यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की दिशा में भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 के उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से हासिल करने के लिए देश को मौजूदा कार्यबल के अतिरिक्त लगभग 10 लाख कुशल भू-स्थानिक पेशेवरों की आवश्यकता होगी। इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी दूर करने, उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने तथा रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण को गति देने की जरूरत पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। शहरी विकास, बुनियादी ढांचे के निर्माण, कृषि, पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन, परिवहन, भूमि अभिलेख और स्मार्ट सिटी जैसी योजनाओं में इस तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, इन संभावनाओं का पूरा लाभ उठाने के लिए केवल आधुनिक तकनीक और डिजिटल उपकरण पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए ऐसे प्रशिक्षित पेशेवरों की जरूरत होगी, जो आंकड़ों का विश्लेषण करने, आधुनिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने और वास्तविक समस्याओं के समाधान में भू-स्थानिक तकनीक को प्रभावी ढंग से लागू कर सकें।
फिक्की के कार्यक्रम ‘विकसित भारत के लिए भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी में राष्ट्रीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम : शिक्षा, कौशल एवं कार्यबल विकास’ में शामिल विशेषज्ञों ने इस क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि भारत को भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रमाणन और उद्योग की जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा।
राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 का उद्देश्य देश में भू-स्थानिक आंकड़ों, प्रौद्योगिकी और संबंधित सेवाओं के विकास तथा उपयोग को बढ़ावा देना है। इस क्षेत्र में मजबूत क्षमता विकसित होने से सरकारी योजनाओं की निगरानी, संसाधनों का बेहतर प्रबंधन और विकास परियोजनाओं की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नीति के लक्ष्यों को जमीन पर उतारने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। यदि पर्याप्त संख्या में कुशल पेशेवर उपलब्ध नहीं होंगे, तो आधुनिक उपकरणों और डिजिटल तकनीकों का पूरा लाभ उठाना कठिन हो सकता है।
भारतीय सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के अपर महासर्वेक्षक नितिन जोशी ने कहा कि भू-स्थानिक क्षेत्र में विशेष रूप से मध्य और वरिष्ठ स्तर के कुशल पेशेवरों की कमी महसूस की जा रही है। उन्होंने इस अंतर को दूर करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों, संस्थागत साझेदारियों और औपचारिक प्रमाणन व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
जोशी के मुताबिक, राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति ने इस क्षेत्र में विकास और नवाचार के नए अवसर खोले हैं। प्रौद्योगिकी इन अवसरों को साकार करने के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध करा सकती है, लेकिन उनका प्रभावी इस्तेमाल प्रशिक्षित मानव संसाधन के माध्यम से ही संभव होगा।
उन्होंने कहा, “नीति ने दरवाजे खोल दिए हैं और प्रौद्योगिकी आवश्यक साधन उपलब्ध कराएगी, लेकिन विकसित भारत के निर्माण के लिए इन अवसरों का लाभ उठाने और उन्हें साकार करने का काम कुशल मानव संसाधन को ही करना होगा।”
उनका कहना था कि देश में भू-स्थानिक क्षेत्र की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिभाओं को तैयार करना और मौजूदा पेशेवरों के कौशल को उन्नत बनाना आवश्यक है।
नितिन जोशी ने भू-स्थानिक क्षेत्र में पेशेवर मानकों को बेहतर बनाने के लिए सर्वेक्षकों की औपचारिक प्रमाणन व्यवस्था विकसित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कुछ अन्य पेशों में योग्यता और विशेषज्ञता को प्रमाणित करने की व्यवस्था होती है, उसी प्रकार सर्वेक्षण के क्षेत्र में भी निर्धारित मानकों पर आधारित प्रमाणन उपयोगी साबित हो सकता है।
ऐसी व्यवस्था से पेशेवरों की तकनीकी दक्षता को पहचानने, प्रशिक्षण की गुणवत्ता बेहतर बनाने और उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यबल तैयार करने में सहायता मिल सकती है।
उन्होंने उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों से हैदराबाद स्थित भारतीय सर्वेक्षण विभाग के राष्ट्रीय भू-सूचनाविज्ञान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।
जोशी ने निर्धारित पाठ्यक्रमों, उद्योग की जरूरतों के अनुसार तैयार प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संस्थागत साझेदारियों की संभावनाओं पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, भू-स्थानिक क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों को देखते हुए शिक्षा और प्रशिक्षण को व्यावहारिक जरूरतों के अनुरूप बनाना आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को वास्तविक परियोजनाओं, आधुनिक उपकरणों और उद्योग में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर से परिचित कराया जाए, तो उन्हें रोजगार के लिए तैयार करना आसान होगा।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिक ‘जी’ और राष्ट्रीय भू-स्थानिक कार्यक्रम के प्रमुख डॉ. मनोरंजन महंती ने बताया कि विभाग ने पिछले एक दशक में अपने बहुस्तरीय राष्ट्रीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम के माध्यम से 6,000 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित किया है।
उन्होंने कहा कि भू-स्थानिक क्षेत्र में देश की आवश्यकताओं को देखते हुए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार करना और शिक्षा व्यवस्था को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप बनाना महत्वपूर्ण है।
डॉ. महंती के अनुसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ मिलकर पाठ्यक्रमों तथा प्रमाणन व्यवस्था पर काम कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी को अब ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग यानी गेट परीक्षा के विषयों में भी शामिल किया गया है।
इस कदम को भू-स्थानिक शिक्षा को अधिक व्यवस्थित बनाने और विद्यार्थियों के बीच इस क्षेत्र के प्रति रुचि बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों के सामने चुनौती केवल नए पाठ्यक्रम शुरू करने तक सीमित नहीं है। जरूरी यह भी है कि विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण मिले, उन्हें आधुनिक तकनीकों पर काम करने का अवसर प्राप्त हो और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनके लिए रोजगार के पर्याप्त रास्ते उपलब्ध हों।
डॉ. मनोरंजन महंती ने उद्योग जगत से शिक्षण संस्थानों के साथ अधिक सक्रिय सहयोग करने की अपील की। उन्होंने कहा कि कंपनियों को वास्तविक कार्यक्षेत्र की समस्याओं को विद्यार्थियों के सामने रखना चाहिए, इंटर्नशिप के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए और परिसरों से प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की भर्ती करनी चाहिए।
उन्होंने राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग केवल निजी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल से विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि वास्तविक परियोजनाओं में किस तरह की तकनीकी दक्षता की जरूरत होती है। इससे पाठ्यक्रमों को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है और कंपनियों को प्रशिक्षित पेशेवर उपलब्ध हो सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी शहर में यातायात व्यवस्था सुधारने, जल संसाधनों का प्रबंधन करने या भूमि अभिलेखों को डिजिटल बनाने की परियोजना चल रही है, तो उससे जुड़े वास्तविक आंकड़ों और समस्याओं पर आधारित प्रशिक्षण विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव दे सकता है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. महंती ने ‘भारत की भू-स्थानिक क्षमता निर्माण रणनीति : विजन 2030 और उससे आगे’ शीर्षक से श्वेतपत्र का विमोचन भी किया। यह विषय भू-स्थानिक क्षेत्र में भविष्य की आवश्यकताओं, कार्यबल विकास और राष्ट्रीय क्षमता निर्माण को लेकर बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. वी.के. दधवाल ने कहा कि भारत के पास आवश्यक भू-स्थानिक कार्यबल तैयार करने के लिए वर्ष 2047 तक इंतजार करने का विकल्प नहीं है। उन्होंने अगले पांच से आठ वर्षों को इस दिशा में निर्णायक बताया।
उनके अनुसार, यदि देश को विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप अपनी तकनीकी और संस्थागत क्षमताओं को मजबूत करना है, तो अभी से बड़े पैमाने पर कौशल विकास और प्रशिक्षण पर काम करना होगा।
डॉ. दधवाल ने इस क्षेत्र की चार प्रमुख चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। इनमें शैक्षणिक प्रशिक्षण को उद्योग में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक उपकरणों के अनुरूप बनाना, नीतिगत लक्ष्यों को उपयोगी आधारभूत भू-स्थानिक आंकड़ों में बदलना, प्रायोगिक परियोजनाओं को वास्तविक क्रियान्वयन तक पहुंचाना और विभिन्न विषयों में बड़े पैमाने पर कुशल प्रतिभाएं तैयार करना शामिल है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा और तकनीक के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना जरूरी होगा। केवल सैद्धांतिक जानकारी देने के बजाय विद्यार्थियों को वास्तविक परिस्थितियों में तकनीक का इस्तेमाल करने का अवसर देना होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में ऐसे पेशेवरों की मांग बढ़ सकती है, जो भू-स्थानिक आंकड़ों को समझने के साथ-साथ उनका विश्लेषण कर सकें और विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान के लिए उनका इस्तेमाल कर सकें।
ईएसआरआई के वरिष्ठ सलाहकार राजेश माथुर ने कहा कि भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी अब केवल पारंपरिक सर्वेक्षण और मानचित्रण तक सीमित नहीं रह गई है। यह निर्णय लेने में सहायता देने वाली एक महत्वपूर्ण प्रणाली और मुख्यधारा की सूचना प्रौद्योगिकी का हिस्सा बन चुकी है।
उन्होंने कहा कि भविष्य के पेशेवरों के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी जीआईएस की बुनियादी जानकारी के साथ प्रोग्रामिंग, एंटरप्राइज सिस्टम इंटीग्रेशन और संबंधित कार्यक्षेत्रों की विशेषज्ञता भी आवश्यक होगी।
जीआईएस ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से किसी स्थान से जुड़े आंकड़ों को एकत्रित, व्यवस्थित, विश्लेषित और मानचित्रों के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसका उपयोग शहरों की योजना बनाने, परिवहन नेटवर्क विकसित करने, कृषि भूमि का आकलन करने, प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी और आपदा प्रबंधन जैसे कार्यों में किया जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी शहर में जलभराव की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान करने के लिए भौगोलिक आंकड़ों, वर्षा के रिकॉर्ड, भूमि की ऊंचाई और जल निकासी नेटवर्क का एक साथ विश्लेषण किया जा सकता है। इसी तरह, कृषि क्षेत्र में जीआईएस की मदद से भूमि उपयोग, सिंचाई और फसल संबंधी जानकारी का बेहतर आकलन संभव है।
ऐसे कार्यों के लिए केवल मानचित्र पढ़ने का ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। आंकड़ों को संसाधित करने, विभिन्न डिजिटल प्रणालियों को आपस में जोड़ने और विश्लेषण के परिणामों को उपयोगी जानकारी में बदलने की क्षमता भी जरूरी है।
राजेश माथुर ने उद्योग, शिक्षण संस्थानों और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने वाली एजेंसियों के बीच मजबूत समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि भविष्य की मांग को देखते हुए भू-स्थानिक शिक्षा को व्यापक डिजिटल कौशल के साथ जोड़ना होगा।
भारत में भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी का उपयोग अनेक क्षेत्रों में किया जा सकता है। जैसे-जैसे विकास परियोजनाओं में डिजिटल आंकड़ों और तकनीकी विश्लेषण की भूमिका बढ़ेगी, वैसे-वैसे प्रशिक्षित पेशेवरों की जरूरत भी महत्वपूर्ण होती जाएगी।
इस तकनीक के प्रमुख उपयोगों में शामिल हैं:
शहरी नियोजन: शहरों में सड़कों, आवासीय क्षेत्रों, सार्वजनिक सुविधाओं और जल निकासी व्यवस्था की योजना तैयार करना।
कृषि: भूमि, सिंचाई, फसल क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करना।
आपदा प्रबंधन: बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों की पहचान करना।
परिवहन: सड़क नेटवर्क, यातायात प्रवाह और परिवहन सुविधाओं की योजना बनाना।
पर्यावरण संरक्षण: जंगलों, जल स्रोतों, भूमि उपयोग और पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी करना।
भूमि अभिलेख: जमीन से संबंधित आंकड़ों के डिजिटलीकरण और प्रबंधन में सहयोग देना।
बुनियादी ढांचा: सड़कों, रेल मार्गों, पाइपलाइनों और अन्य विकास परियोजनाओं की योजना बनाने में सहायता करना।
इन क्षेत्रों में भू-स्थानिक तकनीक का प्रभावी इस्तेमाल करने के लिए ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत होगी, जो तकनीकी ज्ञान को वास्तविक जरूरतों से जोड़ सकें।
विशेषज्ञों की चर्चा से यह भी स्पष्ट हुआ कि भू-स्थानिक क्षेत्र में कौशल विकास के साथ पेशेवर योग्यता की पहचान करना महत्वपूर्ण है। मानकीकृत प्रशिक्षण और प्रमाणन से कंपनियों तथा सरकारी एजेंसियों को आवश्यक कौशल वाले उम्मीदवारों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है।
यदि पाठ्यक्रम उद्योग की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तैयार किए जाएं, तो विद्यार्थियों को रोजगार के लिए बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकता है। इसके लिए विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, सरकारी विभागों और निजी कंपनियों को मिलकर प्रशिक्षण की रूपरेखा तैयार करनी होगी।
इंटर्नशिप, परियोजना आधारित शिक्षा, आधुनिक सॉफ्टवेयर का प्रशिक्षण और वास्तविक आंकड़ों पर काम करने के अवसर इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा हो सकते हैं।
इसके साथ ही, पहले से कार्यरत पेशेवरों को भी नई तकनीकों के अनुरूप अपने कौशल को लगातार उन्नत करने की जरूरत होगी। भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी में डिजिटल प्रणालियों और विश्लेषण के तरीकों का विस्तार होने के कारण निरंतर प्रशिक्षण महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।
कार्यक्रम में शामिल विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केवल तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं होगी। प्रशिक्षित मानव संसाधन, उद्योगोन्मुख शिक्षा, मानकीकृत प्रमाणन और संस्थागत साझेदारी इस क्षेत्र की क्षमता बढ़ाने के लिए आवश्यक होंगे।
भारत के सामने मौजूदा कार्यबल के अतिरिक्त लगभग 10 लाख कुशल भू-स्थानिक पेशेवरों की आवश्यकता का अनुमान एक बड़ी चुनौती के साथ-साथ अवसर भी प्रस्तुत करता है। यदि देश समय पर आवश्यक प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करता है, तो इससे तकनीकी रोजगार, शोध, नवाचार और विकास परियोजनाओं के लिए नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
हालांकि, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रशिक्षण की गुणवत्ता, उपलब्ध पाठ्यक्रमों की पहुंच, उद्योग में रोजगार की मांग और विभिन्न राज्यों में कौशल विकास की जरूरतों पर लगातार ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में अगले पांच से आठ वर्ष महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान शिक्षा व्यवस्था, उद्योग और सरकारी संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करना होगा, ताकि भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी से मिलने वाले अवसरों का लाभ व्यापक स्तर पर उठाया जा सके।
निष्कर्षतः, राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत को तकनीकी ढांचे के साथ-साथ कुशल पेशेवरों का मजबूत आधार तैयार करना होगा। अतिरिक्त 10 लाख प्रशिक्षित पेशेवरों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए उद्योगोन्मुख शिक्षा, व्यावहारिक प्रशिक्षण, प्रमाणन और संस्थागत सहयोग पर विशेष ध्यान देना होगा। यही प्रयास भू-स्थानिक क्षेत्र में भारत की क्षमता बढ़ाने और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


