यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली: करीब एक साल से हर महीने असहनीय दर्द झेल रही 44 वर्षीय महिला को आखिरकार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के डॉक्टरों ने राहत दिलाई। महिला को मासिक धर्म के दौरान होने वाला तेज दर्द उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को लगातार प्रभावित कर रहा था। दर्द से राहत पाने के लिए उन्हें बार-बार दवाओं का सहारा लेना पड़ता था। जांच में गर्भाशय से जुड़ी गंभीर समस्याओं का पता चला, जिसके बाद डॉक्टरों ने सर्जरी करने का फैसला किया। महिला की शारीरिक स्थिति और दूसरी बीमारियों को देखते हुए यह ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण था। इसके बावजूद डॉक्टरों की बहु-विषयक टीम ने करीब 90 मिनट में सर्जरी पूरी कर ली। ऑपरेशन के बाद महिला की स्थिति में सुधार हुआ और तीसरे दिन उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इस मामले की सबसे खास बात यह थी कि महिला की लंबाई महज 98 सेंटीमीटर और वजन केवल 22 किलोग्राम था। वह वर्ष 2019 से गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित थीं। इस बीमारी में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और मामूली दबाव या गलत स्थिति में रखने से भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, महिला को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी थी। ऐसे में डॉक्टरों के सामने चुनौती केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि ऑपरेशन से पहले, उसके दौरान और बाद में महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी था।
एम्स के स्त्री रोग, एंडोक्राइनोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग के विशेषज्ञों ने मिलकर इस सर्जरी की योजना बनाई। मरीज की कमजोर हड्डियों, कम वजन, सांस की नली में ट्यूब डालने की कठिनाई और पेट के भीतर सीमित जगह जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए हर चरण की तैयारी की गई। डॉक्टरों ने महिला की इच्छा के अनुसार दूरबीन विधि से सर्जरी करने का विकल्प अपनाया, ताकि बड़े चीरे से बचा जा सके और रिकवरी में मदद मिल सके।
44 वर्षीय महिला पिछले करीब एक साल से मासिक धर्म के दौरान होने वाले तेज दर्द से परेशान थीं। यह दर्द इतना अधिक था कि उनकी सामान्य दिनचर्या प्रभावित होने लगी थी। उन्हें बार-बार दवाएं लेनी पड़ती थीं, लेकिन इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा था।
जांच के दौरान डॉक्टरों को पता चला कि महिला को एडिनोमायोसिस और डीप पेल्विक एंडोमेट्रियोसिस की समस्या है। ये दोनों स्थितियां महिलाओं में लंबे समय तक बने रहने वाले पेल्विक दर्द और मासिक धर्म के दौरान गंभीर तकलीफ का कारण बन सकती हैं।
एडिनोमायोसिस में गर्भाशय की अंदरूनी परत से संबंधित ऊतक गर्भाशय की मांसपेशियों की दीवार में मौजूद होने लगते हैं। इससे गर्भाशय का आकार बढ़ सकता है और मासिक धर्म के दौरान दर्द तथा अधिक रक्तस्राव जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
वहीं, डीप पेल्विक एंडोमेट्रियोसिस में गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी कोशिकाओं वाला ऊतक श्रोणि यानी पेल्विक क्षेत्र के भीतर गहराई तक मौजूद हो सकता है। इससे आसपास के अंगों और ऊतकों के साथ चिपकाव बनने तथा दर्द बढ़ने की आशंका रहती है।
महिला के मामले में इन समस्याओं के साथ उनकी अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी मौजूद थीं। डॉक्टरों के सामने ऐसा उपचार चुनने की चुनौती थी, जिससे उन्हें लंबे समय से परेशान कर रहे दर्द से राहत मिल सके और साथ ही उनकी दूसरी बीमारियों से जुड़े जोखिमों को भी कम रखा जा सके।
महिला की जांच और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों का आकलन करने के बाद डॉक्टरों ने उपचार के विकल्पों पर विचार किया। उनकी शारीरिक स्थिति और अन्य बीमारियों को देखते हुए हार्मोनल उपचार को उपयुक्त विकल्प नहीं माना गया।
काफी विचार-विमर्श के बाद डॉक्टरों ने गर्भाशय निकालने यानी हिस्टेरेक्टॉमी करने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य उन समस्याओं का उपचार करना था, जो महिला को लंबे समय से दर्द और परेशानी दे रही थीं।
हालांकि, महिला की गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस की स्थिति के कारण सर्जरी करना सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अधिक जोखिम भरा था। ऑपरेशन के दौरान मरीज को जिस स्थिति में रखा जाता है, उससे उनकी कमजोर हड्डियों पर दबाव पड़ सकता था। इससे फ्रैक्चर होने की आशंका थी।
डॉक्टरों को इस बात का भी ध्यान रखना था कि महिला का वजन बहुत कम था और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी थी। ऐसे में एनेस्थीसिया, दवाओं की खुराक, सांस लेने की व्यवस्था और संभावित रक्तस्राव से निपटने की तैयारी को विशेष रूप से मरीज की जरूरतों के अनुसार तय करना जरूरी था।
इस सर्जरी की तैयारी में सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक महिला को ऑपरेशन के दौरान सुरक्षित स्थिति में रखना था। गर्भाशय निकालने की कई सर्जरी में मरीज को ऐसी विशेष स्थिति में रखा जाता है, जिससे डॉक्टरों को पेल्विक क्षेत्र तक आसानी से पहुंच मिल सके।
लेकिन इस महिला की हड्डियां गंभीर रूप से कमजोर थीं। सामान्य तरीके से लिटाने या पैरों और कमर को विशेष स्थिति में रखने से हड्डियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता था। डॉक्टरों को आशंका थी कि ऐसा होने पर कमर या जांघ की हड्डियों में फ्रैक्चर हो सकता है।
इस जोखिम को देखते हुए टीम ने महिला को पीठ के बल लिटाकर ऑपरेशन करने की योजना बनाई। उनके शरीर को सहारा देने के लिए विशेष कुशनिंग और अतिरिक्त सावधानियों की व्यवस्था की गई, ताकि ऑपरेशन के दौरान हड्डियों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
यह निर्णय सर्जरी की योजना का अहम हिस्सा था। डॉक्टरों को एक ओर गर्भाशय तक सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करनी थी, वहीं दूसरी ओर महिला की शारीरिक बनावट और हड्डियों की स्थिति को देखते हुए संभावित चोट से बचाना था।
महिला और उनके परिवार की इच्छा थी कि ऑपरेशन दूरबीन विधि यानी लैप्रोस्कोपिक तकनीक से किया जाए। डॉक्टरों ने इस विकल्प को ध्यान में रखते हुए सर्जरी की योजना बनाई। न्यूनतम चीर-फाड़ वाली तकनीक में आमतौर पर बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती और कई मामलों में मरीज को जल्दी स्वस्थ होने में मदद मिल सकती है।
ऑपरेशन करने वाली प्रोफेसर रीता माहे ने बताया कि एडिनोमायोसिस के कारण महिला का गर्भाशय बढ़ा हुआ था। इसके अलावा, गर्भाशय और अंडाशय आसपास की आंतों से चिपके हुए थे। पेट के भीतर काम करने के लिए जगह भी बहुत सीमित थी।
इन परिस्थितियों ने सर्जरी को और जटिल बना दिया। बढ़े हुए गर्भाशय और आसपास के अंगों के बीच चिपकाव के कारण डॉक्टरों को बेहद सावधानी से काम करना था। किसी भी चरण में आसपास के अंगों को नुकसान पहुंचने से बचाना महत्वपूर्ण था।
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में डॉक्टर छोटे चीरे के माध्यम से कैमरे और विशेष उपकरणों की मदद से ऑपरेशन करते हैं। इस तकनीक में पेट के भीतर सीमित जगह में काम करना पड़ता है। जब आसपास के अंगों के बीच चिपकाव मौजूद हो और गर्भाशय का आकार बढ़ा हुआ हो, तो प्रक्रिया अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
महिला की कम लंबाई और कम वजन को देखते हुए भी उपकरणों के इस्तेमाल तथा ऑपरेशन के दौरान शरीर की स्थिति पर विशेष ध्यान देना जरूरी था।
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद डॉक्टरों की टीम ने सावधानीपूर्वक प्रक्रिया पूरी की और करीब 90 मिनट में गर्भाशय निकालने की सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न कर ली।
सर्जरी के दौरान केवल गर्भाशय निकालने की प्रक्रिया ही कठिन नहीं थी, बल्कि एनेस्थीसिया देने के लिए आवश्यक कदम भी अतिरिक्त सावधानी की मांग कर रहे थे।
डॉ. परिन लालवानी ने बताया कि महिला की हड्डियां कमजोर होने के कारण उन्हें लिटाने, नस में कैनुला लगाने और सांस की नली में ट्यूब डालने जैसी प्रक्रियाओं के दौरान भी फ्रैक्चर का जोखिम था।
एनेस्थीसिया के दौरान मरीज को सुरक्षित तरीके से बेहोश करना, सांस लेने की व्यवस्था बनाए रखना और ऑपरेशन के दौरान शरीर की महत्वपूर्ण गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी होता है। इस महिला की शारीरिक बनावट के कारण इन प्रक्रियाओं में विशेष योजना की आवश्यकता थी।
उनकी गर्दन छोटी होने के कारण सांस की नली में ट्यूब डालना भी चुनौतीपूर्ण था। ऐसी स्थिति में एनेस्थीसिया विशेषज्ञों को वायुमार्ग तक सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है।
महिला का वजन केवल 22 किलोग्राम था। इसलिए दवाओं की खुराक उनकी शारीरिक स्थिति के अनुरूप तय की गई। डॉक्टरों ने संभावित रक्तस्राव की आशंका को ध्यान में रखते हुए ऑपरेशन से पहले ही रक्त की व्यवस्था कर ली थी।
इन सभी तैयारियों का उद्देश्य सर्जरी के दौरान संभावित जोखिमों को कम करना और मरीज की सुरक्षा बनाए रखना था।
ऑपरेशन के बाद दर्द को नियंत्रित करना भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा था। महिला की शारीरिक स्थिति और दूसरी बीमारियों को देखते हुए डॉक्टरों ने दर्द प्रबंधन के लिए विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया।
डॉ. परिन लालवानी के अनुसार, दर्द कम करने के लिए एपिड्यूरल तकनीक के बजाय अल्ट्रासाउंड की मदद से पेट की नसों को सुन्न करने वाली तकनीक अपनाई गई।
अल्ट्रासाउंड-निर्देशित नर्व ब्लॉक जैसी तकनीकों में डॉक्टर अल्ट्रासाउंड की सहायता से संबंधित क्षेत्र की संरचनाओं को देखकर दवा पहुंचाते हैं। इसका उद्देश्य दर्द के संकेतों को कम करना और मरीज को ऑपरेशन के बाद राहत देना होता है।
इस महिला के मामले में दर्द नियंत्रण की योजना तैयार करते समय उनकी कम वजन वाली शारीरिक बनावट, ऑस्टियोपोरोसिस और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों को ध्यान में रखा गया।
ऑपरेशन के बाद दर्द को प्रभावी तरीके से नियंत्रित करना मरीज की रिकवरी, आराम और सामान्य गतिविधियों की ओर लौटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सर्जरी के बाद महिला की स्थिति में सुधार हुआ। डॉक्टरों की निगरानी में उनकी रिकवरी हुई और तीसरे दिन उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
करीब एक साल से हर महीने गंभीर दर्द झेल रही महिला के लिए यह उपचार राहत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। लगातार दर्द के कारण उनकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही थी और उन्हें बार-बार दवाओं की जरूरत पड़ रही थी।
सर्जरी के बाद अस्पताल से छुट्टी मिलना इस बात का संकेत था कि उस समय उनकी स्थिति घर पर आगे की देखभाल के लिए पर्याप्त रूप से स्थिर थी। हालांकि, ऑपरेशन के बाद दीर्घकालिक राहत और आगे की रिकवरी का आकलन चिकित्सकीय फॉलो-अप के आधार पर किया जाता है।
महिला की गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं को देखते हुए आगे की देखभाल में भी सावधानी और नियमित चिकित्सकीय सलाह महत्वपूर्ण रहेगी।
एम्स के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख प्रोफेसर नीना मल्होत्रा ने कहा कि यह मामला दिखाता है कि उचित योजना, विशेषज्ञों के बीच समन्वय और मरीज की जरूरतों के अनुरूप देखभाल के जरिए बेहद जटिल परिस्थितियों में भी न्यूनतम चीर-फाड़ वाली सर्जरी संभव हो सकती है।
इस ऑपरेशन में स्त्री रोग विशेषज्ञों के साथ एंडोक्राइनोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग की विशेषज्ञता भी महत्वपूर्ण रही। महिला की हड्डियों की गंभीर कमजोरी, कम वजन और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच समन्वय आवश्यक था।
ऐसे मामलों में सर्जरी की सफलता केवल ऑपरेशन करने की तकनीकी क्षमता पर निर्भर नहीं करती। मरीज को किस स्थिति में रखा जाए, एनेस्थीसिया कैसे दिया जाए, दवाओं की खुराक क्या हो, रक्तस्राव की स्थिति में क्या व्यवस्था हो और ऑपरेशन के बाद दर्द को कैसे नियंत्रित किया जाए—इन सभी पहलुओं पर एक साथ ध्यान देना पड़ता है।
इस मामले में टीम ने ऑपरेशन से पहले ही संभावित चुनौतियों की पहचान की और उनके अनुरूप तैयारी की। इससे सर्जरी को व्यवस्थित ढंग से पूरा करने में मदद मिली।
इस मामले की अहमियत केवल इस बात में नहीं है कि गर्भाशय निकालने की सर्जरी करीब 90 मिनट में पूरी हुई। इसकी खासियत यह भी है कि मरीज की कई जटिल स्वास्थ्य स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऑपरेशन की पूरी योजना तैयार की गई।
इस सर्जरी के प्रमुख पहलू रहे:
गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस: कमजोर हड्डियों के कारण शरीर को सुरक्षित स्थिति में रखना और फ्रैक्चर से बचाना जरूरी था।
कम लंबाई और वजन: महिला की लंबाई 98 सेंटीमीटर और वजन 22 किलोग्राम होने के कारण दवाओं और अन्य प्रक्रियाओं में विशेष सावधानी बरतनी पड़ी।
गर्भाशय का बढ़ा हुआ आकार: एडिनोमायोसिस के कारण गर्भाशय बड़ा था और आसपास के अंगों से चिपकाव मौजूद था।
सीमित जगह: पेट के भीतर काम करने के लिए कम जगह होने से लैप्रोस्कोपिक सर्जरी चुनौतीपूर्ण थी।
एनेस्थीसिया का जोखिम: छोटी गर्दन और कमजोर हड्डियों के कारण सांस की नली में ट्यूब डालने सहित कई प्रक्रियाओं में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत थी।
विशेष दर्द प्रबंधन: ऑपरेशन के बाद दर्द नियंत्रित करने के लिए अल्ट्रासाउंड की मदद से पेट की नसों को सुन्न करने वाली तकनीक अपनाई गई।
इन परिस्थितियों में डॉक्टरों के लिए हर छोटे कदम की योजना बनाना महत्वपूर्ण था।
एम्स में हुई यह सर्जरी बताती है कि जटिल स्वास्थ्य समस्याओं वाले मरीजों का उपचार करते समय व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप योजना बनाना कितना महत्वपूर्ण होता है। महिला को लंबे समय से परेशान कर रहे दर्द का कारण पता लगाने के बाद डॉक्टरों ने उपचार के विकल्पों पर विचार किया और उनकी स्थिति को देखते हुए सर्जरी का फैसला लिया।
ऑपरेशन से पहले हड्डियों के फ्रैक्चर का जोखिम, कम वजन, एनेस्थीसिया से जुड़ी चुनौतियां और पेट के भीतर सीमित जगह जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया गया। इसके बाद विशेषज्ञों की टीम ने करीब 90 मिनट में प्रक्रिया पूरी की और मरीज को तीसरे दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इस मामले में स्त्री रोग विशेषज्ञों, एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञों और एनेस्थीसिया टीम के बीच समन्वय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह भी स्पष्ट हुआ कि जटिल सर्जरी की तैयारी में मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।
यह कहानी सिर्फ 90 मिनट में पूरी हुई एक सर्जरी की नहीं, बल्कि उस महिला को लंबे समय से परेशान कर रहे दर्द से राहत दिलाने के लिए की गई सावधानीपूर्ण चिकित्सा कोशिश की भी है। उचित योजना, विशेषज्ञता और टीमवर्क के सहारे डॉक्टरों ने एक चुनौतीपूर्ण मामले में उपचार का रास्ता तैयार किया।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


