17 सितंबर से मथुरा में शुरू होगा सेवा संकल्प अभियान, 5 लाख दीपों से जगमगाएंगे धार्मिक स्थल
- 10h ago
नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कारोबारी जगत से एक बड़ी सकारात्मक खबर सामने आई है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के ताजा बिजनेस कॉन्फिडेंस सर्वे में भारतीय कंपनियों ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही को लेकर पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और आशावादी रुख दिखाया है।
सीआईआई के बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स (BCI) में दूसरी तिमाही के दौरान उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। यह पहली तिमाही के 60.8 अंक से बढ़कर 66.0 अंक पर पहुंच गया। यानी कारोबारी विश्वास में एक तिमाही के भीतर 5.2 अंकों की बढ़ोतरी हुई है।
यह उछाल ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार संबंधी अनिश्चितताएं और कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारतीय कंपनियों का भविष्य को लेकर भरोसा बढ़ना देश की घरेलू आर्थिक मजबूती की ओर संकेत करता है।
सीआईआई के सर्वे के मुताबिक भारतीय उद्योग जगत के बढ़ते आत्मविश्वास के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों में घरेलू मांग की मजबूती शामिल है।
सर्वेक्षण में शामिल 61 प्रतिशत कंपनियों ने दूसरी तिमाही में घरेलू मांग में वृद्धि की उम्मीद जताई है। इसके विपरीत केवल 9.6 प्रतिशत कंपनियों ने मांग में कमी या नरमी की आशंका व्यक्त की।
यह अंतर बताता है कि उद्योग जगत आने वाले महीनों में भारतीय बाजार को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार मान रहा है।
खास बात यह है कि 20 प्रतिशत से अधिक मांग वृद्धि की उम्मीद रखने वाली कंपनियों का अनुपात भी पहली तिमाही के 12.9 प्रतिशत से बढ़कर दूसरी तिमाही में 16 प्रतिशत हो गया है।
इसका अर्थ है कि कंपनियों का भरोसा केवल सामान्य सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़ा कारोबारी वर्ग अपेक्षाकृत तेज मांग वृद्धि की उम्मीद कर रहा है।
सीआईआई का बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स कारोबारी जगत के मौजूदा और भविष्य के आर्थिक माहौल को लेकर धारणा को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
दूसरी तिमाही में इसके 66.0 अंक पर पहुंचने से पता चलता है कि कंपनियों का कारोबारी माहौल को लेकर भरोसा पहली तिमाही की तुलना में काफी मजबूत हुआ है।
पहली तिमाही में यह सूचकांक 60.8 अंक पर था। केवल एक तिमाही में 5.2 अंकों की बढ़ोतरी को उद्योग जगत के नजरिए में महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
सीआईआई के अनुसार, यह सुधार केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों, भौगोलिक इलाकों और अलग-अलग आकार की कंपनियों से मिले जवाबों में सकारात्मक धारणा दिखाई दी है।
सीआईआई के 136वें त्रैमासिक बिजनेस आउटलुक सर्वे के निष्कर्षों पर यह रिपोर्ट आधारित है। सर्वे में विभिन्न उद्योग क्षेत्रों, भौगोलिक क्षेत्रों और अलग-अलग आकार की 240 से अधिक कंपनियों ने भाग लिया।
इस व्यापक भागीदारी के कारण सर्वेक्षण से सामने आई कारोबारी धारणा को भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर के मौजूदा मूड का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।
सर्वे में कंपनियों से वर्तमान कारोबारी परिस्थितियों के साथ-साथ आने वाली तिमाहियों में मांग, उत्पादन, क्षमता उपयोग, लागत, रोजगार और निवेश जैसे मुद्दों को लेकर उनकी अपेक्षाएं जानी गईं।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स में आई तेज वृद्धि को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और लचीलेपन से जोड़ते हुए कहा कि भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी मजबूती बनाए रखी है।
उनके अनुसार घरेलू मांग, स्थिर व्यापक आर्थिक संकेतक और कारोबारी गतिविधियों में लगातार सुधार ने उद्योग जगत का भरोसा मजबूत किया है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार की सहयोगात्मक और सुविधाजनक नीतियों से उत्पादन तथा नए ऑर्डरों के विस्तार को गति मिलने की उम्मीद है।
कारोबारी भरोसे में यह सुधार ऐसे समय आया है जब भारत के आर्थिक विकास के आंकड़े भी मजबूत तस्वीर पेश कर रहे हैं।
नवीनतम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह दर 6.9 प्रतिशत थी।
इस तरह अर्थव्यवस्था की विकास दर में भी उल्लेखनीय मजबूती दिखाई दी है।
सीआईआई के सर्वे के आंकड़े इस बात को समर्थन देते हैं कि जीडीपी की तेज वृद्धि केवल सांख्यिकीय आंकड़ों तक सीमित नहीं है। उद्योगों की मांग, उत्पादन और कारोबारी गतिविधियों में भी सकारात्मक रुझान देखने को मिल रहा है।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र ने 9.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। पिछले वर्ष की समान अवधि में इसकी वृद्धि दर 8.3 प्रतिशत थी।
वहीं सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर बढ़कर 10 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 8 प्रतिशत थी।
विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में एक साथ मजबूत वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक ओर विनिर्माण गतिविधियां उत्पादन और निवेश को गति देती हैं, वहीं सेवा क्षेत्र रोजगार और घरेलू आर्थिक गतिविधियों का बड़ा आधार है।
सीआईआई सर्वे में सबसे महत्वपूर्ण संकेत एक्सपेक्टेशन इंडेक्स (EI) से मिला है।
दूसरी तिमाही में एक्सपेक्टेशन इंडेक्स पहली तिमाही के 60.6 अंक से बढ़कर 67.7 अंक हो गया। यानी भविष्य के कारोबारी माहौल को लेकर कंपनियों का भरोसा काफी तेजी से बढ़ा है।
इसके मुकाबले करंट सिचुएशन इंडेक्स (CSI) 61.2 अंक से बढ़कर 62.6 अंक हुआ।
दोनों सूचकांकों के बीच का अंतर बताता है कि कंपनियां मौजूदा स्थिति की तुलना में आने वाले समय को अधिक बेहतर मान रही हैं।
यह उद्योग जगत के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि भविष्य के कारोबारी माहौल को लेकर बढ़ता भरोसा अक्सर कंपनियों के निवेश, उत्पादन विस्तार और रोजगार योजनाओं को प्रभावित करता है।
मांग में सुधार की उम्मीद का सीधा प्रभाव उत्पादन क्षमता पर पड़ सकता है।
सर्वेक्षण में 51.6 प्रतिशत कंपनियों ने उम्मीद जताई कि वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में उनकी क्षमता उपयोग दर 80 प्रतिशत से अधिक रहेगी।
पहली छमाही में केवल 36.6 प्रतिशत कंपनियां इस स्तर के क्षमता उपयोग की उम्मीद कर रही थीं।
यानी कंपनियों के एक बड़े वर्ग को लगता है कि आने वाले महीनों में उनकी मौजूदा उत्पादन क्षमता पहले की तुलना में अधिक इस्तेमाल होगी।
जब किसी कंपनी की मौजूदा उत्पादन क्षमता लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर इस्तेमाल होती है, तो उत्पादन बढ़ाने के लिए नई क्षमता विकसित करने की जरूरत पैदा हो सकती है।
ऐसे में कंपनियां नई मशीनरी, संयंत्र, उत्पादन लाइन और तकनीकी सुविधाओं में निवेश करने का निर्णय ले सकती हैं।
इस लिहाज से क्षमता उपयोग में बढ़ोतरी की उम्मीद आने वाले समय में निजी क्षेत्र के पूंजीगत निवेश के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।
यदि घरेलू मांग और ऑर्डर बुक मजबूत बनी रहती है, तो कंपनियों के विस्तार संबंधी फैसलों में तेजी आ सकती है।
उद्योग जगत के लिए लागत अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। कच्चे माल, ऊर्जा और अन्य इनपुट की कीमतों में बदलाव का सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ता है।
हालांकि सर्वे में लागत दबाव को लेकर कुछ राहत के संकेत मिले हैं।
दूसरी तिमाही में 61.1 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने लागत बढ़ने की आशंका जताई। पहली तिमाही में यह अनुपात लगभग दो-तिहाई कंपनियों का था।
इसमें कमी बताती है कि कंपनियों को लागत दबाव की तीव्रता पहले की तुलना में कुछ कम महसूस हो रही है।
यदि मांग मजबूत बनी रहती है और लागत वृद्धि की गति में कमी आती है, तो कंपनियों के लाभ मार्जिन में सुधार की संभावना बन सकती है।
यही वजह है कि लागत दबाव में आई नरमी को उद्योग जगत के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल, धातुओं और अन्य कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की स्थिति में कंपनियों की लागत पर दबाव दोबारा बढ़ सकता है।
कारोबारी विश्वास में सुधार का असर रोजगार योजनाओं में भी दिखाई दे रहा है।
सर्वे में शामिल 53 प्रतिशत कंपनियों ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की योजना जताई है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रोजगार विस्तार आमतौर पर कंपनियों के कारोबारी विस्तार और मांग की उम्मीदों से जुड़ा होता है।
यदि कंपनियां नए कर्मचारियों की भर्ती की योजना बना रही हैं, तो यह संकेत है कि उन्हें उत्पादन और कारोबारी गतिविधियों में आगे विस्तार की उम्मीद है।
रोजगार में बढ़ोतरी का असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। अधिक रोजगार और आय से घरेलू उपभोग में वृद्धि हो सकती है।
इससे उपभोक्ता वस्तुओं, सेवाओं, ऑटोमोबाइल, आवास, यात्रा और अन्य क्षेत्रों में मांग को समर्थन मिल सकता है।
इस प्रकार मजबूत मांग से उत्पादन बढ़ सकता है, उत्पादन बढ़ने से रोजगार में वृद्धि हो सकती है और रोजगार बढ़ने से फिर घरेलू मांग को सहारा मिल सकता है।
यह आर्थिक गतिविधियों के सकारात्मक चक्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हालांकि भारतीय कंपनियों का भरोसा बढ़ा है, लेकिन उद्योग जगत वैश्विक जोखिमों को लेकर पूरी तरह बेफिक्र नहीं है।
अगले छह महीनों के लिए वैश्विक व्यापार अनिश्चितता को सबसे बड़ा जोखिम बताया गया है।
इसके बाद कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव को प्रमुख चिंता के रूप में देखा गया है।
वैश्विक व्यापार में बदलाव, टैरिफ, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक तनाव का असर भारतीय कंपनियों के निर्यात, आयात और लागत पर पड़ सकता है।
सर्वे ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुए व्यवधानों में धीरे-धीरे कमी आने के संकेत हैं।
वैश्विक स्तर पर किसी भी बड़े भू-राजनीतिक संकट का असर ऊर्जा कीमतों, परिवहन लागत, सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
इसके बावजूद भारतीय कंपनियों का भरोसा बढ़ना यह दर्शाता है कि घरेलू बाजार और देश की आंतरिक आर्थिक गतिविधियां बाहरी झटकों के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित करने में सक्षम दिखाई दे रही हैं।
सीआईआई महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी के अनुसार, उद्योग जगत को उम्मीद है कि सरकार की सहयोगात्मक और सुविधाजनक नीतियां उत्पादन तथा नए ऑर्डरों के विस्तार में मदद करेंगी।
कारोबारी क्षेत्र के लिए नीतिगत स्थिरता महत्वपूर्ण होती है। जब कंपनियों को भविष्य की नीतियों और कारोबारी परिस्थितियों को लेकर भरोसा होता है तो वे लंबी अवधि की निवेश योजनाओं पर अधिक आसानी से आगे बढ़ सकती हैं।
सर्वे के आंकड़ों को एक साथ देखा जाए तो कई संकेत सकारात्मक दिशा में दिखाई देते हैं—घरेलू मांग मजबूत रहने की उम्मीद, क्षमता उपयोग बढ़ने की संभावना, रोजगार बढ़ाने की योजनाएं और भविष्य के कारोबारी माहौल को लेकर बढ़ता विश्वास।
इन सभी कारकों का सम्मिलित असर निजी निवेश पर पड़ सकता है।
यदि कंपनियों का भरोसा आगामी तिमाहियों में भी कायम रहता है तो उत्पादन क्षमता विस्तार और नई परियोजनाओं में निवेश को गति मिल सकती है।
सीआईआई का सर्वे भारतीय उद्योग जगत के मूड में आए स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है। पहली तिमाही की तुलना में दूसरी तिमाही में कंपनियां न केवल वर्तमान परिस्थितियों को लेकर सकारात्मक हैं, बल्कि भविष्य को लेकर उनका भरोसा और भी मजबूत दिखाई देता है।
एक्सपेक्टेशन इंडेक्स का 67.7 अंक तक पहुंचना इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
यह बताता है कि कारोबारी जगत आने वाले समय में मांग, उत्पादन और कारोबारी अवसरों में सुधार की उम्मीद कर रहा है।
यदि घरेलू मांग, उत्पादन, रोजगार और निवेश के ये रुझान आगे भी बने रहते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास चक्र को और मजबूती मिल सकती है।
विनिर्माण क्षेत्र में तेज वृद्धि, सेवा क्षेत्र की मजबूत गति और घरेलू खपत के बेहतर रहने की उम्मीद मिलकर अर्थव्यवस्था को व्यापक आधार दे सकती है।
यही वजह है कि सीआईआई के सर्वे को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह जोखिममुक्त नहीं है। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक घटनाक्रम आने वाले महीनों में कारोबारी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
ऐसे में उद्योग जगत के बढ़ते भरोसे को बनाए रखने के लिए नीतिगत समर्थन, बुनियादी ढांचे में निवेश, व्यापार सुगमता और वैश्विक बाजारों में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
कुल मिलाकर सीआईआई के 136वें बिजनेस आउटलुक सर्वे से भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक तस्वीर सामने आती है।
बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स 60.8 से बढ़कर 66.0 अंक, एक्सपेक्टेशन इंडेक्स 60.6 से बढ़कर 67.7 अंक, 61 प्रतिशत कंपनियों को घरेलू मांग बढ़ने की उम्मीद, 51.6 प्रतिशत कंपनियों को 80 प्रतिशत से अधिक क्षमता उपयोग की उम्मीद और 53 प्रतिशत कंपनियों की रोजगार बढ़ाने की योजना—ये आंकड़े उद्योग जगत के बढ़ते आत्मविश्वास की ओर इशारा करते हैं।
वहीं वैश्विक व्यापार अनिश्चितता और कमोडिटी कीमतों का जोखिम यह याद दिलाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता।
फिर भी मौजूदा परिस्थितियों में भारतीय उद्योग जगत का बढ़ता विश्वास इस बात का मजबूत संकेत है कि देश की घरेलू मांग, आर्थिक गतिविधियां और उत्पादन क्षमता भारतीय विकास की गति को सहारा दे रही हैं।
भारत अब ऐसे दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है जहां आर्थिक विकास के साथ-साथ निजी क्षेत्र का भरोसा भी मजबूत हो रहा है। यदि मांग में तेजी, उच्च क्षमता उपयोग, रोजगार विस्तार और निवेश की संभावनाएं आगे भी बनी रहती हैं, तो इससे विकास का आधार और व्यापक हो सकता है।
सीआईआई के सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारतीय उद्योग वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भविष्य को लेकर पहले से ज्यादा आशावादी है। कारोबारी विश्वास में यह सुधार आने वाले महीनों में निवेश, उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


