यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। चुनाव आयोग और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर देश की सियासत मंगलवार को राजधानी दिल्ली में आमने-सामने नजर आई। एक तरफ INDIA गठबंधन के सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च किया, तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और राहुल गांधी के 'वोट चोरी' के आरोपों पर तीखा पलटवार किया।
6 अक्टूबर को राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा समेत विपक्षी दलों के कई नेता चुनाव आयोग की ओर मार्च करते हुए नजर आए। विपक्ष की मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठ रहे सवालों पर कार्रवाई की है। मार्च को पुलिस ने आगे बढ़ने से रोका और कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया।
इसी राजनीतिक टकराव के बीच भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर कई सवाल दागे। उन्होंने राहुल गांधी के चुनाव प्रचार, कांग्रेस के पुराने बयानों और मतदाता सूची में मृतक तथा डुप्लीकेट नामों को लेकर विपक्ष के दावों पर सवाल उठाया।
INDIA गठबंधन का मार्च केवल चुनाव आयोग तक पहुंचने की कवायद नहीं था। यह विपक्ष की उस राजनीतिक मुहिम का हिस्सा है, जिसमें मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
राहुल गांधी लगातार 'वोट चोरी' के आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर पारदर्शिता जरूरी है।
वहीं चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया का उद्देश्य मृतक, डुप्लीकेट और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना है। हाल में आयोग ने राहुल गांधी के कुछ दावों को भी 'भ्रामक' बताते हुए स्पष्टीकरण जारी किया था।
यानी तस्वीर साफ है—विपक्ष सवाल पूछ रहा है, चुनाव आयोग प्रक्रिया का बचाव कर रहा है और भाजपा कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार कर रही है।
भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने उनके चुनाव प्रचार के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि राहुल गांधी किसी राज्य के चुनाव में लगातार एक सप्ताह भी कैंप करके प्रचार नहीं करते।
त्रिवेदी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के चुनावी अभियान का उदाहरण देते हुए कहा कि शाह ने पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक रहने और चुनाव प्रचार करने की बात कही थी, जबकि राहुल गांधी के मामले में ऐसा नहीं दिखता।
उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्हें 'कामचोर' तक कह दिया। इसके अलावा उन्होंने अपने बयान में 'कुंठाधिपति' और 'ईर्ष्याधिपति' जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया।
ये भाजपा नेता के राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के उस दावे पर सवाल उठाया जिसमें मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने की बात कही जा रही है।
उनके मुताबिक इस आंकड़े में लगभग 2.8 करोड़ मृतक, 6.3 करोड़ स्थानांतरित, 1 करोड़ डुप्लीकेट और करीब 3 करोड़ अनुपस्थित या नॉन-ट्रेसेबल मतदाता शामिल हैं। भाजपा का तर्क है कि यदि इनमें मृतक और डुप्लीकेट प्रविष्टियां शामिल हैं तो उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित किए जाने के रूप में पेश करना सही नहीं है।
यही भाजपा के पलटवार का पहला बड़ा आधार है।
हालांकि यहां मूल विवाद केवल नाम हटाने का आंकड़ा नहीं, बल्कि यह भी है कि वैध मतदाताओं के नाम गलती से न हटें और जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनके लिए प्रभावी आपत्ति और अपील की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है।
सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर लगातार संवैधानिक और सार्वजनिक संस्थाओं पर आरोप लगाने का आरोप लगाया।
उन्होंने नौसेना, वायुसेना, LIC, HAL जैसी संस्थाओं का उल्लेख करते हुए कांग्रेस से सवाल किया कि आखिर कितनी संस्थाओं पर पार्टी सवाल उठा चुकी है।
भाजपा का कहना है कि कांग्रेस लगातार संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर भ्रम पैदा कर रही है।
दूसरी ओर कांग्रेस और विपक्ष का तर्क है कि संवैधानिक संस्थाओं से जवाबदेही मांगना लोकतांत्रिक अधिकार है और चुनाव आयोग जैसे संस्थान पर सवाल उठने की स्थिति में पारदर्शिता की मांग करना गलत नहीं है।
यहीं से राजनीतिक बहस का दूसरा मोर्चा खुलता है—संस्थाओं की आलोचना और संस्थाओं की विश्वसनीयता के बीच संतुलन कहां हो?
सुधांशु त्रिवेदी ने मतदाता सूची की सफाई की तुलना दूसरे सरकारी डेटाबेस की जांच से करते हुए राशन कार्ड और मनरेगा का उदाहरण दिया।
उन्होंने दावा किया कि राशन कार्डों की जांच में बड़ी संख्या में गलत प्रविष्टियां मिली थीं और मनरेगा के रिकॉर्ड की जांच में भी लाखों अपात्र या फर्जी प्रविष्टियां सामने आई थीं।
उनका तर्क था कि जब सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के रिकॉर्ड की जांच हो सकती है तो मतदाता सूची की जांच पर आपत्ति क्यों?
भाजपा इसी आधार पर पूछ रही है कि यदि कोई व्यक्ति मृत हो चुका है, स्थानांतरित हो चुका है या रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है तो उसका नाम मतदाता सूची में बनाए रखने की मांग किस उद्देश्य से की जा रही है।
हालांकि मतदाता सूची और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी रिकॉर्ड अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के तहत आते हैं। इसलिए दोनों की तुलना पर भी अलग से बहस की गुंजाइश है।
भाजपा ने कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन को भी निशाने पर लिया।
सुधांशु त्रिवेदी ने सवाल किया कि 2003 से पहले कांग्रेस कितने राज्यों में सत्ता में थी और आज पार्टी की स्थिति क्या है।
उन्होंने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस के कमजोर संगठन और चुनावी प्रदर्शन पर तंज कसा।
भाजपा का राजनीतिक संदेश साफ है—कांग्रेस को अपनी चुनावी हार का कारण मतदाता सूची या चुनाव आयोग को बताने के बजाय अपने संगठन और राजनीतिक रणनीति पर विचार करना चाहिए।
कांग्रेस का जवाब इसके विपरीत है। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया और संस्थागत निष्पक्षता को लोकतंत्र का बुनियादी सवाल मानता है और इसी आधार पर चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा है।
सुधांशु त्रिवेदी का पांचवां सवाल सीधे राहुल गांधी के चुनाव प्रचार से जुड़ा था।
उन्होंने पूछा कि 2004 से अब तक ऐसा कौन सा विधानसभा चुनाव है जिसमें राहुल गांधी ने किसी राज्य में लंबे समय तक डेरा डालकर लगातार चुनाव प्रचार किया हो।
भाजपा नेता का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित भाजपा के वरिष्ठ नेता चुनावी राज्यों में लंबे समय तक कैंप करते हैं, जबकि राहुल गांधी पर वह मॉडल लागू नहीं होता।
यह सवाल भी सीधे कांग्रेस के संगठन और नेतृत्व की चुनावी रणनीति पर भाजपा के हमले का हिस्सा है।
सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के पुराने बयानों का हवाला देते हुए यह भी पूछा कि जब कांग्रेस के नेता पहले डुप्लीकेट वोटरों के नाम हटाने की मांग करते थे, तो अब मतदाता सूची की सफाई पर सवाल क्यों उठा रहे हैं।
भाजपा का कहना है कि अगर डुप्लीकेट, मृतक और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं तो कांग्रेस को इसका विरोध नहीं करना चाहिए।
वहीं विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से न हटें, इसके लिए प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और हर प्रभावित मतदाता को अपना नाम बचाने या वापस जुड़वाने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
यही विवाद इस पूरे राजनीतिक टकराव का केंद्र बना हुआ है।
6 अक्टूबर के मार्च के दौरान राजधानी में राजनीतिक ड्रामा भी देखने को मिला। विपक्षी सांसदों को पुलिस ने चुनाव आयोग की ओर बढ़ने से रोका। इस दौरान राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ते हुए नजर आए और बाद में कई नेताओं को हिरासत में लिया गया।
प्रियंका गांधी वाड्रा समेत विपक्ष के कई नेता भी प्रदर्शन में शामिल रहे।
विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज बता रहा है, जबकि भाजपा ने इस तरह के विरोध प्रदर्शन को लेकर विपक्ष पर राजनीतिक माहौल बिगाड़ने के आरोप लगाए हैं।
इस विवाद में तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष चुनाव आयोग है।
राहुल गांधी और विपक्षी दल चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन आयोग ने कई आरोपों को खारिज किया है। हाल ही में राहुल गांधी के फॉर्म-6 में बदलाव संबंधी दावे पर आयोग ने इसे 'misleading' बताया और अपना पक्ष रखा था।
यानी यह केवल BJP बनाम कांग्रेस का राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है। इसके केंद्र में चुनाव आयोग, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और मतदाताओं के अधिकार का सवाल भी है।
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि कितने नाम हटे।
बड़ा सवाल यह है कि हटाए गए नामों में कितने वास्तविक मतदाता थे, कितने मृतक थे, कितने स्थानांतरित हुए, कितने डुप्लीकेट थे और कितने मामलों में दस्तावेज या सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
विपक्ष जहां 'वोट के अधिकार की रक्षा' की बात कर रहा है, वहीं भाजपा 'मतदाता सूची की सफाई' को जरूरी बता रही है।
चुनाव आयोग प्रक्रिया को नियमों के तहत संचालित होने की बात कह रहा है।
ऐसे में आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और तेज होने के साथ-साथ दस्तावेजी आंकड़े और आधिकारिक स्पष्टीकरण भी इस विवाद के केंद्र में रहेंगे।
एक तरफ INDIA गठबंधन चुनाव आयोग के खिलाफ अपना आंदोलन तेज कर रहा है, दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक रणनीति बताकर जवाब दे रही है।
राहुल गांधी और विपक्ष के लिए सवाल चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का है।
भाजपा के लिए सवाल कांग्रेस के दावों की विश्वसनीयता और उसके चुनावी प्रदर्शन का है।
और चुनाव आयोग के सामने चुनौती है कि वह मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को इस तरह स्पष्ट करे कि वैध मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहे और मृतक, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियां भी हटाई जा सकें।
फिलहाल दिल्ली में एक ही दिन दो तस्वीरें सामने आई हैं—
एक तस्वीर में चुनाव आयोग की ओर बढ़ता INDIA गठबंधन है।
दूसरी तस्वीर में भाजपा के मंच से कांग्रेस और राहुल गांधी पर दागे जा रहे सवाल हैं। राजनीतिक तापमान बढ़ चुका है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह टकराव केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर कोई ठोस संस्थागत जवाब सामने आता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


