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नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में इंडिया गठबंधन की 'चलो दिल्ली' महारैली और मार्च के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रमुख कारोबारी केंद्र कनॉट प्लेस में दुकानों के बंद रहने को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी ने दावा किया कि इंडिया गठबंधन की महारैली में शामिल होने दिल्ली पहुंचे लोगों से उन्होंने स्थानीय व्यापारियों की मदद के लिए खरीदारी करने की अपील की थी, लेकिन जब वह कनॉट प्लेस पहुंचे तो उन्हें पता चला कि बीजेपी ने कथित तौर पर सभी दुकानें जबरन बंद करवा दी हैं।
राहुल गांधी ने इस संबंध में सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश साझा करते हुए कहा कि उन्होंने रैली और मार्च में शामिल होने आ रहे लोगों से दिल्ली के बाजारों में खरीदारी करने का आग्रह किया था, ताकि त्योहारों के इस मौसम में स्थानीय दुकानदारों और व्यापारियों को आर्थिक लाभ मिल सके। लेकिन कनॉट प्लेस पहुंचने पर दुकानों के बंद होने की जानकारी मिलने से उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधा।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर व्यापारियों का नुकसान कौन कर रहा है और इसके पीछे किसकी भूमिका है? राहुल गांधी के मुताबिक, लोगों को यह समझने की जरूरत है कि व्यापारियों को किस तरह नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब दिल्ली में दीपावली, छठ और भाईदूज के आसपास का महत्वपूर्ण कारोबारी समय चल रहा है और बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही व्यापारियों के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
राहुल गांधी के इस बयान के बाद दिल्ली में रैली के आयोजन, बाजारों की स्थिति, यातायात प्रतिबंधों और व्यापारियों को होने वाले संभावित आर्थिक नुकसान को लेकर राजनीतिक और व्यावसायिक बहस तेज हो गई है।
इंडिया गठबंधन की महारैली और मार्च से एक दिन पहले राहुल गांधी ने दिल्ली आने वाले लोगों से स्थानीय दुकानदारों और व्यापारियों की मदद करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि त्योहारों का मौसम चल रहा है और दिल्ली में बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों तथा शहरों से आने वाले हैं। ऐसे में उन्हें केवल राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर वापस नहीं जाना चाहिए, बल्कि दिल्ली के बाजारों में जाकर कुछ खरीदारी भी करनी चाहिए।
राहुल गांधी ने अपने संदेश में कहा था कि दीपावली, छठ और भाईदूज जैसे त्योहारों के अवसर पर बाजारों में खरीदारी बढ़ती है। ऐसे में बाहर से आने वाले लाखों लोग यदि दिल्ली के स्थानीय व्यापारियों से सामान खरीदेंगे तो इससे छोटे दुकानदारों, कारोबारियों और बाजारों को फायदा पहुंचेगा।
उन्होंने लोगों से कहा था कि वे विरोध प्रदर्शन, मार्च और महारैली में शामिल होने के साथ-साथ कुछ समय खरीदारी के लिए भी निकालें। उनका तर्क था कि इससे लोकतांत्रिक विरोध कार्यक्रम में भागीदारी के साथ स्थानीय व्यापार को भी समर्थन मिलेगा।
राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि उन्हें विश्वास है कि रैली से व्यापारियों को नुकसान नहीं होगा। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया था कि वह रैली के कारण व्यापार प्रभावित होने की आशंका को लेकर अफवाहें फैला रही है। उन्होंने लोगों से दोनों काम एक साथ करने की अपील की थी।
रविवार, 1 नवंबर को इंडिया गठबंधन के मार्च और महारैली में शामिल होने के लिए जाते समय राहुल गांधी ने कनॉट प्लेस में दुकानों के बंद रहने का मुद्दा उठाया।
उन्होंने कहा कि जब लोगों से खरीदारी करने और स्थानीय कारोबारियों का समर्थन करने की अपील की गई थी, तब कनॉट प्लेस में दुकानों का बंद मिलना कई सवाल खड़े करता है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने जबरदस्ती दुकानें बंद करवाईं। उन्होंने व्यापारियों के आर्थिक नुकसान के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि देश के लोगों को यह देखना चाहिए कि व्यापारियों का नुकसान कौन कर रहा है और किस तरह किया जा रहा है।
हालांकि, दुकानें बंद होने के पीछे बीजेपी की कथित भूमिका को लेकर राहुल गांधी ने आरोप लगाए हैं। इसे किसी स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दुकानों के बंद रहने के कारणों में रैली के दौरान संभावित भीड़, यातायात प्रतिबंध, सुरक्षा व्यवस्था और माल की आवाजाही को लेकर व्यापारियों की चिंताएं भी शामिल रही हैं।
दिल्ली में इंडिया गठबंधन की महारैली को लेकर व्यापारिक संगठनों ने पहले ही चिंता व्यक्त की थी। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने राहुल गांधी को पत्र लिखकर रैली के आयोजन से राजधानी के प्रमुख बाजारों में व्यापार प्रभावित होने की आशंका जताई थी।
व्यापारियों का कहना था कि दिल्ली में त्योहारों के मौसम के दौरान कारोबार अपने महत्वपूर्ण दौर में होता है। इस समय दुकानदारों ने बड़ी मात्रा में सामान मंगाया होता है और ग्राहकों की आवाजाही भी बढ़ जाती है। ऐसे में यदि रैली के कारण सड़कों पर भारी भीड़, यातायात प्रतिबंध और वाहनों की आवाजाही पर रोक लगती है, तो बाजारों तक ग्राहकों और माल की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
सीटीआई के अध्यक्ष बृजेश गोयल ने कहा था कि रैली के कारण रामलीला मैदान के आसपास के बाजारों में लगभग 80 प्रतिशत दुकानें बंद रहने की आशंका है। उनका सवाल था कि यदि दुकानें ही नहीं खुलेंगी और बाजारों तक ग्राहक नहीं पहुंच पाएंगे, तो रैली में आने वाले लोग खरीदारी कैसे करेंगे?
व्यापारियों की यह चिंता राहुल गांधी की खरीदारी संबंधी अपील के बाद और अधिक चर्चा में आ गई। एक तरफ कांग्रेस की ओर से बाजारों में खरीदारी के जरिए व्यापारियों की मदद करने की बात कही गई, वहीं दूसरी तरफ व्यापार संगठनों ने कहा कि रैली के दौरान पैदा होने वाली परिस्थितियों में खरीदारी करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो सकता है।
चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने रैली को लेकर राहुल गांधी को एक से अधिक बार पत्र लिखकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया था। 1 नवंबर को संगठन ने चौथे पत्र के माध्यम से भी बाजारों की स्थिति और कारोबार पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर अपनी बात रखी।
सीटीआई के मुताबिक, रामलीला मैदान के आसपास लगभग पांच किलोमीटर के दायरे में दिल्ली के कई बड़े थोक और खुदरा बाजार आते हैं। इनमें कश्मीरी गेट, मोरी गेट, जनपथ, चांदनी चौक, चावड़ी बाजार, खारी बावली, नया बाजार, सदर बाजार, अजमेरी गेट, दरियागंज, पहाड़गंज, कमला मार्केट, जामा मस्जिद, भागीरथ पैलेस, लाजपत राय मार्केट, किनारी बाजार, दरिबा कलां, बल्लीमारान, फतेहपुरी, तिलक बाजार, कनॉट प्लेस, पालिका बाजार और गफ्फार मार्केट जैसे प्रमुख कारोबारी केंद्र शामिल हैं।
व्यापार संगठन के अनुसार, इन बाजारों में लगभग तीन लाख दुकानें हैं। संगठन ने आशंका जताई थी कि रैली के दिन इनमें से लगभग 2.5 लाख दुकानें बंद रह सकती हैं और करीब 80 प्रतिशत कारोबार प्रभावित हो सकता है।
सीटीआई ने यह भी कहा कि रैली के कारण केवल खुदरा बाजार ही नहीं, बल्कि थोक व्यापार, परिवहन, माल की ढुलाई और गोदामों से दुकानों तक सामान पहुंचाने की व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
सीटीआई के अध्यक्ष बृजेश गोयल ने रैली के कारण कारोबार प्रभावित होने की आशंका जताते हुए कहा था कि यदि बाजार बंद रहे और परिवहन व्यवस्था भी बाधित हुई, तो 10 से 12 हजार करोड़ रुपये तक के कारोबार पर असर पड़ सकता है।
यह आंकड़ा व्यापार संगठन की ओर से जताई गई आशंका है, न कि रैली के बाद सत्यापित वास्तविक नुकसान का आंकड़ा।
संगठन का कहना है कि दीपावली के आसपास दिल्ली के बाजारों में बड़ी मात्रा में खरीदारी होती है। इस समय दुकानदारों के पास ग्राहकों की मांग के अनुसार सामान उपलब्ध रहना जरूरी होता है। यदि ग्राहक बाजारों तक नहीं पहुंचते और दुकानों तक माल नहीं पहुंच पाता, तो कारोबार की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
व्यापारियों के अनुसार, त्योहारों के मौसम में एक दिन का कारोबार भी कई दुकानदारों के लिए महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में बाजार बंद रहने या ग्राहकों की आवाजाही कम होने से छोटे और मध्यम कारोबारियों को विशेष परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
सीटीआई ने अपनी चिंता में माल की आवाजाही को भी प्रमुख मुद्दा बनाया था। बृजेश गोयल के अनुसार, धनतेरस और दीपावली के लिए बड़ी मात्रा में सामान पहले ही गोदामों में पहुंच चुका था, लेकिन रैली के कारण परिवहन और लोडिंग-अनलोडिंग प्रभावित होने की आशंका थी।
उन्होंने कहा था कि यदि ट्रक और टेंपो बाजारों तक नहीं पहुंच पाएंगे, तो दुकानदारों को समय पर माल उपलब्ध नहीं हो सकेगा। इसका असर ग्राहकों की खरीदारी और व्यापारियों की बिक्री पर पड़ेगा।
दिल्ली में विभिन्न औद्योगिक और व्यापारिक क्षेत्रों से हर दिन बड़ी संख्या में ट्रक और छोटे व्यावसायिक वाहन सामान लेकर बाजारों में पहुंचते हैं। सीटीआई के मुताबिक, प्रतिदिन लगभग पांच हजार ट्रक और टेंपो माल की आवाजाही से जुड़े रहते हैं। संगठन ने दावा किया था कि रैली के दिन इस पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है।
व्यापारियों की चिंता केवल दुकानों के खुलने या बंद होने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके सामने यह सवाल भी था कि यदि दुकान खुली रहे, लेकिन माल ही नहीं पहुंचे तो बिक्री कैसे होगी?
दिल्ली के पुराने और मध्य क्षेत्र के बाजार देश के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में गिने जाते हैं। यहां इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, आभूषण, मोबाइल, हार्डवेयर, मशीनरी, दवाइयां, सजावटी सामान और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का बड़ा कारोबार होता है।
चांदनी चौक, सदर बाजार, खारी बावली और भागीरथ पैलेस जैसे बाजारों का व्यापार केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। यहां से देश के विभिन्न हिस्सों में सामान की आपूर्ति की जाती है।
इसी तरह कनॉट प्लेस दिल्ली का प्रमुख खुदरा और व्यावसायिक केंद्र है, जहां स्थानीय ग्राहकों के अलावा दूसरे राज्यों से आने वाले लोग भी खरीदारी करते हैं।
ऐसे में इन बाजारों में यातायात और आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने से व्यापारियों के साथ-साथ ग्राहकों, परिवहन कारोबारियों और दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है।
सीटीआई ने अपने पत्रों और बयानों में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं है। संगठन के अनुसार, वह व्यापारियों के हितों और उनकी रोजी-रोटी से जुड़े मुद्दे उठा रहा है।
व्यापार संगठनों का कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और गठबंधनों को रैली तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन ऐसे कार्यक्रमों की योजना बनाते समय स्थानीय बाजारों, व्यापारियों और आम नागरिकों की सुविधाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सीटीआई ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि व्यापारियों की चिंताओं को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। संगठन का कहना है कि बाजारों में कारोबार करने वाले लोग किसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा नहीं बनना चाहते, बल्कि वे चाहते हैं कि उनका व्यवसाय सामान्य रूप से चलता रहे।
दिल्ली के व्यापारिक संगठनों की चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि त्योहारों के आसपास बाजारों में होने वाली बिक्री से ही बड़ी संख्या में दुकानदारों का आर्थिक संतुलन बना रहता है।
छोटे दुकानदारों के लिए दीपावली का कारोबार साल के महत्वपूर्ण कारोबारी अवसरों में से एक होता है। इस दौरान वे अतिरिक्त स्टॉक रखते हैं, कर्मचारियों की संख्या बढ़ाते हैं और ग्राहकों की मांग को देखते हुए पहले से तैयारियां करते हैं।
यदि बाजारों में ग्राहक नहीं पहुंचते, दुकानें बंद रहती हैं या माल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल दुकानदार पर नहीं पड़ता। दुकान में काम करने वाले कर्मचारियों, माल ढुलाई करने वाले वाहन चालकों, गोदामों में काम करने वाले श्रमिकों और छोटे आपूर्तिकर्ताओं तक इसका प्रभाव पहुंच सकता है।
इसी कारण व्यापार संगठनों ने राजनीतिक दलों से अपील की थी कि वे अपने कार्यक्रमों का आयोजन करते समय व्यापारिक गतिविधियों और आम लोगों की सुविधाओं का भी ध्यान रखें।
दिल्ली में सामने आए इस पूरे विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है कि क्या बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और सामान्य व्यावसायिक गतिविधियों के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को रैली, मार्च और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है। दूसरी ओर व्यापारियों को भी अपने प्रतिष्ठान सामान्य रूप से संचालित करने और आजीविका कमाने का अवसर मिलना चाहिए।
इसके लिए आयोजकों, प्रशासन, पुलिस और व्यापारिक संगठनों के बीच पहले से समन्वय जरूरी है। यदि यातायात डायवर्जन, पार्किंग, माल ढुलाई और बाजारों तक पहुंचने के वैकल्पिक रास्तों की जानकारी समय पर उपलब्ध कराई जाए, तो आम नागरिकों और व्यापारियों को होने वाली परेशानियों को कम किया जा सकता है।
व्यापारियों की मांग भी यही रही कि राजनीतिक कार्यक्रमों की वजह से उनके कारोबार और रोजी-रोटी पर अनावश्यक संकट नहीं आना चाहिए।
कनॉट प्लेस में दुकानें बंद मिलने के बाद राहुल गांधी ने बीजेपी पर आरोप लगाया, जबकि व्यापारिक संगठनों ने रैली के कारण बाजारों और परिवहन व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर पहले से चेतावनी दी थी।
यहां दो अलग-अलग मुद्दे सामने आते हैं। पहला, कनॉट प्लेस में दुकानें बंद रहने के पीछे वास्तविक कारण क्या था और क्या किसी राजनीतिक दल या प्रशासन की ओर से दुकानें बंद कराने का निर्देश दिया गया था? दूसरा, रैली के कारण यातायात और व्यापारिक गतिविधियों पर कितना वास्तविक आर्थिक असर पड़ा?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब दुकानदारों के बयान, बाजारवार वास्तविक स्थिति, पुलिस और प्रशासन की जानकारी तथा व्यापारिक आंकड़ों से ही सामने आ सकता है।
फिलहाल दिल्ली में व्यापारियों के नुकसान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं। राहुल गांधी ने बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि बीजेपी ने कांग्रेस की रैली के आयोजन पर सवाल उठाए हैं। वहीं व्यापारी संगठन अपनी रोजी-रोटी और कारोबार की सुरक्षा को लेकर चिंता जता रहे हैं। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि राजनीतिक गतिविधियों और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ आम व्यापारियों की आजीविका भी सुरक्षित रह सके।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


