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- 12h ago
नई दिल्ली। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में चालू वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही के दौरान ऋण वृद्धि को लेकर मजबूत आशावाद देखने को मिल रहा है। खुदरा ऋण, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को कर्ज, औद्योगिक गतिविधियों और सेवा क्षेत्र से बढ़ती मांग के चलते बैंकों को आने वाले महीनों में ऋण कारोबार में अच्छी वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि, कर्ज वितरण की रफ्तार के मुकाबले जमा राशि में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) के 22वें बैंकर्स सर्वेक्षण में यह सकारात्मक तस्वीर सामने आई है। जुलाई से दिसंबर 2026 की अवधि को लेकर किए गए इस सर्वेक्षण में सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और विदेशी बैंकों सहित कुल 22 बैंकों ने भाग लिया। ये बैंक देश की कुल बैंकिंग परिसंपत्तियों के तीन-चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, अधिकांश बैंक आने वाले छह महीनों में ऋण मांग मजबूत बने रहने की उम्मीद कर रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि देश में उपभोग, कारोबार विस्तार और निवेश से जुड़ी वित्तीय जरूरतें बैंकिंग क्षेत्र के लिए वृद्धि के महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर सकती हैं।
सर्वेक्षण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि लगभग तीन-चौथाई प्रतिभागी बैंकों को अगले छह महीनों में गैर-खाद्य ऋण की सालाना वृद्धि दर लगभग 15 प्रतिशत या उससे अधिक रहने की उम्मीद है। वहीं, लगभग सभी भाग लेने वाले बैंकों ने कम से कम दोहरे अंकों में ऋण वृद्धि का अनुमान लगाया है।
बैंकिंग क्षेत्र में गैर-खाद्य ऋण से आशय आम तौर पर खाद्य ऋण को छोड़कर अन्य क्षेत्रों को दिए गए बैंक ऋण से है। इसमें व्यक्तिगत कर्ज, आवास ऋण, वाहन ऋण, उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज और कारोबारी वित्तपोषण जैसी श्रेणियां शामिल होती हैं।
निजी क्षेत्र के बैंक ऋण वृद्धि को लेकर सबसे अधिक आशावादी दिखाई दिए। सर्वेक्षण में शामिल निजी बैंकों के लगभग 90 प्रतिशत प्रतिभागियों ने 15 प्रतिशत या उससे अधिक वृद्धि की संभावना जताई।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भी लगभग तीन-चौथाई प्रतिभागियों का अनुमान इसी स्तर का रहा। इसके विपरीत, विदेशी बैंकों ने अपेक्षाकृत सतर्क रुख अपनाया और कम दोहरे अंकों में ऋण वृद्धि की संभावना जताई।
इन अनुमानों से पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र में कर्ज की मांग को लेकर भरोसा बना हुआ है। हालांकि, ये सर्वेक्षण में शामिल बैंकों की अपेक्षाएं हैं, वास्तविक ऋण वृद्धि की गारंटी नहीं।
आने वाले महीनों में खुदरा और MSME क्षेत्र बैंक ऋण वृद्धि के सबसे महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। सर्वेक्षण में 80 प्रतिशत से अधिक प्रतिभागियों ने दोनों क्षेत्रों में मजबूत दोहरे अंकों की सालाना वृद्धि की उम्मीद जताई है।
खुदरा ऋण में आवास ऋण, वाहन ऋण, व्यक्तिगत ऋण और अन्य उपभोक्ता वित्तपोषण शामिल होते हैं। लोगों की आवास, वाहन और अन्य जरूरतों के लिए कर्ज की मांग बढ़ने से बैंकों के खुदरा ऋण कारोबार को सहारा मिलता है।
दूसरी ओर, MSME क्षेत्र देश में रोजगार, उत्पादन और स्थानीय कारोबारी गतिविधियों का महत्वपूर्ण आधार है। छोटे और मध्यम उद्यमों को मशीनरी खरीदने, कच्चा माल जुटाने, कर्मचारियों को वेतन देने और कारोबार का विस्तार करने के लिए वित्त की जरूरत होती है।
सर्वेक्षण में लगभग सभी प्रतिभागी बैंकों ने MSME ऋण में दोहरे अंकों की वृद्धि की संभावना जताई। इससे पता चलता है कि छोटे और मध्यम कारोबारों की वित्तीय जरूरतें बैंकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बनी हुई हैं।
हालांकि, इस क्षेत्र में ऋण विस्तार के साथ समय पर भुगतान, कारोबार की वित्तीय स्थिति और कर्ज की गुणवत्ता पर निगरानी रखना भी जरूरी होगा।
सर्वेक्षण के अनुसार, औद्योगिक क्षेत्र में भी ऋण की मांग मजबूत रहने की संभावना है। उद्योगों को नई मशीनरी लगाने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने, संयंत्र स्थापित करने और दैनिक कारोबारी जरूरतों के लिए बैंकों से वित्त की आवश्यकता होती है।
सेवा क्षेत्र में भी सकारात्मक रुझान देखने को मिल रहा है। तीन-चौथाई से अधिक प्रतिभागी बैंकों को इस क्षेत्र में मजबूत दोहरे अंकों की ऋण वृद्धि की उम्मीद है। लगभग आधे प्रतिभागियों ने 15 प्रतिशत या उससे अधिक वृद्धि का अनुमान लगाया है।
सेवा क्षेत्र में पर्यटन, होटल, रेस्तरां, परिवहन, व्यापार और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) से संबंधित गतिविधियां बैंक ऋण की मांग को बढ़ा सकती हैं।
कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए भी ऋण परिदृश्य सकारात्मक बताया गया है। हालांकि, इस क्षेत्र में बैंकों की अपेक्षाओं में कुछ अंतर है। कृषि ऋण की मांग पर मौसमी परिस्थितियों, फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और कृषि निवेश जैसे कारकों का प्रभाव पड़ता है।
औद्योगिक क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश के लिए दिए जाने वाले सावधि ऋण (टर्म लोन) की मांग बढ़ाने में बुनियादी ढांचा क्षेत्र की प्रमुख भूमिका रहने की उम्मीद है।
सर्वेक्षण में बुनियादी ढांचे के बाद इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटोमोबाइल एवं ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और धातु, लौह एवं इस्पात क्षेत्रों को महत्वपूर्ण माना गया है।
इन क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है। नई उत्पादन इकाइयों, औद्योगिक संयंत्रों, परिवहन सुविधाओं और मशीनरी में निवेश के लिए कंपनियां अक्सर बैंकों से दीर्घकालिक कर्ज लेती हैं।
वहीं, कार्यशील पूंजी ऋण की मांग में ऑटोमोबाइल एवं ऑटो कंपोनेंट्स तथा पेट्रोलियम, कोयला और ईंधन उत्पाद क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। खाद्य प्रसंस्करण, रसायन और धातु उद्योगों में भी दैनिक कारोबारी जरूरतों को पूरा करने के लिए वित्त की मांग बढ़ सकती है।
कार्यशील पूंजी ऋण कंपनियों को कच्चा माल खरीदने, माल का भंडारण करने, कर्मचारियों का वेतन देने और ग्राहकों से भुगतान मिलने तक कारोबार चलाने में मदद करता है।
सेवा क्षेत्र में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC), पर्यटन, होटल एवं रेस्तरां तथा वाणिज्यिक रियल एस्टेट को टर्म लोन की मांग के प्रमुख स्रोतों के रूप में देखा गया है।
NBFC को अपने ऋण कारोबार का विस्तार करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र में नए होटल, रेस्तरां तथा अन्य सुविधाएं विकसित करने के लिए निवेश किया जाता है। इसी तरह, वाणिज्यिक रियल एस्टेट में कार्यालय, व्यावसायिक परिसर और अन्य संपत्तियों के विकास के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण की जरूरत होती है।
कार्यशील पूंजी के मामले में थोक एवं खुदरा व्यापार सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभर सकता है। इसके बाद पर्यटन, होटल एवं रेस्तरां तथा परिवहन परिचालकों का स्थान है।
इन क्षेत्रों में कारोबार की दैनिक जरूरतों को पूरा करने और बढ़ती मांग के अनुरूप सेवाओं का विस्तार करने के लिए बैंक ऋण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
ऋण मांग को लेकर सकारात्मक तस्वीर के बावजूद बैंकिंग क्षेत्र के सामने एक महत्वपूर्ण समस्या है—जमा राशि की वृद्धि का ऋण की मांग से पीछे रहना।
सर्वेक्षण में लगभग दो-तिहाई प्रतिभागी बैंकों ने जमा वृद्धि की तुलना में ऋण मांग की तेज रफ्तार को कर्ज विस्तार की प्रमुख बाधा बताया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में यह चिंता विशेष रूप से अधिक दिखाई दी।
बैंकों के लिए जमा राशि वित्त जुटाने का प्रमुख स्रोत होती है। इसी राशि के आधार पर वे ग्राहकों को ऋण उपलब्ध कराते हैं। यदि कर्ज की मांग तेजी से बढ़ती है, लेकिन जमा राशि उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, तो बैंकों को अपने वित्तपोषण के दूसरे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है।
इस स्थिति का असर बैंकों की लागत, ब्याज दरों और लाभप्रदता पर पड़ सकता है। जमा जुटाने के लिए बैंकों को आकर्षक ब्याज दरें देनी पड़ सकती हैं, जिससे उनकी वित्तपोषण लागत बढ़ सकती है।
ऐसे में आने वाले महीनों में बैंकों के लिए केवल कर्ज वितरण बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें जमा आधार मजबूत करने, ग्राहकों के साथ दीर्घकालिक संबंध विकसित करने और वित्तीय संसाधनों का संतुलित प्रबंधन करने पर भी ध्यान देना होगा।
जमा जुटाने से जुड़ी चुनौतियों के बीच विदेशी मुद्रा जमा को आकर्षित करने के लिए किए गए नीतिगत उपाय भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सर्वेक्षण में विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंकिंग यानी FCNR(B) जमा से जुड़े नियमों में दी गई लचीली सुविधाओं का उल्लेख किया गया है। इन उपायों से बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा जुटाने और वित्तपोषण की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, विदेशी मुद्रा जमा की उपलब्धता पर वैश्विक ब्याज दरों, विनिमय दरों, निवेशकों के भरोसे और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यह उपाय जमा संबंधी दबाव को कम करने में मददगार हो सकता है, लेकिन इसे सभी वित्तपोषण चुनौतियों का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
सर्वेक्षण में निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय यानी कैपेक्स में व्यापक सुधार की राह में भू-राजनीतिक जोखिम और आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों को प्रमुख बाधा बताया गया है।
लगभग तीन-पांचवें प्रतिभागियों ने इन कारकों को निजी निवेश के सामने बड़ी चुनौती माना। इसके बाद वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और कमजोर मांग की आशंका का स्थान रहा।
कंपनियां नई उत्पादन इकाइयां स्थापित करने या मौजूदा कारोबार का विस्तार करने से पहले भविष्य की मांग, लागत और वैश्विक परिस्थितियों का आकलन करती हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है या कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कंपनियां निवेश संबंधी फैसलों को टाल सकती हैं।
इसका असर बैंकों के औद्योगिक ऋण कारोबार पर भी पड़ सकता है। इसलिए निजी निवेश में तेजी लाने के लिए केवल कर्ज की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। कारोबारी भरोसा, स्थिर नीतिगत वातावरण और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का सुचारु संचालन भी जरूरी है।
सर्वेक्षण के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में बैंकों की रणनीतिक प्राथमिकताओं में जमा जुटाना और देनदारी पक्ष को मजबूत करना सबसे ऊपर रहेगा।
इसके बाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा आधारित बैंकिंग परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और परिचालन क्षमता मजबूत करने पर जोर रहने की संभावना है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक AI आधारित बदलाव को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए जमा जुटाना सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल है।
बैंकिंग क्षेत्र में AI का उपयोग ग्राहक सेवा, धोखाधड़ी की पहचान, जोखिम विश्लेषण, ऋण मूल्यांकन और परिचालन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। वहीं, डिजिटल बैंकिंग के विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
बैंकों के लिए चुनौती यह होगी कि वे नई तकनीक अपनाने के साथ ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करें और तकनीकी बदलाव से मिलने वाले लाभों को वास्तविक परिचालन सुधार में बदलें।
सर्वेक्षण में नीतिगत पहलों के संदर्भ में सरकार की ECLGS 5.0 योजना को वित्त वर्ष 2026-27 में ऋण वृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाली प्रमुख पहल के रूप में देखा गया है।
इसके बाद बुनियादी ढांचा विकास, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय कार्यक्रम और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं का उल्लेख किया गया है। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे तथा नवीकरणीय ऊर्जा और हरित बदलाव से जुड़ी पहलों को भी बैंकिंग क्षेत्र के लिए सकारात्मक माना गया है।
ऋण गारंटी से जुड़ी योजनाएं पात्र कारोबारों के लिए वित्त तक पहुंच आसान बनाने में मदद कर सकती हैं। इससे विशेष रूप से उन उद्यमों को लाभ मिल सकता है, जिन्हें पर्याप्त जमानत या वित्तीय इतिहास के अभाव में कर्ज हासिल करने में कठिनाई होती है।
हालांकि, ECLGS 5.0 की पात्रता, गारंटी की शर्तों और वास्तविक ऋण वितरण पर इसके प्रभाव का आकलन संबंधित आधिकारिक दिशानिर्देशों और योजना के क्रियान्वयन के आधार पर किया जाना चाहिए।
आने वाले छह महीनों में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों मौजूद रहेंगी।
एक ओर खुदरा ऋण, MSME, उद्योग और सेवा क्षेत्र से मजबूत मांग कर्ज कारोबार को गति दे सकती है। दूसरी ओर, जमा वृद्धि की धीमी गति, बढ़ती वित्तपोषण लागत और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं बैंकों के लिए दबाव पैदा कर सकती हैं।
बैंकों को ऋण विस्तार के साथ कर्ज की गुणवत्ता पर भी नजर रखनी होगी। तेजी से ऋण वितरण करने के दौरान ग्राहकों की भुगतान क्षमता का सही आकलन करना और संभावित खराब ऋणों के जोखिम को नियंत्रित करना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, AI, डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में निवेश बैंकिंग क्षेत्र की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित करेगा।
FICCI-IBA के 22वें बैंकर्स सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ऋण वृद्धि को लेकर आशावादी है। सर्वेक्षण में शामिल लगभग तीन-चौथाई बैंकों को गैर-खाद्य ऋण में 15 प्रतिशत या उससे अधिक सालाना वृद्धि की उम्मीद है।
खुदरा और MSME क्षेत्र, बुनियादी ढांचा, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, पर्यटन और व्यापार से कर्ज की मांग को सहारा मिल सकता है। लेकिन इस वृद्धि को बनाए रखने के लिए बैंकों को जमा जुटाने की चुनौती से निपटना होगा और वित्तपोषण की लागत पर नियंत्रण रखना होगा। कुल मिलाकर, आने वाले महीनों में बैंकिंग क्षेत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक मजबूत ऋण मांग को किस तरह संतुलित वित्तपोषण, बेहतर जोखिम प्रबंधन और तकनीकी बदलाव के साथ जोड़ पाते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


