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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत के पर्यटन क्षेत्र को विकास के अगले चरण में ले जाने के लिए केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए नए पर्यटन गंतव्यों का विकास, आधुनिक बुनियादी ढांचा, बेहतर कनेक्टिविटी, निजी निवेश, कुशल मानव संसाधन और पर्यटकों को सुविधाजनक एवं यादगार अनुभव उपलब्ध कराना जरूरी होगा। केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित एसोचैम राष्ट्रीय पर्यटन सम्मेलन 2026 में यह बात कही।
‘टूरिज्म एक इकोनॉमिक इंजन के तौर पर: टेक्नोलॉजी, पॉलिसी, इन्वेस्टमेंट और ग्लोबल पार्टनरशिप’ विषय पर आयोजित कॉन्क्लेव में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, पर्यटन उद्योग, होटल कारोबार, रियल एस्टेट, ट्रैवल कंपनियों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने पर्यटन को आर्थिक विकास के प्रमुख इंजन के रूप में विकसित करने की रणनीति पर चर्चा की।
सम्मेलन में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि भारत के पास पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इन संभावनाओं को आर्थिक अवसरों में बदलने के लिए पर्यटन स्थलों की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ नए क्षेत्रों को भी पर्यटन मानचित्र पर लाना होगा।
शेखावत ने कहा कि भारत में हाईवे, हवाई अड्डों, रेलवे नेटवर्क और नए परिवहन गलियारों का लगातार विस्तार हो रहा है। बेहतर कनेक्टिविटी के कारण आने वाले वर्षों में देश के भीतर और बाहर से यात्रा की मांग बढ़ने की संभावना है।
ऐसे में पर्यटन क्षेत्र के सामने अगली चुनौती यह होगी कि बढ़ती यात्रा मांग को किस तरह नए गंतव्यों और नए अनुभवों की ओर मोड़ा जाए। यदि पर्यटकों का दबाव कुछ चुनिंदा शहरों और प्रसिद्ध स्थलों तक सीमित रहता है तो वहां बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए नए पर्यटन गंतव्यों को विकसित करना, कम चर्चित स्थानों को बेहतर तरीके से जोड़ना और वहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा।
पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए सरकार के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया गया। होटल, रिसॉर्ट, मनोरंजन सुविधाएं, पर्यटन परिवहन, सम्मेलन केंद्र, क्रूज, एडवेंचर टूरिज्म और अन्य सेवाओं में निजी निवेश से पर्यटन इकोसिस्टम को विस्तार मिल सकता है।
शेखावत ने पर्यटन ढांचे, हॉस्पिटैलिटी और कुशल मानव संसाधन में निजी निवेश बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी से कई ऐसे प्रोजेक्ट विकसित किए जा सकते हैं, जिन्हें केवल सरकारी निवेश से तेजी से पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
देश में एक्सप्रेसवे और आधुनिक हाईवे नेटवर्क का विस्तार पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण बदलाव ला रहा है। पहले जिन गंतव्यों तक पहुंचने में अधिक समय लगता था, वे अब सड़क नेटवर्क के विस्तार के कारण ज्यादा आसानी से पहुंच योग्य हो रहे हैं।
रेल कनेक्टिविटी, क्षेत्रीय हवाई संपर्क, रोपवे और जल परिवहन जैसे माध्यम भी पर्यटन के नए सर्किट विकसित करने में मदद कर सकते हैं।
पर्यटन के लिए केवल किसी एक स्थल को विकसित करना पर्याप्त नहीं है। आसपास के कई स्थलों को जोड़कर एक पूरा टूरिज्म सर्किट तैयार किया जाए तो पर्यटक अधिक समय तक किसी क्षेत्र में ठहर सकते हैं। इससे होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन, स्थानीय दुकानों और अन्य सेवाओं को भी आर्थिक लाभ मिल सकता है।
कॉन्क्लेव में जारी एसोचैम-सीबीआरई रिपोर्ट ने भारत में पर्यटन के बदलते स्वरूप और विभिन्न उभरती श्रेणियों पर प्रकाश डाला।
भारत की आध्यात्मिक और धार्मिक विरासत देश के पर्यटन क्षेत्र की बड़ी ताकत है। धार्मिक स्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या के साथ अब पर्यटन अनुभव को बेहतर बनाने के लिए आवास, स्वच्छता, परिवहन, सूचना केंद्र, डिजिटल सेवाएं और स्थानीय उत्पादों की बिक्री जैसी सुविधाओं को भी मजबूत करने की आवश्यकता है।
आध्यात्मिक पर्यटन को केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित न रखते हुए आसपास के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों से जोड़ा जा सकता है।
भारत में वेलनेस और मेडिकल टूरिज्म की भी व्यापक संभावनाएं हैं। योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के संयोजन के कारण भारत अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए अलग तरह का अनुभव प्रदान कर सकता है।
इसके लिए अस्पतालों, वेलनेस सेंटर, होटल और पर्यटन संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होगी। अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए भाषा, परिवहन, आवास और डिजिटल सूचना जैसी सुविधाओं को भी मजबूत करना होगा।
मीटिंग्स, इंसेंटिव्स, कॉन्फ्रेंस और एग्जिबिशन यानी एमआईसीई पर्यटन भी भारत में तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र हो सकता है।
बड़े सम्मेलन, व्यापारिक बैठकें, प्रदर्शनियां और कॉर्पोरेट कार्यक्रम पर्यटन को व्यवसायिक यात्रा से जोड़ते हैं। इससे केवल होटल और सम्मेलन केंद्रों को ही फायदा नहीं होता, बल्कि एयरलाइंस, टैक्सी, रेस्टोरेंट, स्थानीय बाजार और मनोरंजन सेवाओं को भी अतिरिक्त मांग मिलती है।
बड़े शहरों के अलावा दूसरे शहरों में आधुनिक कन्वेंशन सुविधाओं के विकास से पर्यटन के भौगोलिक विस्तार में मदद मिल सकती है।
भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और जल संसाधन क्रूज पर्यटन के लिए भी अवसर प्रदान करते हैं। क्रूज टर्मिनल, बंदरगाहों के आसपास पर्यटन सुविधाएं और तटीय शहरों में मनोरंजन एवं सांस्कृतिक गतिविधियां विकसित करके इस क्षेत्र को आगे बढ़ाया जा सकता है।
क्रूज पर्यटन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि पर्यटक केवल बंदरगाह तक सीमित न रहें बल्कि स्थानीय बाजार, संस्कृति, भोजन और विरासत स्थलों का अनुभव कर सकें।
ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने से पर्यटन का लाभ छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाया जा सकता है। स्थानीय संस्कृति, हस्तशिल्प, पारंपरिक भोजन, लोक कला, कृषि आधारित गतिविधियां और ग्रामीण जीवन पर्यटकों के लिए नए अनुभव बन सकते हैं।
होमस्टे मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय का अतिरिक्त माध्यम बन सकता है। इससे स्थानीय परिवार सीधे पर्यटन अर्थव्यवस्था से जुड़ सकते हैं।
भारत के जंगल, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य घरेलू और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। वाइल्डलाइफ पर्यटन को बढ़ावा देते समय संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर ध्यान देना जरूरी होगा।
पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव नियंत्रित करना, कचरा प्रबंधन, स्थानीय रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को पर्यटन नीति का हिस्सा बनाना होगा।
एसोचैम-सीबीआरई रिपोर्ट के अनुसार संगठित होटल क्षेत्र में ऑक्यूपेंसी 2021 के 42 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 64.1 प्रतिशत हो गई।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि औसत दैनिक दरों में वृद्धि के चलते होटल क्षेत्र का रेवपार यानी रेवेन्यू पर अवेलेबल रूम महामारी-पूर्व स्तर से आगे निकल गया है।
यह आंकड़े पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में मांग की वापसी और होटल कारोबार में सुधार की दिशा की ओर संकेत करते हैं।
एसोचैम अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा कि पर्यटन अब केवल घूमने-फिरने तक सीमित गतिविधि नहीं रह गया है। यह आर्थिक विकास, रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।
पर्यटन का प्रभाव होटल या ट्रैवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। पर्यटक जिस क्षेत्र में जाता है, वहां परिवहन, भोजन, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प, मनोरंजन, गाइड और अन्य सेवाओं की मांग बढ़ती है।
इसलिए पर्यटन में निवेश का प्रभाव कई दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचता है।
निर्मल के. मिंडा ने पर्यटन विकास के लिए मेक इन इंडिया, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, एमएसएमई विकास, डिजिटल इकोनॉमी और सस्टेनेबिलिटी को महत्वपूर्ण आधार बताया।
स्थानीय स्तर पर होटल, रेस्टोरेंट, हस्तशिल्प, परिवहन और पर्यटन सेवाओं से जुड़े एमएसएमई को मजबूत करके पर्यटन की आर्थिक श्रृंखला को व्यापक बनाया जा सकता है।
इससे स्थानीय उद्यमियों के लिए नए व्यवसायिक अवसर पैदा हो सकते हैं और पर्यटन आय का अधिक हिस्सा स्थानीय अर्थव्यवस्था में रह सकता है।
पर्यटन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। पर्यटक किसी गंतव्य की योजना बनाने से लेकर यात्रा पूरी करने तक डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करता है।
एआई आधारित सेवाएं पर्यटकों को उनकी पसंद के अनुसार यात्रा कार्यक्रम तैयार करने, होटल और गतिविधियों की जानकारी देने, स्थानीय आकर्षणों की पहचान करने और यात्रा के दौरान सहायता उपलब्ध कराने में उपयोगी हो सकती हैं।
डेस्टिनेशन की खोज, पार्किंग, नेविगेशन, टिकटिंग, फीडबैक और विजिटर सर्विसेज में तकनीक के इस्तेमाल से यात्रा को अधिक सुविधाजनक बनाया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र आईजीएफ की सदस्य डॉ. सुबी चतुर्वेदी ने कहा कि एआई और तकनीक का इस्तेमाल केवल बड़े होटल या पर्यटन कंपनियों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
डिजिटल तकनीक की मदद से पर्यटकों का ध्यान प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों से आगे स्थानीय गाइडों, कारीगरों, महिला उद्यमियों, होमस्टे और छोटे कारोबारों की ओर भी ले जाया जा सकता है।
यदि किसी पर्यटक को स्थानीय हस्तशिल्प, स्थानीय भोजन, ग्रामीण अनुभव या किसी छोटे व्यवसाय की जानकारी डिजिटल माध्यम से आसानी से मिलती है तो उस क्षेत्र में पर्यटन से होने वाली आय का विस्तार हो सकता है।
डॉ. चतुर्वेदी ने स्मार्ट टूरिज्म को केवल फुटफॉल बढ़ाने की प्रक्रिया न मानते हुए स्थानीय समुदायों की आजीविका और विरासत संरक्षण से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
इस मॉडल में पर्यटक को बेहतर अनुभव मिलने के साथ स्थानीय लोगों को भी आर्थिक लाभ मिलना महत्वपूर्ण है। इससे पर्यटन का विकास अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाया जा सकता है।
हरियाणा के कैबिनेट मंत्री डॉ. अरविंद कुमार शर्मा ने कुरुक्षेत्र, पानीपत, सूरजकुंड और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन की संभावनाओं का उल्लेख किया।
कुरुक्षेत्र की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान, पानीपत का इतिहास, सूरजकुंड का सांस्कृतिक महत्व और ग्रामीण क्षेत्रों की स्थानीय विरासत को पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की संभावनाएं मौजूद हैं।
उन्होंने पर्यटन परियोजनाओं में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी और निजी निवेश को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
सीबीआरई के चेयरमैन एवं सीईओ अंशुमान मैगजीन ने भारत की विरासत, आध्यात्मिकता, संस्कृति, वन्यजीव, वेलनेस, समुद्र तट और पर्वतीय क्षेत्रों की विविधता को पर्यटन की बड़ी ताकत बताया।
भारत में एक ही देश के भीतर अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक अनुभव उपलब्ध हैं। यही विविधता घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के लिए आकर्षण का आधार बन सकती है।
हालांकि, इन क्षेत्रों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए बुनियादी ढांचे, स्वच्छता, सुरक्षा और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट में सुधार आवश्यक होगा।
पर्यटन स्थल का आकर्षण केवल प्राकृतिक सुंदरता या ऐतिहासिक महत्व से निर्धारित नहीं होता। वहां पहुंचने के बाद पर्यटक को साफ-सफाई, सुरक्षित वातावरण, अच्छी सड़कें, सार्वजनिक शौचालय, पार्किंग, भोजन और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी चाहिए।
इसलिए पर्यटन विकास की योजनाओं में डेस्टिनेशन की सुंदरता के साथ बुनियादी नागरिक सुविधाओं को भी प्राथमिकता देनी होगी।
आईएटीओ अध्यक्ष रवि गोसैन ने कहा कि पर्यटन का आर्थिक प्रभाव होटल और पर्यटकों की संख्या से कहीं व्यापक है। परिवहन, स्थानीय कारोबार, कारीगर, गाइड और समुदाय भी पर्यटन से रोजगार और आय प्राप्त करते हैं।
उन्होंने कनेक्टिविटी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, कौशल विकास और कम चर्चित पर्यटन स्थलों में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया।
भारत में ऐसे अनेक ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्थल हैं, जो अभी बड़े पैमाने पर पर्यटन मानचित्र पर नहीं आ पाए हैं। इन स्थलों को बुनियादी सुविधाओं और बेहतर प्रचार के जरिए नए पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
पर्यटन का वास्तविक आर्थिक प्रभाव तब अधिक व्यापक हो सकता है जब पर्यटक स्थानीय सेवाओं और उत्पादों पर खर्च करता है।
स्थानीय गाइड, हस्तशिल्प निर्माता, लोक कलाकार, छोटे रेस्टोरेंट, टैक्सी संचालक, होमस्टे और महिला उद्यमी पर्यटन की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म इन लोगों को सीधे पर्यटकों से जोड़ सकते हैं। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और स्थानीय उद्यमों की दृश्यता बढ़ाने की संभावना बनती है।
पर्यटन क्षेत्र के विस्तार के साथ प्रशिक्षित कर्मचारियों की मांग भी बढ़ेगी। होटल, रेस्टोरेंट, ट्रैवल कंपनियां, एयरपोर्ट, क्रूज, टूर गाइड और एडवेंचर पर्यटन जैसी सेवाओं के लिए अलग-अलग प्रकार के कौशल की आवश्यकता होती है।
भाषा कौशल, डिजिटल सेवाएं, ग्राहक सेवा, आतिथ्य, स्थानीय संस्कृति और आपातकालीन प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण देकर युवाओं को पर्यटन क्षेत्र से जोड़ा जा सकता है।
कॉन्क्लेव में विदेशी पर्यटकों के लिए वीजा सुविधा को भी महत्वपूर्ण विषय बताया गया। यात्रा की योजना बनाने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए वीजा प्रक्रिया जितनी स्पष्ट और सुविधाजनक होगी, भारत की पर्यटन प्रतिस्पर्धात्मकता पर उसका उतना ही प्रभाव पड़ सकता है।
डिजिटल गवर्नेंस के माध्यम से आवेदन, जानकारी और यात्रा संबंधी सेवाओं को अधिक सहज बनाया जा सकता है।
पर्यटन किसी एक मंत्रालय या विभाग तक सीमित क्षेत्र नहीं है। किसी पर्यटन स्थल के विकास में सड़क, परिवहन, संस्कृति, पर्यावरण, नगर निकाय, पुलिस, स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन सहित कई संस्थाओं की भूमिका होती है।
इसलिए केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय से परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने और पर्यटकों को एकीकृत सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
पर्यटन परियोजनाओं में पीपीपी मॉडल का इस्तेमाल बढ़ाने से सरकार और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता तथा संसाधनों को एक साथ लाया जा सकता है।
होटल, कन्वेंशन सेंटर, रोपवे, मनोरंजन सुविधाएं, पर्यटन परिवहन और अन्य परियोजनाओं में निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए स्पष्ट नीतियां और आसान कारोबारी प्रक्रियाएं जरूरी होंगी।
पर्यटन के विस्तार के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक होगा। पहाड़ी, समुद्री और वन क्षेत्रों में अत्यधिक पर्यटन से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण, ऊर्जा दक्षता, स्थानीय संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग और पर्यावरण अनुकूल निर्माण को पर्यटन परियोजनाओं का हिस्सा बनाना होगा।
पर्यटन का एक बड़ा लाभ यह है कि यह रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बड़े शहरों से बाहर भी ले जा सकता है।
यदि किसी छोटे शहर या गांव में पर्यटन स्थल विकसित होता है तो वहां होटल, परिवहन, भोजन, हस्तशिल्प, स्थानीय बाजार और अन्य सेवाओं का विकास हो सकता है। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
आने वाले वर्षों में पर्यटक केवल किसी स्थान को देखने के बजाय अनुभव की तलाश करेगा। स्थानीय भोजन, संस्कृति, कला, इतिहास, प्रकृति, आध्यात्मिकता और समुदाय से जुड़ना यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
भारत इस क्षेत्र में अपनी विविधता का लाभ उठा सकता है। अलग-अलग राज्यों की स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली को पर्यटन उत्पाद के रूप में विकसित किया जा सकता है।
कॉन्क्लेव में हुई चर्चाओं से पर्यटन क्षेत्र की कई प्रमुख प्राथमिकताएं सामने आईं—
भारत के पास विशाल सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्थल, प्राकृतिक संसाधन, समुद्र तट, पहाड़, जंगल, ऐतिहासिक शहर और विविध खान-पान जैसी अनेक पर्यटन संपदाएं हैं। इसके अलावा घरेलू पर्यटन का बड़ा बाजार भी मौजूद है।
अब चुनौती इन सभी संसाधनों को व्यवस्थित पर्यटन उत्पाद में बदलने की है। बेहतर कनेक्टिविटी के साथ यदि नए गंतव्यों में होटल, स्थानीय परिवहन, डिजिटल सेवाएं, सुरक्षा और स्वच्छता जैसी सुविधाएं विकसित होती हैं तो पर्यटन का आर्थिक प्रभाव और व्यापक हो सकता है।
एसोचैम राष्ट्रीय पर्यटन सम्मेलन 2026 में उभरा व्यापक संदेश यही रहा कि भारत के पर्यटन क्षेत्र की अगली छलांग केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि बेहतर गंतव्य, बेहतर अनुभव, बेहतर कनेक्टिविटी और स्थानीय अर्थव्यवस्था से मजबूत जुड़ाव के जरिए होगी।
सरकार, उद्योग और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग से पर्यटन को रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय विकास के एक बड़े इंजन के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। तकनीक और एआई इस बदलाव को गति दे सकते हैं, लेकिन पर्यटन की वास्तविक ताकत भारत की संस्कृति, विरासत, प्रकृति और स्थानीय समुदायों में बनी रहेगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


