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- 12h ago
नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और पुलिसकर्मियों के व्यवहार पर निगरानी मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। राष्ट्रीय राजधानी में अब पुलिस अधिकारी और जवान ड्यूटी के दौरान बॉडी कैमरे से लैस नजर आएंगे। नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा समेत कई पुलिस अधिकारियों को बॉडी कैमरे उपलब्ध कराए गए हैं। पुलिसकर्मियों के बॉडी कैमरे के साथ मैदान में उतरने की शुरुआत 6 अक्टूबर से हो गई है।
बॉडी कैमरे पुलिसकर्मियों की वर्दी पर लगाए जाएंगे और ड्यूटी के दौरान होने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियों की वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकेगी। इसका उद्देश्य पुलिस और आम नागरिकों के बीच होने वाली बातचीत तथा कार्रवाई को अधिक पारदर्शी बनाना है। किसी विवाद, शिकायत या आरोप की स्थिति में कैमरे में रिकॉर्ड फुटेज जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य के तौर पर काम कर सकती है।
पुलिस अधिकारियों के बॉडी कैमरे से लैस होने के बाद ड्यूटी के दौरान होने वाली कई गतिविधियां कैमरे में दर्ज हो सकेंगी। खासतौर पर प्रदर्शन, भीड़ नियंत्रण, धरना-प्रदर्शन स्थल, संवेदनशील इलाकों और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।
अगर किसी पुलिस अधिकारी पर नागरिक से बदसलूकी, मारपीट, अभद्र व्यवहार या अन्य किसी तरह के अनुचित आचरण का आरोप लगता है, तो जांच एजेंसियां उपलब्ध वीडियो फुटेज की मदद से घटना की वास्तविक स्थिति समझ सकती हैं। इसी तरह पुलिसकर्मियों पर लगाए गए गलत या तथ्यहीन आरोपों की स्थिति में भी रिकॉर्डिंग उनके पक्ष में महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध करा सकती है।
दिल्ली पुलिस की ओर से बॉडी कैमरों के इस्तेमाल का फैसला ऐसे समय में सामने आया है, जब हाल ही में जंतर-मंतर के पास एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर छेड़खानी और बदसलूकी के आरोप लगाए थे। बताया गया कि 3 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों ने एसीपी विवेक भगत समेत तीन पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाए।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी मामला चर्चा में रहा। महिला पत्रकारों की ओर से लगाए गए आरोपों ने प्रदर्शन स्थल पर महिला सुरक्षा और पुलिस के व्यवहार को लेकर सवाल खड़े किए। घटना को लेकर पुलिस की भूमिका और शिकायत पर कार्रवाई को लेकर भी सार्वजनिक बहस हुई।
इस मामले पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने महिला पत्रकार की ओर से पुलिस अधिकारी पर बदसलूकी के आरोप और एफआईआर दर्ज किए जाने की मांग का जिक्र करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा कि जंतर-मंतर पर एक महिला पत्रकार ने पुलिस अधिकारी पर बदसलूकी का आरोप लगाया और सैकड़ों पत्रकार घंटों तक एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर बैठे रहे। उन्होंने सवाल उठाया कि एफआईआर दर्ज करना पुलिस का बुनियादी काम है और इस मामले में भी इसे लेकर सवाल खड़े हुए।
उन्होंने पुलिस अधिकारियों पर महिलाओं के साथ बदसलूकी के पुराने आरोपों का भी उल्लेख किया और कहा कि पहले भी वीडियो सबूतों के जरिए इस तरह के मामलों को देखा गया है।
बॉडी कैमरे की सबसे बड़ी उपयोगिता यह मानी जा रही है कि घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मी और अधिकारी की गतिविधियों का वीडियो रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। किसी घटना के बाद अलग-अलग पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे किए जाने की स्थिति में जांचकर्ताओं के लिए घटनाक्रम को समझने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, बॉडी कैमरे से रिकॉर्ड होने वाले वीडियो का सुरक्षित रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। फुटेज को किस तरह स्टोर किया जाएगा, कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा और जांच के दौरान इसे किस प्रक्रिया के तहत इस्तेमाल किया जाएगा, यह व्यवस्था भी पारदर्शी और स्पष्ट होनी जरूरी है।
बॉडी कैमरे को सिर्फ पुलिसकर्मियों पर निगरानी रखने वाली तकनीक के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। यह पुलिस और जनता दोनों के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच भी बन सकता है। ड्यूटी के दौरान किसी पुलिसकर्मी और नागरिक के बीच विवाद की स्थिति में वीडियो रिकॉर्डिंग वास्तविक घटनाक्रम सामने रखने में मदद कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पुलिसिंग में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से जवाबदेही मजबूत हो सकती है। हालांकि, इसका प्रभाव तभी अधिक होगा जब कैमरों का इस्तेमाल नियमित रूप से हो और रिकॉर्ड किए गए वीडियो की सुरक्षा तथा उपयोग के लिए स्पष्ट नियम लागू हों।
दिल्ली में सालभर अलग-अलग मुद्दों को लेकर धरना-प्रदर्शन और विरोध कार्यक्रम होते रहते हैं। जंतर-मंतर जैसे स्थानों पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी, पत्रकार और पुलिसकर्मी एक साथ मौजूद रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में छोटी-सी घटना भी तेजी से विवाद का रूप ले सकती है।
बॉडी कैमरों के इस्तेमाल से प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई और मौके पर मौजूद लोगों के व्यवहार का रिकॉर्ड उपलब्ध रह सकता है। इससे बाद में किसी घटना की जांच के दौरान घटनाक्रम को क्रमवार समझने में मदद मिलने की उम्मीद है।
अगर भविष्य में किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ छेड़खानी, अभद्रता, मारपीट या अधिकारों के दुरुपयोग जैसे आरोप सामने आते हैं, तो उपलब्ध बॉडी कैमरा फुटेज जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। वहीं, यदि किसी पुलिसकर्मी पर झूठा आरोप लगाए जाने का दावा हो, तो रिकॉर्डिंग घटना की वास्तविकता स्पष्ट करने में मदद कर सकती है।
यानी बॉडी कैमरा व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ पुलिसकर्मियों पर निगरानी रखना नहीं, बल्कि पुलिसिंग में जवाबदेही, पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच को मजबूत करना भी है।
फिलहाल अधिकारियों और जवानों को बॉडी कैमरों से लैस करने की शुरुआत की गई है। आने वाले समय में इसके इस्तेमाल का दायरा बढ़ने और संवेदनशील ड्यूटी में तैनात अधिक पुलिसकर्मियों को इस तकनीक से जोड़ने की संभावना है।
दिल्ली जैसे बड़े महानगर में जहां रोजाना कानून-व्यवस्था से जुड़ी कई चुनौतियां सामने आती हैं, वहां पुलिसिंग में तकनीक का इस्तेमाल आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बॉडी कैमरा व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होती है, यह इसके नियमित इस्तेमाल, रिकॉर्डिंग की सुरक्षा और शिकायतों की जांच में फुटेज के निष्पक्ष इस्तेमाल पर निर्भर करेगा।
फिलहाल, 6 अक्टूबर से दिल्ली पुलिस के अधिकारियों और जवानों का बॉडी कैमरे के साथ ड्यूटी पर नजर आना पुलिसिंग में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


