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- 12h ago
नई दिल्ली। बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार से नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट और उनकी पहुंच के संबंध में वैधानिक व्यवस्था बनाने की संभावनाओं पर विचार करने को कहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भारत में लागू कानूनों और नाबालिगों से संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप अपनी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए।
मामला 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया अकाउंट बनाए जाने और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म की सदस्यता लेने से जुड़ा है। अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठाया गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाते समय प्रत्येक यूजर को प्लेटफॉर्म की शर्तों एवं नियमों को स्वीकार करना पड़ता है। ऐसे में नाबालिगों की कानूनी स्थिति और उनके द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ किए जाने वाले ऐसे समझौतों को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच बच्चों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट और प्रभावी कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाना अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गया है। बच्चे और किशोर शिक्षा, जानकारी, मनोरंजन, वीडियो, गेमिंग, ऑनलाइन समुदायों और संवाद के लिए भी इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में अदालत के सामने यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि नाबालिगों को सोशल मीडिया तक किस सीमा तक स्वतंत्र पहुंच दी जाए और यदि उन्हें पहुंच दी जाती है तो उनकी उम्र, अभिभावकों की सहमति और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े नियम किस प्रकार लागू किए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह देखने को कहा है कि मौजूदा इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंटरमीडियरी रूल्स के तहत इस विषय में वैधानिक व्यवस्था तैयार की जा सकती है या इसके लिए किसी अन्य कानूनी कदम की जरूरत होगी।
अदालत की सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की सदस्यता के लिए 18 वर्ष की न्यूनतम उम्र से संबंधित व्यवस्था पर भी विचार किए जाने का संकेत सामने आया है। यदि भविष्य में ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है तो सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यूजर की उम्र निर्धारित करने और नाबालिगों के अकाउंट से संबंधित अलग व्यवस्था लागू करने की चुनौती भी सामने आएगी।
हालांकि, इस स्तर पर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर तत्काल और पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। मामले में केंद्र सरकार का पक्ष और संभावित कानूनी व्यवस्था आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण रहेगी।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले पर विचार करने की बात कही। सरकार की ओर से यह संभावना भी सामने रखी गई कि नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए माता-पिता या अभिभावकों की सहमति आधारित व्यवस्था बनाई जा सकती है।
ऐसी व्यवस्था में यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि अभिभावक की सहमति किस तरीके से ली जाए, उसकी पुष्टि कैसे हो और यह सुनिश्चित कैसे किया जाए कि किसी बच्चे की उम्र या अभिभावक की पहचान से संबंधित जानकारी का दुरुपयोग न हो।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के सामने उम्र की पुष्टि और बच्चों की निजता के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी रहेगी। यदि उम्र सत्यापन के लिए अधिक व्यक्तिगत जानकारी मांगी जाती है तो उससे बच्चों के निजी डेटा की सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ सकता है।
याचिका में बच्चों को ऑनलाइन गूमिंग, साइबरबुलिंग, यौन शोषण, व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और उम्र के अनुरूप न होने वाली सामग्री से बचाने के लिए मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की गई है।
ऑनलाइन गूमिंग के मामलों में अपराधी सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बच्चों से संपर्क स्थापित कर धीरे-धीरे उनका विश्वास हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। इसी तरह साइबरबुलिंग के कारण बच्चों को ऑनलाइन उत्पीड़न, धमकी, अपमानजनक टिप्पणियों और लगातार परेशान किए जाने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
सोशल मीडिया पर बच्चों की गतिविधियों और व्यक्तिगत जानकारी को लेकर भी सुरक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण है। फोटो, वीडियो, स्कूल की जानकारी, लोकेशन, संपर्क विवरण और अन्य निजी सूचनाएं यदि असावधानी से सार्वजनिक हो जाएं तो उनका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री में बच्चों और किशोरों की उम्र के अनुरूप न होने वाली सामग्री भी एक प्रमुख चिंता है। अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर वीडियो, पोस्ट, विज्ञापन और अन्य डिजिटल सामग्री लगातार सामने आती रहती है। ऐसे में केवल अकाउंट बनाने की उम्र निर्धारित करना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि बच्चों को किस प्रकार की सामग्री दिखाई जाती है, इसकी निगरानी और नियंत्रण का मुद्दा भी महत्वपूर्ण होगा।
विशेषज्ञों और अभिभावकों के सामने यह सवाल भी रहेगा कि उम्र आधारित प्रतिबंध लागू होने के बाद बच्चों को प्लेटफॉर्म तक पहुंच से रोकने के लिए तकनीकी व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी। कई बच्चे अपनी सही उम्र दर्ज नहीं करते हैं, इसलिए केवल जन्मतिथि दर्ज कराने वाली व्यवस्था को प्रभावी बनाना अपने आप में चुनौती हो सकता है।
यदि केंद्र सरकार इस दिशा में वैधानिक व्यवस्था तैयार करती है तो सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी भी बढ़ सकती है। प्लेटफॉर्म को नाबालिग यूजर की पहचान, उम्र सत्यापन, अभिभावकीय सहमति, शिकायत निवारण, अनुचित सामग्री की रोकथाम और बच्चों के डेटा की सुरक्षा से संबंधित प्रक्रियाओं को मजबूत करना पड़ सकता है।
इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि उम्र सत्यापन की प्रक्रिया बच्चों की निजता के अधिकार को प्रभावित न करे। किसी भी व्यवस्था में सुरक्षा और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर केवल सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है। अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बच्चों को सोशल मीडिया पर अपनी निजी जानकारी साझा नहीं करने, अनजान लोगों से सावधानी बरतने, संदिग्ध लिंक पर क्लिक नहीं करने और किसी भी प्रकार के ऑनलाइन उत्पीड़न की स्थिति में तुरंत माता-पिता या किसी विश्वसनीय व्यक्ति को जानकारी देने के लिए जागरूक किया जा सकता है।
कम उम्र के बच्चों के मामले में अभिभावक यह भी देख सकते हैं कि बच्चे किन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं, किस प्रकार की सामग्री देख रहे हैं और किन लोगों से ऑनलाइन संपर्क में हैं। हालांकि, ऐसी निगरानी करते समय बच्चों की निजता और विश्वास का भी ध्यान रखना जरूरी होगा।
पिछले कुछ वर्षों में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ने के साथ बच्चों का डिजिटल दुनिया से जुड़ाव भी तेजी से बढ़ा है। सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों को शिक्षा, जानकारी और रचनात्मक गतिविधियों के अवसर मिलते हैं, लेकिन इसके साथ कई प्रकार के जोखिम भी जुड़े हैं।
इसी वजह से दुनिया के कई हिस्सों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर उम्र सीमा, अभिभावकीय सहमति, उम्र सत्यापन और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर चर्चा चलती रही है। भारत में भी अब यह विषय कानूनी और नीतिगत स्तर पर अधिक महत्वपूर्ण होता दिखाई दे रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद अब निगाहें केंद्र सरकार की ओर हैं कि वह नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर किस प्रकार की कानूनी या नियामकीय व्यवस्था पर विचार करती है। सरकार की ओर से माता-पिता की सहमति आधारित मॉडल की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
फिलहाल 18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर देशव्यापी तत्काल प्रतिबंध लागू नहीं हुआ है। आगे की सुनवाई में अदालत के समक्ष केंद्र सरकार का जवाब, प्रस्तावित व्यवस्था और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलू सामने आ सकते हैं।
मामले का व्यापक असर सोशल मीडिया कंपनियों, बच्चों, अभिभावकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से जुड़े नियमों पर पड़ सकता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार और अदालत के स्तर पर किस प्रकार की संतुलित व्यवस्था सामने आती है।


