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- 10h ago
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण लंबे समय से स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। प्रदूषित हवा को आमतौर पर सांस और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इसके संभावित प्रभाव का दायरा और बड़ा कर दिया है। अध्ययन में संकेत मिला है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने का संबंध किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट से भी हो सकता है।
खास तौर पर दिल्ली के लिए यह निष्कर्ष चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि अध्ययन में दिल्ली की हवा में मौजूद बारीक प्रदूषक कण PM2.5 का स्तर चेन्नई की तुलना में कई गुना अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने दोनों शहरों में रहने वाले हजारों वयस्कों के स्वास्थ्य आंकड़ों और उनके आसपास के वायु प्रदूषण के स्तर का अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट का आकलन eGFR नामक मापदंड से किया गया।
यह अध्ययन सेंटर फॉर क्रॉनिक डिजीज के सिद्धार्थ मंडल के नेतृत्व में किया गया। रिसर्च में दिल्ली और चेन्नई के कुल 12,271 वयस्कों को शामिल किया गया।
शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों की किडनी की कार्यक्षमता को करीब पांच साल के दौरान अलग-अलग समय पर जांचा। इसके साथ ही उनके घर के आसपास मौजूद PM2.5 के स्तर का भी आकलन किया गया।
इस तरह शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि लंबे समय तक अलग-अलग स्तर के वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने और किडनी की कार्यक्षमता में होने वाले बदलाव के बीच क्या संबंध है।
अध्ययन में दो अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों वाले शहरों को शामिल करना महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर काफी अधिक है, जबकि चेन्नई में आम तौर पर PM2.5 का स्तर तुलनात्मक रूप से कम रहता है।
रिसर्च की शुरुआत में दिल्ली में सालाना औसत PM2.5 का स्तर करीब 118 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया था। इसके मुकाबले चेन्नई में यह स्तर लगभग 33 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।
अध्ययन के आगे बढ़ने के दौरान दिल्ली में PM2.5 का औसत स्तर बढ़कर करीब 130 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया, जबकि चेन्नई में यह घटकर लगभग 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया।
इसका मतलब यह हुआ कि अध्ययन अवधि के दौरान दिल्ली के प्रतिभागियों को चेन्नई की तुलना में लगातार कहीं अधिक PM2.5 प्रदूषण का सामना करना पड़ा।
यही अंतर शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि दोनों शहरों में प्रदूषण के स्तर और किडनी की कार्यक्षमता के बीच संबंधों की तुलना करने का अवसर मिला।
PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। इनका आकार इतना छोटा होता है कि सांस के साथ ये फेफड़ों के बेहद अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।
समस्या केवल इतनी नहीं है कि ये कण फेफड़ों में जाते हैं। बेहद छोटे आकार के कारण इनके कुछ घटक शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी जैविक प्रक्रियाओं से जुड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क को शरीर के दूसरे अंगों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के संदर्भ में भी वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है।
रिसर्च में किडनी की कार्यक्षमता को समझने के लिए eGFR यानी estimated glomerular filtration rate का इस्तेमाल किया गया।
आसान भाषा में समझें तो eGFR यह अनुमान लगाने में मदद करता है कि किडनी खून को कितनी प्रभावी तरीके से फिल्टर कर रही है। किडनी हमारे शरीर से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त द्रव को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यदि किडनी की फिल्टर करने की क्षमता लंबे समय में कम होती है तो यह स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हो सकता है। इसी कारण eGFR में समय के साथ होने वाले बदलाव को किडनी की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि दोनों शहरों में PM2.5 के अधिक संपर्क के साथ eGFR में गिरावट का संबंध दिखाई दिया। हालांकि दिल्ली में यह गिरावट चेन्नई की तुलना में अधिक स्पष्ट थी।
यह निष्कर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि वायु प्रदूषण का प्रभाव केवल श्वसन तंत्र तक सीमित नहीं हो सकता। शरीर में प्रदूषण के कारण होने वाली जैविक प्रतिक्रियाएं किडनी जैसे दूसरे अंगों को भी प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि इस तरह के अध्ययन में संबंध पाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति में प्रदूषण सीधे तौर पर किडनी की बीमारी पैदा करेगा। शोध के निष्कर्ष प्रदूषण के लंबे समय के संपर्क और किडनी की कार्यक्षमता के बीच संभावित संबंध की ओर इशारा करते हैं।
दिल्ली और आसपास के इलाकों में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण का स्तर कई बार बेहद खराब स्थिति तक पहुंच जाता है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण गतिविधियों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, पराली जलाने से आने वाला धुआं और मौसम संबंधी परिस्थितियां प्रदूषण के स्तर को प्रभावित करती हैं।
जब हवा में महीन कणों की मात्रा लंबे समय तक अधिक बनी रहती है तो लोगों का लगातार एक्सपोजर बढ़ता है। ऐसे में चिंता केवल सांस लेने में परेशानी या फेफड़ों की क्षमता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शरीर के दूसरे अंगों पर संभावित प्रभाव भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
PM2.5 जैसे महीन कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं। फेफड़ों में पहुंचने के बाद प्रदूषक शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसी प्रक्रियाओं को हृदय और रक्त वाहिकाओं समेत शरीर के कई हिस्सों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों से जोड़ा है।
किडनी शरीर के रक्त को लगातार फिल्टर करती है। इसलिए रक्त प्रवाह और शरीर में होने वाली सूजन जैसी प्रक्रियाओं में बदलाव किडनी के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि इस अध्ययन के आधार पर इन जैविक प्रक्रियाओं को पूरी तरह कारण के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता।
वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर अब तक बड़ी संख्या में अध्ययन सांस और हृदय संबंधी बीमारियों पर केंद्रित रहे हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने को अस्थमा, सांस लेने में परेशानी और हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ा गया है।
अब किडनी की कार्यक्षमता से जुड़ा यह अध्ययन इस बहस को और व्यापक बनाता है। इससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि शहरों में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण का शरीर के अलग-अलग अंगों पर लंबे समय में कितना असर पड़ सकता है।
किडनी से जुड़ी समस्याओं को अक्सर उम्र बढ़ने या डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी स्थितियों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि पर्यावरणीय कारक भी किडनी की कार्यक्षमता में भूमिका निभाते हैं, तो प्रदूषण का मुद्दा व्यापक जनस्वास्थ्य चिंता बन जाता है।
दिल्ली जैसे शहर में जहां बड़ी संख्या में लोग सालभर प्रदूषित हवा के संपर्क में रहते हैं, वहां लंबे समय के स्वास्थ्य प्रभावों को समझना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी चुनौती यह भी है कि किडनी की सेहत पर केवल प्रदूषण का प्रभाव नहीं पड़ता। उम्र, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान, खान-पान, शारीरिक गतिविधि और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारक भी किडनी की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति की किडनी की सेहत को केवल उसके प्रदूषण एक्सपोजर के आधार पर समझना उचित नहीं होगा। इसी कारण बड़े अध्ययनों में अलग-अलग संभावित कारणों को ध्यान में रखकर विश्लेषण किया जाता है।
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि वायु प्रदूषण को केवल ‘फेफड़ों की समस्या’ मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। प्रदूषित हवा का शरीर के अन्य अंगों पर भी संभावित प्रभाव हो सकता है और इस दिशा में आगे और अध्ययन की आवश्यकता है।
विशेष रूप से दिल्ली जैसे अत्यधिक प्रदूषित शहरों में लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क और विभिन्न स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध को समझना सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
वायु प्रदूषण को लेकर अक्सर चर्चा पर्यावरण और शहर की हवा की गुणवत्ता तक सीमित रहती है। लेकिन यदि प्रदूषित हवा का लंबे समय तक संपर्क शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकता है, तो प्रदूषण कम करना सीधे तौर पर स्वास्थ्य नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए वाहनों के उत्सर्जन को कम करना, निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल को नियंत्रित करना, औद्योगिक प्रदूषण पर निगरानी बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।
इसके साथ ही लोगों के स्तर पर भी प्रदूषण वाले दिनों में बाहरी गतिविधियों को लेकर सावधानी बरतना और स्थानीय वायु गुणवत्ता की जानकारी पर नजर रखना उपयोगी हो सकता है।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष इस दिशा में आगे और शोध की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भविष्य के अध्ययनों में अलग-अलग शहरों, लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क और किडनी की बीमारी के अन्य संकेतकों को शामिल कर तस्वीर को और स्पष्ट किया जा सकता है।
विशेष रूप से यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क से किडनी की कार्यक्षमता में होने वाले बदलाव कितने स्थायी होते हैं और प्रदूषण का स्तर कम होने पर क्या इस जोखिम में भी कमी आ सकती है।
दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए यह रिसर्च एक महत्वपूर्ण चेतावनी की तरह देखी जा सकती है। हवा में मौजूद महीन प्रदूषक कण आंखों में जलन, खांसी या सांस लेने में परेशानी जैसे तत्काल लक्षणों से आगे भी स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं।
रिसर्च में सामने आया दिल्ली और चेन्नई के PM2.5 स्तर का बड़ा अंतर और दोनों शहरों में eGFR में देखी गई गिरावट इस बात की ओर संकेत करती है कि वायु प्रदूषण और किडनी स्वास्थ्य के बीच संबंध को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
हालांकि इसे अंतिम कारण-परिणाम के रूप में स्थापित करने के लिए और वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता है, लेकिन अध्ययन ने इतना जरूर स्पष्ट किया है कि दिल्ली की जहरीली हवा का सवाल केवल फेफड़ों तक सीमित मानना पर्याप्त नहीं है। अब किडनी सहित शरीर के दूसरे अंगों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य चर्चा का हिस्सा बनाना होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


