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- 10h ago
नई दिल्ली। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच भारत को बड़ी कूटनीतिक सफलता मिली है। सदस्य देशों के बीच संयुक्त घोषणापत्र जारी करने पर सहमति बन गई है। इस सहमति तक पहुंचने के लिए सदस्य देशों के बीच देर रात तक गहन बातचीत और विचार-विमर्श चलता रहा। कई संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर अलग-अलग राय होने के बावजूद भारत ने सभी पक्षों के साथ लगातार संवाद बनाए रखा और साझा सहमति का रास्ता तैयार किया।
जानकारी के मुताबिक, संयुक्त बयान को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत सुबह करीब चार बजे तक जारी रही। इसके बाद सदस्य देशों के बीच सहमति बनने का रास्ता साफ हुआ। संयुक्त घोषणापत्र को आज जारी किए जाने की तैयारी है।
ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच पर संयुक्त दस्तावेज को लेकर सहमति बनना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि संगठन के सदस्य देशों की विदेश नीति, रणनीतिक प्राथमिकताएं और विभिन्न वैश्विक संकटों को लेकर सोच कई मामलों में एक-दूसरे से अलग है। ऐसे माहौल में किसी साझा दस्तावेज पर सभी देशों को साथ लाना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।
संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति अचानक नहीं बनी। इसके लिए ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। संवेदनशील मुद्दों पर शब्दों के चयन से लेकर साझा रुख तय करने तक विभिन्न स्तरों पर चर्चा की गई।
कई मुद्दों पर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग होने के कारण बातचीत आसान नहीं थी। इसके बावजूद भारत ने अध्यक्ष देश के तौर पर बातचीत का सिलसिला जारी रखा। कोशिश रही कि किसी एक विवादित मुद्दे पर असहमति पूरे घोषणापत्र को रोकने की वजह न बने।
सुबह करीब चार बजे तक चली बातचीत इस बात को दिखाती है कि सदस्य देशों के बीच अंतिम सहमति बनाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी। अंततः साझा दस्तावेज पर सहमति बनना भारत की मध्यस्थता और समन्वय क्षमता के लिए अहम माना जा रहा है।
ब्रिक्स देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में रूस-यूक्रेन युद्ध भी शामिल है। रूस ब्रिक्स का प्रमुख सदस्य है, जबकि संगठन के अन्य देशों के इस युद्ध को लेकर अपने अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।
भारत ने लगातार बातचीत और कूटनीति के माध्यम से विवादों के समाधान पर जोर दिया है। वहीं, अन्य सदस्य देशों की प्राथमिकताएं उनके अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों से जुड़ी हुई हैं।
ऐसे में संयुक्त घोषणापत्र में युद्ध जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर ऐसी भाषा पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण था, जिसे सभी सदस्य स्वीकार कर सकें।
पश्चिम एशिया की स्थिति भी ब्रिक्स के भीतर चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रही। क्षेत्र में जारी तनाव और संघर्ष का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव ऊर्जा, व्यापार, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
ब्रिक्स में इस बार पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण देश ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं। इन देशों के अपने रणनीतिक हित और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों पर साझा भाषा तैयार करना आसान नहीं था।
भारत के सामने चुनौती यह थी कि अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाले देशों को एक ऐसे साझा बयान पर सहमत कराया जाए, जो किसी एक पक्ष के खिलाफ न दिखाई दे और संगठन की सामूहिक भावना को भी बनाए रखे।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद संगठन की भौगोलिक और राजनीतिक विविधता बढ़ी है। पश्चिम एशिया के तीन प्रभावशाली देशों के शामिल होने से ब्रिक्स का वैश्विक दायरा भी बढ़ा है।
लेकिन इन देशों के बीच क्षेत्रीय राजनीति से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दे हैं। ईरान, सऊदी अरब और यूएई की अपनी-अपनी विदेश नीति प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में तीनों देशों को एक साझा घोषणापत्र के लिए साथ लाना अध्यक्ष देश भारत के लिए बड़ी परीक्षा थी।
भारत ने इस चुनौती को टकराव के बजाय संवाद और सहमति के रास्ते से संभालने की कोशिश की। यही कारण है कि संयुक्त बयान पर सहमति को भारत की अध्यक्षता के दौरान एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
ब्रिक्स के भीतर कई ऐसे देश हैं जिनके संबंध पश्चिमी देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर हैं। कुछ सदस्य अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ करीबी आर्थिक संबंध रखते हैं, जबकि कुछ सदस्य पश्चिमी नीतियों के मुखर आलोचक हैं।
भारत ने इस विविधता के बीच एक संतुलित भूमिका निभाने की कोशिश की। भारत का जोर रहा कि ब्रिक्स को किसी एक देश या गुट के खिलाफ मंच के रूप में नहीं देखा जाए, बल्कि इसे विकास, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने वाले मंच के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति इसी संतुलनकारी भूमिका की महत्वपूर्ण परीक्षा थी।
ब्रिक्स की अध्यक्षता करने वाले देश के सामने केवल सम्मेलन आयोजित करने की जिम्मेदारी नहीं होती। अध्यक्ष देश को एजेंडा तय करने, विभिन्न मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच संवाद कराने और मतभेदों के बावजूद संगठन को एक साझा दिशा देने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।
भारत के सामने इस बार चुनौती इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि ब्रिक्स का विस्तार हो चुका है और सदस्य देशों की संख्या एवं विविधता पहले की तुलना में अधिक है।
ऐसे में संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनाना भारत की अध्यक्षता के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इससे ब्रिक्स की एकजुटता का संदेश जाता है। सदस्य देशों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन साझा हितों के मुद्दों पर साथ आने की क्षमता किसी भी बहुपक्षीय संगठन की ताकत होती है।
भारत ने इसी भावना को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। संदेश यह है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक हितों और विदेश नीति प्राथमिकताओं के बावजूद सदस्य देश कुछ व्यापक मुद्दों पर साझा रुख अपना सकते हैं।
ब्रिक्स का संयुक्त घोषणापत्र महज एक औपचारिक दस्तावेज नहीं है। इसमें सदस्य देशों की सामूहिक प्राथमिकताओं और वैश्विक मुद्दों पर उनके साझा दृष्टिकोण की झलक होती है।
इसलिए घोषणापत्र पर सहमति बनना महत्वपूर्ण है। यदि सदस्य देश किसी एक मुद्दे पर पूरी तरह सहमत नहीं भी हों, फिर भी ऐसी भाषा तैयार करना जो सभी को स्वीकार्य हो, बहुपक्षीय कूटनीति की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
ब्रिक्स के विस्तार ने संगठन के स्वरूप को पहले से ज्यादा विविध बना दिया है। अब इसमें एशिया, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के महत्वपूर्ण देश शामिल हैं।
इस विविधता ने संगठन की ताकत बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल भी हुई है। अलग-अलग क्षेत्रों के देशों की अपनी सुरक्षा और आर्थिक प्राथमिकताएं हैं।
भारत के सामने चुनौती थी कि इस बढ़ती विविधता को कमजोरी बनने के बजाय संगठन की ताकत में बदला जाए।
भारत ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने वाले प्रमुख मंच के रूप में देखता है। विकासशील देशों के सामने आर्थिक विकास, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी असमानता और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ी अनेक चुनौतियां हैं।
ब्रिक्स इन मुद्दों पर सामूहिक आवाज उठाने का मंच उपलब्ध कराता है। संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यह विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच साझा प्राथमिकताओं को सामने ला सकता है।
ब्रिक्स की चर्चा केवल राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों तक सीमित नहीं है। आर्थिक सहयोग भी संगठन का प्रमुख आधार है।
सदस्य देश व्यापार, निवेश, वित्तीय सहयोग, ऊर्जा, तकनीक और विकास के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में संयुक्त घोषणापत्र में आर्थिक सहयोग से जुड़े मुद्दों को महत्व मिलने की संभावना है।
भारत के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि ब्रिक्स के मंच का इस्तेमाल व्यापार और निवेश के नए अवसर पैदा करने के लिए किया जाए।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है। ब्रिक्स के मंच से भी वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित बनाने की मांग उठाई गई है।
भारत का तर्क है कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक ताकत का संतुलन बदल चुका है, इसलिए वैश्विक संस्थाओं की संरचना भी आज की वास्तविकताओं के अनुरूप होनी चाहिए।
संयुक्त घोषणापत्र में यदि इस तरह के मुद्दों पर साझा रुख सामने आता है तो इसे भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाएगा।
ब्रिक्स की मौजूदा संरचना में मतभेदों की संभावना पहले से अधिक है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते।
इसके बावजूद बातचीत को जारी रखना और साझा बयान तक पहुंचना यह दिखाता है कि संगठन के भीतर संवाद की गुंजाइश बनी हुई है।
भारत ने अध्यक्ष देश के तौर पर इसी संवाद को बनाए रखने पर जोर दिया।
संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत ने एक ओर ब्रिक्स के सदस्य देशों के साथ सहयोग बढ़ाया, वहीं दूसरी ओर विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखा है।
भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की नीति का यह एक और उदाहरण माना जा सकता है।
भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि बहुपक्षीय संगठनों को किसी एक देश या गुट के विरोध के मंच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ब्रिक्स को भी भारत व्यापक आर्थिक और विकासात्मक सहयोग के मंच के रूप में मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ाना चाहता है।
संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति इसी सोच को मजबूती देती है कि मतभेदों के बावजूद सहयोग के क्षेत्रों को आगे बढ़ाया जा सकता है।
संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन असली चुनौती इसके बाद शुरू होगी। घोषणापत्र में जिन मुद्दों पर सदस्य देश सहमत होंगे, उन्हें व्यवहार में लागू करना आसान नहीं होगा।
व्यापार, वित्तीय सहयोग, तकनीक, ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक शासन जैसे क्षेत्रों में अलग-अलग राष्ट्रीय हित सामने आ सकते हैं। इसलिए साझा बयान को ठोस सहयोग और कार्ययोजना में बदलना ब्रिक्स के लिए अगली बड़ी चुनौती होगी।
भारत के लिए संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उसकी अध्यक्षता की प्रभावशीलता का संदेश जाता है। अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाले देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत कराना आसान काम नहीं था।
देर रात से सुबह तक चली बातचीत और अंततः बनी सहमति यह संकेत देती है कि भारत ने अध्यक्ष देश के रूप में बातचीत और समन्वय की भूमिका को गंभीरता से निभाया।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ब्रिक्स के मंच पर अपनी भूमिका को लगातार मजबूत किया है। भारत आर्थिक सहयोग के साथ-साथ आतंकवाद, वैश्विक शासन सुधार, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल तकनीक और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देता रहा है।
भारत चाहता है कि ब्रिक्स एक ऐसा मंच बने जहां सदस्य देश अपने साझा हितों को वैश्विक स्तर पर मजबूती से सामने रख सकें।
अब सभी की नजर उस संयुक्त घोषणापत्र पर है, जिसमें सदस्य देशों के बीच बनी सहमति को औपचारिक रूप दिया जाएगा। यह दस्तावेज बताएगा कि रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया, वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और वैश्विक शासन सुधार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सदस्य देश किस तरह की साझा भाषा पर पहुंचे हैं।
घोषणापत्र की भाषा और उसमें शामिल प्राथमिकताएं ब्रिक्स की आगे की दिशा का संकेत भी दे सकती हैं।
ब्रिक्स सम्मेलन में संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति को भारत की कूटनीतिक क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत ने यह दिखाने की कोशिश की है कि अलग-अलग हितों और मतभेदों के बावजूद बातचीत के जरिए साझा जमीन तैयार की जा सकती है।
संयुक्त घोषणापत्र पर बनी सहमति से फिलहाल इतना संदेश जरूर गया है कि ब्रिक्स के भीतर मतभेद होने के बावजूद संगठन की एकजुटता कायम है और भारत अध्यक्ष देश के रूप में विभिन्न पक्षों को साथ लाने में सफल रहा है। अब चुनौती इस सहमति को ठोस फैसलों और वास्तविक सहयोग में बदलने की होगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


