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- 12h ago
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में बारिश के दौरान महिपालपुर और रंगपुरी के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-48 पर लगातार होने वाले जलभराव और इसके कारण पैदा होने वाली यातायात अव्यवस्था को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने संबंधित सरकारी एजेंसियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि समस्या के समाधान को लेकर कई दौर की बैठकें होने के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कौन-सा काम किस एजेंसी को करना है और उसे पूरा करने की समयसीमा क्या होगी।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि संबंधित विभागों और एजेंसियों के साथ आगे बैठकें आयोजित कर प्रत्येक अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपाय के लिए स्पष्ट रूप से जिम्मेदारी तय की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि अगली सुनवाई तक प्रत्येक कार्य की निर्धारित समयसीमा के साथ रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बैठकें आयोजित करना और कागजी रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट के समक्ष यह स्थिति सामने आई कि पहले के निर्देशों के बाद विभिन्न विभागों के बीच व्यापक स्तर पर बैठकें हुईं और बड़ी मात्रा में दस्तावेज तैयार किए गए, लेकिन जमीन पर समस्या के समाधान के लिए जिम्मेदारी तय करने और काम शुरू करने की ठोस स्थिति दिखाई नहीं दे रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष नाराजगी जताई कि विभिन्न एजेंसियां बैठकें तो कर रही हैं, लेकिन किसी ठोस कार्ययोजना में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कौन-सी एजेंसी किस काम के लिए जिम्मेदार होगी। अदालत के अनुसार समस्या का समाधान तभी संभव है जब जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ काम पूरा करने की स्पष्ट समयसीमा भी निर्धारित हो।
महिपालपुर क्षेत्र में जलभराव की समस्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नजदीक है और राष्ट्रीय राजमार्ग-48 के माध्यम से दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ने वाले प्रमुख मार्ग का हिस्सा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले भी इस स्थान के महत्व को देखते हुए संबंधित विभागों को प्रभावी समाधान तलाशने का निर्देश दिया था।
महिपालपुर-रंगपुरी क्षेत्र में जलभराव की समस्या के समाधान के लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने विभिन्न विभागों और एजेंसियों को एक साथ काम करने की जरूरत बताई है। इनमें दिल्ली नगर निगम (एमसीडी), दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) शामिल हैं।
जरूरत पड़ने पर एयरपोर्ट से संबंधित एजेंसी और जीएमआर समूह को भी प्रक्रिया में शामिल करने की बात कही गई है। अदालत का जोर इस बात पर है कि सभी संबंधित पक्ष आपस में समन्वय बनाकर महिपालपुर और रंगपुरी के बीच एनएच-48 पर प्रभावी तूफानी जल निकासी व्यवस्था विकसित करने की व्यवहार्यता पर ठोस प्रस्ताव तैयार करें।
इस मामले में 25 जुलाई 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने महिपालपुर और रंगपुरी के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-48 पर कार्यात्मक स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम बनाने की मांग से संबंधित याचिका पर सुनवाई की थी। अदालत ने क्षेत्र में बारिश के दौरान होने वाले जलभराव को दर्शाने वाली तस्वीरों का भी संज्ञान लिया था।
अदालत ने क्षेत्र की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव की निगरानी में गठित विशेष कार्यबल को संबंधित सभी हितधारकों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि बैठक में एमसीडी, डीडीए, एनएचएआई, दिल्ली जल बोर्ड, डीएमआरसी और पीडब्ल्यूडी के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर जीएमआर समूह को भी शामिल किया जाए।
कोर्ट ने विशेष कार्यबल से यह भी कहा था कि वह यह जांचे कि क्षेत्र में जलभराव रोकने के लिए स्टॉर्म वाटर ड्रेन का निर्माण व्यावहारिक रूप से किस प्रकार किया जा सकता है और इसके लिए संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर उचित प्रस्ताव तैयार किया जाए।
महिपालपुर में समस्या केवल पानी जमा होने तक सीमित नहीं है। भारी बारिश के दौरान सड़क पर पानी भरने से वाहनों की रफ्तार प्रभावित होती है और कई बार लंबा यातायात जाम लग जाता है। एयरपोर्ट, दिल्ली और गुरुग्राम के बीच आवाजाही करने वाले यात्रियों तथा स्थानीय लोगों को इसका सीधा असर झेलना पड़ता है।
हालिया सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इसी स्थिति को गंभीरता से लेते हुए कहा कि महिपालपुर में नियमित जलभराव और यातायात जाम का समाधान तेजी से किया जाना चाहिए। अदालत ने एजेंसियों को चेतावनी दी कि यदि वे समस्या का समाधान करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती हैं तो अदालत कड़े निर्देश जारी करने पर मजबूर हो सकती है।
अदालत की नाराजगी केवल जलभराव तक सीमित नहीं रही। हालिया सुनवाई के दौरान कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि संबंधित एजेंसियां समस्या के समाधान के लिए आगे नहीं आतीं और जिम्मेदारी तय कर प्रभावी कदम नहीं उठातीं तो एयरोसिटी क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों को रोकने जैसे कड़े कदम पर भी विचार किया जा सकता है।
कोर्ट की यह टिप्पणी इस लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि महिपालपुर-एयरोसिटी क्षेत्र में तेजी से हुए विकास और राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास बढ़ती गतिविधियों के बीच जल निकासी व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने का सवाल लगातार उठ रहा है।
दिल्ली में जलभराव और ड्रेनेज से जुड़े मामलों में एजेंसियों के बीच जिम्मेदारी को लेकर खींचतान पहले भी अदालत के सामने आती रही है। मार्च 2026 के एक अन्य मामले में भी दिल्ली हाईकोर्ट ने अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय की समस्या को रेखांकित करते हुए संबंधित अधिकारियों से ड्रेनेज और सीवेज व्यवस्था की स्थिति का विस्तृत चार्ट प्रस्तुत करने को कहा था।
अदालत के पुराने आदेशों में भी यह मुद्दा सामने आया है कि दिल्ली में ड्रेनेज व्यवस्था कई अलग-अलग एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में होने के कारण समन्वय की कमी पैदा होती है। 2024 में हाईकोर्ट ने भी कहा था कि विभिन्न एजेंसियों के बीच अधिकारों के बंटवारे के कारण ड्रेनेज व्यवस्था के प्रबंधन में कठिनाइयां सामने आती हैं।
महिपालपुर मामले में अदालत की मौजूदा चिंता का मुख्य केंद्र यही दिखाई देता है कि बैठकों, रिपोर्टों और प्रस्तावों के बजाय अब वास्तविक स्तर पर काम शुरू हो। अदालत चाहती है कि संबंधित विभाग स्पष्ट रूप से बताएं कि जलभराव रोकने के लिए कौन-सा अल्पकालिक कदम उठाया जाएगा, कौन-सा स्थायी समाधान तैयार किया जाएगा, उसका जिम्मेदार विभाग कौन होगा और उसे कब तक पूरा किया जाएगा।
यानी अब केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि समस्या के समाधान के लिए बैठक हो चुकी है। संबंधित एजेंसियों को अपनी जिम्मेदारी, प्रस्तावित काम और उसकी समयसीमा स्पष्ट करनी होगी।
महिपालपुर का भौगोलिक और परिवहन संबंधी महत्व इस मामले को और गंभीर बनाता है। यह इलाका दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास स्थित है और एनएच-48 के जरिए गुरुग्राम की ओर जाने वाले प्रमुख यातायात मार्ग से जुड़ा है। ऐसे में सड़क पर पानी जमा होने का असर केवल स्थानीय आवागमन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल्ली-गुरुग्राम यातायात और एयरपोर्ट की ओर जाने वाले यात्रियों पर भी पड़ता है।
इसी महत्व को देखते हुए जुलाई में हाईकोर्ट ने भी क्षेत्र को महत्वपूर्ण बताते हुए संबंधित एजेंसियों को एक साथ बैठकर समाधान तलाशने का निर्देश दिया था।
अब संबंधित एजेंसियों के सामने अदालत के निर्देशों के अनुरूप ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करने की चुनौती है। मुख्य सचिव की निगरानी में होने वाली बैठकों के बाद यह स्पष्ट करना होगा कि जलभराव की समस्या के स्थायी समाधान के लिए किस विभाग को क्या जिम्मेदारी दी गई है।
अदालत ने यह भी अपेक्षा की है कि प्रस्तावित उपायों की समयसीमा स्पष्ट हो। इससे यह तय करना आसान होगा कि केवल योजना तैयार की गई है या वास्तव में उस पर काम भी शुरू हुआ है।
30 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत के सामने संबंधित एजेंसियों की प्रगति रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी। यदि रिपोर्ट में फिर से केवल बैठकों और प्रस्तावों का विवरण सामने आता है और जमीनी कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी नहीं होती, तो अदालत की अगली प्रतिक्रिया पर सभी की नजर रहेगी।
महिपालपुर जलभराव का मामला अब सिर्फ बारिश के पानी की निकासी का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय, जिम्मेदारी तय करने और तय समयसीमा में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने की प्रशासनिक क्षमता की भी परीक्षा बन गया है।


