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- 12h ago
मथुरा। विद्यार्थियों को कानून की जानकारी देने और उन्हें उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों से परिचित कराने के उद्देश्य से अब जिला न्यायालय में कार्यरत न्यायिक अधिकारी विद्यालयों का रुख करेंगे। उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ के निर्देशों के क्रम में जिला जज ने जिला न्यायालय में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों की अलग-अलग विद्यालयों में ड्यूटी लगाई है। जिले के कुल 34 विद्यालयों में 34 न्यायिक अधिकारी पहुंचकर विद्यार्थियों को विधिक जानकारी देंगे।
इस कार्यक्रम को लेकर जिला स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। न्यायिक अधिकारियों को आवंटित विद्यालयों में जाकर विद्यार्थियों से संवाद करने तथा उन्हें कानून से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। माना जा रहा है कि इस पहल के माध्यम से विद्यार्थियों को बाल अधिकार, शिक्षा का अधिकार, महिला एवं बाल सुरक्षा, साइबर अपराध, यातायात नियम, नशे के दुष्प्रभाव, घरेलू हिंसा, कानूनी सहायता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों जैसे विषयों की जानकारी दी जाएगी।
उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की पहल के तहत न्यायिक अधिकारियों को विद्यालयवार जिम्मेदारी दी गई है। प्रत्येक न्यायिक अधिकारी निर्धारित विद्यालय में पहुंचकर विद्यार्थियों के बीच विधिक जागरूकता कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल कानून की धाराएं बताना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को यह समझाना भी है कि किसी परिस्थिति में उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी कहां से और किस प्रकार मिल सकती है।
विद्यालयों में न्यायिक अधिकारियों के पहुंचने से विद्यार्थियों को सीधे न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अधिकारी से संवाद करने का अवसर भी मिलेगा। छात्र-छात्राएं कानून से संबंधित अपने सवाल पूछ सकेंगे और न्यायिक अधिकारी उन्हें कानूनी प्रावधानों के बारे में जानकारी दे सकेंगे।
इस पूरी कवायद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल विद्यालयों के चयन को लेकर खड़ा हो रहा है। उपलब्ध सूची पर नजर डालें तो राजकीय माध्यमिक विद्यालयों को इसमें स्थान नहीं मिला है। वहीं दूसरी ओर एडेड और प्राइवेट विद्यालयों को प्राथमिकता दिए जाने की बात सामने आ रही है।
यही स्थिति अब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और विद्यालयों के चयन की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर रही है। जब कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में विधिक जागरूकता बढ़ाना है तो ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों को इस पहल से बाहर क्यों रखा गया?
जिले में बड़ी संख्या में विद्यार्थी राजकीय विद्यालयों में अध्ययनरत हैं। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं भी समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उन्हें भी अपने अधिकारों, कानून तथा विधिक सहायता की जानकारी की उतनी ही आवश्यकता है जितनी अन्य विद्यालयों के विद्यार्थियों को।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि न्यायिक अधिकारियों को विद्यार्थियों के बीच भेजने की पहल की गई है तो विद्यालयों के चयन में सभी वर्ग के विद्यालयों को समान अवसर क्यों नहीं दिया गया? क्या सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए अलग से कोई कार्यक्रम प्रस्तावित है? यदि है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
विद्यालयों की सूची सामने आने के बाद जिला विद्यालय निरीक्षक मथुरा राघवेंद्र सिंह की भूमिका और मंशा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि इन सवालों पर संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना अभी बाकी है। सवाल यह है कि विद्यालयों के चयन की प्रक्रिया किस आधार पर तय की गई और राजकीय माध्यमिक विद्यालयों को सूची में शामिल न करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया।
क्या विद्यालयों का चयन किसी निर्धारित मानक के आधार पर हुआ है? क्या सभी विद्यालयों से प्रस्ताव मांगे गए थे? क्या राजकीय विद्यालयों को भी कार्यक्रम में शामिल करने का प्रयास किया गया? और यदि नहीं किया गया तो इसका कारण क्या है?
इन सवालों का जवाब शिक्षा विभाग की ओर से स्पष्ट किया जाना जरूरी है, ताकि पूरी प्रक्रिया को लेकर किसी प्रकार की भ्रांति न रहे।
विधिक जागरूकता का मूल उद्देश्य समाज के अधिक से अधिक लोगों तक कानून की जानकारी पहुंचाना है। विद्यार्थी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में कार्यक्रम को कुछ विद्यालयों तक सीमित रखने के बजाय जिले के सभी वर्ग के विद्यालयों तक पहुंचाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
विशेष रूप से सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच न्यायिक अधिकारियों की मौजूदगी का अलग महत्व हो सकता है। ग्रामीण और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक विद्यार्थी पहली बार किसी न्यायिक अधिकारी से सीधे संवाद कर सकते हैं। उन्हें कानूनी सहायता, बाल अधिकार और सुरक्षा संबंधी प्रावधानों की जानकारी मिल सकती है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को विभिन्न कानूनी विषयों से अवगत कराया जा सकता है। इनमें प्रमुख रूप से—
जैसे विषयों पर विद्यार्थियों को जानकारी दी जा सकती है।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थियों और न्यायिक अधिकारियों के बीच सीधा संवाद हो सकता है। आमतौर पर विद्यार्थी न्यायालय की प्रक्रिया को दूर से देखते हैं, लेकिन न्यायिक अधिकारी जब उनके विद्यालय में पहुंचेंगे तो उन्हें सीधे सवाल पूछने का अवसर मिलेगा।
कानून से जुड़े विषयों पर विद्यार्थियों की जिज्ञासा भी सामने आ सकती है। इससे उन्हें न्याय व्यवस्था को समझने में मदद मिलेगी और कानून के प्रति उनके मन में मौजूद भ्रम दूर हो सकते हैं।
विद्यालयों के चयन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यह मांग भी सामने आ सकती है कि शिक्षा विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि 34 विद्यालयों का चयन किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
यदि इसके लिए कोई मानक तय किया गया था तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि विद्यालयों से प्रस्ताव या आवेदन मांगे गए थे तो यह भी बताया जाना चाहिए कि कितने विद्यालयों ने आवेदन किया था और किन आधारों पर अंतिम सूची तैयार की गई।
इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होगी और किसी भी प्रकार के पक्षपात की आशंका समाप्त हो सकेगी।
अब एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए बाद में अलग से विधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। यदि ऐसा कोई प्रस्ताव है तो शिक्षा विभाग को इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
क्योंकि कानून की जानकारी किसी एक वर्ग या किसी एक प्रकार के विद्यालय तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी समाज के समान रूप से महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
न्यायिक अधिकारियों को विद्यालयों में भेजने की पहल निश्चित रूप से विद्यार्थियों को कानून से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे बच्चों में कानूनी जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझने में मदद मिल सकती है।
लेकिन इसी के साथ विद्यालयों के चयन की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिलना भी जरूरी है। 34 विद्यालयों में न्यायिक अधिकारी भेजे जा रहे हैं, लेकिन राजकीय माध्यमिक विद्यालय इस सूची से बाहर क्यों हैं—यह सवाल अब चर्चा का विषय बन गया है।
यदि चयन पूरी तरह निर्धारित मानकों के आधार पर हुआ है तो शिक्षा विभाग को उन मानकों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। इससे जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों का भी जवाब मिल सकेगा।
अब देखना होगा कि इन सवालों पर शिक्षा विभाग और जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की ओर से क्या स्पष्टीकरण सामने आता है। फिलहाल न्यायिक अधिकारियों के विद्यालयों में पहुंचने की पहल से जहां विद्यार्थियों को कानून की जानकारी मिलने की उम्मीद है, वहीं विद्यालयों के चयन को लेकर उठे सवालों ने कार्यक्रम की पारदर्शिता पर चर्चा शुरू कर दी है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


