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- 12h ago
नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि क्षमा केवल किसी गलती को माफ कर देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली एक आध्यात्मिक शक्ति है। क्षमा का वास्तविक अर्थ बदले की भावना को छोड़कर सुधार का रास्ता अपनाना, घृणा के स्थान पर संवाद को चुनना और शत्रुता की जगह सुलह की भावना को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया के कई हिस्से संघर्ष, हिंसा और अविश्वास से जूझ रहे हैं, ऐसे समय में भगवान महावीर की शिक्षाएं मानवता को शांति, अहिंसा, करुणा और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाती हैं।
उपराष्ट्रपति रविवार को नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में भगवान महावीर स्मारक समिति और जैन महासभा दिल्ली की ओर से आयोजित महापर्व क्षमापना समारोह-2026 को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर को क्षमा, मित्रता, अहिंसा और आत्मशुद्धि जैसे सार्वभौमिक मूल्यों का उत्सव बताया।
सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि जैन परंपरा ने क्षमा को जिस गहराई के साथ आध्यात्मिक अनुशासन का हिस्सा बनाया है, वह आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि क्षमापना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपने विचारों, व्यवहार और संबंधों का आत्ममंथन करने का अवसर देती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य से गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती को स्वीकार करना, उससे सीख लेना और उसे दोबारा न दोहराने का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है। इसी प्रक्रिया में क्षमा व्यक्ति के भीतर अहंकार, क्रोध और प्रतिशोध जैसी नकारात्मक भावनाओं को कम करने में सहायक बनती है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार करता है और दूसरे को क्षमा करता है, तो इससे केवल दो व्यक्तियों के बीच संबंध बेहतर नहीं होते, बल्कि परिवार और समाज में भी शांति एवं विश्वास का वातावरण बनता है।
क्षमा के महत्व को स्पष्ट करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना या सत्य से समझौता करना नहीं है। उन्होंने कहा कि क्षमा का सही अर्थ यह है कि मनुष्य प्रतिशोध की भावना से ऊपर उठकर सुधार और समाधान का रास्ता चुने।
उन्होंने कहा, “क्षमा का अर्थ है बदले की जगह सुधार, घृणा के बजाय बातचीत और शत्रुता के स्थान पर सुलह को चुनना।”
उन्होंने प्रतिक्रमण की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह व्यक्ति को अपनी गलतियों पर विचार करने और अपने आचरण को बेहतर बनाने की प्रेरणा देती है। यदि इस भावना को व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी अपनाया जाए तो अनेक विवादों और तनावों का शांतिपूर्ण समाधान संभव है।
उपराष्ट्रपति ने भगवान महावीर के संदेश को वर्तमान समय की परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा कि महावीर स्वामी ने मानवता को केवल बाहरी विजय का नहीं, बल्कि आंतरिक विजय का मार्ग दिखाया। उन्होंने लोगों को अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, असहिष्णुता और प्रतिशोध पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि वास्तविक शक्ति दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि स्वयं की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने में है। यदि व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को संयमित कर ले तो परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति की स्थापना का रास्ता आसान हो सकता है।
सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा की अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अहिंसा का व्यापक अर्थ विचार, वाणी और कर्म में हिंसा से बचना है।
उन्होंने कहा कि किसी के प्रति घृणा रखना, कटु शब्द बोलना या जानबूझकर किसी को मानसिक पीड़ा पहुंचाना भी हिंसक प्रवृत्ति का हिस्सा हो सकता है। इसलिए अहिंसा को जीवनशैली के रूप में अपनाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की शिक्षाएं व्यक्ति को यह समझने की प्रेरणा देती हैं कि हर जीव के प्रति संवेदना और सम्मान का भाव रखा जाना चाहिए। यही भावना समाज में करुणा और सह-अस्तित्व को मजबूत करती है।
जैन दर्शन के सार्वभौमिक संदेश का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सभी जीवित प्राणियों के प्रति मित्रता और किसी के प्रति शत्रुता न रखने की भावना भारत के प्राचीन सभ्यतागत मूल्यों के अनुरूप है।
उन्होंने कहा कि “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना हमें पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देती है। जैन धर्म का जीव मात्र के प्रति मैत्री और करुणा का संदेश भी इसी व्यापक मानवीय दृष्टिकोण को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष और हिंसा की घटनाएं देखने को मिलती हैं, तब संवाद, सह-अस्तित्व और करुणा जैसे मूल्यों की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस होती है।
उपराष्ट्रपति ने तमिलनाडु और जैन धर्म के बीच रहे ऐतिहासिक संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म ने तमिल साहित्य, भाषा और संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होंने शास्त्रीय तमिल साहित्य के विकास में जैन विद्वानों और भिक्षुओं की भूमिका को याद किया। साथ ही उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों में आज भी प्राचीन जैन मंदिरों, स्मारकों और शिक्षा केंद्रों की मौजूदगी इस ऐतिहासिक संबंध की गवाही देती है।
उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत अनेक परंपराओं के योगदान से समृद्ध हुई है और जैन परंपरा भी इस विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में विकसित भारत @ 2047 के लक्ष्य का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की कल्पना केवल आर्थिक समृद्धि, आधुनिक बुनियादी ढांचे और तकनीकी प्रगति तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वास्तव में विकसित राष्ट्र वही होगा, जहां नागरिकों के बीच आपसी विश्वास हो, परिवारों में संस्कार और मूल्य हों, युवाओं में चरित्र और समाज में करुणा हो।
उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को आधुनिकता की ओर आगे बढ़ते हुए अपनी महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को भी साथ लेकर चलना होगा।
सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। युवाओं में केवल तकनीकी और व्यावसायिक दक्षता विकसित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके भीतर जिम्मेदारी, सेवा, संवेदना, अनुशासन और नैतिकता के मूल्यों को भी मजबूत करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि यदि युवा पीढ़ी क्षमा, अहिंसा, संयम और करुणा जैसे मूल्यों को अपने जीवन में अपनाती है तो इससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन की नींव मजबूत होगी।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि क्षमा और संवाद की शुरुआत घर से होनी चाहिए। परिवार में छोटी-छोटी गलतियों को लेकर लंबे समय तक मनमुटाव बनाए रखने के बजाय बातचीत के माध्यम से समाधान खोजा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि परिवार समाज की मूल इकाई है। यदि परिवारों में विश्वास, सम्मान, संवाद और क्षमा की संस्कृति मजबूत होगी तो इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा।
उपराष्ट्रपति ने लोगों से विकसित भारत के निर्माण में विनम्रता, करुणा, सेवा, एकता और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश का विकास तभी सार्थक होगा, जब आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक और मानवीय मूल्यों को भी मजबूती मिले।
उन्होंने कहा कि समाज में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद में बदलने से बचना चाहिए। संवाद के माध्यम से समस्याओं का समाधान और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना समाज को मजबूत बनाती है।
समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने के. सी. जैन को ‘जैन समाज रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित किया। इस अवसर पर जैन समाज के संतों और प्रमुख प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी, मुनिश्री उदित कुमार जी, मुनिश्री तीर्थ निर्वाण विजय जी और उपाध्याय श्री रविंदर मुनि जी ने भी संबोधित किया।
समारोह में विभिन्न क्षेत्रों से आए जैन समाज के प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही।
महापर्व क्षमापना समारोह में पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, भगवान महावीर स्मारक समिति के अध्यक्ष कन्हैया लाल जैन, जैन महासभा दिल्ली के अध्यक्ष दिनेश दोषी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने भगवान महावीर के संदेशों को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया। समारोह के दौरान क्षमा, अहिंसा, आत्मशुद्धि और परस्पर मैत्री की भावना को जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया।
महापर्व क्षमापना का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपने भीतर झांके, अपनी गलतियों को स्वीकार करे और दूसरों के प्रति मन में द्वेष न रखे। उपराष्ट्रपति के संबोधन ने इस संदेश को व्यापक सामाजिक संदर्भ से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि क्षमा व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज और वैश्विक स्तर तक शांति का माध्यम बन सकती है।
आज जब छोटी-छोटी बातों पर विवाद और मतभेद बढ़ते दिखाई देते हैं, ऐसे समय में संवाद, संयम और क्षमा की भावना समाज को अधिक संवेदनशील और सहिष्णु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
समारोह का संदेश स्पष्ट रहा कि सच्ची क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का प्रतीक है। बदले की भावना संघर्ष को आगे बढ़ाती है, जबकि सुधार, संवाद और सुलह की भावना समाधान का रास्ता खोलती है। यही भगवान महावीर की शिक्षाओं की व्यापक प्रासंगिकता है और यही एक शांतिपूर्ण, संवेदनशील एवं समरस समाज की मजबूत आधारशिला भी बन सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


