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- 12h ago
नई दिल्ली। संसद की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली विभाग-संबंधी स्थायी समितियों का वर्ष 2026-27 के लिए पुनर्गठन किया गया है। नए गठन के तहत राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों को विभिन्न संसदीय समितियों में शामिल किया गया है और कई महत्वपूर्ण समितियों के अध्यक्षों के नाम भी तय किए गए हैं।
विभाग-संबंधी स्थायी समितियां संबंधित मंत्रालयों और विभागों के कामकाज, नीतियों, बजटीय प्रावधानों और विधायी मामलों की विस्तार से समीक्षा करती हैं। संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर इन समितियों को विभाग-संबंधी स्थायी समितियों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
नए पुनर्गठन में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े सांसदों को समितियों में जिम्मेदारियां दी गई हैं। इनमें वाणिज्य, स्वास्थ्य, गृह, रक्षा, वित्त, विदेश मामले, शिक्षा, कृषि, रेल, ऊर्जा और संचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़ी समितियां शामिल हैं।
पुनर्गठित समितियों में राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी को वाणिज्य संबंधी समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। वाणिज्य क्षेत्र से जुड़े विषयों में व्यापार, निर्यात-आयात और संबंधित नीतिगत मामलों की संसदीय समीक्षा इस समिति के कार्यक्षेत्र से जुड़ी होती है।
संसदीय समितियों में सांसदों की भागीदारी उन्हें मंत्रालयों के कामकाज और नीतिगत विषयों की विस्तृत समीक्षा का अवसर देती है।
समाजवादी पार्टी के सांसद प्रो. रामगोपाल यादव को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी नीतियों, योजनाओं, बजटीय प्रावधानों और संबंधित मंत्रालय के कामकाज की संसदीय समीक्षा इस समिति के माध्यम से की जाती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विषयों की व्यापकता को देखते हुए यह समिति संसद की महत्वपूर्ण विभाग-संबंधी स्थायी समितियों में शामिल है।
पुनर्गठन के तहत विभिन्न समितियों के अध्यक्षों की जिम्मेदारी इस प्रकार दी गई है—
संसदीय स्थायी समितियां संसद की विस्तृत जांच-पड़ताल वाली व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सदन में हर विधेयक, नीति या मंत्रालय के कामकाज पर विस्तार से चर्चा के लिए सीमित समय होता है। ऐसे में समितियां संबंधित विषयों को अधिक विस्तार से देखने का मंच उपलब्ध कराती हैं।
समितियां संबंधित मंत्रालयों और विभागों से जुड़े बजटीय प्रस्तावों, विधेयकों, नीतियों, योजनाओं और कामकाज की समीक्षा कर सकती हैं। विशेषज्ञों, अधिकारियों और संबंधित पक्षों से जानकारी लेकर किसी विषय को गहराई से समझने की प्रक्रिया भी समिति के काम का हिस्सा होती है।
विभाग-संबंधी स्थायी समितियों का एक महत्वपूर्ण कार्य संबंधित मंत्रालयों की अनुदान मांगों और बजटीय प्रावधानों की जांच करना है। समिति मंत्रालय की योजनाओं और खर्च से जुड़े मुद्दों पर विचार कर सकती है और अपनी रिपोर्ट के माध्यम से सुझाव दे सकती है।
संसदीय समिति की रिपोर्ट संसद के भीतर संबंधित विषय पर चर्चा और सरकार की जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। संसद की डिजिटल लाइब्रेरी में विभाग-संबंधी स्थायी समितियों की बड़ी संख्या में रिपोर्ट उपलब्ध हैं, जिनमें मंत्रालयों की अनुदान मांगों और सरकार की ओर से की गई कार्रवाई पर रिपोर्ट भी शामिल हैं।
समितियों के सामने आने वाले विषय केवल बजट तक सीमित नहीं होते। संबंधित मंत्रालय के कामकाज, नीतिगत फैसलों और कई मामलों में विधायी प्रस्तावों पर भी समिति विचार कर सकती है।
समिति की प्रक्रिया में विषय पर जानकारी जुटाना, संबंधित पक्षों के विचार लेना और दस्तावेजों की समीक्षा करना शामिल हो सकता है। इसके बाद समिति अपनी टिप्पणियों और सिफारिशों को रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत करती है।
विभाग-संबंधी स्थायी समितियों की खासियत यह है कि इनमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं। इससे अलग-अलग सदनों के सांसदों को संबंधित मंत्रालयों के कामकाज की संयुक्त रूप से समीक्षा करने का अवसर मिलता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य संसदीय निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाना और मंत्रालयों से जुड़े विषयों पर सदन के बाहर भी विस्तृत विचार-विमर्श के लिए मंच उपलब्ध कराना है।
पुनर्गठित समितियों में देश की अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था से जुड़े लगभग सभी प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। वित्त और वाणिज्य से लेकर कृषि, उद्योग, ऊर्जा, पेट्रोलियम और रेल तक के विषय अलग-अलग समितियों के दायरे में आते हैं।
इसी तरह स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास और आवास जैसे सामाजिक क्षेत्र से जुड़े विषयों के लिए भी अलग समितियां हैं।
रक्षा, गृह, विदेश मामले तथा संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे रणनीतिक और प्रशासनिक महत्व वाले विषयों की भी अलग समितियां हैं।
संसदीय समितियां अपनी जांच और विचार-विमर्श के बाद रिपोर्ट पेश करती हैं। इन रिपोर्टों में किसी मंत्रालय या विभाग के कामकाज पर टिप्पणियों के साथ सिफारिशें भी शामिल हो सकती हैं।
इसके बाद संबंधित मंत्रालयों की ओर से सिफारिशों पर की गई कार्रवाई या उनके जवाब की भी संसदीय प्रक्रिया के तहत समीक्षा होती है। संसद की डिजिटल लाइब्रेरी में 2026 में भी विभिन्न स्थायी समितियों की कार्रवाई रिपोर्ट और अनुदान से संबंधित रिपोर्ट दर्ज हैं।
समितियों के पुनर्गठन के बाद अब नए अध्यक्षों और सदस्यों के सामने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की जिम्मेदारी होगी। आने वाले समय में इन समितियों के एजेंडे में संबंधित मंत्रालयों की योजनाएं, बजट, नीतियां, विधायी विषय और कामकाज से जुड़े विभिन्न मुद्दे शामिल हो सकते हैं।
इस तरह 2026-27 के लिए किया गया पुनर्गठन संसद की समिति व्यवस्था को नए कार्यकाल के लिए व्यवस्थित करता है और सांसदों को मंत्रालय-वार संसदीय समीक्षा की जिम्मेदारी देता है।
संसदीय समितियां सीधे तौर पर सरकार का विकल्प नहीं होतीं, लेकिन वे संसद के भीतर विस्तृत जांच, समीक्षा और सिफारिश की महत्वपूर्ण व्यवस्था हैं। इनके माध्यम से सांसद मंत्रालयों के कामकाज से जुड़े विषयों पर विस्तार से जानकारी लेते हैं और अपनी रिपोर्ट के जरिए संसद के सामने निष्कर्ष और सुझाव रखते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


