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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए जल सुरक्षा को आर्थिक विकास की केंद्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। पानी अब केवल पर्यावरण या प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह कृषि, उद्योग, रोजगार, आजीविका, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी विकास और देश की समग्र अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा संसाधन बन चुका है। ऐसे में जल का संरक्षण, पुन: उपयोग, वैज्ञानिक प्रबंधन और हर स्तर पर जल दक्षता बढ़ाना आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक मजबूती के लिए निर्णायक साबित होगा।
यह बात केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री डॉ. राज भूषण चौधरी ने मंगलवार को सीआईआई वाटर इंस्टीट्यूट की ओर से आयोजित 12वें सीआईआई वाटर इनोवेशन समिट-2026 में कही। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए देश को जल प्रबंधन को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना होगा।
उन्होंने कहा कि जल सुरक्षा को लेकर सरकार, उद्योग, समुदाय और तकनीकी संस्थानों को मिलकर काम करना होगा। केवल सरकारी योजनाओं के माध्यम से जल संकट का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए जनभागीदारी, निजी क्षेत्र की जिम्मेदारी, तकनीकी नवाचार और स्थानीय स्तर पर प्रभावी जल प्रबंधन को समान महत्व देना होगा।
डॉ. चौधरी ने भारत की ‘वाटर विजन-2047’ रणनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका आधार पांच ‘पी’ हैं—राजनीतिक नेतृत्व, सार्वजनिक वित्तपोषण, साझेदारी, सार्वजनिक भागीदारी और स्थिरता के लिए अनुनय।
इन पांचों पहलुओं को साथ लेकर चलना इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जल की उपलब्धता और मांग दोनों ही क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग हैं।
कहीं भूजल पर अत्यधिक निर्भरता है, तो कहीं वर्षा जल का पर्याप्त संचयन नहीं हो पाता। कई शहरों में बढ़ती आबादी के साथ पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि दूसरी ओर कृषि और उद्योग भी बड़ी मात्रा में जल का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में जल सुरक्षा का समाधान केवल अधिक पानी उपलब्ध कराने में नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी का बेहतर, न्यायसंगत और टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करने में है।
केंद्रीय मंत्री ने सरकार की विभिन्न जल प्रबंधन पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जल जीवन मिशन, नमामि गंगे, अटल भूजल योजना और जल संचय जन भागीदारी जैसी पहलों को जनभागीदारी और आधुनिक तकनीक से जोड़कर आगे बढ़ाने की जरूरत है।
जल संरक्षण को सफल बनाने में स्थानीय समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण है। जब लोग जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण से सीधे जुड़ते हैं तो योजनाओं का प्रभाव लंबे समय तक कायम रह सकता है।
इसी के साथ जल प्रबंधन में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाने की आवश्यकता है। जल की उपलब्धता, खपत, रिसाव और पुनर्चक्रण से जुड़े आंकड़ों का वैज्ञानिक उपयोग बेहतर योजना बनाने में मदद कर सकता है।
समिट में उद्योग जगत को भी जल सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने का स्पष्ट संदेश दिया गया। डॉ. चौधरी ने कहा कि उद्योगों के लिए जल संरक्षण अब केवल कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व का विषय नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे कारोबारी रणनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उद्योगों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पानी का अधिकतम दक्षता के साथ उपयोग हो। जहां संभव हो, वहां अपशिष्ट जल का उपचार कर उसे दोबारा उत्पादन या अन्य उपयुक्त कार्यों में इस्तेमाल किया जाए।
उन्होंने अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण, डिजिटल तकनीक, स्मार्ट मॉनिटरिंग और आधुनिक सिंचाई प्रणालियों के इस्तेमाल पर जोर दिया।
औद्योगिक इकाइयों में पानी की खपत की नियमित निगरानी, रिसाव की पहचान, पुनर्चक्रण व्यवस्था और जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों को अपनाने से पानी की मांग को नियंत्रित किया जा सकता है।
आज उद्योगों के लिए पानी केवल उत्पादन प्रक्रिया का एक इनपुट नहीं है। पानी की कमी उत्पादन लागत, आपूर्ति श्रृंखला और कारोबारी निरंतरता को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे में कंपनियों के लिए स्थानीय जल उपलब्धता और भविष्य की जल जरूरतों का आकलन करना भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। किसी औद्योगिक क्षेत्र में पानी की उपलब्धता प्रभावित होने पर इसका असर उत्पादन और स्थानीय रोजगार तक पड़ सकता है।
इसी कारण उद्योगों से जिम्मेदार जल प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर जल सुरक्षा में निवेश बढ़ाने का आह्वान किया गया।
ऑस्ट्रेलिया के ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट कमीशन के मंत्री एवं दक्षिण एशिया प्रमुख मुकुंद नारायणमूर्ति ने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच जल क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई।
उन्होंने जल प्रशासन, वाटर अकाउंटिंग, अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग, सिंचाई दक्षता और सूखा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में ऑस्ट्रेलिया के अनुभवों को साझा किया।
उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान से जल प्रबंधन के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
विशेष रूप से जल की कमी वाले क्षेत्रों में बेहतर सिंचाई तकनीक, सूखा प्रबंधन और जल उपयोग की वैज्ञानिक निगरानी से कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने जल संकट से जुड़ी एक महत्वपूर्ण चुनौती की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि भारत में कुल मिलाकर वर्षा की मात्रा पर्याप्त है, लेकिन चुनौती बारिश की मात्रा से अधिक जल के प्रभावी प्रबंधन, संरक्षण और समान वितरण की है।
बारिश का पानी यदि तेजी से बहकर निकल जाए और उसका पर्याप्त संचयन या भूजल पुनर्भरण न हो तो वर्षा के बावजूद जल उपलब्धता का संकट बना रह सकता है।
इसी तरह एक क्षेत्र में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के बावजूद दूसरे क्षेत्र में जल संकट हो सकता है। इसलिए जल सुरक्षा की रणनीति में स्थानीय परिस्थितियों और क्षेत्रीय जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
आर. मुकुंदन ने टाटा केमिकल्स के नेट वाटर-पॉजिटिव बनने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि पानी को एक साथ तीन दृष्टिकोणों—आजीविका, पारिस्थितिकी और आर्थिक विकास—से देखना होगा।
उद्योगों को ऐसे मॉडल की ओर बढ़ना होगा जिसमें वे जितने जल संसाधनों का उपयोग करते हैं, उसके मुकाबले जल संरक्षण और पुनर्भरण में भी महत्वपूर्ण योगदान दें।
उन्होंने सरकार, स्थानीय समुदायों और वैश्विक भागीदारों के साथ मिलकर वाटर-पॉजिटिव विकास मॉडल अपनाने की आवश्यकता बताई।
सीआईआई-त्रिवेणी वाटर इंस्टीट्यूट के चेयरमैन निखिल सावनी ने कहा कि जल अब केवल पर्यावरणीय संसाधन नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण इनपुट और कारोबार के लिए बढ़ता जोखिम भी है।
उन्होंने कहा कि जल संकट से निपटने के लिए केवल योजनाओं और घोषणाओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक बदलाव के लिए ऐसी कार्रवाई जरूरी है जिसके परिणामों को मापा और परखा जा सके।
इसके लिए वैज्ञानिक आकलन, विश्वसनीय आंकड़ों और डेटा आधारित योजना को जल प्रबंधन का आधार बनाने की जरूरत है।
उनके अनुसार, यह पता होना चाहिए कि किसी क्षेत्र में कितना पानी उपलब्ध है, कितना इस्तेमाल हो रहा है, कितना पुनर्चक्रित किया जा रहा है और भविष्य में मांग कितनी बढ़ सकती है। ऐसे आंकड़ों के आधार पर तैयार योजनाएं अधिक प्रभावी हो सकती हैं।
जल क्षेत्र में डेटा की भूमिका लगातार बढ़ रही है। भूजल स्तर, वर्षा, जलाशयों की स्थिति, औद्योगिक खपत और शहरी जल मांग से जुड़े आंकड़ों का एकीकृत इस्तेमाल नीति निर्माण को अधिक प्रभावी बना सकता है।
स्मार्ट मीटरिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों से यह पता लगाना आसान हो सकता है कि पानी कहां और कितनी मात्रा में इस्तेमाल हो रहा है।
इससे अनावश्यक खपत, रिसाव और जल की बर्बादी को कम करने के लिए समय रहते कदम उठाए जा सकते हैं।
सीआईआई मिशन ऑन वाटर के सह-अध्यक्ष इंद्रनील दत्त ने कहा कि जल सुरक्षा में किया गया निवेश वास्तव में आर्थिक सुरक्षा में निवेश है।
उन्होंने उद्योगों में तकनीक, नवाचार और दक्षता के माध्यम से जल संरक्षण को तेज करने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि कंपनियों को अपनी जल जरूरतों और उससे जुड़े जोखिमों को लंबे समय की कारोबारी योजना का हिस्सा बनाना चाहिए।
उन्होंने 2030 वाटर न्यूट्रल इंडस्ट्री ग्रुप जैसी पहलों के माध्यम से उद्योग-नेतृत्व वाली सामूहिक कार्रवाई के प्रति सीआईआई की प्रतिबद्धता भी दोहराई।
इस तरह की सामूहिक पहल का उद्देश्य केवल एक कंपनी के स्तर पर जल संरक्षण करना नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र में जल उपयोग के बेहतर मानक विकसित करना है।
भारत में जल की सबसे बड़ी मांग कृषि क्षेत्र से जुड़ी है। ऐसे में आधुनिक सिंचाई प्रणालियों और जल दक्षता को बढ़ावा देना जल सुरक्षा की व्यापक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ड्रिप और अन्य दक्ष सिंचाई तकनीकों, वर्षा जल संचयन और स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण से कृषि क्षेत्र में पानी की खपत को अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है।
इसी तरह शहरी क्षेत्रों में घरेलू जल उपयोग, सीवेज ट्रीटमेंट और उपचारित जल के पुन: उपयोग पर ध्यान देना होगा।
उद्योगों में भी ‘यूज एंड डिस्चार्ज’ मॉडल के बजाय ‘यूज, ट्रीट एंड रीयूज’ की दिशा में बढ़ना आवश्यक होगा।
जल सुरक्षा का सवाल जलवायु परिवर्तन से भी सीधे जुड़ा हुआ है। वर्षा के स्वरूप में बदलाव, अत्यधिक वर्षा की घटनाएं, लंबे सूखे और तापमान में वृद्धि जैसी परिस्थितियां जल प्रबंधन को और चुनौतीपूर्ण बना सकती हैं।
ऐसे में जल संसाधनों को केवल वर्तमान जरूरतों के आधार पर नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रबंधित करना होगा।
जलवायु लचीलापन बढ़ाने के लिए स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जलाशयों की क्षमता और अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
दो दिवसीय सीआईआई वाटर इनोवेशन समिट-2026 में नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत, तकनीकी कंपनियों, जल विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों ने जल सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
समिट में जल सुरक्षा और आर्थिक विकास के बीच संबंध, जलवायु लचीलापन, तकनीकी नवाचार, जल पुनर्चक्रण, उद्योगों में जल दक्षता और सतत विकास जैसे विषय प्रमुख रहे।
चर्चा का केंद्रीय संदेश यह रहा कि जल संकट को केवल पर्यावरणीय चुनौती मानकर नहीं देखा जा सकता। यह आर्थिक विकास, औद्योगिक उत्पादन, कृषि, रोजगार और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।
भारत के लिए 2047 का विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य केवल आर्थिक उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए ऐसे विकास मॉडल की जरूरत होगी जो प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्याप्त संसाधन सुनिश्चित करे।
जल इसी विकास मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है।
पानी बचाना अब केवल पर्यावरण बचाने का अभियान नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य और आजीविका को सुरक्षित रखने की रणनीति है। यही कारण है कि जल सुरक्षा को आर्थिक सुरक्षा से जोड़ते हुए सरकार, उद्योग और समाज—तीनों की साझा जिम्मेदारी पर जोर दिया जा रहा है।
2047 के विकसित भारत की नींव मजबूत करने के लिए आने वाले वर्षों में यह तय करना होगा कि देश उपलब्ध हर बूंद पानी का कितना बेहतर उपयोग कर सकता है, कितने पानी को दोबारा इस्तेमाल कर सकता है और स्थानीय जल स्रोतों को भविष्य के लिए कितना सुरक्षित रख सकता है। इसी दिशा में जल सुरक्षा को आर्थिक सुरक्षा का आधार बनाने की सोच भारत की विकास यात्रा को अधिक टिकाऊ और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


