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नई दिल्ली/जयपुर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्षों से लंबित अंतरराज्यीय जल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में मंगलवार को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर छह राज्यों के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में हुए इस समझौते पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सहित राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किए।
किशाऊ परियोजना को उत्तरी भारत के लिए महत्वपूर्ण जल परियोजना माना जा रहा है। परियोजना से उपलब्ध होने वाले जल का उपयोग पेयजल और सिंचाई जैसी आवश्यकताओं के लिए किया जाएगा। राजस्थान के लिए विशेष रूप से इसका महत्व इसलिए है क्योंकि प्रदेश के शेखावाटी क्षेत्र के अनेक हिस्से लंबे समय से जल की कमी का सामना करते रहे हैं। परियोजना से मिलने वाला जल इस क्षेत्र की भविष्य की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना यमुना नदी की प्रमुख सहायक नदी टौंस पर प्रस्तावित है। यह बांध उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बनाया जाना प्रस्तावित है। करीब 15,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना में जल संसाधन के उपयोग के साथ-साथ बिजली उत्पादन का भी प्रावधान किया गया है। परियोजना से लगभग 660 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन होने की बात कही गई है।
इस परियोजना से राजस्थान के अलावा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा को भी विभिन्न रूपों में लाभ मिलने की संभावना है। परियोजना को अंतरराज्यीय सहयोग और साझा जल संसाधन प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
किशाऊ परियोजना के माध्यम से जल के उपयोग और वितरण को लेकर राज्यों के बीच लंबे समय से चल रही चर्चाओं को अब औपचारिक समझौते का आधार मिला है। एमओयू के बाद परियोजना से जुड़े विभिन्न तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है।
समझौते के तहत हिमाचल प्रदेश के जल हिस्से का एक भाग राजस्थान और दिल्ली को उपलब्ध कराया जाएगा। इसके बदले संबंधित राज्यों द्वारा हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक की लागत में योगदान किए जाने की व्यवस्था बताई गई है।
परियोजना की लागत में भी केंद्र सरकार और भागीदार राज्यों की भूमिका निर्धारित की गई है। जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार द्वारा सहायता के रूप में वहन की जाएगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत लागत भागीदार राज्यों द्वारा वहन की जाएगी। इससे परियोजना के वित्तीय ढांचे को स्पष्ट आधार मिलेगा और इसके निर्माण को आगे बढ़ाने में सुविधा होगी।
समझौते में विभिन्न राज्यों के हितों और उनकी जल एवं विद्युत आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है। अंतरराज्यीय परियोजनाओं में अलग-अलग राज्यों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सहमति बनाना महत्वपूर्ण माना जाता है।
किशाऊ बांध परियोजना को भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय परियोजनाओं की सूची में शामिल किया गया है। इससे परियोजना को केंद्र स्तर पर विशेष महत्व प्राप्त हुआ है। परियोजना के निर्माण, संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा निभाई जाएगी।
परियोजना की निगरानी अपर यमुना बेसिन से संबंधित व्यवस्था के तहत की जाएगी। इससे परियोजना के निर्माण और संचालन से संबंधित विभिन्न गतिविधियों को निर्धारित संस्थागत ढांचे के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रावधान रहेगा।
राष्ट्रीय परियोजना के रूप में किशाऊ को आगे बढ़ाने का उद्देश्य केवल बांध निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से विभिन्न राज्यों की दीर्घकालीन जल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जल संसाधन का उपयोग सुनिश्चित करना भी है।
राजस्थान के लिए किशाऊ परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शेखावाटी क्षेत्र से जुड़ा है। सीकर, चूरू और झुंझुनूं सहित आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से पेयजल उपलब्धता एक महत्वपूर्ण विषय रही है। इन क्षेत्रों में भूजल पर निर्भरता अधिक रही है और जल की गुणवत्ता तथा उपलब्धता को लेकर भी कई स्थानों पर चुनौतियां सामने आती रही हैं।
किशाऊ बांध से राजस्थान को आवंटित 124 एमसीएम पानी को यमुना जल परियोजना के तहत भूमिगत पाइपलाइन प्रणालियों के माध्यम से राजस्थान तक पहुंचाने की योजना बताई गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार हरियाणा के हांसीवासी से चूरू तक तीन भूमिगत पाइपलाइन प्रणालियों के जरिए पानी पहुंचाने की योजना है।
इस जल व्यवस्था से शेखावाटी के जल अभावग्रस्त क्षेत्रों को दीर्घकालीन राहत मिलने की उम्मीद है। नियमित जल उपलब्धता से पेयजल योजनाओं को मजबूती मिल सकती है और क्षेत्र के लोगों को पानी की उपलब्धता के लिए वैकल्पिक एवं अस्थायी व्यवस्थाओं पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
शेखावाटी क्षेत्र के लिए प्रस्तावित जल आपूर्ति व्यवस्था का प्रभाव कई जिलों तक पहुंच सकता है। विशेष रूप से सीकर, चूरू और झुंझुनूं में पेयजल की उपलब्धता को बेहतर बनाने में इसका उपयोग किया जा सकता है।
पर्याप्त जल उपलब्ध होने से ग्रामीण आबादी, शहरी क्षेत्रों और कृषि क्षेत्र की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा करने की संभावनाएं बढ़ेंगी। पेयजल की नियमित उपलब्धता से स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक जीवन पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
किसी भी क्षेत्र में जल की स्थायी उपलब्धता केवल लोगों की बुनियादी जरूरत पूरी नहीं करती, बल्कि आर्थिक गतिविधियों के लिए भी आधार तैयार करती है। उद्योग, छोटे कारोबार, संस्थान और अन्य विकास गतिविधियां भी पर्याप्त जल संसाधनों से प्रभावित होती हैं। ऐसे में किशाऊ से मिलने वाला जल शेखावाटी के लिए व्यापक विकास की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है।
राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र के लिए जल सुरक्षा को लेकर यमुना जल समझौते और किशाऊ परियोजना को एक व्यापक जल व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। यमुना जल समझौते के तहत सीकर, चूरू, झुंझुनूं और अन्य क्षेत्रों की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भूमिगत पाइपलाइन के जरिए पानी राजस्थान लाने की दिशा में संयुक्त डीपीआर तैयार करने पर सहमति बनी है।
अब किशाऊ परियोजना के संशोधित एमओयू से इस पूरी जल व्यवस्था को और मजबूत आधार मिलने की बात कही जा रही है। भविष्य में परियोजना से उपलब्ध जल का उपयोग पेयजल, सिंचाई और अन्य आवश्यकताओं के लिए किया जा सकेगा।
इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य शेखावाटी जैसे जल अभाव वाले क्षेत्रों में दीर्घकालीन जल सुरक्षा तैयार करना है, ताकि बढ़ती आबादी और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जल उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
संशोधित समझौते में राजस्थान के जल हितों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हिमाचल प्रदेश द्वारा अपने विद्युत घटक से संबंधित लागत वहन किए जाने के बदले किशाऊ परियोजना के उसके आवंटित जल हिस्से का 95 प्रतिशत दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध होगा, जबकि 5 प्रतिशत हिस्सा हिमाचल प्रदेश अपने स्थानीय उपयोग के लिए रखेगा।
इस 95 प्रतिशत हिस्से में दिल्ली और राजस्थान की हिस्सेदारी 75:25 के अनुपात में निर्धारित किए जाने की जानकारी दी गई है। इस व्यवस्था से राजस्थान को परियोजना से मिलने वाले जल में निर्धारित हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी।
राजस्थान के लिए यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के कई क्षेत्र भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जल संसाधनों की कमी से प्रभावित रहे हैं। ऐसे में अंतरराज्यीय जल समझौतों के जरिए राज्य के हिस्से का पानी सुनिश्चित करना दीर्घकालीन जल नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
राजस्थान में जल सुरक्षा के संदर्भ में 1994 में हुए यमुना जल समझौते का भी विशेष महत्व है। वर्ष 1994 में पांच राज्यों के बीच हुए समझौते के तहत ताजेवाला हेड से मानसून अवधि में राजस्थान के लिए 1917 क्यूसेक यानी 577 एमसीएम पानी आवंटित किया गया था।
हालांकि जल प्रवाह प्रणाली उपलब्ध नहीं होने के कारण राजस्थान पिछले करीब 32 वर्षों से अपने हिस्से के इस पानी का उपयोग नहीं कर पा रहा था। ऐसे में यमुना जल समझौते को धरातल पर लागू करने और इसके लिए आवश्यक जल प्रवाह प्रणाली विकसित करने की दिशा में हाल के वर्षों में प्रयास तेज हुए हैं।
किशाऊ परियोजना और यमुना जल से जुड़ी योजनाओं को इसी व्यापक प्रयास के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। यदि प्रस्तावित जल परिवहन और पाइपलाइन व्यवस्था निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विकसित होती है तो शेखावाटी सहित राजस्थान के अन्य क्षेत्रों की दीर्घकालीन जल जरूरतों को पूरा करने में सहायता मिल सकती है।
राजस्थान सरकार की ओर से जल अभावग्रस्त क्षेत्रों के लिए कई बड़ी परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। इनमें रामजल सेतु लिंक परियोजना भी प्रमुख है। इसका उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जल संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाना और पेयजल एवं सिंचाई आवश्यकताओं को मजबूत करना है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में प्रदेश के विभिन्न जिलों में पेयजल और सिंचाई से संबंधित योजनाओं को आगे बढ़ाने की बात कही गई है। किशाऊ परियोजना, यमुना जल समझौता और रामजल सेतु लिंक परियोजना जैसी योजनाओं के माध्यम से राज्य की दीर्घकालीन जल आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
शेखावाटी क्षेत्र की पहचान ऐतिहासिक हवेलियों, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और देश-विदेश में फैले प्रवासी समाज के कारण रही है। यदि क्षेत्र में स्थायी जल उपलब्धता मजबूत होती है तो इसका असर केवल पेयजल तक सीमित नहीं रहेगा।
जल उपलब्धता से कृषि गतिविधियों को मजबूती मिल सकती है। उद्योग और छोटे कारोबार स्थापित करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। शिक्षा एवं स्वास्थ्य संस्थानों के विस्तार में सुविधा हो सकती है। पर्यटन क्षेत्र को भी इससे अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
शेखावाटी की ऐतिहासिक हवेलियां और सांस्कृतिक स्थल पहले से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। बेहतर बुनियादी सुविधाओं, सड़क संपर्क, हवाई संपर्क और जल उपलब्धता के साथ क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के प्रयासों से शेखावाटी में जल उपलब्धता के साथ-साथ कनेक्टिविटी, पर्यटन, विरासत संरक्षण और हवाई संपर्क से संबंधित योजनाओं को भी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यमुना जल समझौते और किशाऊ परियोजना से जल उपलब्धता को मजबूती मिलने की संभावना है, वहीं एक्सप्रेस-वे और हाईवे परियोजनाओं से सड़क संपर्क बेहतर होने की उम्मीद है। ऐतिहासिक हवेलियों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। सीकर और झुंझुनूं में हवाई संपर्क से संबंधित योजनाएं क्षेत्र को व्यापक परिवहन नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
इन सभी क्षेत्रों में एक साथ विकास होने से शेखावाटी की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की संभावनाएं बनती हैं। बेहतर जल व्यवस्था, सड़क और हवाई कनेक्टिविटी तथा पर्यटन विकास एक-दूसरे के पूरक साबित हो सकते हैं।
किसी भी क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास का सीधा संबंध रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से होता है। जल परियोजनाओं के साथ यदि उद्योग, पर्यटन और आधारभूत ढांचे का विस्तार होता है तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना रहती है।
शेखावाटी के युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर जाने के बजाय अपने क्षेत्र में ही अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में भी यह विकास महत्वपूर्ण हो सकता है। पर्यटन, होटल, परिवहन, सेवा क्षेत्र, कृषि आधारित उद्योग और स्थानीय कारोबार को बेहतर बुनियादी सुविधाओं का लाभ मिल सकता है।
हालांकि इन संभावनाओं को वास्तविक लाभ में बदलने के लिए परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन, जल वितरण व्यवस्था, पर्यावरणीय पहलुओं और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप योजना बनाना भी महत्वपूर्ण होगा।
शेखावाटी जैसे क्षेत्र में पानी की उपलब्धता को सामाजिक विकास से भी जोड़कर देखा जा सकता है। ग्रामीण परिवारों को दूर-दराज से पानी लाने में लगने वाला समय कम हो सकता है। पेयजल की नियमित उपलब्धता से महिलाओं और बच्चों पर पानी जुटाने का बोझ कम होने की संभावना रहती है।
स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने से बुनियादी सेवाओं को संचालित करने में भी सुविधा मिलती है। इसी कारण जल परियोजनाओं का प्रभाव केवल पाइपलाइन और बांध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचता है।
किशाऊ परियोजना का एमओयू अंतरराज्यीय जल सहयोग की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। एक ही नदी तंत्र से जुड़े राज्यों के बीच जल के उपयोग और वितरण को लेकर सहमति बनाना आसान प्रक्रिया नहीं होती। ऐसे में केंद्र सरकार की मध्यस्थ भूमिका और राज्यों के बीच सहमति परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
राजस्थान सहित छह राज्यों के बीच हुए समझौते से परियोजना के क्रियान्वयन का एक संस्थागत आधार तैयार हुआ है। अब परियोजना के अगले चरणों में तकनीकी, वित्तीय, पर्यावरणीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।
किशाऊ परियोजना को राजस्थान की दीर्घकालीन जल रणनीति के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। यमुना जल समझौते से लेकर किशाऊ परियोजना और रामजल सेतु लिंक परियोजना तक विभिन्न जल परियोजनाओं का उद्देश्य प्रदेश के जल अभावग्रस्त क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में संसाधन जुटाना है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के अनुसार, जल सुरक्षा केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा विषय है। राजस्थान जैसे राज्य में जहां कई क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से जल की उपलब्धता सीमित है, वहां दीर्घकालीन और अंतरराज्यीय जल परियोजनाओं का महत्व और बढ़ जाता है। किशाऊ परियोजना के एमओयू के बाद अब नजर इसके आगामी क्रियान्वयन पर रहेगी। परियोजना के निर्माण, जल परिवहन और वितरण से जुड़े चरण पूरे होने के साथ राजस्थान के जल अभावग्रस्त क्षेत्रों को भविष्य में इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है। खासतौर पर शेखावाटी के लिए यह परियोजना पेयजल सुरक्षा, सिंचाई, आर्थिक गतिविधियों और क्षेत्रीय विकास की नई संभावनाओं का आधार बन सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


