैं।
जकार्ता ब्रिक्स को आसियान और ग्लोबल साउथ के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखता है। इंडोनेशिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति का इस्तेमाल व्यापार और निवेश बढ़ाने के लिए करना चाहता है।
दुनिया की बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के रूप में इंडोनेशिया ब्रिक्स के भीतर अपनी भूमिका को भविष्य की वैश्विक शक्ति के रूप में मजबूत करने का प्रयास करेगा।
सऊदी अरब के लिए ऊर्जा बाजार, निवेश और आर्थिक विविधीकरण प्रमुख प्राथमिकताएं रहेंगी। तेल आधारित अर्थव्यवस्था को बदलने की उसकी दीर्घकालिक योजना के लिए विदेशी निवेश और नई तकनीक महत्वपूर्ण हैं।
ब्रिक्स के बड़े बाजार सऊदी अरब के लिए निवेश और व्यापार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। वहीं ऊर्जा बाजार में सऊदी अरब की भूमिका ब्रिक्स की ऊर्जा सुरक्षा चर्चा को महत्वपूर्ण बनाती है।
यूएई के सामने दोहरी प्राथमिकता होगी—एक तरफ आर्थिक और ऊर्जा सहयोग बढ़ाना और दूसरी तरफ पश्चिम एशिया संकट के बीच क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना।
यूएई यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि ब्रिक्स के मंच पर पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा एकतरफा न हो। वह क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर जोर दे सकता है।
अबूधाबी की वित्तीय क्षमता और वैश्विक निवेश नेटवर्क भी ब्रिक्स देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत समेत कई देशों के साथ यूएई के व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़े हैं।
ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका की नजर भी इस सम्मेलन पर बनी हुई है। खासकर डॉलर, वैश्विक भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा व्यापार और ब्रिक्स विस्तार से जुड़े फैसले वॉशिंगटन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति और टैरिफ आधारित रणनीति के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ब्रिक्स देश वैश्विक व्यापार व्यवस्था को लेकर क्या रुख अपनाते हैं।
हालांकि ब्रिक्स के सभी देश डॉलर व्यवस्था को खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं। भारत का रुख विशेष रूप से व्यावहारिक है। नई दिल्ली का जोर भुगतान विकल्पों को बढ़ाने पर हो सकता है, लेकिन वह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को अचानक बदलने की कोशिश के बजाय चरणबद्ध और बाजार आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देता है।
ब्रिक्स में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अलग-अलग देशों की मुद्राओं के बीच स्थिरता, परिवर्तनीयता और भुगतान प्रणाली को कैसे विकसित किया जाए।
भारत के लिए यूपीआई जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यदि ब्रिक्स देश डिजिटल भुगतान के इंटरऑपरेबल मॉडल और कम लागत वाली सीमा-पार भुगतान प्रणाली विकसित करते हैं तो इसका लाभ छोटे व्यापारियों और एमएसएमई को भी मिल सकता है।
ब्रिक्स की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक छोटे और मध्यम उद्यमों के बीच सीधा व्यापार है।
भारत के टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, खाद्य प्रसंस्करण, खिलौने, हस्तशिल्प, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो कंपोनेंट उद्योगों के लिए ब्रिक्स बाजार बड़े अवसर उपलब्ध करा सकते हैं।
इसी तरह भारत के स्टार्टअप डिजिटल सेवाओं, फिनटेक, एआई, साइबर सुरक्षा, हेल्थटेक और एग्रीटेक जैसे क्षेत्रों में ब्रिक्स देशों के बाजारों में प्रवेश कर सकते हैं।
यदि बायर-सैलर मीट, डिजिटल बिजनेस प्लेटफॉर्म, आसान भुगतान और सरल व्यापार प्रक्रियाओं को बढ़ावा मिलता है तो ब्रिक्स का फायदा केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा।
इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती मांग ने महत्वपूर्ण खनिजों को रणनीतिक संपत्ति बना दिया है।
ब्रिक्स देशों के पास कई महत्वपूर्ण खनिज संसाधन और औद्योगिक क्षमताएं हैं। ऐसे में खनिजों की खोज, खनन, प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला में सहयोग भविष्य का बड़ा एजेंडा बन सकता है।
भारत के लिए यह विशेष महत्व रखता है, क्योंकि आत्मनिर्भर विनिर्माण के लिए कच्चे माल की भरोसेमंद आपूर्ति जरूरी है।
ब्रिक्स का न्यू डेवलपमेंट बैंक भी सम्मेलन में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय हो सकता है। विकासशील देशों के बुनियादी ढांचे, स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल कनेक्टिविटी और जलवायु परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक वित्तीय स्रोत विकसित करना इसकी प्रमुख संभावनाओं में शामिल है।
यदि बैंक की ऋण क्षमता और सदस्य देशों में परियोजनाओं का विस्तार होता है तो ब्रिक्स के आर्थिक प्रभाव को जमीन पर उतारने में मदद मिल सकती है।
ब्रिक्स के सामने सबसे कठिन राजनीतिक मुद्दों में पश्चिम एशिया संकट भी रहेगा। ईरान, यूएई, मिस्र और सऊदी अरब जैसे सदस्य देशों के क्षेत्रीय हित अलग-अलग हैं। भारत की भूमिका यहां संतुलन बनाने वाले देश की होगी।
नई दिल्ली की कोशिश होगी कि ब्रिक्स किसी एक पक्ष का राजनीतिक मंच न बने और इसके बजाय युद्धविराम, मानवीय सहायता, क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापार मार्गों की सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दों पर सहमति बने।
ब्रिक्स में अलग-अलग देशों की प्राथमिकताओं को देखते हुए सम्मेलन के अंत में जारी होने वाला संयुक्त बयान विशेष महत्व रखेगा।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, व्यापार प्रतिबंध, डॉलर, भुगतान प्रणाली और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे विषयों पर शब्दों का चयन बेहद सावधानी से करना होगा।
भारत के लिए यह सम्मेलन की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा भी होगी। मेजबान देश के रूप में भारत ऐसी भाषा चाहता है जिसमें सभी सदस्य देश अपने हितों को देख सकें और ब्रिक्स की एकता भी बनी रहे।
ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल नेताओं की बैठकों और घोषणाओं तक सीमित रहेगा या वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली संस्थागत शक्ति बन पाएगा।
इसके लिए सदस्य देशों को तीन मोर्चों पर ठोस प्रगति करनी होगी—व्यापार, वित्त और तकनीक।
यदि ब्रिक्स देश आपसी व्यापार बढ़ाने, भुगतान की लागत कम करने, निवेश आसान बनाने, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने, तकनीकी सहयोग बढ़ाने और विकासशील देशों के लिए वित्त उपलब्ध कराने में सफल होते हैं, तो इसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देगा।
भारत की मेजबानी में होने वाला यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली ब्रिक्स को टकराव की राजनीति से निकालकर सहयोग और विकास की दिशा में ले जाना चाहती है।
ब्रिक्स की असली तस्वीर यही है—एक मंच पर 11 देश हैं, लेकिन सभी के लक्ष्य अलग हैं। चीन वैश्विक शक्ति-संतुलन बदलना चाहता है, रूस प्रतिबंधों के बीच अपनी मौजूदगी साबित करना चाहता है, ईरान कूटनीतिक समर्थन तलाश रहा है, भारत बहुध्रुवीय और संतुलित विश्व व्यवस्था चाहता है, जबकि अफ्रीकी और पश्चिम एशियाई देश व्यापार, निवेश, ऊर्जा और विकास के अपने हितों को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
यही विविधता ब्रिक्स को जटिल भी बनाती है और प्रभावशाली भी।
भारत के सामने चुनौती यह है कि इन अलग-अलग हितों को एक साझा आर्थिक एजेंडे में बदला जाए। यदि नई दिल्ली ऐसा करने में सफल होती है तो 12-13 सितंबर का सम्मेलन केवल एक और शिखर बैठक नहीं रहेगा, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका का महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है।
दुनिया की नजर इसलिए सिर्फ इस बात पर नहीं है कि ब्रिक्स क्या कहता है, बल्कि इस पर भी है कि भारत की मेजबानी में ब्रिक्स क्या ठोस करके दिखाता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


