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- 10h ago
नई दिल्ली। दिल्ली महिला आयोग की ‘विमेंस हेल्पलाइन 181’ की पूर्व कर्मचारी मुनीरा की नौकरी से हटाए जाने से जुड़े मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए दिल्ली महिला आयोग को नोटिस जारी किया है। मुनीरा ने लेबर कोर्ट के उस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें दिल्ली महिला आयोग को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 के तहत ‘इंडस्ट्री’ यानी उद्योग मानने से इनकार किया गया था।
याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला आयोग से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 22 जनवरी को निर्धारित की गई है। हाई कोर्ट के इस कदम के बाद अब दिल्ली महिला आयोग को यह बताना होगा कि पूर्व कर्मचारी की ओर से उठाए गए सवालों और लेबर कोर्ट के फैसले के संबंध में उसका क्या पक्ष है।
मुनीरा ने लेबर कोर्ट के 16 दिसंबर 2025 के फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया है। याचिका में उन्होंने लेबर कोर्ट के निर्णय को रद्द करने की मांग की है।
इसके साथ ही उन्होंने अपनी नौकरी में पुनर्बहाली और नौकरी से संबंधित सभी बकाया वेतन तथा अन्य देय भत्तों के भुगतान की भी मांग की है।
याचिका का मुख्य आधार यह है कि जिस संस्था में उन्होंने काम किया, उसकी गतिविधियों और कर्मचारियों के रोजगार से जुड़े विवाद को किस कानूनी दायरे में देखा जाना चाहिए। इसी संदर्भ में ‘इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947’ के तहत दिल्ली महिला आयोग को ‘इंडस्ट्री’ माने जाने का सवाल मामले का महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा बन गया है।
पूरा विवाद मार्च 2019 में शुरू हुआ था। मुनीरा का कहना है कि उन्हें ‘विमेंस हेल्पलाइन 181’ में काम करने के दौरान अचानक सेवा से हटा दिया गया। नौकरी से हटाए जाने के बाद उन्होंने अपने रोजगार और सेवा समाप्ति से संबंधित राहत पाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया।
मामला इसके बाद लंबे समय तक श्रम न्याय व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन रहा। लेबर ट्रिब्यूनल और लेबर कोर्ट में चली कार्यवाही के बाद आखिरकार 16 दिसंबर 2025 को फैसला सामने आया।
अब उस फैसले को मुनीरा ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है। इस तरह करीब वर्षों पुराने रोजगार विवाद में एक बार फिर न्यायिक स्तर पर सुनवाई शुरू हुई है।
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि क्या दिल्ली महिला आयोग जैसी संस्था को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 के तहत ‘इंडस्ट्री’ की श्रेणी में माना जा सकता है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी संस्था को अधिनियम के तहत ‘इंडस्ट्री’ माने जाने या न माने जाने का असर वहां कार्यरत कर्मचारियों के रोजगार विवादों के कानूनी उपचार पर पड़ सकता है।
मुनीरा की याचिका में लेबर कोर्ट के उस निष्कर्ष को चुनौती दी गई है, जिसमें दिल्ली महिला आयोग को इस कानून के तहत ‘इंडस्ट्री’ मानने से इनकार किया गया था। हाई कोर्ट अब इस पूरे कानूनी विवाद और लेबर कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली महिला आयोग का पक्ष सुनेगा।
मुनीरा ने हाई कोर्ट के समक्ष केवल लेबर कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग नहीं की है, बल्कि अपनी नौकरी में पुनर्बहाली की भी मांग रखी है।
याचिका में उनके द्वारा नौकरी से जुड़े बकाया वेतन और भत्तों के भुगतान की मांग भी की गई है। यदि अदालत याचिका में उठाए गए उनके तर्कों को स्वीकार करती है तो मामले में आगे सेवा संबंधी राहतों पर भी विचार हो सकता है।
फिलहाल हाई कोर्ट ने महिला आयोग से जवाब मांगा है। इसलिए मामले में अंतिम कानूनी स्थिति अगली सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलों के बाद ही स्पष्ट होगी।
‘विमेंस हेल्पलाइन 181’ महिलाओं को सहायता उपलब्ध कराने से जुड़ी व्यवस्था है। ऐसे संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों के सेवा विवाद का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह रोजगार अधिकारों और सार्वजनिक सेवा से जुड़ी संस्थागत व्यवस्थाओं के बीच संबंध को सामने लाता है।
मुनीरा का मामला इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि हाई कोर्ट के समक्ष फिलहाल मुख्य कानूनी प्रश्न लेबर कोर्ट के फैसले की वैधता और दिल्ली महिला आयोग की ‘इंडस्ट्री’ के रूप में स्थिति से जुड़ा है।
मुनीरा के नौकरी से हटाए जाने का विवाद मार्च 2019 से चला आ रहा है। इतने लंबे समय तक मामला श्रम न्यायालयों में विचाराधीन रहने के बाद अब दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा है।
रोजगार से जुड़े विवादों में कर्मचारी के लिए समय का विशेष महत्व होता है। नौकरी समाप्त होने के बाद लंबे समय तक मामला लंबित रहने से कर्मचारी की आर्थिक और पेशेवर स्थिति पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि ऐसे मामलों में अदालतों के समक्ष केवल कानूनी प्रश्न ही नहीं, बल्कि सेवा से जुड़े व्यावहारिक पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
हालांकि इस मामले में अभी हाई कोर्ट ने केवल याचिका पर दिल्ली महिला आयोग का जवाब मांगा है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि अदालत आगे किस तरह की राहत प्रदान करेगी।
हाई कोर्ट के नोटिस के बाद दिल्ली महिला आयोग के समक्ष अब याचिका में उठाए गए सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी होगी। आयोग को लेबर कोर्ट के फैसले और उसके खिलाफ दायर चुनौती पर अपना कानूनी पक्ष अदालत के सामने रखना होगा।
विशेष रूप से यह मुद्दा महत्वपूर्ण रहेगा कि आयोग को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत ‘इंडस्ट्री’ नहीं मानने के लेबर कोर्ट के निष्कर्ष को किस आधार पर सही या गलत माना जाना चाहिए।
अगली सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर मामले की आगे की दिशा तय हो सकती है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख तय की है। अब सभी की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि दिल्ली महिला आयोग अपने जवाब में क्या रुख अपनाता है और हाई कोर्ट लेबर कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर किस तरह आगे बढ़ता है।
फिलहाल हाई कोर्ट ने मामले को अपने समक्ष सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए संबंधित पक्ष को नोटिस जारी किया है। इससे मुनीरा की ओर से लेबर कोर्ट के फैसले के खिलाफ शुरू की गई न्यायिक चुनौती का अगला चरण शुरू हो गया है।
मार्च 2019 में नौकरी से हटाए जाने से शुरू हुआ यह विवाद अब दिल्ली हाई कोर्ट के सामने है। एक तरफ पूर्व कर्मचारी ने सेवा में बहाली, बकाया वेतन और भत्तों के भुगतान की मांग की है, वहीं दूसरी ओर मामले का केंद्रीय कानूनी प्रश्न यह है कि दिल्ली महिला आयोग को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत ‘इंडस्ट्री’ की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं।
हाई कोर्ट के समक्ष अब दिल्ली महिला आयोग का जवाब और दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें महत्वपूर्ण होंगी। 22 जनवरी की अगली सुनवाई से इस लंबे समय से चले आ रहे रोजगार विवाद की आगे की दिशा तय होने की उम्मीद है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


