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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत का कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्यूरेबल्स सेक्टर विकास के एक ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां तकनीकी बदलाव, ऊर्जा दक्षता, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा एक साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), सेंसर आधारित सिस्टम और आपस में जुड़े स्मार्ट डिवाइस तेजी से उपभोक्ता उत्पादों का स्वरूप बदल रहे हैं। ऐसे में उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता, ऊर्जा दक्षता और अलग-अलग डिवाइस के बीच आपसी तालमेल सुनिश्चित करने के लिए मानकों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
सीआईआई कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड ड्यूरेबल्स समिट 2026 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) के डायरेक्टर जनरल संजय गर्ग ने कहा कि भारत को एडवांस्ड टेक्नोलॉजी अपनाने के साथ-साथ ऐसे मानकों को मजबूत करना होगा, जो उपभोक्ताओं की सुरक्षा और उत्पादों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करें। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानक तैयार करने की प्रक्रिया में भारत की बढ़ती भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया।
संजय गर्ग ने कहा कि वैश्विक स्तर पर तकनीक तेजी से बदल रही है और इसके साथ मानकीकरण की जरूरत भी बढ़ रही है। बीआईएस कई आईएसओ और आईईसी तकनीकी समितियों के सचिवालय की मेजबानी कर रहा है। इसके अलावा 600 से अधिक भारतीय विशेषज्ञों को अंतरराष्ट्रीय तकनीकी समितियों के लिए नामित किया गया है।
इससे भारत के पास अंतरराष्ट्रीय मानकों के निर्माण और उन्हें विकसित करने की प्रक्रिया में अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और उद्योग की जरूरतों को सामने रखने का अवसर बढ़ रहा है। खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्यूरेबल्स क्षेत्र में यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्मार्ट उपकरणों और कनेक्टेड सिस्टम की संख्या लगातार बढ़ रही है।
आज टीवी, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, वॉशिंग मशीन और अन्य घरेलू उपकरण केवल स्वतंत्र उत्पाद नहीं रह गए हैं। स्मार्ट कनेक्टिविटी के विस्तार के साथ इन उत्पादों में सेंसर, सॉफ्टवेयर, नेटवर्क कनेक्टिविटी और एआई आधारित सुविधाओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में सुरक्षा और इंटरऑपरेबिलिटी के लिए समान और भरोसेमंद मानकों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है।
ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी के सेक्रेटरी अरिजीत सेनगुप्ता ने कहा कि भारत का कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्यूरेबल्स सेक्टर ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहां तकनीक, ऊर्जा दक्षता और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं तेजी से विकसित हो रही हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को एक तरफ वैश्विक तकनीकी विकास के साथ कदम मिलाना होगा, वहीं दूसरी ओर घरेलू स्तर पर मजबूत और प्रतिस्पर्धी इकोसिस्टम तैयार करना होगा। इसके लिए सरकार और उद्योग के बीच सक्रिय सहयोग आवश्यक है।
सेनगुप्ता ने सेक्टर के दीर्घकालिक विकास के लिए मानकों में बेहतर तालमेल और घरेलू कंपोनेंट इकोसिस्टम को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। उनके अनुसार, तकनीक को तेजी से अपनाने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और कुशल तथा भरोसेमंद उत्पादों के लिए ऐसा वातावरण बनाना जरूरी है, जिसमें सरकार और उद्योग साझेदारी के साथ काम करें।
सीआईआई नेशनल कमिटी ऑन कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड ड्यूरेबल्स के चेयरमैन मुकुंदन मेनन ने कहा कि भारत के पास अपने विशाल घरेलू बाजार के पैमाने का इस्तेमाल करके वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं विकसित करने का बड़ा अवसर है।
उन्होंने सेक्टर के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं बताईं—घरेलू मांग बढ़ाना, कंपोनेंट इकोसिस्टम को मजबूत करना और भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना।
मेनन के अनुसार, वॉशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर जैसी प्रमुख श्रेणियों में घरेलू पहुंच बढ़ने से उत्पादन के पैमाने को बढ़ाने के लिए मजबूत आधार तैयार हो सकता है। यदि घरेलू मांग और उत्पादन दोनों में विस्तार होता है तो इससे कंपोनेंट निर्माण, सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, डिजाइन और संबंधित औद्योगिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है।
समिट में जारी सीआईआई-बीसीजी रिपोर्ट 'कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड ड्यूरेबल्स: रोडमैप फॉर द नेक्स्ट डिकेड' में सेक्टर के विकास की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत का कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर अगले कुछ वर्षों में तेज विकास के दौर में प्रवेश कर सकता है। इसके पीछे बढ़ती घरेलू आय, फाइनेंसिंग तक बेहतर पहुंच, बदलती उपभोक्ता आदतें और प्रमुख ड्यूरेबल्स कैटेगरी में अभी भी अपेक्षाकृत कम पहुंच जैसे कारण बताए गए हैं।
अनुमान है कि सेक्टर 2030 तक सालाना 8 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है और इसका बाजार आकार करीब 3 लाख करोड़ से 3.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
इस वृद्धि के साथ घरेलू स्तर पर मटीरियल और कन्वर्जन के जरिए करीब 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वैल्यू एडिशन अवसर पैदा हो सकता है। हालांकि, इस अवसर को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने के लिए भारत को घरेलू कंपोनेंट उत्पादन और तकनीकी क्षमताओं को तेजी से विकसित करना होगा।
सेक्टर के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक कंपोनेंट लोकलाइजेशन है। मौजूदा समय में अलग-अलग प्रमुख कैटेगरी में बिल ऑफ मटीरियल्स का स्थानीयकरण लगभग 25 से 70 प्रतिशत के बीच बताया गया है। टीवी और रूम एयर कंडीशनर जैसी कैटेगरी में स्थानीयकरण अपेक्षाकृत कम है, जबकि रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन में यह स्तर तुलनात्मक रूप से अधिक है।
कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट के लिए भारतीय कंपनियां अभी भी वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। इनमें टीवी के डिस्प्ले पैनल, रूम एयर कंडीशनर के कंप्रेसर, रेफ्रिजरेटर की इंसुलेशन सामग्री और वॉशिंग मशीन की मोटर जैसे प्रमुख कंपोनेंट शामिल हैं।
इस स्थिति में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ तकनीक, पूंजी, स्केल और सप्लाई चेन से जुड़े मुद्दों को भी हल करना होगा।
बीसीजी के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीनियर पार्टनर अभीक सिंघी ने कहा कि भारत के सामने मौजूद अवसर केवल घरेलू बाजार के विस्तार तक सीमित नहीं हैं। उनके मुताबिक अगले चरण में कंपोनेंट, तकनीक, प्रोडक्ट डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्रों में गहरी क्षमताएं विकसित करने की आवश्यकता होगी।
लोकलाइजेशन को केवल नीति के लक्ष्य के रूप में नहीं बल्कि व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाना भी जरूरी होगा। बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत घटाने और उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिल सकती है।
सिंघी ने भारतीय कंपनियों के लिए 'भारत के लिए मैन्युफैक्चरिंग' से आगे बढ़कर 'दुनिया के लिए डिजाइन और निर्माण' की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसका मतलब केवल घरेलू मांग को पूरा करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए प्रतिस्पर्धी उत्पाद और तकनीकी क्षमताएं विकसित करना भी होगा।
सीआईआई स्किल्स स्टीयरिंग काउंसिल के चेयरमैन बी. त्यागराजन ने कहा कि ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में किए गए प्रयासों ने यह दिखाया है कि सरकार और उद्योग के बीच करीबी संवाद से महत्वपूर्ण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत जब घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब उद्योग को उत्पादन का पैमाना बढ़ाने और लागत के मामले में प्रतिस्पर्धी बनने पर ध्यान देना होगा।
भारतीय बाजार कीमत को लेकर काफी संवेदनशील है। इसलिए घरेलू उत्पादन और लोकलाइजेशन की दिशा में शुरुआती निवेश और लागत बढ़ने के बावजूद उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों को किफायती बनाए रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
त्यागराजन ने यह भी रेखांकित किया कि लोकलाइजेशन केवल मशीनरी या उत्पादन इकाई लगाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ कुशल मानव संसाधन, तकनीकी ज्ञान, गुणवत्ता नियंत्रण, डिजाइन क्षमता और सप्लाई चेन का विकास भी जरूरी है।
कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्यूरेबल्स में एआई, आईओटी और सेंसर आधारित तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ने से उत्पादों की कार्यक्षमता और उपयोग का तरीका बदल रहा है। स्मार्ट टीवी, कनेक्टेड एयर कंडीशनर, स्मार्ट रेफ्रिजरेटर और अन्य इंटरनेट से जुड़े घरेलू उपकरण उपभोक्ताओं को रिमोट मॉनिटरिंग और ऑटोमेशन जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं।
ऐसे उत्पादों के विस्तार के साथ डेटा, साइबर सुरक्षा, डिवाइस इंटरऑपरेबिलिटी और तकनीकी मानकों से जुड़े विषय भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसलिए आने वाले समय में मानकीकरण केवल उत्पाद की भौतिक गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्मार्ट और कनेक्टेड तकनीकों की विश्वसनीयता से भी जुड़ा होगा।
सीआईआई-बीसीजी रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि भारत में बड़े घरेलू उपकरणों की पहुंच कई अन्य तुलनात्मक देशों की तुलना में अभी कम है। इसका मतलब है कि आय बढ़ने, शहरीकरण, आसान फाइनेंसिंग और बदलती जीवनशैली के साथ इन उत्पादों की मांग में विस्तार की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है।
रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन और एयर कंडीशनर जैसे उत्पादों की पहुंच बढ़ने से न केवल घरेलू उपभोक्ताओं को सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि इनसे जुड़े विनिर्माण और कंपोनेंट उद्योगों के लिए भी बाजार का विस्तार हो सकता है।
भारत के लिए अगला बड़ा लक्ष्य घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है। इसके लिए भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप बनाना महत्वपूर्ण होगा।
अंतरराष्ट्रीय मानकों में भारत की भागीदारी बढ़ने से भारतीय उद्योग को वैश्विक तकनीकी आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझने और उनके अनुरूप उत्पाद विकसित करने में मदद मिल सकती है। इससे निर्यात आधारित मैन्युफैक्चरिंग के लिए आधार मजबूत करने की संभावना भी बढ़ती है।
सेक्टर के विकास के अगले चरण में केवल असेंबली आधारित उत्पादन पर्याप्त नहीं माना जा रहा। तकनीक, उत्पाद डिजाइन, इंजीनियरिंग, अनुसंधान एवं विकास और कंपोनेंट निर्माण में घरेलू क्षमताओं को बढ़ाना आवश्यक होगा।
यदि भारत उच्च मूल्य वाले कंपोनेंट और तकनीक के क्षेत्रों में अपनी क्षमता विकसित करता है, तो घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की भूमिका मजबूत हो सकती है।
इसके लिए उद्योग को दीर्घकालिक निवेश, तकनीकी साझेदारी, कौशल विकास और आरएंडडी पर ध्यान देना होगा। साथ ही नियामकीय वातावरण में स्पष्टता और पूर्वानुमेयता भी निवेश संबंधी निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण होगी।
समिट में सामने आए विचारों और रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्यूरेबल्स सेक्टर के सामने बाजार विस्तार का अवसर तो बड़ा है, लेकिन इस अवसर को टिकाऊ औद्योगिक क्षमता में बदलने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।
एक ओर उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ाना होगा, वहीं दूसरी ओर घरेलू कंपोनेंट इकोसिस्टम, तकनीक और डिजाइन क्षमता को मजबूत करना होगा। ऊर्जा दक्षता, सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को भी उत्पादन विस्तार के साथ समान महत्व देना होगा।
भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह बढ़ते घरेलू बाजार का इस्तेमाल केवल आयातित कंपोनेंट की असेंबली के लिए न करे, बल्कि अधिक से अधिक मूल्यवर्धन देश के भीतर विकसित करे। इसके साथ भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने योग्य बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।
कुल मिलाकर, सीआईआई-बीसीजी रिपोर्ट और समिट में विशेषज्ञों के विचारों ने कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और ड्यूरेबल्स सेक्टर के लिए अगले दशक की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं सामने रखी हैं। बाजार का विस्तार, ऊर्जा दक्षता, मानकीकरण, लोकलाइजेशन, तकनीकी क्षमता, कुशल मानव संसाधन, आरएंडडी और वैश्विक गुणवत्ता मानकों का पालन इस विकास यात्रा के प्रमुख आधार बन सकते हैं।
2030 तक बाजार के 3-3.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना के साथ घरेलू वैल्यू एडिशन के 40,000-50,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त अवसर का अनुमान इस सेक्टर के आर्थिक महत्व को रेखांकित करता है। अब इस संभावित अवसर को वास्तविक औद्योगिक क्षमता, प्रतिस्पर्धी लागत और वैश्विक स्तर के उत्पादों में बदलना उद्योग और नीति निर्माताओं के सामने प्रमुख कार्य होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


