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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत के डेयरी क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन, पशुओं की उत्पादकता, चारे की उपलब्धता, बढ़ती लागत और संसाधनों पर दबाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अब छोटे स्तर के पायलट प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़कर सफल और प्रमाणित समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की जरूरत है। विशेषज्ञों और क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि देश के डेयरी इकोसिस्टम में पहले से मौजूद ज्ञान, तकनीक और सफल प्रयोगों को अलग-अलग स्तरों पर सीमित रखने के बजाय किसानों, सहकारी संस्थाओं, उद्योग, वित्तीय संस्थानों, सरकार और अनुसंधान संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय के साथ व्यापक स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।
यह विचार रेज़िलिएंट डेयरी एलायंस (आरडीए) के राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में प्रमुखता से सामने आया। कार्यक्रम में भारतीय डेयरी क्षेत्र को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाने के लिए दो महत्वपूर्ण प्रकाशनों का शुभारंभ किया गया। इन प्रकाशनों को कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) – फूड एंड एग्रीकल्चर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और एनवायरनमेंटल डिफेंस फंड (ईडीएफ) की ओर से तैयार किया गया है।
कार्यक्रम में जारी किए गए दो प्रकाशनों में पहला व्हाइट पेपर “भारत में जलवायु-अनुकूल और उत्पादक डेयरी सिस्टम को बड़े पैमाने पर लागू करना: अपनाने में बाधाएं, विस्तार के रास्ते और इकोसिस्टम को मजबूत करने के अवसर” है। वहीं दूसरा प्रकाशन “भविष्य को सुरक्षित करना: भारतीय डेयरी सेक्टर में लचीलापन लाना” नाम की प्लेबुक है। दोनों दस्तावेजों का उद्देश्य डेयरी क्षेत्र के सामने मौजूद जलवायु और उत्पादकता से जुड़े जोखिमों को समझने के साथ-साथ उनके व्यावहारिक समाधान और बड़े स्तर पर क्रियान्वयन के रास्ते तलाशना है।
व्हाइट पेपर में डेयरी सेक्टर में जलवायु-अनुकूल और उत्पादकता बढ़ाने वाले समाधानों को बड़े पैमाने पर अपनाने में आने वाली प्रमुख बाधाओं का विश्लेषण किया गया है। इसमें वित्तीय संसाधनों तक पहुंच, किसानों और अन्य हितधारकों के लिए पर्याप्त जानकारी तथा सलाहकारी सेवाओं की उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण इनपुट और तकनीक तक पहुंच, संस्थागत सहयोग तथा अंतिम छोर तक समाधान पहुंचाने की व्यवस्था जैसी चुनौतियों पर ध्यान दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कई ऐसे समाधान पहले से मौजूद हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम दे चुके हैं। समस्या यह है कि इन समाधानों का प्रभाव अक्सर सीमित भौगोलिक क्षेत्र या कुछ चुनिंदा परियोजनाओं तक ही रह जाता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि सफल प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों को व्यवस्थित रूप से साझा किया जाए और उन्हें स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बड़े स्तर पर अपनाने के लिए आवश्यक व्यवस्था तैयार की जाए।
आरडीए के पहले चरण में उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में परामर्श और विभिन्न हितधारकों के साथ संवाद किया गया। इस प्रक्रिया से सामने आई सीख को व्हाइट पेपर में शामिल किया गया है। दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि अलग-अलग और बिखरे हुए प्रयासों के बजाय पूरे डेयरी इकोसिस्टम को साथ लेकर चलने वाली समन्वित व्यवस्था विकसित की जाए।
डेयरी क्षेत्र में किसी तकनीक या समाधान की सफलता केवल उसके विकसित होने से सुनिश्चित नहीं होती। उसका वास्तविक प्रभाव तभी सामने आता है, जब वह किसान तक सही समय, सही कीमत और सही जानकारी के साथ पहुंचे। इसके लिए गांव और ब्लॉक स्तर पर सेवाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षित मानव संसाधन, पशु स्वास्थ्य सेवाएं, चारा प्रबंधन, वित्त और बाजार से जुड़ाव जैसे पहलुओं को मजबूत करना आवश्यक होगा।
परामर्श कार्यक्रम में इस बात पर भी चर्चा हुई कि किसानों को केवल नई तकनीक उपलब्ध कराने के बजाय उसके उपयोग, लाभ और आर्थिक व्यवहार्यता के बारे में भी पर्याप्त जानकारी दी जानी चाहिए। इसके लिए सहकारी समितियों, किसान संगठनों, निजी क्षेत्र, विस्तार सेवाओं और वित्तीय संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक माना गया।
व्हाइट पेपर के साथ जारी की गई प्लेबुक को डेयरी व्यवसायों और वैल्यू-चेन से जुड़े अन्य हितधारकों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य जलवायु और पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को केवल चर्चा का विषय बनाए रखने के बजाय उन्हें व्यवसाय की रणनीति, निवेश और रोजमर्रा के संचालन में शामिल करने की दिशा में मार्गदर्शन देना है।
प्लेबुक के माध्यम से डेयरी क्षेत्र से जुड़े संस्थान जलवायु जोखिमों की पहचान करने, संभावित प्रभावों को समझने और उनके अनुरूप व्यावहारिक कदम तय करने की दिशा में काम कर सकते हैं। इससे डेयरी व्यवसायों को भविष्य की परिस्थितियों के लिए अपनी योजनाओं और संचालन को अधिक लचीला बनाने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में सरकार, डेयरी उद्योग, वित्तीय संस्थानों, अनुसंधान संगठनों, सहकारी समितियों और अन्य संबंधित पक्षों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल रिपोर्ट और प्लेबुक जारी करना नहीं था, बल्कि उनमें सामने आए निष्कर्षों को जमीन पर लागू करने के रास्तों पर विचार करना भी था।
प्रतिभागियों ने माना कि डेयरी क्षेत्र में जलवायु जोखिमों का असर किसी एक संस्था या समूह तक सीमित नहीं है। चारे की उपलब्धता से लेकर पशु स्वास्थ्य, दूध उत्पादन, संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और बाजार तक पूरी वैल्यू-चेन पर जलवायु परिस्थितियों का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए समाधान भी वैल्यू-चेन के अलग-अलग हिस्सों को अलग करके नहीं, बल्कि समग्र दृष्टिकोण के साथ विकसित करने की आवश्यकता है।
चर्चा में प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए रेजिलिएंट डेयरी एलायंस के को-लीड डॉ. रत्नम ने डेयरी इकोसिस्टम के विभिन्न पक्षों को एक मंच पर लाने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों, उद्योग, सरकार, वित्तीय संस्थानों और अनुसंधान जगत के बीच संवाद से जलवायु जोखिमों की साझा समझ विकसित की जा सकती है और उत्पादकता तथा लचीलेपन को बढ़ाने वाले व्यावहारिक समाधानों की पहचान की जा सकती है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि डेयरी वैल्यू-चेन में जलवायु के प्रति लचीलेपन को शामिल करना अब एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है। इसके लिए केवल नई तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सफल समाधानों को किसानों और डेयरी व्यवसायों तक बड़े स्तर पर पहुंचाने की व्यवस्था भी बनानी होगी।
एनवायरनमेंटल डिफेंस फंड के भारत में मुख्य सलाहकार हिशाम मुंडोल ने आरडीए के पहले चरण से प्राप्त अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि अब फोकस केवल समाधानों की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अगला चरण इन समाधानों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए आवश्यक परिस्थितियां तैयार करने का होना चाहिए।
उनके अनुसार, भारतीय डेयरी क्षेत्र के पास जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान, अनुभव और कई प्रमाणित समाधान मौजूद हैं। अब आवश्यकता इन प्रयासों को आपस में जोड़ने, सहयोग की व्यवस्था मजबूत करने और सफल मॉडलों को व्यापक स्तर पर लागू करने की है।
कार्यक्रम में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर (इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग) डॉ. वी. श्रीधर ने विशेष संबोधन दिया। उन्होंने एनडीडीबी के चल रहे कार्यों और डेयरी क्षेत्र के लिए ‘डेयरी 2.0’ के विजन पर प्रकाश डाला।
उन्होंने चारे की उपलब्धता की चुनौती से निपटने के लिए ‘साइलेज ग्रिड’ की अवधारणा पर विचार करने की जरूरत बताई। उन्होंने इसकी तुलना बिजली के पावर ग्रिड से करते हुए कहा कि जिस तरह बिजली को अधिक उत्पादन वाले क्षेत्रों से जरूरत वाले क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है, उसी तरह अधिक चारा उत्पादन वाले इलाकों में साइलेज का उत्पादन और भंडारण करके उसे चारे की कमी वाले डेयरी क्षेत्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
इसके लिए नए फ्रेट कॉरिडोर और बेहतर लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का उपयोग किए जाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था चारे की क्षेत्रीय असमानता को कम करने और डेयरी किसानों को नियमित रूप से गुणवत्तापूर्ण चारा उपलब्ध कराने में सहायक हो सकती है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. अशोक गुलाटी ने भारतीय डेयरी क्षेत्र के लिए जलवायु-लचीलेपन के व्यापक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच डेयरी क्षेत्र को उत्पादकता, किसानों की आजीविका और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन कायम करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि भविष्य के डेयरी सिस्टम को तैयार करने के लिए पशु नस्लों, पोषण, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा उपयोग और चारा व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में निरंतर सुधार जरूरी होगा। देसी नस्लों के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन, पशुओं के पोषण में सुधार, जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे तथा नई तकनीकों के इस्तेमाल से डेयरी क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।
सौर ऊर्जा आधारित कूलिंग सिस्टम और समुद्री शैवाल आधारित चारे जैसे नए समाधानों पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई गई। ऐसे समाधानों का उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ डेयरी गतिविधियों से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने की दिशा में काम करना है।
डेयरी किसानों के लिए चारे की नियमित और गुणवत्तापूर्ण उपलब्धता उत्पादन लागत और पशुओं की उत्पादकता दोनों को प्रभावित करती है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में बदलाव, पानी की उपलब्धता और कृषि उत्पादन में उतार-चढ़ाव का असर चारे की व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
इसलिए कार्यक्रम में चारा उत्पादन, भंडारण और परिवहन की बेहतर व्यवस्था विकसित करने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई। स्थानीय स्तर पर चारा उत्पादन के साथ-साथ जरूरत वाले क्षेत्रों में दूसरे इलाकों से चारा पहुंचाने के लिए मजबूत आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
डेयरी क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने के लिए केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। पशु स्वास्थ्य, पोषण, नस्ल सुधार और वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों को मजबूत करना भी आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि किसानों तक पशु चिकित्सा सेवाओं, पोषण संबंधी सलाह और वैज्ञानिक पशुपालन की जानकारी आसानी से पहुंचनी चाहिए। इसके लिए डिजिटल तकनीक, मोबाइल आधारित सेवाओं, सहकारी नेटवर्क और स्थानीय स्तर की सलाहकारी व्यवस्था का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
जलवायु-अनुकूल डेयरी व्यवस्था विकसित करने के लिए किसानों और डेयरी उद्यमों को निवेश की आवश्यकता होगी। सोलर कूलिंग, बेहतर पशु आवास, चारा भंडारण, जल प्रबंधन और ऊर्जा दक्ष उपकरणों जैसे समाधानों को अपनाने के लिए वित्तीय सहायता महत्वपूर्ण होगी।
इस संदर्भ में वित्तीय संस्थानों और डेयरी संगठनों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत महसूस की गई। किसानों के लिए ऐसे वित्तीय उत्पाद और योजनाएं विकसित करने की आवश्यकता है, जो जलवायु-अनुकूल तकनीकों और उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश को अपनाने में सहायता कर सकें।
परामर्श कार्यक्रम में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि जलवायु-लचीलापन डेयरी क्षेत्र के लिए अलग से चलाया जाने वाला कोई सीमित कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। इसे डेयरी विकास और उत्पादकता बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में चारा व्यवस्था मजबूत करना, पशु स्वास्थ्य एवं पोषण सुधारना, पानी और ऊर्जा के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना, जलवायु-अनुकूल कृषि एवं पशुपालन पद्धतियों को अपनाना और किसानों को वित्त, तकनीक, जानकारी तथा सलाहकारी सेवाओं से जोड़ना शामिल है।
रेजिलिएंट डेयरी एलायंस अब अपने अगले चरण में समाधानों की पहचान से आगे बढ़कर उन्हें अपनाने और बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा। इसके तहत विभिन्न क्षेत्रों में सफल प्रयोगों से सीख लेने, उन्हें साझा करने और स्थानीय जरूरतों के अनुसार समाधान विकसित करने की दिशा में काम किया जाएगा।
इस प्रक्रिया में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ऐसे समाधान चुने जाएं जो किसानों के लिए व्यावहारिक होने के साथ आर्थिक रूप से भी उपयोगी हों। डेयरी किसानों के लिए किसी भी नई व्यवस्था की स्वीकार्यता तभी बढ़ सकती है, जब उससे उनकी उत्पादकता, लागत, आय या जोखिम प्रबंधन में स्पष्ट लाभ दिखाई दे।
आरडीए द्वारा जारी व्हाइट पेपर और प्लेबुक को इस व्यापक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जा रहा है। व्हाइट पेपर इकोसिस्टम स्तर पर मौजूद बाधाओं, संभावित अवसरों और बड़े पैमाने पर समाधान लागू करने के रास्तों पर संवाद को दिशा देगा।
वहीं प्लेबुक डेयरी व्यवसायों और वैल्यू-चेन से जुड़े हितधारकों को जलवायु जोखिमों की पहचान और उनके समाधान को व्यवसाय की रणनीति तथा रोजमर्रा के संचालन में शामिल करने के लिए व्यावहारिक दिशा प्रदान करेगी।
चर्चा में यह बात भी सामने आई कि भारत के विशाल डेयरी क्षेत्र में एक ही समाधान हर जगह समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकता। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में पशुपालन की परिस्थितियां, चारा उपलब्धता, पानी, बाजार, बुनियादी ढांचा और किसानों की जरूरतें अलग हो सकती हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर की रणनीति के साथ स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करना भी जरूरी होगा।
इस दिशा में सहकारी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। सहकारी नेटवर्क के माध्यम से किसानों तक तकनीक, प्रशिक्षण, पशु स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण इनपुट और बाजार संबंधी जानकारी पहुंचाने के अवसर मौजूद हैं।
कार्यक्रम के समापन पर रेजिलिएंट डेयरी एलायंस के को-लीड सचिन शर्मा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने आरडीए के काम तथा दोनों प्रकाशनों को तैयार करने में योगदान देने वाले हितधारकों और साझेदार संस्थाओं के प्रयासों की सराहना की।
कार्यक्रम में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि भारत के डेयरी क्षेत्र को भविष्य की जलवायु और आर्थिक चुनौतियों के लिए तैयार करने के लिए केवल नई परियोजनाएं शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा। पहले से उपलब्ध ज्ञान और सफल समाधानों को एक-दूसरे से जोड़ना, संस्थागत सहयोग बढ़ाना और उन्हें किसानों तक बड़े पैमाने पर पहुंचाना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
भारत का डेयरी क्षेत्र करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ा है। ऐसे में इसमें लचीलापन बढ़ाने का असर केवल दूध उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण आय, रोजगार, पोषण, महिला भागीदारी और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
आरडीए के अगले चरण में इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ ऐसे समाधानों को बढ़ावा देने की दिशा में काम करने की बात कही गई है, जो भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप हों, किसानों के लिए व्यावहारिक और आर्थिक रूप से लाभकारी हों तथा लंबे समय तक डेयरी क्षेत्र की उत्पादकता और स्थिरता को मजबूत कर सकें।
दोनों प्रकाशनों का लॉन्च इसी प्रयास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इनका उद्देश्य उपलब्ध प्रमाणों, हितधारकों के अनुभव और नए समाधानों को बेहतर सहयोग, व्यावहारिक कार्रवाई और बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन की दिशा में आगे बढ़ाना है, ताकि भारतीय डेयरी इकोसिस्टम अधिक उत्पादक, जलवायु-अनुकूल, टिकाऊ और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार बनाया जा सके।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


