यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। स्ट्रोक यानी मस्तिष्काघात एक गंभीर चिकित्सकीय आपातस्थिति है, जिसमें समय पर उपचार नहीं मिलने पर मरीज की जान जा सकती है या उसे लंबे समय तक अथवा स्थायी दिव्यांगता का सामना करना पड़ सकता है। यह बीमारी अचानक व्यक्ति की सामान्य जिंदगी को प्रभावित कर सकती है। कुछ ही मिनटों में बोलने, चलने, देखने और शरीर के अंगों को नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, समय रहते लक्षणों की पहचान, तत्काल अस्पताल पहुंचने और आधुनिक उपचार तकनीकों की सहायता से कई मरीजों की जान बचाने तथा दिव्यांगता के खतरे को कम करने की संभावना रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, स्ट्रोक के मामलों में प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण होता है। मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने पर तंत्रिका कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। इसलिए लक्षणों को सामान्य कमजोरी, थकान, चक्कर या उम्र से जुड़ी परेशानी समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
स्ट्रोक के प्रति जागरूकता बढ़ाना, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे जोखिम कारकों पर नियंत्रण रखना तथा आपातकालीन उपचार की सुविधाओं तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करना इस बीमारी से होने वाली मौतों और दिव्यांगता को कम करने के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
स्ट्रोक उस स्थिति को कहा जाता है, जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्तवाहिका फटने से रक्तस्राव होने लगता है। मस्तिष्क को सामान्य रूप से काम करने के लिए लगातार ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। रक्त प्रवाह में रुकावट आने पर मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं।
स्ट्रोक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है।
इस्केमिक स्ट्रोक: यह तब होता है, जब रक्त का थक्का मस्तिष्क की किसी रक्तवाहिका में रुकावट पैदा कर देता है। इससे मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंच पाता। इस प्रकार का स्ट्रोक अक्सर रक्तवाहिकाओं में जमा वसा, रक्त के थक्के या हृदय से मस्तिष्क तक पहुंचे थक्के के कारण हो सकता है।
हेमरेजिक स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क की कोई रक्तवाहिका फट जाती है और रक्त आसपास के ऊतकों में फैलने लगता है। इससे मस्तिष्क पर दबाव बढ़ सकता है और आसपास की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। अनियंत्रित उच्च रक्तचाप और कुछ प्रकार की रक्तवाहिका संबंधी समस्याएं इसके जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
दोनों प्रकार के स्ट्रोक की पहचान और उपचार की रणनीति अलग-अलग होती है। इसीलिए अस्पताल पहुंचने पर मस्तिष्क की इमेजिंग जांच कराना बेहद जरूरी होता है। बिना जांच के यह मान लेना कि स्ट्रोक केवल खून के थक्के के कारण हुआ है, खतरनाक साबित हो सकता है।
मस्तिष्क शरीर के लगभग सभी महत्वपूर्ण कार्यों को नियंत्रित करता है। बोलना, समझना, चलना, हाथ-पैर हिलाना, देखना, निगलना और संतुलन बनाए रखना मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों की कार्यप्रणाली पर निर्भर करता है।
जब किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति रुक जाती है, तो वहां की कोशिकाएं तेजी से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। यदि रक्त प्रवाह को समय रहते बहाल नहीं किया जाता, तो नुकसान बढ़ सकता है। परिणामस्वरूप मरीज को हाथ-पैर में कमजोरी, बोलने में कठिनाई, चलने में परेशानी या अन्य गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
समय पर उपचार मिलने से प्रभावित मस्तिष्क के कुछ हिस्सों को बचाने और दीर्घकालिक दिव्यांगता की आशंका कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, उपचार का परिणाम स्ट्रोक के प्रकार, प्रभावित हिस्से, गंभीरता, मरीज की पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं और उपचार मिलने के समय पर निर्भर करता है।
इसी कारण स्ट्रोक के मामलों में घर पर इंतजार करने, घरेलू उपचार आजमाने या लक्षण अपने आप ठीक होने की उम्मीद करने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
स्ट्रोक की शुरुआती पहचान के लिए एफएएसटी सिद्धांत उपयोगी माना जाता है। यह लोगों को कुछ प्रमुख लक्षणों की पहचान करने और बिना देर किए मदद लेने की याद दिलाता है।
एफ — फेस यानी चेहरा: व्यक्ति को मुस्कुराने के लिए कहें। यदि चेहरे का एक हिस्सा नीचे झुका हुआ दिखाई दे या मुस्कान असमान हो, तो यह स्ट्रोक का संकेत हो सकता है।
ए — आर्म यानी बांह: व्यक्ति से दोनों हाथ ऊपर उठाने को कहें। यदि एक हाथ कमजोर हो, नीचे गिर जाए या शरीर के एक तरफ अचानक सुन्नपन महसूस हो, तो सावधान हो जाएं।
एस — स्पीच यानी बोलना: यदि व्यक्ति की आवाज लड़खड़ा रही हो, शब्द स्पष्ट न निकल रहे हों या वह सामान्य बात समझने अथवा बोलने में परेशानी महसूस कर रहा हो, तो इसे गंभीरता से लें।
टी — टाइम यानी समय: इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं और मरीज को स्ट्रोक के उपचार की सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाएं।
स्ट्रोक के कुछ अन्य संकेत भी हो सकते हैं। इनमें अचानक एक या दोनों आंखों से देखने में परेशानी, दोहरा दिखाई देना, संतुलन बिगड़ना, चलने में कठिनाई, भ्रम या बिना स्पष्ट कारण के अत्यंत तेज सिरदर्द शामिल हैं।
हर मरीज में सभी लक्षण एक साथ दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है। केवल एक लक्षण भी आपातकालीन सहायता लेने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
कई बार स्ट्रोक जैसे लक्षण कुछ मिनटों या घंटों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। ऐसी स्थिति को ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (टीआईए) कहा जा सकता है। इसे सामान्य कमजोरी या अस्थायी परेशानी समझना बड़ी भूल हो सकती है।
टीआईए में मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति थोड़े समय के लिए बाधित होती है। इसके लक्षण स्ट्रोक जैसे हो सकते हैं, लेकिन वे पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं। इसके बावजूद यह भविष्य में स्ट्रोक होने की आशंका का महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत है।
यदि चेहरे में अचानक टेढ़ापन, हाथ-पैर में कमजोरी या बोलने में परेशानी हुई हो, भले ही बाद में सब सामान्य हो जाए, तो तत्काल चिकित्सा जांच जरूरी है। यह तय करना डॉक्टर का काम है कि समस्या का कारण क्या था और आगे स्ट्रोक से बचाव के लिए कौन-से कदम उठाने चाहिए।
स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है, हालांकि बढ़ती उम्र के साथ इसका जोखिम अधिक हो जाता है। कुछ जोखिम कारक ऐसे हैं, जिन्हें नियंत्रित करके स्ट्रोक की आशंका कम की जा सकती है।
उच्च रक्तचाप: अनियंत्रित ब्लड प्रेशर स्ट्रोक के सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में से एक है। लंबे समय तक उच्च रक्तचाप रहने से रक्तवाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है और रक्तस्राव अथवा रक्तवाहिकाओं में रुकावट का खतरा बढ़ सकता है।
मधुमेह: लंबे समय तक बढ़ा हुआ रक्त शर्करा स्तर रक्तवाहिकाओं को प्रभावित कर सकता है। मधुमेह के मरीजों के लिए नियमित जांच और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उपचार जरूरी है।
बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल: रक्त में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक होने से धमनियों में वसा जमा हो सकती है। इससे रक्त प्रवाह प्रभावित होने और थक्का बनने का जोखिम बढ़ सकता है।
हृदय संबंधी बीमारियां: एट्रियल फिब्रिलेशन जैसी हृदय की अनियमित धड़कन से हृदय में थक्का बनने और उसके मस्तिष्क तक पहुंचने की आशंका बढ़ सकती है।
धूम्रपान और तंबाकू: धूम्रपान रक्तवाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकता है। तंबाकू से दूरी बनाना बचाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता: अत्यधिक वजन और नियमित शारीरिक गतिविधि की कमी से उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य चयापचय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
अस्वास्थ्यकर खानपान: नमक, संतृप्त वसा और अत्यधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा सकता है। संतुलित भोजन और उचित मात्रा में फल-सब्जियों का सेवन बेहतर स्वास्थ्य में सहायक होता है।
इसके अतिरिक्त अत्यधिक शराब का सेवन और कुछ अन्य चिकित्सकीय स्थितियां भी जोखिम बढ़ा सकती हैं। प्रत्येक व्यक्ति का जोखिम अलग होता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और बचाव की योजना बनाना उपयोगी है।
स्ट्रोक के संदिग्ध मरीज को अस्पताल पहुंचने पर सबसे पहले उसकी स्थिति का आकलन किया जाता है। चिकित्सकीय टीम लक्षणों की शुरुआत का समय, रक्तचाप, रक्त शर्करा, चेतना का स्तर और शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यक्षमता की जांच कर सकती है।
इसके बाद सीटी स्कैन या जरूरत के अनुसार एमआरआई जैसी जांच की जाती है। इनसे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ है या रक्तवाहिका में रुकावट आई है। कुछ मरीजों में सीटी एंजियोग्राफी, एमआर एंजियोग्राफी या अन्य इमेजिंग जांचों से मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं की स्थिति भी देखी जाती है।
जांच के परिणामों के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि मरीज को थक्का घोलने वाली दवा की जरूरत है, थक्का निकालने की प्रक्रिया की जा सकती है या रक्तस्राव के उपचार के लिए दूसरे कदम उठाने होंगे।
इस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी से बचना महत्वपूर्ण है। इसलिए स्ट्रोक के लक्षण दिखाई देने पर मरीज को ऐसे अस्पताल ले जाना चाहिए, जहां आवश्यक जांच और आपातकालीन उपचार की सुविधा उपलब्ध हो।
इस्केमिक स्ट्रोक के चुनिंदा मरीजों को थक्का घोलने वाली दवा दी जा सकती है। इसे थ्रोम्बोलाइसिस कहा जाता है। इसका उद्देश्य रक्तवाहिका में मौजूद थक्के को घोलकर मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बहाल करना है।
सामान्यतः उपयुक्त मरीजों में नस के जरिए दी जाने वाली थक्का घोलने वाली दवाओं का उपयोग लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर किया जाता है। कुछ मरीजों में विशेष इमेजिंग जांच और चिकित्सकीय मानदंडों के आधार पर अलग समय-सीमा में भी उपचार पर विचार किया जा सकता है।
यह उपचार प्रत्येक मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होता। डॉक्टर रक्तस्राव की आशंका, लक्षणों की अवधि, अन्य बीमारियों और दवा से जुड़े जोखिमों का आकलन करने के बाद निर्णय लेते हैं।
इसीलिए लक्षण शुरू होने का समय याद रखना या उसे लिख लेना महत्वपूर्ण है। यदि समय का सही पता न हो, तब भी अस्पताल जाने में देरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विशेषज्ञ जांच के आधार पर उपलब्ध विकल्पों का मूल्यांकन कर सकते हैं।
स्ट्रोक के आधुनिक उपचार में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसका उपयोग मस्तिष्क की बड़ी रक्तवाहिकाओं में फंसे थक्के को निकालने के लिए चुनिंदा मरीजों में किया जाता है।
इस प्रक्रिया में विशेषज्ञ डॉक्टर रक्तवाहिका के रास्ते कैथेटर को प्रभावित स्थान तक पहुंचाते हैं। इसके बाद विशेष उपकरणों की सहायता से थक्के को निकालने का प्रयास किया जाता है, जिससे मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बहाल हो सके।
उपयुक्त मरीजों में यह प्रक्रिया दिव्यांगता कम करने और स्वतंत्र जीवन जीने की संभावना बढ़ाने में मदद कर सकती है। चयनित मरीजों में लक्षण शुरू होने के 24 घंटे तक उपचार का लाभ संभव हो सकता है, लेकिन यह निर्णय इमेजिंग, लक्षणों के समय और अन्य चिकित्सकीय मानदंडों पर निर्भर करता है।
इस तकनीक के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों, उन्नत इमेजिंग और आवश्यक उपकरणों से युक्त अस्पताल की जरूरत होती है। इसलिए स्ट्रोक की पहचान के साथ मरीज को उचित उपचार सुविधा तक पहुंचाना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि स्ट्रोक मस्तिष्क की रक्तवाहिका फटने के कारण हुआ है, तो थक्का घोलने वाली दवा देना नुकसानदायक हो सकता है। इस स्थिति में उपचार का उद्देश्य रक्तस्राव को नियंत्रित करना, मस्तिष्क पर बढ़ते दबाव को कम करना और रक्तवाहिका संबंधी समस्या का उचित प्रबंधन करना होता है।
मरीज की स्थिति के अनुसार रक्तचाप नियंत्रित किया जा सकता है, रक्त को पतला करने वाली कुछ दवाओं के प्रभाव को उलटने के उपाय किए जा सकते हैं और जरूरत पड़ने पर न्यूरोसर्जरी की जा सकती है।
यदि रक्तवाहिका में एन्यूरिज्म फटने से रक्तस्राव हुआ हो, तो मरीज की स्थिति के अनुसार कॉइलिंग या अन्य एंडोवैस्कुलर तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। कुछ गंभीर मामलों में मस्तिष्क की सूजन और दबाव कम करने के लिए डिकम्प्रेसिव सर्जरी पर विचार किया जाता है।
उपचार का निर्णय स्ट्रोक के कारण, रक्तस्राव की मात्रा, प्रभावित हिस्से और मरीज की समग्र स्थिति के आधार पर विशेषज्ञ टीम लेती है।
स्ट्रोक के उपचार में आधुनिक इमेजिंग तकनीकों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। सीटी, एमआरआई और रक्तवाहिका इमेजिंग से डॉक्टर मस्तिष्क में हुए नुकसान तथा रक्त प्रवाह की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकते हैं।
कुछ विशेष इमेजिंग तकनीकें यह पहचानने में भी मदद कर सकती हैं कि मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा गंभीर रूप से प्रभावित है और कौन-सा हिस्सा समय पर उपचार मिलने पर बचाया जा सकता है। इससे चुनिंदा मरीजों में उपचार के विकल्पों का आकलन करने में सहायता मिलती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आधारित प्रणालियां इमेजिंग रिपोर्ट का विश्लेषण करने, संभावित स्ट्रोक की पहचान करने और विशेषज्ञों तक महत्वपूर्ण जानकारी तेजी से पहुंचाने में सहायक हो सकती हैं। टेली-स्ट्रोक सेवाओं के जरिए छोटे अस्पतालों के डॉक्टर दूर बैठे विशेषज्ञों से परामर्श भी ले सकते हैं।
हालांकि, एआई डॉक्टरों की जगह नहीं लेता। अंतिम उपचार निर्णय मरीज की स्थिति, जांच के परिणाम और प्रशिक्षित चिकित्सकों के आकलन के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।
स्ट्रोक का उपचार केवल शुरुआती आपातकालीन देखभाल तक सीमित नहीं है। कई मरीजों को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी लंबे समय तक पुनर्वास की जरूरत पड़ती है।
स्ट्रोक के कारण कुछ लोगों को चलने, हाथ-पैर हिलाने, बोलने, भोजन निगलने, याददाश्त या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। पुनर्वास का उद्देश्य मरीज की उपलब्ध क्षमताओं को बेहतर बनाना और उसे यथासंभव स्वतंत्र जीवन जीने में सहायता देना है।
फिजियोथेरेपी: शरीर की ताकत, संतुलन, चलने और अंगों की गति सुधारने में मदद करती है।
स्पीच और भाषा थेरेपी: बोलने, भाषा समझने और संवाद करने में आने वाली समस्याओं के प्रबंधन में सहायक होती है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी: कपड़े पहनने, भोजन करने, लिखने और रोजमर्रा के अन्य कार्यों को दोबारा सीखने में मदद कर सकती है।
निगलने और पोषण का आकलन: कुछ मरीजों में भोजन या पानी निगलने में परेशानी हो सकती है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ सलाह जरूरी है, क्योंकि भोजन या तरल पदार्थ सांस की नली में जाने का खतरा हो सकता है।
पुनर्वास की योजना मरीज की जरूरतों के अनुसार बनाई जाती है। नियमित अभ्यास, परिवार का सहयोग और समय-समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन सुधार की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
स्ट्रोक का प्रभाव केवल शारीरिक क्षमताओं तक सीमित नहीं रहता। कुछ मरीजों को चिंता, उदासी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या या आत्मविश्वास में कमी महसूस हो सकती है। अचानक जीवनशैली बदलने और दूसरों पर निर्भरता बढ़ने से मरीज तथा उसके परिवार पर भावनात्मक दबाव भी पड़ सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में मरीज की भावनात्मक जरूरतों को समझना और उसे परिवार तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सहयोग देना जरूरी है। यदि उदासी लंबे समय तक बनी रहे या रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगे, तो चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
परिवार के सदस्यों को मरीज को प्रोत्साहित करना चाहिए, लेकिन उससे उसकी क्षमता से अधिक अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए। सुधार की गति हर व्यक्ति में अलग हो सकती है।
स्ट्रोक के सभी मामलों को रोकना संभव नहीं है, लेकिन कई महत्वपूर्ण जोखिम कारकों को नियंत्रित करके इसकी आशंका कम की जा सकती है।
रक्तचाप की नियमित जांच कराएं। उच्च रक्तचाप होने पर चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवा लें और निर्धारित अंतराल पर जांच कराएं।
मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें। रक्त शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना और जरूरत के अनुसार उपचार लेना जरूरी है।
धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाएं। धूम्रपान छोड़ने से रक्तवाहिकाओं और हृदय के स्वास्थ्य को लाभ मिलता है।
संतुलित आहार अपनाएं। भोजन में सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करें। नमक तथा अत्यधिक संतृप्त वसा का सेवन सीमित रखें।
नियमित शारीरिक गतिविधि करें। अपनी उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार पैदल चलना तथा अन्य उपयुक्त व्यायाम करना लाभकारी हो सकता है। यदि पहले से कोई गंभीर बीमारी है, तो व्यायाम शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
स्वस्थ वजन बनाए रखें। वजन का उचित प्रबंधन उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य जोखिम कारकों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
हृदय की बीमारियों का इलाज कराएं। एट्रियल फिब्रिलेशन जैसी स्थितियों में डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार और जरूरत पड़ने पर रक्त के थक्के बनने से बचाने वाली दवाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
इसके अतिरिक्त पर्याप्त नींद, तनाव का उचित प्रबंधन और नियमित स्वास्थ्य जांच भी समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हैं।
जिन लोगों को पहले स्ट्रोक या टीआईए हो चुका है, उनमें दोबारा स्ट्रोक होने का जोखिम हो सकता है। ऐसे मरीजों के लिए चिकित्सक द्वारा निर्धारित उपचार और नियमित फॉलो-अप का पालन करना बेहद महत्वपूर्ण है।
डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार रक्तचाप नियंत्रित करने वाली दवाएं, कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं, एंटीप्लेटलेट दवाएं या कुछ मामलों में एंटीकोआगुलेंट दवाएं दे सकते हैं। इनका चुनाव स्ट्रोक के कारण और मरीज की अन्य स्वास्थ्य स्थितियों पर निर्भर करता है।
इन दवाओं को अपने स्तर पर बंद करना, खुराक बदलना या बिना सलाह के एस्पिरिन शुरू करना उचित नहीं है। विशेष रूप से स्ट्रोक के शुरुआती समय में यह जानना जरूरी है कि कहीं मस्तिष्क में रक्तस्राव तो नहीं हुआ है।
स्ट्रोक के लक्षण दिखने पर परिजन या आसपास मौजूद लोग कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं।
तुरंत एम्बुलेंस या स्थानीय आपातकालीन चिकित्सा सेवा को बुलाएं।
लक्षण शुरू होने का समय नोट करें या मरीज को आखिरी बार सामान्य अवस्था में देखे जाने का समय याद रखें।
मरीज को सुरक्षित रखें और उसकी सांस तथा चेतना पर ध्यान दें।
चिकित्सकीय सहायता मिलने तक भोजन, पानी या मुंह से दवा देने से बचें, क्योंकि निगलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
बिना चिकित्सकीय निर्देश के एस्पिरिन या कोई अन्य दवा न दें।
मरीज को स्वयं वाहन चलाकर अस्पताल जाने न दें।
लक्षण कुछ समय बाद समाप्त हो जाएं, तब भी तत्काल जांच कराएं।
यदि मरीज बेहोश हो जाए या उसकी सांस सामान्य न हो, तो आपातकालीन सेवा के निर्देशों का पालन करें और जरूरत के अनुसार प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा प्राथमिक जीवनरक्षक सहायता दी जाए।
स्ट्रोक के प्रभाव को कम करने के लिए बड़े अस्पतालों में आधुनिक उपचार उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है, लेकिन मरीज तक समय पर पहुंच बनाना भी उतना ही आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में दूरी, परिवहन, लक्षणों की जानकारी की कमी और उपचार सुविधाओं की उपलब्धता जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों, एम्बुलेंस सेवाओं और बड़े स्ट्रोक केंद्रों के बीच बेहतर समन्वय उपयोगी हो सकता है। यदि शुरुआती स्तर पर स्ट्रोक की पहचान हो जाए और मरीज को उचित अस्पताल भेजने की व्यवस्था हो, तो उपचार में होने वाली देरी कम की जा सकती है।
जनजागरूकता अभियान के माध्यम से लोगों को यह समझाना जरूरी है कि अचानक चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी या बोलने में परेशानी आपातकालीन संकेत हैं। परिवार के सदस्यों, शिक्षकों, पुलिसकर्मियों, परिवहन कर्मचारियों और समुदाय के अन्य लोगों को भी इन लक्षणों की पहचान के बारे में जानकारी होनी चाहिए।
स्ट्रोक एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शुरुआती पहचान और समय पर उपचार से महत्वपूर्ण अंतर पड़ सकता है। आधुनिक दवाओं, मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी, बेहतर इमेजिंग और पुनर्वास सेवाओं ने कई मरीजों के लिए उपचार की संभावनाएं बढ़ाई हैं। फिर भी इन सुविधाओं का लाभ तभी मिल सकता है, जब मरीज और उसके परिजन लक्षणों को पहचानकर तत्काल मदद लें।
स्ट्रोक से बचाव के लिए उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण, धूम्रपान से दूरी, संतुलित आहार तथा नियमित शारीरिक गतिविधि को जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है। जिन लोगों को पहले स्ट्रोक हो चुका है, उन्हें दोबारा स्ट्रोक से बचने के लिए चिकित्सकीय सलाह का पालन करना चाहिए।
याद रखें—स्ट्रोक में समय ही मस्तिष्क है। चेहरे का अचानक टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी या बोलने में परेशानी को कभी नजरअंदाज न करें। तुरंत चिकित्सा सहायता लें, क्योंकि समय पर उठाया गया कदम किसी व्यक्ति की जान बचाने और स्थायी दिव्यांगता के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


