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- 12h ago
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट से ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा को बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने और एक जमानतदार पेश करने के लिए कहा गया था। यह मामला चुनाव आयोग के खिलाफ आयोजित विरोध मार्च के दौरान सामने आया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने उसे खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने मामले की आगे की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नेहा बोरा को मामले से संबंधित पूरा मटेरियल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 135 के तहत निर्धारित प्रक्रिया और शांति भंग होने की आशंका से जुड़े पहलुओं पर विचार करना होगा। मजिस्ट्रेट को यह भी देखना होगा कि संबंधित परिस्थितियों में बॉन्ड भरवाने की प्रक्रिया किस चरण में अपनाई जानी चाहिए।
इस आदेश के बाद अब मामले में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाली आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण हो गई है। याचिका खारिज होने के बावजूद बॉन्ड की प्रक्रिया को लेकर मजिस्ट्रेट को कानूनी प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करना होगा।
दरअसल, चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध मार्च के दौरान विभिन्न संगठनों और नेताओं ने प्रदर्शन किया था। इसी घटनाक्रम के सिलसिले में नेहा बोरा को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने और जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने तथा एक जमानतदार उपलब्ध कराने को कहा गया था।
इस नोटिस को चुनौती देते हुए नेहा बोरा ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था। उनकी याचिका में मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी गई थी। मामला इस सवाल से जुड़ा था कि शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने की प्रक्रिया किस आधार पर और किन परिस्थितियों में लागू की जा सकती है।
ऐसी कार्यवाही का उद्देश्य संभावित शांति भंग होने की आशंका से निपटना होता है। हालांकि, किसी व्यक्ति से बॉन्ड भरवाने की प्रक्रिया में संबंधित कानूनी प्रावधानों का पालन और मामले से जुड़ी सामग्री की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। इसी संदर्भ में हाई कोर्ट ने मामले की आगे की कार्यवाही के लिए मजिस्ट्रेट को आवश्यक पहलुओं पर विचार करने को कहा।
नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने इसका विरोध किया था। पुलिस की ओर से दलील दी गई कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। पुलिस ने हाई कोर्ट के समक्ष याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया।
अदालत ने अंततः याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अपने आदेश में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले से संबंधित सामग्री नेहा बोरा को उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे की प्रक्रिया में संबंधित तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार किया जा सके।
इस निर्देश का महत्व इसलिए है, क्योंकि किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्यवाही में संबंधित व्यक्ति को मामले की सामग्री उपलब्ध होना प्रक्रिया को समझने और अपना पक्ष रखने के लिए महत्वपूर्ण होता है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में नेहा बोरा को मामले से संबंधित पूरा मटेरियल उपलब्ध कराने पर जोर दिया। इसके साथ ही मजिस्ट्रेट को बॉन्ड भरवाने की प्रक्रिया के संबंध में कानूनी प्रावधानों पर विचार करने का निर्देश दिया गया।
अदालत के निर्देश के अनुसार, विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को यह देखना होगा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 135 के तहत बॉन्ड भरवाने की प्रक्रिया किस चरण में अपनाई जानी चाहिए। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि बॉन्ड की मांग शुरुआती स्तर पर की जाए या मामले की जांच और संबंधित तथ्यों पर विचार करने के बाद इस संबंध में निर्णय लिया जाए।
इस प्रकार, हाई कोर्ट के आदेश में एक ओर नेहा बोरा की याचिका खारिज की गई, वहीं दूसरी ओर मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे की प्रक्रिया में कानूनी पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता भी रेखांकित की गई।
हाई कोर्ट ने बॉन्ड की प्रक्रिया के साथ शांति भंग होने की आशंका से जुड़े पहलू पर विचार करने को भी महत्वपूर्ण बताया। मजिस्ट्रेट को मामले की परिस्थितियों के आधार पर यह देखना होगा कि शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड की आवश्यकता के संबंध में क्या निष्कर्ष निकलता है।
शांति बनाए रखने से संबंधित ऐसी कार्यवाही में संबंधित व्यक्ति से भविष्य में शांति बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन बॉन्ड की प्रक्रिया लागू करने के लिए कानून में निर्धारित शर्तों और प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है।
इसी कारण मामले से जुड़ी सामग्री उपलब्ध कराने और बॉन्ड की प्रक्रिया के उचित चरण पर विचार करने संबंधी निर्देश महत्वपूर्ण हैं। आगे की कार्यवाही में मजिस्ट्रेट को संबंधित कानूनी प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
इस घटनाक्रम से जुड़े मामले में आशुतोष रांका और सौरव दास की विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में भी सुनवाई हुई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों की सुनवाई करीब डेढ़ घंटे तक चली। इसके बाद उन्हें 17 नवंबर को दोबारा पेश होने के लिए कहा गया था।
यह घटनाक्रम चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध मार्च और उससे जुड़ी कानूनी कार्यवाही के व्यापक संदर्भ में सामने आया है। हालांकि, नेहा बोरा की याचिका और आशुतोष रांका तथा सौरव दास की कार्यवाही के अलग-अलग कानूनी पहलुओं को उनके संबंधित आदेशों और रिकॉर्ड के आधार पर ही समझना उचित होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद अब विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे की प्रक्रिया पर ध्यान रहेगा। मजिस्ट्रेट को नेहा बोरा को मामले से जुड़ी सामग्री उपलब्ध कराने के साथ बीएनएसएस की धारा 135 के तहत बॉन्ड की प्रक्रिया और शांति भंग होने की आशंका से संबंधित पहलुओं पर विचार करना होगा।
यह भी महत्वपूर्ण होगा कि मजिस्ट्रेट बॉन्ड भरवाने के उचित समय और संबंधित कानूनी शर्तों के बारे में क्या निर्णय लेते हैं। हाई कोर्ट के आदेश के बाद इन पहलुओं पर आगे की कार्यवाही में स्पष्टता आने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, दिल्ली हाई कोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका खारिज कर दी है, लेकिन मामले में आगे की प्रक्रिया को लेकर विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। मामले की सामग्री उपलब्ध कराने, कानूनी प्रावधानों का पालन करने और शांति भंग होने की आशंका पर विचार करने के निर्देश इस कार्यवाही के प्रमुख पहलू हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


