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- 12h ago
नई दिल्ली। स्तन कैंसर की समय रहते पहचान और बेहतर जांच की दिशा में भारत ने तकनीकी नवाचार की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थान एम्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित मैमोग्राफी इमेज इंटरप्रिटेशन तकनीक को चिकित्सा-प्रौद्योगिकी कंपनी बीपीएल टेक्नोलॉजीज लिमिटेड को हस्तांतरित किया है। इस तकनीक का उद्देश्य मैमोग्राफी से प्राप्त तस्वीरों के विश्लेषण में रेडियोलॉजिस्ट को अतिरिक्त डिजिटल सहायता उपलब्ध कराना है।
यह हस्तांतरण केवल एक तकनीक को एक संस्था से दूसरी संस्था तक पहुंचाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि चिकित्सा अनुसंधान को प्रयोगशाला और शोध-पत्रों से आगे ले जाकर वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं में उपयोग की संभावनाएं तलाशने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। तकनीक के हस्तांतरण के बाद इसके आगे विकास, परीक्षण, व्यापक सत्यापन और संभावित चिकित्सकीय उपयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकेगा।
समारोह में एम्स के निदेशक प्रो. निखिल टंडन और बीपीएल टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के मुख्य वित्तीय अधिकारी अजय जिंदल ने संबंधित समझौतों का आदान-प्रदान किया। इस अवसर पर एम्स के एसोसिएट डीन (रिसर्च) प्रो. गोविंद मखारिया, आईपीआर सेल के प्रमुख प्रो. वेलपांडियन, रेडियोलॉजी विभाग की प्रोफेसर प्रो. स्मृति हरि और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कृतिका रंगराजन सहित दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
मैमोग्राफी स्तन कैंसर की जांच में महत्वपूर्ण इमेजिंग तकनीक है। इसमें स्तन की एक्स-रे तस्वीरें लेकर चिकित्सक उनमें मौजूद असामान्य पैटर्न, गांठ, कैल्सिफिकेशन या अन्य संदिग्ध बदलावों का अध्ययन करते हैं। इन तस्वीरों की व्याख्या के लिए विशेषज्ञता और अनुभव की आवश्यकता होती है।
एआई आधारित तकनीक इसी प्रक्रिया में डिजिटल सहयोग प्रदान करने की दिशा में विकसित की जा रही है। मशीन-लर्निंग मॉडल बड़ी संख्या में मेडिकल इमेज से पैटर्न सीखकर तस्वीरों में ऐसे संकेतों को चिन्हित करने में मदद कर सकते हैं, जिन पर रेडियोलॉजिस्ट को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि मशीन स्वयं कैंसर का अंतिम निदान करेगी। एआई से प्राप्त संकेत या विश्लेषण चिकित्सक के लिए अतिरिक्त जानकारी हो सकते हैं। अंतिम निर्णय मरीज की पूरी चिकित्सकीय स्थिति, इमेजिंग रिपोर्ट, चिकित्सकीय परीक्षण और आवश्यकता पड़ने पर अन्य जांचों के आधार पर विशेषज्ञ चिकित्सक ही करेंगे।
एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भविष्य में मशीन डॉक्टरों की जगह ले सकती है? इस तकनीक के मौजूदा उद्देश्य को देखते हुए इसका लक्ष्य डॉक्टरों को हटाना नहीं बल्कि उनकी क्षमता को बढ़ाना है।
रेडियोलॉजिस्ट के सामने आने वाली मैमोग्राफी तस्वीरों में एआई संभावित संदिग्ध क्षेत्रों को चिन्हित कर सकता है। इससे विशेषज्ञ का ध्यान कुछ विशेष हिस्सों पर जल्दी केंद्रित हो सकता है। जटिल मामलों में एआई एक अतिरिक्त डिजिटल राय या सहायक विश्लेषण उपलब्ध करा सकता है।
इस तरह इसे 'डिजिटल सहयोगी' के रूप में देखा जा सकता है, न कि चिकित्सक के विकल्प के तौर पर।
विशेषज्ञ चिकित्सक को यह तय करना होगा कि एआई द्वारा चिन्हित पैटर्न वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है और मरीज के लिए आगे कौन-सी जांच या उपचार आवश्यक है।
भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक विशेषज्ञ डॉक्टरों और अत्याधुनिक जांच सुविधाओं का असमान वितरण है। महानगरों में जहां बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक है, वहीं छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है।
कई स्थानों पर मैमोग्राफी मशीन उपलब्ध होने के बावजूद हर समय ऐसे विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होते, जिन्हें स्तन इमेजिंग के मामलों में व्यापक अनुभव हो। भविष्य में यदि एआई आधारित इमेजिंग सिस्टम वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित और प्रभावी साबित होते हैं, तो ऐसे स्थानों पर इनका इस्तेमाल विशेषज्ञों के काम में सहायता देने के लिए किया जा सकता है।
इससे दूरदराज के इलाकों में उपलब्ध जांचों की गुणवत्ता को बेहतर करने की संभावना पैदा हो सकती है। हालांकि इस संभावना को वास्तविक स्वास्थ्य लाभ में बदलने के लिए तकनीक की सटीकता, अस्पतालों की डिजिटल क्षमता, इंटरनेट और डेटा सुरक्षा जैसी कई आवश्यकताओं को पूरा करना होगा।
स्तन कैंसर के मामलों में समय पर पहचान महत्वपूर्ण मानी जाती है। बीमारी की पहचान जितनी जल्दी होती है, उपचार की योजना बनाने और मरीज को उचित चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाने की संभावनाएं उतनी बेहतर हो सकती हैं।
यही कारण है कि स्क्रीनिंग से जुड़ी तकनीकों को लेकर दुनिया भर में लगातार शोध हो रहा है। एआई इस क्षेत्र में इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि कंप्यूटर बड़ी संख्या में मेडिकल इमेज का विश्लेषण तेजी से कर सकता है।
यदि किसी अस्पताल में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मैमोग्राफी की जाती हैं, तो एआई आधारित सिस्टम चिकित्सकों को संभावित रूप से अधिक व्यवस्थित तरीके से संदिग्ध इमेज की पहचान में सहायता दे सकता है।
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि तेजी और सटीकता एक ही चीज नहीं हैं। किसी एआई मॉडल का वास्तविक मूल्य तभी साबित होगा जब वह अलग-अलग उम्र, भौगोलिक क्षेत्रों और विविध आबादी के मरीजों में विश्वसनीय परिणाम दे।
चिकित्सा क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल जितना संभावनाओं से भरा है, उतना ही इसमें सावधानी की आवश्यकता भी है। किसी भी एआई मॉडल में गलत-सकारात्मक और गलत-नकारात्मक परिणाम की संभावना हो सकती है।
गलत-सकारात्मक परिणाम का अर्थ है कि सिस्टम किसी ऐसी जगह को संदिग्ध बताए, जहां वास्तव में कैंसर न हो। इससे मरीज में अनावश्यक चिंता और अतिरिक्त जांच की आवश्यकता पैदा हो सकती है।
दूसरी ओर गलत-नकारात्मक परिणाम अधिक गंभीर चिंता का विषय हो सकता है, जब किसी वास्तविक संदिग्ध बदलाव को सिस्टम सामान्य मान ले। इसलिए चिकित्सा एआई में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि मॉडल कितनी तस्वीरों का विश्लेषण कर सकता है। यह देखना भी जरूरी है कि वह कितनी विश्वसनीयता से काम करता है।
एआई मॉडल जिस डेटा पर प्रशिक्षित होता है, उसकी गुणवत्ता और विविधता उसके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है। यदि मॉडल सीमित प्रकार के डेटा पर विकसित किया गया हो, तो जरूरी नहीं कि वह हर क्षेत्र और हर आबादी में समान प्रदर्शन करे।
भारत की आबादी सामाजिक, भौगोलिक और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों के लिहाज से बेहद विविध है। ऐसे में किसी तकनीक को व्यापक उपयोग में लाने से पहले अलग-अलग अस्पतालों और मरीजों के डेटा पर उसका परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।
एम्स और बीपीएल टेक्नोलॉजीज के बीच हुआ हस्तांतरण इसी व्यापक विकास और सत्यापन की दिशा में आगे की प्रक्रिया को संभव बनाता है।
चिकित्सा अनुसंधान में किसी तकनीक का विकसित होना केवल पहला चरण होता है। इसके बाद उसे प्रयोगशाला से वास्तविक दुनिया में लाने के लिए कई स्तरों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
एक शोध मॉडल को वास्तविक अस्पतालों में इस्तेमाल करने से पहले उसकी तकनीकी स्थिरता, सटीकता, उपयोग में आसानी, डेटा सुरक्षा और चिकित्सकीय उपयोगिता का मूल्यांकन करना पड़ता है।
इसके बाद यह भी देखना होता है कि डॉक्टर उसे अपने मौजूदा कार्यप्रवाह में किस तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि तकनीक इतनी जटिल हो कि डॉक्टरों के लिए उसे अपनाना मुश्किल हो, तो उसकी वैज्ञानिक क्षमता के बावजूद उसका वास्तविक प्रभाव सीमित हो सकता है।
इसीलिए उद्योग के साथ साझेदारी चिकित्सा तकनीक के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उद्योग के पास तकनीक को उत्पाद के रूप में विकसित करने, उसका विस्तार करने और विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाने की क्षमता हो सकती है।
इस परियोजना में एम्स के रेडियोलॉजी, शोध और मशीन-लर्निंग विशेषज्ञों ने योगदान दिया है। डॉ. कृतिका रंगराजन ने परियोजना से जुड़े तकनीकी और शोध दल के योगदान के लिए आभार व्यक्त किया।
उन्होंने मशीन लर्निंग इंजीनियरिंग टीम के ओम शिवोम, कुशाग्र चतुर्वेदी और आशीष रस्तोगी, रेडियोलॉजिस्ट डॉ. अमित गुप्ता और डॉ. वरुण होल्ला तथा हेमा मल्होत्रा के नेतृत्व वाली प्रबंधकीय टीम सहित अन्य सदस्यों के योगदान को रेखांकित किया।
इस तरह परियोजना में केवल चिकित्सकों की ही भूमिका नहीं रही, बल्कि मेडिकल विशेषज्ञों, डेटा और मशीन-लर्निंग विशेषज्ञों तथा प्रबंधन से जुड़े लोगों ने मिलकर काम किया।
चिकित्सा क्षेत्र में एआई का भविष्य संभवतः डॉक्टर बनाम मशीन की प्रतिस्पर्धा से ज्यादा डॉक्टर और मशीन की साझेदारी पर आधारित होगा।
एक रेडियोलॉजिस्ट मरीज की उम्र, पारिवारिक इतिहास, पुराने मेडिकल रिकॉर्ड, लक्षण और अन्य चिकित्सकीय जानकारी को समझ सकता है। एआई मुख्य रूप से उपलब्ध इमेज में मौजूद पैटर्न का विश्लेषण करने में सहायता कर सकता है।
दोनों की क्षमताएं अलग-अलग हैं। मशीन बड़े डेटा में पैटर्न खोजने में मदद कर सकती है, जबकि चिकित्सक मरीज के संदर्भ में उस जानकारी का अर्थ समझ सकता है।
इसी वजह से भविष्य के अस्पतालों में एआई को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखा जा सकता है जो डॉक्टर की निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करे।
भारत में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की चुनौती के बीच स्क्रीनिंग सुविधाओं को अधिक व्यापक बनाना महत्वपूर्ण है। यदि एआई आधारित इमेजिंग तकनीक प्रभावी और किफायती साबित होती है, तो भविष्य में इसके माध्यम से जांच व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने की संभावना हो सकती है।
विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में जहां विशेषज्ञों की संख्या कम है, वहां तकनीक प्रारंभिक स्तर पर चिकित्सकों को अतिरिक्त सहायता दे सकती है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं होगा कि केवल एआई के आधार पर मरीज को कैंसर है या नहीं, इसका फैसला किया जाए। स्क्रीनिंग और निदान के बीच अंतर को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।
भविष्य में ऐसी तकनीकों के व्यापक उपयोग की स्थिति में अस्पतालों में कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
पहला, बड़ी संख्या में इमेज की प्रारंभिक समीक्षा अधिक व्यवस्थित हो सकती है।
दूसरा, संभावित संदिग्ध मामलों की पहचान में चिकित्सकों को अतिरिक्त सहायता मिल सकती है।
तीसरा, विशेषज्ञ डॉक्टर अपना समय अधिक जटिल मामलों पर केंद्रित कर सकते हैं।
चौथा, दूरदराज के स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध चिकित्सकों को विशेषज्ञ स्तर की डिजिटल सहायता मिलने की संभावना पैदा हो सकती है।
लेकिन इन सभी संभावनाओं का वास्तविक मूल्यांकन तभी किया जा सकेगा जब तकनीक का पर्याप्त क्लिनिकल परीक्षण हो और वास्तविक अस्पतालों में इसके परिणाम सामने आएं।
मेडिकल एआई के साथ एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा मरीजों के स्वास्थ्य संबंधी डेटा की सुरक्षा है। मेडिकल इमेज और मरीज की चिकित्सकीय जानकारी अत्यंत संवेदनशील होती है।
इसलिए एआई आधारित सिस्टम विकसित करते समय डेटा को सुरक्षित रखना, मरीज की गोपनीयता बनाए रखना और डेटा के इस्तेमाल के लिए उचित प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी होगा।
भविष्य में जब ऐसी तकनीकें अधिक अस्पतालों में इस्तेमाल होंगी, तब यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि मरीजों की जानकारी अनधिकृत तरीके से इस्तेमाल न हो।
किसी भी नई चिकित्सा तकनीक का प्रभाव केवल उसकी वैज्ञानिक क्षमता से तय नहीं होता। उसकी कीमत, रखरखाव, अस्पताल के मौजूदा सिस्टम के साथ उसका एकीकरण और डॉक्टरों के लिए उसका इस्तेमाल कितना आसान है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
यदि एआई तकनीक महंगी रही या उसे चलाने के लिए विशेष बुनियादी ढांचे की जरूरत पड़ी, तो इसका इस्तेमाल सीमित संस्थानों तक रह सकता है।
इसके विपरीत यदि इसे सामान्य स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों की जरूरत के अनुरूप विकसित किया जा सके, तो इसका संभावित दायरा काफी बढ़ सकता है।
आज किसी मरीज की इमेज की व्याख्या मुख्य रूप से विशेषज्ञ की विशेषज्ञता और अनुभव पर निर्भर करती है। भविष्य में इस प्रक्रिया में एआई एक अतिरिक्त स्तर जोड़ सकता है।
मसलन, मैमोग्राफी इमेज तैयार होने के बाद सिस्टम संभावित संदिग्ध हिस्सों को चिन्हित कर सकता है। इसके बाद रेडियोलॉजिस्ट उस विश्लेषण को देखकर अपनी स्वतंत्र चिकित्सकीय राय बना सकता है।
इस मॉडल में मशीन प्रारंभिक डिजिटल विश्लेषण उपलब्ध कराएगी और डॉक्टर अंतिम चिकित्सकीय व्याख्या करेंगे।
यह व्यवस्था विशेष रूप से उन स्वास्थ्य प्रणालियों में उपयोगी हो सकती है जहां मरीजों की संख्या अधिक और विशेषज्ञों की संख्या सीमित है।
एआई मॉडल की सफलता का मूल्यांकन केवल औसत सटीकता से नहीं किया जाना चाहिए। अलग-अलग आयु समूह, स्तन ऊतक की संरचना, मरीज की पृष्ठभूमि और बीमारी की अवस्था जैसे कारक परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए व्यापक उपयोग से पहले यह पता लगाना आवश्यक होगा कि मॉडल किन परिस्थितियों में सबसे अच्छा काम करता है और किन परिस्थितियों में डॉक्टर को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
यही कारण है कि क्लिनिकल वैलिडेशन इस तकनीक के भविष्य का महत्वपूर्ण चरण होगा।
एम्स जैसे चिकित्सा संस्थान में विकसित तकनीक का उद्योग तक पहुंचना देश में मेडिकल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की संस्कृति के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
विश्वविद्यालयों और चिकित्सा संस्थानों में अनेक शोध परियोजनाएं विकसित होती हैं, लेकिन उनमें से सभी प्रयोगशाला से बाहर नहीं निकल पातीं। तकनीक हस्तांतरण के माध्यम से किसी शोध समाधान को आगे विकसित करने और संभावित रूप से बड़े पैमाने पर उपयोग योग्य बनाने का रास्ता खुलता है।
यदि इस मॉडल से अन्य चिकित्सा क्षेत्रों में भी शोध को उत्पाद और स्वास्थ्य सेवा समाधान में बदला जा सके, तो देश में स्वदेशी मेडिकल टेक्नोलॉजी के विकास को गति मिल सकती है।
स्तन कैंसर के अलावा भविष्य में एआई आधारित तकनीकों का इस्तेमाल कैंसर स्क्रीनिंग, पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी, उपचार योजना और मरीजों की निगरानी जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ सकता है।
मेडिकल इमेजिंग में एआई विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें बड़ी मात्रा में दृश्य डेटा उपलब्ध होता है।
हालांकि हर चिकित्सा क्षेत्र में एआई को अपनाने के लिए अलग-अलग वैज्ञानिक प्रमाण और परीक्षण की जरूरत होगी।
एम्स की यह तकनीक निश्चित रूप से चिकित्सा अनुसंधान और एआई के मेल की दिशा में एक महत्वपूर्ण विकास है, लेकिन इसे अभी अंतिम चिकित्सकीय समाधान के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
तकनीक का हस्तांतरण उसके विकास की अगली यात्रा की शुरुआत है। इसके बाद परीक्षण, सत्यापन, चिकित्सकीय मूल्यांकन और नियामकीय आवश्यकताओं जैसे चरण महत्वपूर्ण होंगे।
वास्तविक अस्पतालों में यह तकनीक कितनी सटीक होगी, डॉक्टरों के निर्णय में कितना सुधार करेगी और मरीजों के लिए इसका वास्तविक लाभ कितना होगा—इन सवालों के जवाब आगे के शोध से मिलेंगे।
स्तन कैंसर के खिलाफ लड़ाई में तकनीक की भूमिका आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। एआई आधारित मैमोग्राफी विश्लेषण इसी बदलती चिकित्सा व्यवस्था का एक हिस्सा है।
यदि एम्स द्वारा विकसित मॉडल व्यापक वैज्ञानिक परीक्षणों में प्रभावी साबित होता है और इसे सुरक्षित, विश्वसनीय तथा व्यावहारिक तरीके से अस्पतालों में लागू किया जा सका, तो यह रेडियोलॉजिस्ट की सहायता करने वाली उपयोगी तकनीक बन सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इसका इस्तेमाल मरीज और डॉक्टर के बीच संबंध को कमजोर करने के बजाय चिकित्सकीय निर्णय को अधिक सूचनापूर्ण बनाने के लिए किया जाए।
एम्स से उद्योग तक पहुंची यह तकनीक फिलहाल एक शोध-आधारित संभावना है। लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है—क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत जैसे विशाल देश में कैंसर स्क्रीनिंग की पहुंच और गुणवत्ता के बीच की खाई को कम करने में मदद कर सकता है? इसका जवाब आने वाले परीक्षण और वास्तविक क्लिनिकल उपयोग से सामने आएगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


