यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। लाल किला मैदान स्थित माधवदास पार्क में श्री धार्मिक लीला कमेटी की ओर से आयोजित रामलीला में रामकथा के विभिन्न मार्मिक प्रसंगों का भव्य एवं प्रभावशाली मंचन किया गया। राजा दशरथ के निधन से लेकर भरत के अयोध्या आगमन, कैकेयी के साथ उनके संवाद, माता कौशल्या के प्रति उनके भावनात्मक समर्पण और अंततः चित्रकूट में श्रीराम-भरत मिलाप तक की कथा ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कलाकारों के सशक्त अभिनय, प्रभावशाली संवादों और मंच पर प्रस्तुत भावनात्मक दृश्यों ने रामकथा के आदर्शों को जीवंत कर दिया।
रामलीला के दौरान राजमहल में छाए शोक, भरत की व्याकुलता, कैकेयी के निर्णय पर उनके आक्रोश, माता कौशल्या के प्रति सम्मान और श्रीराम के प्रति उनके अटूट प्रेम को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। चित्रकूट में लक्ष्मण के क्रोध और श्रीराम-भरत के मिलन का दृश्य इस दिन के मंचन का प्रमुख आकर्षण रहा। भरत की आंखों में अपने बड़े भाई के प्रति श्रद्धा, अयोध्या लौटने के लिए श्रीराम से आग्रह और श्रीराम की ओर से मर्यादा तथा पिता के वचन का पालन करने की दृढ़ता ने दर्शकों को रामायण के मूल संदेश से जोड़ा।
इस आयोजन में केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक, लोकसभा सदस्य मनोज तिवारी, केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, दिल्ली सरकार के मंत्री मजिंदर सिंह सिरसा, राज्यसभा सदस्य अरुण सिंह तथा विश्व हिंदू परिषद के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष कपिल खन्ना सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
रामलीला की शुरुआत कौशल्या महल के उस मार्मिक प्रसंग से हुई, जिसमें राजा दशरथ के निधन के बाद अयोध्या के राजपरिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। श्रीराम के वनवास और उनसे बिछोह के कारण पहले से व्यथित राजा दशरथ का निधन पूरी अयोध्या को शोक में डुबो देता है। इस प्रसंग के मंचन में राजमहल की पीड़ा, माता कौशल्या के दुख और परिवार पर आए संकट को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
राजा दशरथ के निधन के बाद सुमंत की अयोध्या वापसी का दृश्य भी दर्शकों के लिए अत्यंत भावनात्मक रहा। सुमंत के माध्यम से श्रीराम के वनगमन और वन में उनके हालात से जुड़ी घटनाओं का प्रभाव सामने आया। राजपरिवार के सदस्यों के बीच संवादों ने उस परिस्थिति को जीवंत कर दिया, जब अयोध्या का राजमहल अपने प्रिय राजकुमार के वियोग और महाराज के निधन के दोहरे दुख से गुजर रहा था।
कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से यह दिखाया कि श्रीराम के वनवास का निर्णय केवल एक राजकीय घटना नहीं था, बल्कि उससे पूरे परिवार और राज्य की भावनाएं जुड़ी हुई थीं। इस प्रसंग ने दर्शकों को रामकथा की उस संवेदनशील पृष्ठभूमि से परिचित कराया, जिसके बाद भरत के चरित्र की महानता और अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है।
इसके बाद भरत और शत्रुघ्न के अयोध्या आगमन का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। अयोध्या पहुंचने पर भरत को राजमहल में बदली परिस्थितियों और परिवार पर आए संकट का पता चलता है। पिता के निधन और श्रीराम के वनवास की जानकारी मिलने पर भरत की व्याकुलता तथा दुख को कलाकारों ने प्रभावशाली संवादों और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से मंच पर उतारा।
भरत का चरित्र रामायण में निस्वार्थ प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। उनके लिए राजसिंहासन किसी व्यक्तिगत उपलब्धि या महत्वाकांक्षा का विषय नहीं था। वह श्रीराम को अपना आदर्श और बड़े भाई के रूप में सर्वोच्च सम्मान देते थे। इसी भावना को मंचन में प्रमुखता से उभारा गया।
भरत की पीड़ा केवल पिता के निधन तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्हें इस बात का भी गहरा दुख था कि उनकी अनुपस्थिति में उनकी माता कैकेयी के निर्णय के कारण श्रीराम को वनवास जाना पड़ा। इस स्थिति ने उनके सामने एक कठिन नैतिक प्रश्न खड़ा कर दिया। एक ओर राजपरिवार की परिस्थितियां थीं, तो दूसरी ओर बड़े भाई के प्रति प्रेम और न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी।
भरत के संवादों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सच्चा प्रेम अधिकार जताने में नहीं, बल्कि दूसरे के सम्मान, सुख और आदर्शों को स्वीकार करने में निहित होता है।
रामलीला का एक महत्वपूर्ण दृश्य कैकेयी महल में भरत और उनकी माता कैकेयी के बीच हुआ संवाद रहा। इस प्रसंग में भरत अपनी माता के निर्णय से व्यथित दिखाई देते हैं। श्रीराम को वनवास भेजे जाने और राजसिंहासन से जुड़े घटनाक्रम को लेकर उनका असंतोष स्पष्ट रूप से सामने आता है।
भरत के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह माता के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए भी उनके अनुचित निर्णय का समर्थन नहीं करते। वह राजसत्ता को व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं मानते और श्रीराम के अधिकार तथा उनकी श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं। मंच पर इस भाव को संवादों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
इस प्रसंग ने दर्शकों के सामने पारिवारिक संबंधों के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी रखा। रामकथा यह बताती है कि किसी संबंध का सम्मान करने का अर्थ हर निर्णय को सही मान लेना नहीं है। जब धर्म, न्याय और कर्तव्य का प्रश्न सामने हो, तो व्यक्ति को विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए।
भरत और कैकेयी के संवाद में जहां एक ओर माता-पुत्र के संबंधों की जटिलता दिखाई दी, वहीं दूसरी ओर भरत के मन में श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा भी स्पष्ट हुई। इस दृश्य ने रामायण के उन मूल्यों को रेखांकित किया, जिनमें व्यक्तिगत हितों से ऊपर धर्म और सत्य को स्थान दिया गया है।
कैकेयी महल के बाद माता कौशल्या और भरत के बीच संवाद का मंचन किया गया। यह प्रसंग रामकथा के सबसे संवेदनशील पारिवारिक दृश्यों में से एक है। श्रीराम के वनवास और राजा दशरथ के निधन से दुखी माता कौशल्या के सामने जब भरत आते हैं, तो उनके मन में दुख, पीड़ा और अनेक भावनाएं उमड़ती हैं।
भरत अपनी ओर से श्रीराम के वनवास के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानते, फिर भी उन्हें इस घटना का गहरा दुख है। वह माता कौशल्या के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हुए श्रीराम के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण प्रकट करते हैं। इस दृश्य में पारिवारिक संवेदनाओं, पश्चाताप, स्नेह और विश्वास का सुंदर चित्रण देखने को मिला।
कलाकारों ने संवादों के माध्यम से यह दिखाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और विश्वास का महत्व कम नहीं होता। दुख की घड़ी में एक-दूसरे को समझना, भावनाओं का सम्मान करना और संबंधों को संभालना ही परिवार की वास्तविक शक्ति है।
माता कौशल्या और भरत के इस संवाद ने रामकथा के उस पक्ष को सामने रखा, जिसमें परिवार केवल रक्त संबंधों से नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और आत्मीयता से जुड़ा होता है।
रामलीला का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव चित्रकूट का प्रसंग रहा, जहां श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वन में निवास कर रहे हैं। भरत जब राजपरिवार के अन्य सदस्यों और अयोध्या के लोगों के साथ श्रीराम को वापस लाने के उद्देश्य से चित्रकूट पहुंचते हैं, तो घटनाक्रम भावनात्मक मोड़ ले लेता है।
भरत के आगमन को लेकर लक्ष्मण की प्रतिक्रिया का मंचन भी प्रभावशाली रहा। श्रीराम के प्रति अपने गहरे प्रेम और समर्पण के कारण लक्ष्मण तत्काल परिस्थितियों को लेकर चिंतित और आक्रोशित दिखाई देते हैं। उन्हें आशंका होती है कि कहीं अयोध्या से आने वाले लोगों के पीछे कोई दूसरा उद्देश्य तो नहीं है।
लक्ष्मण के इस क्रोध के विपरीत श्रीराम का धैर्य, विवेक और शांत स्वभाव कथा को संतुलन प्रदान करता है। श्रीराम परिस्थितियों को समझने और संबंधों की गरिमा बनाए रखने का संदेश देते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से कलाकारों ने यह दर्शाया कि भावनाओं के तीव्र होने पर भी धैर्य और विवेक बनाए रखना आवश्यक है।
लक्ष्मण का चरित्र जहां अपने बड़े भाई की रक्षा और सेवा के लिए पूर्णतः समर्पित दिखाई देता है, वहीं श्रीराम का व्यवहार उन्हें मर्यादा, संयम और करुणा का आदर्श बनाता है। दोनों भाइयों के स्वभाव का यह अंतर कथा को नाटकीयता प्रदान करने के साथ-साथ जीवन के महत्वपूर्ण संदेश भी देता है।
पूरे मंचन का सबसे भावुक और यादगार प्रसंग चित्रकूट में श्रीराम और भरत का मिलन रहा। भरत अपने बड़े भाई को अयोध्या वापस लौटने के लिए मनाने आते हैं। उनके मन में राज्य प्राप्त करने की कोई लालसा नहीं, बल्कि श्रीराम को उनका उचित स्थान दिलाने की भावना है।
भरत की दृष्टि में श्रीराम ही अयोध्या के वास्तविक और योग्य शासक हैं। वह चाहते हैं कि श्रीराम वापस लौटकर राज्य का दायित्व संभालें और अयोध्या को उनके मार्गदर्शन का लाभ मिले। भरत का यह आग्रह उनके व्यक्तित्व की महानता और बड़े भाई के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को उजागर करता है।
दूसरी ओर, श्रीराम पिता दशरथ को दिए गए वचन और वनवास की अवधि पूरी करने के अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहते हैं। भरत के आग्रह के बावजूद वह मर्यादा और सत्य के मार्ग से हटने को तैयार नहीं होते। इस प्रकार दोनों भाइयों के बीच संवाद केवल भावनात्मक मिलन नहीं, बल्कि कर्तव्य और आदर्शों के बीच संतुलन का उदाहरण बन जाता है।
मंच पर इस दृश्य के दौरान भरत की विनम्रता, श्रीराम के प्रति उनका सम्मान और श्रीराम का स्नेहपूर्ण व्यवहार कथा के भावनात्मक प्रभाव को और गहरा करता है। दोनों भाइयों का मिलन दर्शकों के लिए भ्रातृप्रेम, त्याग और पारिवारिक एकता का प्रतीक बनकर उभरा।
इस प्रसंग की विशेषता यह है कि यहां दो भाइयों के बीच न तो सत्ता का संघर्ष है और न ही अधिकारों की प्रतिस्पर्धा। दोनों एक-दूसरे के सम्मान और कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हैं। भरत श्रीराम को अयोध्या का राजा देखना चाहते हैं, जबकि श्रीराम पिता के वचन को निभाने के लिए वनवास पूरा करने पर अडिग हैं। दोनों का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा की रक्षा है।
चित्रकूट का यह दृश्य रामायण के उन प्रसंगों में शामिल है, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ जीवन के गहरे आदर्शों से भी परिचित कराते हैं।
राम-भरत मिलाप की कथा भारतीय संस्कृति में भ्रातृप्रेम और त्याग का अद्वितीय उदाहरण मानी जाती है। भरत को राजसिंहासन सहज रूप से प्राप्त हो सकता था, लेकिन उन्होंने इसे अपना अधिकार या उपलब्धि नहीं माना। उनके लिए श्रीराम का सम्मान और पिता की इच्छा के अनुरूप धर्म का पालन अधिक महत्वपूर्ण था।
इसी प्रकार श्रीराम ने भी परिस्थितियों के अनुसार अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय पिता के वचन का पालन करना उचित समझा। दोनों भाइयों का आचरण यह दर्शाता है कि आदर्श व्यक्ति वह नहीं, जो केवल अपने अधिकारों की बात करे, बल्कि वह है जो अपने कर्तव्यों को भी समान महत्व दे।
भरत का त्याग और श्रीराम की मर्यादा आज के सामाजिक जीवन में भी प्रासंगिक हैं। परिवारों में आपसी विश्वास, सम्मान, संवाद और जिम्मेदारी की भावना बनाए रखने के लिए इन आदर्शों से प्रेरणा ली जा सकती है। रामलीला के माध्यम से यही संदेश दर्शकों तक पहुंचाया गया कि प्रेम का वास्तविक अर्थ अधिकार प्राप्त करना नहीं, बल्कि संबंधों की गरिमा बनाए रखना है।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला में कलाकारों ने रामकथा के विभिन्न पात्रों की भावनाओं को अभिनय और संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया। राजा दशरथ के निधन का दुख, भरत की व्याकुलता, कैकेयी के साथ उनका संवाद, माता कौशल्या के प्रति उनका सम्मान और चित्रकूट में श्रीराम के प्रति उनका समर्पण कथा के अलग-अलग भावनात्मक रंगों को सामने लाए।
रामलीला की विशेषता यह है कि इसमें धार्मिक प्रसंगों को केवल घटनाओं के रूप में नहीं दिखाया जाता, बल्कि उनके माध्यम से जीवन के आदर्शों और मानवीय संवेदनाओं को भी अभिव्यक्त किया जाता है। इस मंचन में पारिवारिक संबंधों की गहराई, भाइयों के बीच प्रेम, माता-पिता के प्रति सम्मान और कर्तव्य के प्रति निष्ठा को प्रमुखता से उभारा गया।
माधवदास पार्क में आयोजित इस रामलीला के माध्यम से दर्शकों को रामायण की कथा से जुड़ने और उसके आदर्शों को समझने का अवसर मिला। विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए ऐसे आयोजन भारतीय परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों को जानने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की ओर से रामलीला को अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बनाने के लिए पारंपरिक मंचन के साथ आधुनिक तकनीकी प्रयोगों पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कमेटी के प्रवक्ता रवि जैन के अनुसार, इस वर्ष दर्शकों को रामकथा का अधिक जीवंत अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से मंचन की प्रस्तुति और तकनीकी पहलुओं को विशेष महत्व दिया गया है।
रामलीला जैसे पारंपरिक आयोजन में मंच सज्जा, दृश्य संयोजन, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि और कलाकारों के संवादों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन सभी तत्वों के समन्वय से कथा के भावनात्मक और नाटकीय पक्ष को दर्शकों तक प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है।
आधुनिक तकनीक का उपयोग पारंपरिक संस्कृति को नया स्वरूप देने के साथ उसे नई पीढ़ी के लिए अधिक सहज और आकर्षक बनाने में सहायक हो सकता है। हालांकि, रामलीला की मूल पहचान उसकी कथा, पात्रों की गरिमा, संवादों और धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों में निहित है। कमेटी का प्रयास इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दर्शकों को बेहतर अनुभव प्रदान करना है।
श्री धार्मिक लीला कमेटी के महासचिव धीरजधर गुप्ता ने बताया कि कमेटी इस वर्ष अपनी 103 वर्षों की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि रामलीला की तैयारियों, मंच सज्जा और विभिन्न झांकियों के माध्यम से रामकथा के आदर्शों को व्यापक स्तर पर दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
एक सदी से अधिक समय तक किसी सांस्कृतिक परंपरा का निरंतर आगे बढ़ना अपने आप में महत्वपूर्ण है। रामलीला जैसे आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक निरंतरता को भी मजबूत करते हैं। इनके माध्यम से विभिन्न पीढ़ियों को एक साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलता है।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की यह परंपरा रामायण के प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत करने के साथ भारतीय समाज में प्रचलित नैतिक और पारिवारिक मूल्यों को भी रेखांकित करती है। प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली रामलीला दर्शकों को भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में उनकी प्रतिष्ठा से परिचित कराती है।
महासचिव धीरजधर गुप्ता के अनुसार, आयोजन के माध्यम से दर्शकों तक रामकथा के संदेश पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं, प्रवक्ता रवि जैन ने पारंपरिक मंचन के साथ आधुनिक तकनीक के प्रयोगों को दर्शकों के अनुभव को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
माधवदास पार्क में आयोजित रामलीला में अनेक राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। रामलीला देखने वालों में केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक, लोकसभा सदस्य मनोज तिवारी, केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, दिल्ली सरकार के मंत्री मजिंदर सिंह सिरसा, राज्यसभा सदस्य अरुण सिंह तथा विश्व हिंदू परिषद के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष कपिल खन्ना सहित अन्य गणमान्य अतिथि शामिल रहे।
इन अतिथियों की उपस्थिति ने आयोजन की सार्वजनिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित किया। रामलीला भारतीय समाज में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा ऐसा आयोजन है, जिसमें विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ आकर रामकथा का आनंद लेते हैं।
लाल किला मैदान क्षेत्र में आयोजित रामलीला का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी विशेष माना जाता है। यहां होने वाले आयोजन राजधानी की धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे कार्यक्रम लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ सामाजिक मेलजोल और सामुदायिक सहभागिता के अवसर भी प्रदान करते हैं।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला का उद्देश्य केवल धार्मिक कथा का मंचन करना नहीं, बल्कि उसके माध्यम से समाज तक नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सत्य और मर्यादा का संदेश पहुंचाना भी है। रामायण के पात्रों के जीवन और उनके निर्णयों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जो वर्तमान समय में भी प्रासंगिक हैं।
श्रीराम का कर्तव्य के प्रति समर्पण, भरत का निस्वार्थ त्याग, लक्ष्मण की सेवा भावना, माता कौशल्या का वात्सल्य और परिवार के सदस्यों के बीच आपसी संबंधों की जटिलता रामकथा को केवल धार्मिक आख्यान तक सीमित नहीं रहने देते। ये प्रसंग जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने और अपने व्यवहार में सकारात्मक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
आज जब सामाजिक जीवन में संवाद, सहिष्णुता और पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता लगातार महसूस की जाती है, तब रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन अपनी विशेष भूमिका निभाते हैं। मंच पर प्रस्तुत घटनाओं के माध्यम से दर्शक यह समझ सकते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, संयम और कर्तव्य के मार्ग पर चलना कितना महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से भरत का चरित्र यह संदेश देता है कि सत्ता, पद और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर संबंधों की गरिमा और नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। श्रीराम और भरत का मिलन इस बात का प्रतीक है कि आपसी प्रेम और आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता से कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की ओर से आयोजित रामलीला ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि पारंपरिक धार्मिक मंचन भारतीय संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। रामायण के प्रसंगों को मंच पर देखकर दर्शक न केवल कथा का आनंद लेते हैं, बल्कि उसके भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को भी समझने का अवसर प्राप्त करते हैं।
चित्रकूट में श्रीराम और भरत के मिलन ने इस आयोजन को विशेष भावनात्मक आयाम प्रदान किया। भरत की विनम्रता और त्याग, श्रीराम की मर्यादा तथा लक्ष्मण की अपने बड़े भाई के प्रति निष्ठा ने दर्शकों को संबंधों की पवित्रता और कर्तव्य के महत्व का संदेश दिया।
103 वर्षों की परंपरा को आगे बढ़ा रही श्री धार्मिक लीला कमेटी का यह आयोजन राजधानी की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पारंपरिक रामलीला, प्रभावशाली अभिनय और आधुनिक तकनीकी प्रयोगों के समन्वय से दर्शकों तक रामकथा के संदेश पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
रामलीला के इन प्रसंगों का मूल संदेश यही है कि जीवन में पद और प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण सत्य, त्याग, प्रेम और कर्तव्य हैं। श्रीराम और भरत का संबंध इसका अनुपम उदाहरण है, जहां प्रेम के साथ मर्यादा और त्याग के साथ जिम्मेदारी भी समान रूप से दिखाई देती है। यही आदर्श रामकथा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रासंगिक बनाए रखते हैं और समाज को नैतिकता, सद्भाव तथा पारिवारिक एकता की दिशा में प्रेरित करते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


