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वृंदावन। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अगले दिन वृंदावन के ऐतिहासिक श्री रंगनाथ मंदिर में आयोजित पारंपरिक नंदोत्सव के दौरान लट्ठे का मेला श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा। करीब 50 फीट ऊंचे और तेल से चिकने किए गए लट्ठे पर चढ़कर विजय पताका हासिल करने के लिए पहलवानों ने ताकत, संतुलन, धैर्य और सामूहिक रणनीति का शानदार प्रदर्शन किया। ऊंचाई, फिसलन और लगातार बढ़ती चुनौती के बीच विजय पताका तक पहुंचने के लिए पहलवानों को करीब 40 मिनट तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
लट्ठे पर पहलवानों की एक-एक कोशिश के साथ मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं का रोमांच बढ़ता गया। कोई पहलवान कुछ ऊंचाई तक पहुंचता तो नीचे खड़ी भीड़ जयकारों से उसका उत्साह बढ़ाती। कई बार फिसलकर नीचे आने के बाद भी पहलवानों ने हिम्मत नहीं छोड़ी और दोबारा प्रयास करते रहे।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के उल्लास के बाद नंदोत्सव को लेकर श्री रंगनाथ मंदिर में सुबह से ही धार्मिक और उत्सवी माहौल बना रहा। मंदिर में ठाकुर रंगनाथ भगवान की पूजा-अर्चना और विशेष आयोजन के बाद शोभायात्रा निकाली गई। भगवान के दर्शन और नंदोत्सव की पारंपरिक गतिविधियों को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में जुटे।
शोभायात्रा के बाद जैसे ही लट्ठे मेले की तैयारियां शुरू हुईं, लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई। मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालु लट्ठे के आसपास जमा हो गए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई इस पारंपरिक आयोजन को देखने के लिए उत्साहित नजर आया।
लट्ठे मेले की परंपरा के तहत अंतर्यामी अखाड़े के पहलवानों ने सबसे पहले भगवान का आशीर्वाद लिया। इसके बाद पहलवानों ने लट्ठे पर चढ़ने की चुनौती स्वीकार की।
पहलवानों के लिए यह केवल शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इसमें सही समय पर सही रणनीति बनाना भी बेहद जरूरी था। एक पहलवान के कंधे पर दूसरा और उसके ऊपर तीसरा पहलवान चढ़कर ऊंचाई हासिल करने की कोशिश करता रहा। कई बार पूरा समूह कुछ ऊंचाई तक पहुंचा, लेकिन लट्ठे की फिसलन के कारण संतुलन बिगड़ गया और पहलवान नीचे आ गए।
हर बार असफलता के बाद पहलवानों ने खुद को संभाला और नए उत्साह के साथ दोबारा प्रयास किया।
करीब 50 फीट ऊंचे लट्ठे को पहले से ही तेल और विशेष मिश्रण की मदद से चिकना किया गया था। इसके कारण उस पर पैर टिकाना और शरीर का संतुलन बनाए रखना बेहद मुश्किल हो रहा था।
पहलवान जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते, चुनौती और कठिन होती जाती। उनकी मुश्किल बढ़ाने के लिए मंदिर सेवकों की ओर से ऊपर से तेल मिश्रित पानी की बौछार भी की जाती रही। पानी पड़ते ही लट्ठे की सतह और अधिक फिसलन भरी हो जाती और पहलवानों को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अतिरिक्त ताकत लगानी पड़ती।
कई बार ऐसा लगा कि पहलवान विजय पताका तक पहुंचने वाले हैं, लेकिन अंतिम ऊंचाई पर पहुंचते ही संतुलन बिगड़ गया। इसके बाद नीचे खड़े पहलवानों ने फिर से समूह बनाया और नई रणनीति के साथ ऊपर चढ़ने का प्रयास शुरू किया।
लट्ठे पर अकेले चढ़ना लगभग असंभव चुनौती थी। इसे पार करने के लिए पहलवानों ने सामूहिक ताकत का सहारा लिया। नीचे कई पहलवानों ने एक-दूसरे के कंधों का सहारा लेकर आधार बनाया और उनके ऊपर दूसरे पहलवान चढ़ते गए।
इस तरह पहलवानों ने मानव मचान तैयार कर लट्ठे की ऊंचाई को कम करने की कोशिश की। जैसे-जैसे ऊपर जाने वाला पहलवान आगे बढ़ता, नीचे मौजूद साथी अपनी स्थिति मजबूत करते जाते।
दर्शकों के लिए यह पूरा दृश्य किसी रोमांचक खेल मुकाबले से कम नहीं था। जब भी पहलवान कुछ फीट ऊपर पहुंचते, नीचे से तालियों और जयकारों की आवाज तेज हो जाती।
लट्ठे पर चढ़ने का मुकाबला लगातार करीब 40 मिनट तक चलता रहा। इस दौरान कई बार पहलवान ऊपर पहुंचे और फिसलकर नीचे आए। लेकिन किसी ने प्रयास बंद नहीं किया।
भीड़ में मौजूद श्रद्धालु हर प्रयास पर उनका उत्साह बढ़ाते रहे। मंदिर परिसर में लगातार ‘जय श्री रंगनाथ’, ‘जय कन्हैया लाल की’ और भगवान के जयकारे गूंजते रहे।
जैसे-जैसे विजय पताका नजदीक आती गई, श्रद्धालुओं की उत्सुकता चरम पर पहुंच गई। अंततः लगातार प्रयास, सामूहिक रणनीति और मजबूत पकड़ के दम पर पहलवान विजय पताका तक पहुंचने में सफल हुए।
जैसे ही पहलवानों ने विजय पताका हासिल की, मंदिर परिसर जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने तालियां बजाकर पहलवानों का उत्साह बढ़ाया। लंबे समय तक चले इस रोमांचक मुकाबले के सफल समापन के बाद वहां मौजूद लोगों में उत्साह का माहौल दिखाई दिया।
विजय पताका हासिल करना इस पारंपरिक आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण और रोमांचकारी क्षण रहा। श्रद्धालु इस पल को अपने मोबाइल कैमरों में भी कैद करते नजर आए।
विजय पताका हासिल करने वाले पहलवानों का मंदिर प्रबंधन की ओर से सम्मान किया गया। उन्हें नारियल, विजय पताका और उत्तरीय भेंट किए गए। सम्मान समारोह के दौरान भी श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए।
पहलवानों के सम्मान के साथ लट्ठे मेले का मुख्य आकर्षण पूरा हुआ, लेकिन काफी देर तक मंदिर परिसर में उत्सव और भक्ति का माहौल बना रहा।
वृंदावन का लट्ठे का मेला केवल पहलवानों की ताकत आजमाने वाला आयोजन नहीं है। यह धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा, सामूहिक सहभागिता और शौर्य का अनूठा संगम भी माना जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी परंपराएं वृंदावन के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन को अलग पहचान देती हैं।
इस आयोजन में पहलवानों की शारीरिक क्षमता के साथ-साथ टीमवर्क भी दिखाई देता है। एक पहलवान की सफलता दूसरे पहलवानों के सहयोग पर निर्भर रहती है। यही वजह है कि पूरा मुकाबला सामूहिक प्रयास का रूप ले लेता है।
लट्ठे मेले को देखने के लिए बड़ी संख्या में युवा भी पहुंचे। युवाओं ने पहलवानों के करतब और उनकी रणनीति को काफी उत्सुकता से देखा। कई लोग पूरे मुकाबले के दौरान अपने मोबाइल फोन से वीडियो बनाते रहे।
श्रद्धालुओं का कहना था कि आधुनिक दौर में भी ऐसी पारंपरिक गतिविधियों का जीवित रहना वृंदावन की सांस्कृतिक पहचान के लिए महत्वपूर्ण है। धार्मिक आयोजनों के साथ इस तरह की परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और स्थानीय विरासत से जोड़ने का काम करती हैं।
लट्ठे मेले के दौरान सबसे खास बात पहलवानों का धैर्य रहा। कई बार फिसलने और नीचे आने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। एक बार असफल होने के बाद वे फिर से समूह बनाते और नई रणनीति के साथ ऊपर चढ़ने का प्रयास करते।
नीचे खड़ी भीड़ भी उनके साथ पूरी तरह जुड़ी नजर आई। जैसे ही कोई पहलवान ऊंचाई हासिल करता, चारों ओर से जयकारे लगने लगते। फिसलकर नीचे आने पर भी लोगों ने उनका उत्साह कम नहीं होने दिया।
श्री रंगनाथ मंदिर का नंदोत्सव एक बार फिर यह संदेश देता नजर आया कि वृंदावन की पहचान केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की लोकपरंपराएं और उत्सवी आयोजन भी इसकी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लट्ठे मेले में जहां एक ओर पहलवानों ने अपनी शारीरिक क्षमता और साहस का प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान के प्रति अपनी आस्था और उत्साह का परिचय दिया।
करीब 50 फीट ऊंचे चिकने लट्ठे पर विजय पताका तक पहुंचने के लिए चली 40 मिनट की यह मशक्कत देखने वालों के लिए यादगार बन गई। पहलवानों की मेहनत, श्रद्धालुओं के जयकारे और मंदिर परिसर का भक्तिमय वातावरण मिलकर नंदोत्सव को बेहद खास बना गए।
इस तरह श्री रंगनाथ मंदिर में आयोजित लट्ठे का मेला एक बार फिर भक्ति, परंपरा, शौर्य और सामूहिक उत्साह का अनूठा संगम बनकर सामने आया।


