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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और किफायती बनाने के लिए देश के सभी अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा तथा उपचार की गुणवत्ता के न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाने चाहिए। प्रत्येक मरीज को अस्पताल की स्थिति, स्थान या प्रबंधन व्यवस्था से परे सुरक्षित उपचार और सम्मानजनक देखभाल मिलनी चाहिए। नीति आयोग के सदस्य प्रो. डॉ. एम. श्रीनिवास ने यह विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत के प्रत्येक अस्पताल में मरीजों की देखभाल और सुरक्षा का एक बुनियादी गुणवत्ता स्तर सुनिश्चित करना आवश्यक है। इससे न केवल मरीजों का स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारतीय अस्पतालों की पहचान भी विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं के केंद्र के रूप में स्थापित हो सकेगी।
प्रो. डॉ. श्रीनिवास सोमवार को आयोजित फिक्की हील 2026 के 20वें संस्करण को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, उद्योग प्रतिनिधियों और नीति निर्माताओं ने चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता, डिजिटल स्वास्थ्य तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), किफायती उपचार और भविष्य की स्वास्थ्य जरूरतों पर विचार साझा किए। चर्चा का प्रमुख केंद्र यह रहा कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल उपचार उपलब्ध कराने तक सीमित न रखकर मरीजों की सुरक्षा, समय पर निदान, बीमारी की रोकथाम और बेहतर उपचार परिणामों पर भी ध्यान देना होगा।
प्रो. श्रीनिवास ने कहा कि अस्पतालों की सफलता का आकलन केवल उपलब्ध बिस्तरों, आधुनिक मशीनों या अत्याधुनिक इमारतों के आधार पर नहीं होना चाहिए। मरीज को किस स्तर की देखभाल मिलती है, उपचार कितना सुरक्षित है, सेवाओं की गुणवत्ता कैसी है और मरीज के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है—ये सभी पहलू स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक गुणवत्ता तय करते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में मरीज की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। अस्पताल पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह भरोसा होना चाहिए कि उसे निर्धारित प्रक्रियाओं, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और उचित निगरानी के तहत उपचार मिलेगा। इसके लिए अस्पतालों में बुनियादी सुरक्षा प्रक्रियाओं, संक्रमण नियंत्रण, दवाओं के सुरक्षित उपयोग, सही निदान और उपचार के दौरान संभावित जोखिमों को कम करने पर लगातार ध्यान देना जरूरी है।
प्रो. श्रीनिवास के विचारों के अनुसार, देश में अस्पतालों के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानकों की व्यवस्था स्वास्थ्य सेवाओं में एक समान बुनियादी स्तर सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। इसका उद्देश्य अस्पतालों की विविधता को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक मरीज को सुरक्षित और सम्मानजनक उपचार का अधिकार व्यवहार में भी मिले।
स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए स्पष्ट मानकों के साथ उनकी नियमित समीक्षा, जवाबदेही और सुधार की प्रक्रिया भी आवश्यक है। अस्पतालों को उपचार के परिणामों का आकलन करने, कमियों की पहचान करने और मरीजों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे।
सम्मेलन में डिजिटल स्वास्थ्य तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया। प्रो. डॉ. श्रीनिवास ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े देश के लिए एक बहुमूल्य संसाधन हैं और उनका जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।
एआई की सहायता से बड़ी मात्रा में उपलब्ध स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण करके बीमारी के जोखिमों को समझने, संभावित स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान करने, निदान में चिकित्सकों की सहायता करने और स्वास्थ्य संसाधनों के बेहतर उपयोग की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। हालांकि, इसके लिए आंकड़ों की गुणवत्ता, मरीजों की गोपनीयता, डेटा सुरक्षा और तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
प्रो. श्रीनिवास ने विश्वास व्यक्त किया कि डिजिटल स्वास्थ्य आंकड़ों का उचित उपयोग भारत के साथ-साथ ग्लोबल साउथ के देशों में भी स्वास्थ्य सेवाओं में परिवर्तन लाने में सहायक हो सकता है। भारत का अनुभव उन देशों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जो बड़ी आबादी तक कम लागत में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के माध्यम से संरचित और परस्पर संवाद करने में सक्षम स्वास्थ्य आंकड़ों की व्यवस्था विकसित करने के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया। इसके अंतर्गत आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (आभा) आईडी और इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड को ऐसे डिजिटल ढांचे से जोड़ने पर जोर है, जिससे विभिन्न स्वास्थ्य प्रणालियों के बीच आवश्यक जानकारी उपयोगी ढंग से साझा की जा सके।
यदि मरीज की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी उचित अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था के साथ अलग-अलग उपचार केंद्रों में उपलब्ध हो, तो चिकित्सकों को उसकी पिछली बीमारियों, जांचों और उपचार के इतिहास को समझने में मदद मिल सकती है। इससे बार-बार जांच कराने की जरूरत कम करने, उपचार में निरंतरता बनाए रखने और मरीज की देखभाल को बेहतर बनाने की संभावनाएं पैदा होती हैं।
हालांकि, डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए तकनीकी सुविधाओं के साथ मजबूत गोपनीयता प्रावधान, सुरक्षित डेटा आदान-प्रदान और डिजिटल सेवाओं तक व्यापक पहुंच भी जरूरी है। तकनीक का लाभ केवल बड़े अस्पतालों या महानगरों तक सीमित न रहकर छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचना चाहिए।
प्रो. श्रीनिवास ने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था के केंद्र में आम नागरिक को रखना आवश्यक है। मरीज को सही समय पर सही उपचार उपलब्ध कराने के साथ उसे अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करना व्यापक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में अहम है।
उन्होंने गैर-संचारी रोगों के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य व्यवस्था में रोकथाम, समय रहते पहचान और प्राथमिक स्तर पर हस्तक्षेप को अधिक महत्व देने की आवश्यकता रेखांकित की। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों जैसी समस्याओं के मामले में समय पर जांच, नियमित निगरानी और जीवनशैली में आवश्यक बदलाव बीमारी के जोखिम तथा उससे जुड़ी जटिलताओं को कम करने में मदद कर सकते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा अक्सर तब सक्रिय होता है, जब मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है। लेकिन एक प्रभावी स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य केवल गंभीर अवस्था में उपचार देना नहीं, बल्कि बीमारी के जोखिमों को पहले पहचानना और लोगों को समय पर आवश्यक सलाह तथा देखभाल उपलब्ध कराना भी होना चाहिए।
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, नियमित स्वास्थ्य जांच को प्रोत्साहित करने और आम नागरिकों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाने से अस्पतालों पर अनावश्यक दबाव कम करने की दिशा में भी मदद मिल सकती है। इस दृष्टिकोण से स्वास्थ्य क्षेत्र को उपचार-केंद्रित व्यवस्था के साथ-साथ रोकथाम और निरंतर देखभाल पर आधारित मॉडल की ओर बढ़ना होगा।
स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता केवल चिकित्सा तकनीक और उपचार की सफलता से निर्धारित नहीं होती। मरीज को अस्पताल में कैसा अनुभव मिलता है, उसकी बात कितनी गंभीरता से सुनी जाती है और उसे बीमारी तथा उपचार के बारे में कितनी स्पष्ट जानकारी दी जाती है—ये सभी पहलू भी महत्वपूर्ण हैं।
प्रो. श्रीनिवास ने कहा कि सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों के अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाओं के साथ आतिथ्य, संवेदनशीलता और मरीजों के प्रति सम्मान का समुचित समन्वय होना चाहिए। मरीज और उसके परिवार को उपचार की प्रक्रिया, संभावित जोखिमों तथा आगे की देखभाल के बारे में समझाना स्वास्थ्य सेवाओं में भरोसा कायम करने के लिए आवश्यक है।
उन्होंने निजी अस्पतालों से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में सहयोग देने और दूसरे तथा तीसरे स्तर के शहरों में भी किफायती स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने का आग्रह किया। गुणवत्तापूर्ण उपचार की उपलब्धता केवल बड़े महानगरों तक सीमित रहने से स्वास्थ्य सेवाओं में क्षेत्रीय असमानता बनी रह सकती है।
छोटे शहरों में बेहतर अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्सक, आधुनिक जांच सुविधाएं और आवश्यक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होने से मरीजों को इलाज के लिए दूर-दराज के शहरों की यात्रा करने की जरूरत कम हो सकती है। इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग, स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता तथा स्थानीय जरूरतों के अनुसार निवेश महत्वपूर्ण होगा।
मेडिकल एक्सीलेंस जापान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. केंजी शिबुया ने कहा कि भारत और जापान के पास मिलकर स्वास्थ्य क्षेत्र में परिवर्तन का नेतृत्व करने का विशिष्ट अवसर है। उन्होंने भारत की ‘हील इन इंडिया’ पहल की सराहना करते हुए कहा कि आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद तथा स्वास्थ्य और कल्याण के प्रति जागरूकता के समन्वय से भारत वैश्विक स्वास्थ्य एवं उपचार केंद्र के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।
भारत और जापान के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग से चिकित्सा विशेषज्ञता, तकनीकी नवाचार, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के नए अवसर सामने आ सकते हैं। दोनों देशों के अनुभवों का आदान-प्रदान स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने और मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने में सहायक हो सकता है।
भारत की बड़ी आबादी और विविध स्वास्थ्य जरूरतों को देखते हुए ऐसी साझेदारियां विशेष महत्व रखती हैं। वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसेमंद स्वास्थ्य केंद्र के रूप में पहचान बनाने के लिए उपचार की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा, पारदर्शिता और सेवाओं की निरंतरता को मजबूत करना भी आवश्यक है।
फिक्की स्वास्थ्य सेवा समिति के अध्यक्ष तथा फोर्टिस हेल्थकेयर के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. आशुतोष रघुवंशी ने कहा कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें विश्वस्तरीय चिकित्सा क्षमताओं के साथ किफायती उपचार, व्यापक पहुंच और लोगों का विश्वास सुनिश्चित हो।
उन्होंने कहा कि इस दिशा में निरंतर निवेश, रोगों की रोकथाम, समय रहते निदान, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता और सरकारी एवं निजी क्षेत्र के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता है।
भारत की स्वास्थ्य जरूरतें लगातार बदल रही हैं। बढ़ती आबादी, गैर-संचारी रोगों का बोझ, उन्नत उपचार की मांग और स्वास्थ्य सेवाओं की क्षेत्रीय असमानता जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए दीर्घकालिक योजना जरूरी है। इसके लिए अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, जांच सुविधाओं और प्रशिक्षित मानव संसाधन पर भी ध्यान देना होगा।
किफायती उपचार का अर्थ केवल इलाज की कीमत कम करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि मरीज को सही समय पर उचित उपचार मिले और इलाज के खर्च के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति पर असहनीय दबाव न पड़े। व्यापक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में आगे बढ़ने के लिए वित्तीय सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के बीच संतुलन आवश्यक है।
जॉनसन एंड जॉनसन के कंट्री लीड, जेएंडजे मेडटेक इंडिया एवं सर्जरी के उपाध्यक्ष अनुज पसरीजा ने कहा कि भविष्य के अस्पतालों की पहचान केवल उनकी इमारतों, बिस्तरों या ऑपरेशन थिएटरों से नहीं होगी। उनकी वास्तविक पहचान इस बात से तय होगी कि वे मरीज की उपचार यात्रा के प्रत्येक चरण में उससे कितनी प्रभावी तरह जुड़े रहते हैं।
मरीज की उपचार यात्रा में बीमारी की पहचान, जांच, विशेषज्ञ से परामर्श, उपचार, अस्पताल से छुट्टी और उसके बाद की देखभाल जैसे कई चरण शामिल होते हैं। इन चरणों के बीच बेहतर समन्वय होने से मरीज को अधिक व्यवस्थित और निरंतर सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
इस दृष्टिकोण में मरीज की जरूरतों को केंद्र में रखना, उपचार संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से देना और विभिन्न स्वास्थ्यकर्मियों के बीच प्रभावी संवाद सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। अस्पतालों के लिए भविष्य की तैयारी का अर्थ केवल नई तकनीक अपनाना नहीं, बल्कि तकनीक, चिकित्सा विशेषज्ञता और मरीज-केंद्रित सेवाओं का बेहतर संयोजन तैयार करना भी है।
फिक्की स्वास्थ्य सेवा समिति के सह-अध्यक्ष वरुण खन्ना ने फिक्की हील के 20 वर्ष पूरे होने पर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, किफायती, समानतापूर्ण और नवाचार-आधारित बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था का लक्ष्य प्रत्येक मरीज को गुणवत्तापूर्ण उपचार और वास्तविक मूल्य प्रदान करना होना चाहिए।
सम्मेलन में प्रस्तुत विचारों और जारी रिपोर्टों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, डिजिटल तकनीक के उपयोग, किफायती उपचार, कुशल स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित की गई।
स्वास्थ्य क्षेत्र में नवाचार का वास्तविक लाभ तभी दिखाई देगा, जब उसका असर मरीजों की सुरक्षा, उपचार के परिणामों, सेवाओं की उपलब्धता और इलाज के खर्च पर भी पड़े। इसके लिए तकनीक और निवेश के साथ स्पष्ट गुणवत्ता मानक, प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा जवाबदेही की व्यवस्था भी जरूरी होगी।
फिक्की हील 2026 के 20वें संस्करण में सामने आए विचारों ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने मौजूद प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। एक ओर अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा और उपचार की गुणवत्ता के न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल स्वास्थ्य, एआई, बीमारी की रोकथाम और किफायती उपचार को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देना भी जरूरी है।
भारत को वैश्विक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में स्थापित करने और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ आम नागरिक की जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। अस्पतालों में सुरक्षित उपचार, समय पर निदान, सम्मानजनक व्यवहार और आर्थिक सुरक्षा के समन्वय से ही लोगों का भरोसा मजबूत किया जा सकता है।
सम्मेलन का व्यापक संदेश यही रहा कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अधिक अस्पताल बनाने या नई तकनीक अपनाने तक सीमित नहीं हो सकती। उसकी सफलता इस बात से तय होगी कि वह हर मरीज को कितना सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और किफायती उपचार उपलब्ध करा पाती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


