यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री एवं पद्म विभूषण डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में किसी भी देश की वास्तविक प्रगति का आकलन उसकी तकनीकी संप्रभुता से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सेमीकंडक्टर और डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। यदि देश को अपनी जरूरतों के लिए लगातार विदेशी तकनीक और बाहरी डिजिटल अवसंरचना पर निर्भर रहना पड़े तो तकनीकी विकास की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं।
डॉ. जोशी गुरुवार को 21वें फिक्की उच्च शिक्षा शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत के सामने आज केवल तकनीक को अपनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि ऐसी तकनीकी क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है, जिसके आधार पर देश अपने अनुसंधान, उद्योग, शिक्षा, प्रशासन और रणनीतिक क्षेत्रों की जरूरतों को स्वयं पूरा कर सके।
उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में डेटा और कंप्यूटिंग क्षमता किसी भी देश की आर्थिक और रणनीतिक शक्ति के महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं। इसलिए भारत को अपने डेटा, कंप्यूटिंग संसाधनों और एआई अवसंरचना को लेकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
भारत के डेटा उत्पादन और डेटा सेंटर क्षमता में बड़ा अंतर
डॉ. जोशी ने कहा कि भारत दुनिया के करीब 20 प्रतिशत डेटा का सृजन करता है, जबकि वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता में देश की हिस्सेदारी लगभग तीन प्रतिशत है। उनके अनुसार, यह अंतर बताता है कि देश को डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में अभी लंबी दूरी तय करनी है।
भारत में इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, मोबाइल सेवाओं, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल सरकारी सेवाओं के विस्तार के साथ डेटा का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। आने वाले वर्षों में एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ डेटा की मात्रा और तेजी से बढ़ने की संभावना है।
ऐसे में देश के सामने केवल डेटा उत्पन्न करने की क्षमता बढ़ाने की नहीं, बल्कि डेटा को सुरक्षित रखने, संसाधित करने और उसका उपयोग करने के लिए पर्याप्त डेटा सेंटर तथा उच्च क्षमता वाली कंप्यूटिंग प्रणाली विकसित करने की भी चुनौती है।
घरेलू जीपीयू और कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने पर जोर
डॉ. जोशी ने घरेलू जीपीयू और डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने को तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम बताया। उन्होंने कहा कि एआई के विकास के लिए उच्च क्षमता वाली कंप्यूटिंग व्यवस्था आवश्यक है और इसमें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट यानी जीपीयू की महत्वपूर्ण भूमिका है।
एआई मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए बड़ी मात्रा में कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है। यदि ऐसी क्षमता के लिए देश को पूरी तरह विदेशी कंपनियों और तकनीक पर निर्भर रहना पड़े तो भविष्य में रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इसलिए भारत को घरेलू स्तर पर कंप्यूटिंग संसाधनों के विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, स्टार्टअप और सार्वजनिक संस्थाओं को अत्याधुनिक कंप्यूटिंग संसाधनों तक पर्याप्त पहुंच मिलना जरूरी है। इससे देश में अनुसंधान और नवाचार को भी गति मिल सकती है।
एआई में भारत के पास बड़ा अवसर
डॉ. जोशी ने कहा कि भारत एआई के क्षेत्र में निवेश और प्रतिभा के मामले में महत्वपूर्ण स्थिति रखता है। देश में चार करोड़ से अधिक आईटी पेशेवर हैं और वैश्विक एआई प्रतिभा में भी भारत की उल्लेखनीय हिस्सेदारी है।
उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल और युवा प्रतिभा आधार है। यदि इस मानव संसाधन को आधुनिक शिक्षा, अत्याधुनिक कंप्यूटिंग सुविधाओं और अनुसंधान के पर्याप्त अवसर मिलें तो भारत एआई के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
एआई का उपयोग स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, उद्योग, परिवहन, वित्त, रक्षा, प्रशासन और वैज्ञानिक अनुसंधान सहित अनेक क्षेत्रों में बढ़ रहा है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी है कि वह केवल एआई तकनीक का उपभोक्ता न बने, बल्कि इसके विकास, अनुसंधान और अनुप्रयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।
तकनीक के साथ नैतिक शिक्षा जरूरी
डॉ. जोशी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल तकनीकी दक्षता हासिल करना नहीं होना चाहिए। उन्होंने भारतीय शिक्षा परंपरा में व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समग्र विकास की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को भी विद्यार्थी के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तकनीकी रूप से सक्षम व्यक्ति तभी समाज और देश के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जब उसके भीतर जिम्मेदारी, नैतिकता और संवेदनशीलता भी हो। एआई और अन्य उन्नत तकनीकों के बढ़ते प्रभाव के बीच यह आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
उन्होंने शिक्षण संस्थानों से ऐसे विद्यार्थियों को तैयार करने का आह्वान किया जो तकनीक को समझने और इस्तेमाल करने के साथ उसके सामाजिक प्रभावों को भी समझें। तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों का संतुलन बनाए रखना भविष्य की शिक्षा व्यवस्था की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
एआई के दौर में बदल रही रोजगार की तस्वीर
फिक्की के महासचिव अनंत स्वरूप ने कहा कि एआई जिस तेजी से रोजगार और कौशल की प्रकृति बदल रहा है, उसके मुकाबले पाठ्यक्रमों में बदलाव की गति धीमी है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को भविष्य के रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुरूप अपने पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण प्रणाली को लगातार अपडेट करना होगा।
उन्होंने कहा कि आज केवल पारंपरिक डिग्री हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को डिजिटल कौशल, समस्या समाधान, रचनात्मक सोच, संचार क्षमता, डेटा विश्लेषण और नई तकनीकों के साथ काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।
एआई के आने से कुछ पारंपरिक कार्यों के स्वरूप में बदलाव हो सकता है, जबकि नए प्रकार के रोजगार भी पैदा होंगे। इसलिए उच्च शिक्षा व्यवस्था को विद्यार्थियों को बदलते रोजगार बाजार के लिए तैयार करने पर विशेष ध्यान देना होगा।
उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ा, अब गुणवत्ता पर जोर
अनंत स्वरूप ने कहा कि उच्च शिक्षा में नामांकन 4.5 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। हालांकि, सकल नामांकन अनुपात को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के 50 प्रतिशत लक्ष्य तक ले जाने के लिए सरकार के साथ निजी क्षेत्र और शिक्षण संस्थानों की भी भागीदारी आवश्यक होगी।
उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा का विस्तार केवल संस्थानों और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके साथ शिक्षा की गुणवत्ता, अनुसंधान, कौशल विकास, रोजगार क्षमता और उद्योग के साथ तालमेल को भी मजबूत करना होगा।
उच्च शिक्षा संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग को बढ़ाने से विद्यार्थियों को वास्तविक कार्यक्षेत्र की जरूरतों को समझने में मदद मिल सकती है। इंटर्नशिप, इंडस्ट्री प्रोजेक्ट, व्यावहारिक प्रशिक्षण और संयुक्त अनुसंधान जैसे मॉडल उच्च शिक्षा को रोजगार बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ सकते हैं।
विद्यार्थियों में धैर्य और लचीलापन विकसित करने की जरूरत
फिक्की उच्च शिक्षा समिति की चेयर और सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी की चांसलर डॉ. विद्या येरवडेकर ने कहा कि आज के विद्यार्थी प्रतिभाशाली और सक्षम हैं, लेकिन उनमें धैर्य और लचीलापन विकसित करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती दुनिया में विद्यार्थियों को केवल ज्ञान अर्जित करने के बजाय असफलताओं से सीखने, परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने और लगातार नई चीजें सीखने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
तकनीक के तेजी से बदलते दौर में आज सीखा गया कौशल कुछ वर्षों बाद बदल सकता है। इसलिए विद्यार्थियों के लिए आजीवन सीखने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी। उच्च शिक्षा संस्थानों को इसी मानसिकता को विकसित करने पर जोर देना होगा।
डिग्री से ज्यादा वास्तविक दक्षता जरूरी
नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमणियम ने कहा कि विद्यार्थियों को केवल डिग्री और योग्यता प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा व्यवस्था को वास्तविक दक्षता और क्षमता विकसित करने पर ध्यान देना होगा।
उन्होंने कहा कि किसी विद्यार्थी की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसके पास कौन-सी डिग्री है, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि वह अपने ज्ञान का वास्तविक परिस्थितियों में कितना प्रभावी उपयोग कर सकता है।
उन्होंने विद्यार्थियों को लचीला बनाने के लिए शिक्षण संस्थानों को भी स्वयं लचीला होने की आवश्यकता बताई। उनका कहना था कि शिक्षा संस्थानों को बदलती तकनीक, रोजगार की जरूरतों और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार अपने तरीके बदलने होंगे।
शिक्षा संस्थानों में भी बदलाव की जरूरत
एआई, डिजिटल तकनीक और वैश्विक रोजगार बाजार में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच विश्वविद्यालयों के सामने अपनी पारंपरिक कार्यप्रणाली को बदलने की चुनौती है। पाठ्यक्रम तैयार करने से लेकर परीक्षा प्रणाली, शोध और उद्योग से सहयोग तक कई क्षेत्रों में नई सोच की जरूरत है।
शिक्षण संस्थानों को विद्यार्थियों में केवल विषयगत ज्ञान के बजाय आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, टीमवर्क और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करने पर भी जोर देना होगा। इससे विद्यार्थी तेजी से बदलते रोजगार और कारोबारी वातावरण में बेहतर तरीके से काम कर सकेंगे।
विश्वविद्यालयों को मिले फिक्की उत्कृष्टता पुरस्कार
शिखर सम्मेलन के दौरान 12वें फिक्की उच्च शिक्षा उत्कृष्टता पुरस्कार भी प्रदान किए गए। विभिन्न श्रेणियों में देश के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया।
सार्वजनिक संस्थानों की श्रेणी में यूनिवर्सिटी ऑफ मुंबई को स्थापित विश्वविद्यालय और एनआईटी मेघालय को उभरते विश्वविद्यालय का सम्मान मिला। निजी संस्थानों में थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, पटियाला को स्थापित विश्वविद्यालय तथा प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु को उभरते विश्वविद्यालय का पुरस्कार प्रदान किया गया।
इन पुरस्कारों के जरिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों की उपलब्धियों, नवाचार, वैश्वीकरण, रोजगार क्षमता, अनुसंधान और डिजिटल परिवर्तन को पहचान देने का प्रयास किया गया।
वैश्वीकरण के लिए केआईआईटी और अशोका यूनिवर्सिटी सम्मानित
वैश्वीकरण की श्रेणी में केआईआईटी और अशोका यूनिवर्सिटी को संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया। वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालयों की पहचान मजबूत करने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने और विद्यार्थियों को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराने के क्षेत्र में किए गए प्रयासों को इस श्रेणी में महत्व दिया गया।
आज उच्च शिक्षा तेजी से वैश्विक स्वरूप ले रही है। विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग, संयुक्त शोध, छात्र आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रमों की उपलब्धता उच्च शिक्षा संस्थानों की वैश्विक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
रोजगार एवं उद्यमिता पर भी जोर
रोजगार एवं उद्यमिता की श्रेणी में इंदिरा गांधी दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी फॉर विमेन और विश्वकर्मा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पुणे को सम्मानित किया गया।
इस श्रेणी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उच्च शिक्षा से निकलने वाले विद्यार्थियों के लिए केवल नौकरी प्राप्त करना ही लक्ष्य नहीं, बल्कि नए रोजगार पैदा करने की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है। स्टार्टअप, इनोवेशन और उद्यमिता को बढ़ावा देने वाले विश्वविद्यालय युवाओं को आर्थिक गतिविधियों का सक्रिय भागीदार बना सकते हैं।
शोध एवं नवाचार में संस्थानों को सम्मान
शोध एवं नवाचार की श्रेणी में इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी और पंडित दीनदयाल एनर्जी यूनिवर्सिटी को पुरस्कार मिला। अनुसंधान और नवाचार को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।
भारत को वैश्विक तकनीकी शक्ति बनाने के लिए विश्वविद्यालयों में शोध क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा मिलने से नई तकनीकों और उत्पादों के विकास में तेजी आ सकती है।
डिजिटल परिवर्तन और छात्र सफलता
डिजिटल परिवर्तन और छात्र सफलता की श्रेणी में गुजरात टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी तथा थापर इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी को सम्मानित किया गया।
डिजिटल तकनीक ने शिक्षा के तरीके में बड़ा बदलाव किया है। ऑनलाइन लर्निंग, डिजिटल कंटेंट, वर्चुअल लैब, एआई आधारित शिक्षण और डेटा आधारित छात्र सहायता जैसे माध्यम शिक्षा को अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बनाने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि, डिजिटल शिक्षा की सफलता के लिए तकनीक के साथ प्रशिक्षित शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण सामग्री और विद्यार्थियों तक समान पहुंच भी जरूरी है।
उत्कृष्टता के साथ संवेदना जरूरी
फिक्की उच्च शिक्षा समिति के सह-अध्यक्ष और थापर इंस्टीट्यूट के कुलपति प्रो. (डॉ.) पद्मकुमार नायर ने कहा कि उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता के साथ संवेदना का संतुलन जरूरी है। उन्होंने कहा, “करुणा बिना उत्कृष्टता के लाड़ बन सकती है और उत्कृष्टता बिना करुणा के शोषण।”
उनके इस विचार को उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता के रूप में देखा गया। विश्वविद्यालयों से अपेक्षा है कि वे विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ सामाजिक रूप से जिम्मेदार नागरिक भी तैयार करें।
प्रमुख शिक्षाविदों को विशेष सम्मान
शिखर सम्मेलन में अशोका यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. ऋषिकेशा टी. कृष्णन को पर्सनैलिटी ऑफ द ईयर अवॉर्ड 2026 प्रदान किया गया। डॉ. रामदास एम. पाई को लेजेंडरी इंस्टीट्यूशन बिल्डर अवॉर्ड और प्रो. सुधीर के. जैन को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड 2026 से सम्मानित किया गया।
इन सम्मानों के माध्यम से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय तक योगदान देने वाले शिक्षाविदों और संस्थान निर्माताओं के कार्यों को पहचान दी गई।
तकनीक, शिक्षा और मानव मूल्यों का संतुलन बने चुनौती
फिक्की उच्च शिक्षा शिखर सम्मेलन में सामने आए विचारों से स्पष्ट है कि भारत के सामने उच्च शिक्षा और तकनीकी विकास के क्षेत्र में एक साथ कई अवसर और चुनौतियां हैं। एआई और डिजिटल तकनीक देश के विकास को नई गति दे सकती है, लेकिन इसके लिए मजबूत डिजिटल अवसंरचना, प्रशिक्षित मानव संसाधन और जिम्मेदार तकनीकी उपयोग जरूरी है।
तकनीकी संप्रभुता के लिए घरेलू कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा सेंटर, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और शोध सुविधाओं का विस्तार करना होगा। वहीं, इन तकनीकों का प्रभावी उपयोग करने के लिए शिक्षा व्यवस्था को भी तेजी से बदलना होगा।
भविष्य की शिक्षा होगी कौशल और नवाचार केंद्रित
भारत के लिए अगले चरण की शिक्षा व्यवस्था में ज्ञान, कौशल, अनुसंधान, उद्यमिता और नैतिक मूल्यों का संतुलन महत्वपूर्ण होगा। विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों को ऐसी क्षमताएं देनी होंगी, जो उन्हें बदलती तकनीक के साथ लगातार सीखने और खुद को विकसित करने में सक्षम बनाएं।
एआई के दौर में रटने और केवल डिग्री हासिल करने की बजाय समस्या समाधान, रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और व्यावहारिक कौशल की मांग बढ़ेगी। इसके लिए विश्वविद्यालयों, उद्योगों और सरकार के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक होगा।
कुल मिलाकर, 21वें फिक्की उच्च शिक्षा शिखर सम्मेलन में तकनीकी संप्रभुता से लेकर एआई, डिजिटल अवसंरचना, कौशल विकास, नैतिक शिक्षा, अनुसंधान, रोजगार और उद्यमिता तक उच्च शिक्षा के व्यापक भविष्य पर मंथन हुआ। डॉ. मुरली मनोहर जोशी का तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत की अगली विकास यात्रा में शिक्षा और तकनीक को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखना होगा।
भारत यदि अपनी विशाल युवा आबादी, आईटी प्रतिभा, उच्च शिक्षा नेटवर्क और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत अनुसंधान एवं घरेलू तकनीकी क्षमता से जोड़ने में सफल होता है तो वह न केवल एआई और डिजिटल क्षेत्र में वैश्विक भूमिका मजबूत कर सकता है, बल्कि विकसित भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य को भी नई गति दे सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


