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- 12h ago
नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि देश में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। रविवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी नेताओं ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कथित पुलिस कार्रवाई, हिरासत में लिए जाने, कानूनी सहायता तक पहुंच में बाधा और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। पार्टी ने स्पष्ट किया कि पुलिस कार्रवाई और अन्य कथित बाधाओं के बावजूद चुनावी जवाबदेही की मांग को लेकर उसका आंदोलन जारी रहेगा।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका, सह-संयोजक सौरव दास और कानूनी प्रमुख रत्ना ने अपने-अपने वक्तव्यों में केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन को घेरा। नेताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी शिकायतें सामने रखने, सरकार से सवाल पूछने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने का अधिकार है। उनका आरोप था कि दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए जिस तरह की सुरक्षा व्यवस्था की गई और जिस प्रकार हिरासत की कार्रवाई की गई, उससे कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
पार्टी ने दावा किया कि चुनावी अनियमितताओं और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब देने के बजाय प्रदर्शनकारियों को रोकने पर अधिक जोर दिया जा रहा है। सीजेपी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं कर रही है।
हालांकि, प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों पर केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया इस खबर में उपलब्ध नहीं है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि भी आवश्यक है।
सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि देश में ऐसे हालात बनते दिखाई दे रहे हैं, जहां अपनी मांगों को लेकर सरकार तक पहुंचने की कोशिश करने वाले नागरिकों को ही संदेह की नजर से देखा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभिन्न राज्यों से दिल्ली पहुंचने वाले छात्रों, युवाओं और कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल तैनात किया गया।
दास के अनुसार, प्रदर्शन में शामिल होने आए लोग किसी हिंसक गतिविधि के उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपनी शिकायतें सरकार तक पहुंचाने और निर्धारित स्थान पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए दिल्ली पहुंचे थे। उनका कहना था कि यदि सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांगों या कार्यक्रम को लेकर कोई चिंता थी, तो बातचीत के माध्यम से उसका समाधान निकाला जा सकता था।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने संवाद का रास्ता अपनाने के बजाय प्रदर्शनकारियों को रोकने और हिरासत में लेने की कार्रवाई की। सीजेपी का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से असहमति व्यक्त करने वाले नागरिकों में भय का माहौल पैदा हो सकता है।
दास ने सवाल उठाया कि जब लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है, तो उनकी शिकायतें सुनने के लिए सरकार और प्रशासन को आगे क्यों नहीं आना चाहिए। उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और किसी भी विवाद का समाधान संवाद, पारदर्शिता तथा जवाबदेही के माध्यम से किया जाना चाहिए।
सीजेपी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर विशेष रूप से सवाल उठाए। पार्टी का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर उठ रहे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा रहा है।
आशुतोष रांका ने कहा कि चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं और मतदाता सूची की शुद्धता तथा चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर नागरिकों का भरोसा बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और संबंधित अधिकारियों को इनका जवाब देना चाहिए।
रांका ने कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर यदि किसी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या नागरिक समूह की ओर से सवाल उठाए जाते हैं, तो उन सवालों को नजरअंदाज करने के बजाय तथ्यों के आधार पर उनका समाधान किया जाना चाहिए।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सवाल किया कि ज्ञानेश कुमार को लेकर उठ रहे विवाद के बीच सरकार की भूमिका क्या है और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का आधार क्या था।
सीजेपी ने मांग की कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए सवालों का जवाब सार्वजनिक रूप से दिया जाए। पार्टी ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की प्रक्रिया से जुड़े मामलों में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक है, ताकि किसी भी योग्य मतदाता को अपने मताधिकार से वंचित होने की आशंका न रहे।
पार्टी ने हालांकि जिन कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया है, उनसे संबंधित विस्तृत आंकड़े, आधिकारिक दस्तावेज और स्वतंत्र सत्यापन के निष्कर्ष इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के उपलब्ध विवरण में सामने नहीं आए हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सौरव दास ने मौजूदा परिस्थितियों की तुलना वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल से करते हुए आरोप लगाया कि देश में विरोध की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर की गई सुरक्षा व्यवस्था और कथित पुलिस कार्रवाई ने नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर चिंताएं पैदा की हैं।
दास ने दावा किया कि पिछले कुछ दिनों के दौरान दूसरे राज्यों से सुरक्षा बलों को दिल्ली बुलाया गया और राजधानी के कई हिस्सों में बैरिकेडिंग की गई। उन्होंने मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने, रेल सेवाओं पर असर पड़ने और दुकानों के बंद रहने जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया।
उनका कहना था कि यदि किसी प्रदर्शन के कारण कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता है, तो प्रशासन को आवश्यक सुरक्षा प्रबंध करते हुए प्रदर्शनकारियों से बातचीत करनी चाहिए। लेकिन उनके आरोप के अनुसार, जिस तरह की व्यापक व्यवस्था की गई, उससे प्रदर्शन में शामिल लोगों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी असुविधा का सामना करना पड़ा।
दास ने कहा कि राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए। यदि सुरक्षा प्रबंधों के कारण लोगों की आवाजाही, सार्वजनिक परिवहन या सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो प्रशासन को इसकी आवश्यकता और प्रभाव के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार को यदि प्रदर्शनकारियों की मांगों से असहमति है, तो उसका जवाब राजनीतिक और लोकतांत्रिक तरीके से क्यों नहीं दिया जाता। सीजेपी का कहना है कि किसी भी सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का आकलन इस बात से भी किया जाता है कि वह आलोचना और असहमति को किस तरह स्वीकार करती है।
हालांकि, वर्ष 1975 के आपातकाल से मौजूदा हालात की तुलना सीजेपी नेता का राजनीतिक आकलन है। इस तुलना को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए दोनों परिस्थितियों के कानूनी, राजनीतिक और प्रशासनिक पहलुओं का अलग-अलग मूल्यांकन आवश्यक होगा।
सौरव दास ने अपने और अपने साथियों के साथ हुई कथित कार्रवाई का विवरण देते हुए आरोप लगाया कि उन्हें विमान से जबरन उतारा गया। उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए जाने के दौरान उन्हें कार्रवाई का स्पष्ट आधार नहीं बताया गया और जरूरी दस्तावेज भी नहीं दिखाए गए।
दास के अनुसार, हिरासत के दौरान उनके मोबाइल फोन ले लिए गए, जिससे उन्हें अपने परिचितों और कानूनी सहायता देने वाले लोगों से संपर्क करने में परेशानी हुई। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि उनके फोन के साथ छेड़छाड़ की गई हो सकती है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के दौरान निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। संबंधित व्यक्ति को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उसे किस आधार पर रोका गया है और उसे अपनी कानूनी सहायता तक पहुंच कैसे प्राप्त होगी।
दास ने आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान वकीलों से संपर्क करने में बाधाएं आईं। उनके मुताबिक, यह केवल व्यक्तिगत परेशानी का मामला नहीं है, बल्कि हिरासत में लिए गए नागरिकों के अधिकारों और कानून के पालन से जुड़ा सवाल है।
उन्होंने मानवाधिकार आयोग और न्यायपालिका से पूरे मामले का संज्ञान लेने की अपील की। साथ ही कहा कि यदि किसी प्रदर्शनकारी के साथ मारपीट हुई है या हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार किया गया है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सीजेपी ने मांग की कि कथित कार्रवाई से संबंधित तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। पार्टी का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन इन अधिकारों का इस्तेमाल भी कानून के दायरे में ही होना चाहिए।
इन आरोपों की पुष्टि के लिए हिरासत संबंधी रिकॉर्ड, संबंधित अधिकारियों का पक्ष, उपलब्ध वीडियो और अन्य दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अभिजीत दिपके की दादी के निधन का उल्लेख करते हुए हिरासत के दौरान पुलिस के व्यवहार पर सवाल उठाए।
रांका ने आरोप लगाया कि हिरासत में रहने के दौरान अभिजीत अपने परिवार से संपर्क करना चाहते थे, ताकि उन्हें घर में हुई घटना की जानकारी मिल सके। उनके अनुसार, अभिजीत ने परिवार से बात करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन उन्हें जिस प्रकार की परेशानी का सामना करना पड़ा, उससे पुलिस के व्यवहार पर सवाल उठते हैं।
रांका ने अभिजीत के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए परिवार में मृत्यु जैसी घटना के समय अपने परिजनों से संपर्क कर पाना बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे समय में प्रशासन को मानवीय संवेदनशीलता और कानूनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने बताया कि रिहाई के बाद अभिजीत अपनी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अपने पैतृक गांव रवाना हो गए। रांका के मुताबिक, इस व्यक्तिगत दुख के बावजूद अभिजीत ने चुनावी जवाबदेही की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन से पीछे हटने से इनकार किया।
सीजेपी नेताओं ने कहा कि किसी भी आंदोलन में शामिल व्यक्ति की राजनीतिक या वैचारिक भूमिका से अलग उसके मानवीय अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि हिरासत के दौरान परिजनों से संपर्क, आवश्यक सूचना प्राप्त करने और कानूनी सहायता लेने जैसे मुद्दों को संवेदनशीलता से देखा जाना चाहिए।
पार्टी ने इस मामले में भी संबंधित घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की मांग की।
सीजेपी ने प्रदर्शन के दौरान स्वतंत्र पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा भी उठाया। सौरव दास ने आरोप लगाया कि आंदोलन को कवर करने पहुंचे पत्रकारों को पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ा और उन्हें स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने में बाधाओं का सामना करना पड़ा।
दास ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पत्रकार घटनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाते हैं और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े तथ्यों को सामने लाने में मदद करते हैं। ऐसे में रिपोर्टिंग के दौरान उनके साथ कथित दुर्व्यवहार या अनावश्यक रोक-टोक की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि पत्रकारों को किसी घटना की रिपोर्टिंग से रोका जाता है, तो इससे जनता तक सही और समय पर जानकारी पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि, पुलिस और पत्रकारों के बीच किसी विशेष घटना में क्या हुआ, इसकी पुष्टि के लिए संबंधित पत्रकारों के बयान, उपलब्ध रिकॉर्ड और पुलिस का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
सीजेपी ने मांग की कि प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकारों के साथ हुई कथित घटनाओं की जांच की जाए। पार्टी ने कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीजेपी नेताओं ने बंगला साहिब गुरुद्वारे से जुड़ा मुद्दा भी उठाया। सौरव दास ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने गुरुद्वारे में शरण ली थी और पुलिसकर्मी वहां पहुंचे तथा लोगों को बाहर निकालने की कोशिश की।
दास ने इसे धार्मिक स्थल की गरिमा और वहां शरण लेने वाले लोगों के अधिकारों से जुड़ा विषय बताया। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखना आवश्यक है और किसी भी विवाद का समाधान ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए, जिसमें धार्मिक भावनाओं तथा कानून दोनों का सम्मान हो।
उन्होंने सिख समुदाय से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं का साथ देने की अपील की। सीजेपी का कहना है कि लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर समाज के विभिन्न वर्गों को संवाद और शांतिपूर्ण सहयोग के माध्यम से अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
हालांकि, गुरुद्वारे में हुई कथित घटना के संबंध में विस्तृत स्वतंत्र पुष्टि और पुलिस का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं है। घटना की वास्तविक परिस्थितियों को समझने के लिए संबंधित पक्षों के बयान तथा अन्य साक्ष्यों का सामने आना जरूरी है।
सीजेपी की कानूनी प्रमुख रत्ना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस कार्रवाई के कानूनी आधार और जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों को रोकने के लिए पुलिस उनके घरों तक पहुंच रही थी और उनके परिवारों पर दबाव बनाया जा रहा था।
रत्ना के अनुसार, बेंगलुरु से दिल्ली पहुंचने के दौरान उन्हें और उनके साथियों को कथित तौर पर ट्रैक किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली पहुंचने के बाद पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे और बाद में उन्हें कई घंटों तक हिरासत में रखा गया।
उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए जाने का कारण पूछने पर पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर यह कहा कि उन्हें ऊपर से आदेश मिले हैं। रत्ना ने सवाल किया कि यदि किसी अधिकारी ने किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का निर्देश दिया है, तो उस निर्देश का कानूनी आधार क्या था और किसी संभावित उल्लंघन के लिए जिम्मेदारी किसकी होगी।
उन्होंने कहा कि प्रशासनिक आदेशों का पालन करने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि कानूनी प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी की जाए। किसी भी कार्रवाई का आधार स्पष्ट होना चाहिए और संबंधित अधिकारी को उसके औचित्य के बारे में जवाब देने में सक्षम होना चाहिए।
रत्ना ने कथित मारपीट, मोबाइल फोन छीने जाने और वकीलों से संपर्क में बाधा डालने जैसे मामलों की जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि ऐसी शिकायतें सामने आती हैं, तो उन्हें केवल राजनीतिक आरोप बताकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उनकी जांच होनी चाहिए।
सीजेपी की कानूनी प्रमुख ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन, एक स्थान पर एकत्र होने और अपनी मांगें रखने के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने प्रशासन से अपील की कि कानून-व्यवस्था से जुड़ी किसी भी कार्रवाई में पारदर्शिता रखी जाए और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बार-बार हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकारों का मुद्दा उठा। सीजेपी नेताओं ने कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की कार्रवाई के दौरान लागू कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
पार्टी के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने, उनके मोबाइल फोन अपने कब्जे में रखने और उन्हें वकीलों से संपर्क करने में कथित परेशानी होने जैसे मामलों की जांच जरूरी है। नेताओं ने कहा कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच से न केवल संबंधित व्यक्तियों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी, बल्कि पुलिस प्रशासन के प्रति सार्वजनिक विश्वास भी मजबूत हो सकता है।
कानूनी दृष्टि से किसी भी हिरासत की वैधता का निर्धारण संबंधित परिस्थितियों, लागू कानून, कार्रवाई के आधार और प्रक्रिया के पालन को देखकर किया जाता है। इसलिए सीजेपी द्वारा लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए संबंधित दस्तावेजों और सभी पक्षों की बातों का परीक्षण जरूरी है।
पार्टी ने मांग की कि हिरासत में लिए गए लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी दी जाए और कानूनी सहायता तक पहुंच सुनिश्चित की जाए। नेताओं का कहना था कि कानून का शासन तभी प्रभावी माना जाएगा, जब प्रशासनिक कार्रवाई भी कानून के अनुरूप हो और शिकायतों के निवारण के लिए उचित व्यवस्था उपलब्ध हो।
सीजेपी नेताओं ने कहा कि चुनावी जवाबदेही को लेकर चल रहे आंदोलन में छात्रों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है। पार्टी के मुताबिक, विभिन्न राज्यों से लोग अपनी मांगें रखने के लिए दिल्ली पहुंचे थे।
नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों को रोकने के लिए की गई कार्रवाई से आंदोलन में भाग लेने वाले युवाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।
सीजेपी का तर्क है कि चुनावी व्यवस्था, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की जवाबदेही जैसे विषय केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं हैं। इनका संबंध नागरिकों के मताधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे से है।
पार्टी ने कहा कि यदि किसी नागरिक को चुनावी प्रक्रिया से संबंधित कोई शिकायत है, तो उसे उचित मंच पर उठाने और उसका जवाब प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। नेताओं ने यह भी कहा कि शिकायतों के निवारण के लिए पारदर्शी और सुलभ प्रक्रिया होने से विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।
सीजेपी नेताओं ने आंदोलन के समर्थन में सामने आए विपक्षी नेताओं, छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आभार जताया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी ने अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, माणिक सरकार और पिनाराई विजयन सहित कई विपक्षी नेताओं का उल्लेख किया।
पार्टी ने कहा कि चुनावी पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े सवालों पर विभिन्न संगठनों और राजनीतिक समूहों का समर्थन लोकतांत्रिक विमर्श को व्यापक बनाता है। नेताओं के मुताबिक, इस आंदोलन का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को सार्वजनिक चर्चा में लाना और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगना है।
सीजेपी ने दावा किया कि आंदोलन में शामिल कई संगठनों के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया और उनके साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ। पार्टी ने इन मामलों की जांच करने तथा हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करने की मांग की।
नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन नागरिकों की शिकायतों पर चर्चा और उनका समाधान संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए। उनका कहना था कि चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए सभी संबंधित पक्षों के बीच संवाद आवश्यक है।
हालांकि, प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिन नेताओं और संगठनों के समर्थन का उल्लेख किया गया, उनके समर्थन की सीमा और स्वरूप की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विवरण में नहीं है।
सीजेपी ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को अपने आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बताया। पार्टी नेताओं ने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में मतदाता सूची की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि मतदान का अधिकार नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी का आधार है।
पार्टी का आरोप है कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं और संबंधित अधिकारियों को इनका जवाब देना चाहिए। नेताओं ने मांग की कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया, नाम हटाए जाने के आधार और शिकायतों के निपटारे से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जाए।
इस मुद्दे पर सीजेपी ने चुनाव आयोग की जवाबदेही को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि मतदाताओं को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि उनके नाम सूची में दर्ज हैं या नहीं और किसी त्रुटि की स्थिति में उसे ठीक कराने की प्रक्रिया क्या है।
मतदाता सूची में संशोधन अपने आप में एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन किसी भी कथित अनियमितता का आकलन करने के लिए आधिकारिक आंकड़े, प्रभावित मतदाताओं की जानकारी और संबंधित शिकायतों के निस्तारण की स्थिति देखना जरूरी है। सीजेपी ने जिन आरोपों का उल्लेख किया है, उनकी स्वतंत्र पुष्टि के लिए ऐसे दस्तावेजों का उपलब्ध होना महत्वपूर्ण होगा।
पार्टी ने कहा कि चुनावी पारदर्शिता को लेकर उठने वाले सवालों का समय पर जवाब मिलने से नागरिकों का भरोसा मजबूत हो सकता है। उसने चुनाव आयोग से जुड़े विवादों पर सार्वजनिक संवाद और तथ्यों के आधार पर स्पष्टीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया।
सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने एक व्यापक प्रश्न भी उठाया कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया जाना चाहिए।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। वहीं, नागरिकों को अपनी मांगें रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने के अधिकार भी प्राप्त हैं, जिनका प्रयोग लागू कानूनों और उचित प्रतिबंधों के दायरे में किया जाता है।
सीजेपी नेताओं का आरोप है कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान प्रशासन ने जरूरत से अधिक सख्ती दिखाई और संवाद की संभावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। पार्टी ने कहा कि यदि प्रदर्शनकारियों की किसी गतिविधि को लेकर आपत्ति थी, तो उन्हें स्पष्ट कारण बताकर उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।
दूसरी ओर, किसी भी सुरक्षा कार्रवाई की आवश्यकता और औचित्य का आकलन करने के लिए प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी, सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों और लागू प्रतिबंधों का विवरण भी जरूरी है। इन तथ्यों के बिना पूरी कार्रवाई पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सीजेपी ने मांग की कि पुलिस प्रशासन इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करे और प्रदर्शनकारियों के आरोपों की जांच के लिए निष्पक्ष व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
सौरव दास ने कहा कि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी लोकतांत्रिक विवाद का समाधान केवल सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने या लोगों को हिरासत में लेने से नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को सुनना और उनका जवाब देना सरकार तथा संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो उनकी जांच की जानी चाहिए और यदि किसी दावे में तथ्यात्मक त्रुटि है, तो उसे भी आधिकारिक जानकारी के माध्यम से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
सीजेपी का कहना है कि बातचीत से विवादों को कम किया जा सकता है और प्रदर्शनकारियों तथा प्रशासन के बीच विश्वास बहाल करने में मदद मिल सकती है। पार्टी ने मांग की कि चुनावी जवाबदेही, मतदाता सूची और कथित पुलिस कार्रवाई से संबंधित सवालों पर संबंधित संस्थाएं स्पष्ट रुख अपनाएं।
नेताओं ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है। साथ ही, उन्होंने आंदोलन में शामिल लोगों से भी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखने और कानून का पालन करने की अपील की।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में सीजेपी नेताओं ने स्पष्ट किया कि पुलिस कार्रवाई के बावजूद उनका आंदोलन समाप्त नहीं होगा। पार्टी ने देशभर के छात्रों, युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग को लेकर अपनी आवाज उठाने की अपील की।
आशुतोष रांका ने कहा कि व्यक्तिगत कठिनाइयों, हिरासत और अन्य कथित बाधाओं के बावजूद पार्टी अपने मुद्दों से पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने कहा कि चुनावी जवाबदेही का सवाल किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों के भरोसे से है।
सौरव दास ने सरकार से प्रदर्शनकारियों की शिकायतें सुनने और उनके सवालों का जवाब देने की मांग की। वहीं, रत्ना ने हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकारों, कानूनी प्रक्रिया और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
सीजेपी ने कहा कि आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके अपनाए जाएंगे और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों को सार्वजनिक मंचों पर उठाया जाता रहेगा। पार्टी का दावा है कि पुलिस कार्रवाई से उसकी मांगों में कोई बदलाव नहीं आया है।
सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद अब पूरे मामले में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। पार्टी द्वारा लगाए गए आरोपों के संबंध में आधिकारिक स्पष्टीकरण, हिरासत की परिस्थितियों का विवरण और संबंधित घटनाओं की स्वतंत्र जांच से मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
यदि प्रदर्शनकारियों की शिकायतों पर जांच होती है, तो उसके निष्कर्षों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं और किसी अधिकारी की जवाबदेही बनती है या नहीं। इसी तरह, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों पर आधिकारिक आंकड़े तथा दस्तावेज सामने आने से विवाद के तथ्यात्मक पहलुओं का मूल्यांकन किया जा सकेगा।
फिलहाल सीजेपी ने अपने आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया है। पार्टी चुनावी जवाबदेही, कथित पुलिस कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के मुद्दे को आगे भी उठाने की तैयारी में है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, प्रशासन और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिक्रियाएं घटनाक्रम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
सीजेपी की प्रमुख मांगें
चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों पर स्पष्ट जवाब दिया जाए।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर उठाए गए सवालों पर तथ्यात्मक स्पष्टीकरण दिया जाए।
प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और उनके साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
हिरासत में लिए गए लोगों को लागू कानून के अनुसार कानूनी सहायता और अन्य आवश्यक अधिकार उपलब्ध कराए जाएं।
स्वतंत्र पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और बंगला साहिब गुरुद्वारे से संबंधित आरोपों की जांच की जाए।
केंद्र सरकार और संबंधित प्रशासन प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद स्थापित करें।
चुनावी पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े सवालों पर सार्वजनिक रूप से जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
निष्कर्ष: सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनावी पारदर्शिता की मांग के साथ-साथ पुलिस कार्रवाई, नागरिक स्वतंत्रता, हिरासत में कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दे प्रमुखता से सामने आए। पार्टी ने आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है। हालांकि, पूरे मामले पर निष्पक्ष निष्कर्ष के लिए संबंधित सरकारी संस्थाओं का पक्ष, उपलब्ध दस्तावेज और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने आना आवश्यक है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


