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- 12h ago
नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ लगातार सामने आ रही दुष्कर्म और छेड़छाड़ की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने दिल्ली पुलिस से साफ शब्दों में कहा कि केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पुलिस को ऐसा माहौल तैयार करना होगा कि अपराध करने से पहले ही अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा हो।
दिल्ली-एनसीआर में हाल के दिनों में सामने आए दुष्कर्म के मामलों, जिनमें नोएडा से दिल्ली के बीच चलती स्लीपर बस में नाबालिग से दुष्कर्म का मामला भी शामिल है, पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई की। मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली, सीसीटीवी निगरानी, पुलिस की गश्त और अपराध रोकने की रणनीति को लेकर अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य अपराध को होने से रोकना है। अदालत ने सवाल किया कि अगर किसी पार्क या सार्वजनिक स्थान पर सीसीटीवी कैमरा लगा भी दिया जाए, लेकिन उसकी लगातार निगरानी न हो तो उसका वास्तविक फायदा क्या होगा?
जस्टिस पारदीवाला ने पुलिस से पूछा कि सीसीटीवी कैमरा यह तो बता सकता है कि किसी व्यक्ति ने पार्क में किस समय प्रवेश किया और किस समय बाहर निकला, लेकिन अगर अपराध हो जाने के बाद फुटेज देखी जाएगी तो उससे अपराध को पहले कैसे रोका जा सकेगा?
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कैमरों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। कैमरों से मिलने वाली जानकारी पर तत्काल कार्रवाई करने के लिए प्रभावी मॉनिटरिंग व्यवस्था भी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि क्या राजधानी में ऐसा कोई प्रभावी सिस्टम मौजूद है, जहां सार्वजनिक स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की लगातार निगरानी की जाती हो।
अदालत ने कहा कि अगर सीसीटीवी की निगरानी किसी 'वॉर रूम' या मॉनिटरिंग सेंटर से लगातार नहीं होगी तो अपराध रोकने में कैमरों की उपयोगिता सीमित रह जाएगी।
कोर्ट का कहना था कि पुलिस को केवल घटना के बाद जांच करने वाली एजेंसी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पुलिस की मौजूदगी और निगरानी ऐसी होनी चाहिए कि संदिग्ध गतिविधि दिखाई देते ही पुलिस मौके पर पहुंच सके और संभावित अपराध को रोका जा सके।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने दिल्ली पुलिस से अपराधियों के मन में कानून का भय पैदा करने को लेकर भी सवाल किया।
अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति अपराध करने के लिए तैयार है, उसके मन में यह डर होना चाहिए कि अगर उसने अपराध किया तो उसके खिलाफ तत्काल और कड़ी कार्रवाई होगी। पुलिस को अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म नहीं होने देना चाहिए।
अदालत ने सवाल किया कि क्या दिल्ली पुलिस ऐसा प्रभाव पैदा कर पा रही है कि अपराधी अपराध करने से पहले कई बार सोचें?
कोर्ट की टिप्पणी का मूल संदेश यही था कि कानून का डर अपराध होने के बाद नहीं, अपराध करने से पहले दिखाई देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने उन स्थानों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई जहां लड़कियों और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ या अन्य आपराधिक घटनाएं होने की आशंका अधिक रहती है।
अदालत ने कहा कि कॉलेजों, स्कूलों, पार्कों, सार्वजनिक स्थानों, सुनसान इलाकों और ऐसे स्थानों पर विशेष निगरानी होनी चाहिए जहां असामाजिक तत्वों की गतिविधियां देखी जाती हैं।
पुलिस को ऐसे स्थानों की पहचान कर वहां नियमित गश्त और निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए। केवल शिकायत मिलने का इंतजार करने के बजाय पुलिस को संभावित अपराध वाले स्थानों पर पहले से सक्रिय रहना होगा।
अदालत ने खास तौर पर उन जगहों को लेकर चिंता जताई जहां छात्राओं और युवतियों को परेशान किया जाता है। कॉलेज परिसरों और उनके आसपास होने वाली छेड़छाड़ जैसी घटनाओं को गंभीरता से लेने की जरूरत बताई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि किसी इलाके में लगातार महिलाओं या छात्राओं को परेशान किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं तो उस क्षेत्र को सामान्य क्षेत्र मानकर पुलिस नहीं चल सकती। वहां अतिरिक्त पुलिस व्यवस्था, गश्त और निगरानी की आवश्यकता हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और आम जनता के बीच सीधा संवाद बढ़ाने पर भी जोर दिया। अदालत ने सवाल किया कि क्या पुलिस को जनता के साथ नियमित रूप से बातचीत नहीं करनी चाहिए?
कोर्ट का मानना है कि कानून-व्यवस्था केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि जनता और पुलिस के बीच भरोसे का संबंध भी अपराध रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
स्थानीय लोगों से बातचीत के जरिए पुलिस को उन इलाकों की जानकारी मिल सकती है जहां असामाजिक तत्व सक्रिय हैं, जहां महिलाओं को परेशानी होती है या जहां रात के समय सुरक्षा व्यवस्था कमजोर रहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने आने वाले त्योहारों को लेकर भी दिल्ली पुलिस की तैयारियों पर सवाल किए। अदालत ने कहा कि दुर्गा पूजा और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान राजधानी में भीड़ बढ़ती है और ऐसे समय में असामाजिक तत्वों की गतिविधियों पर अतिरिक्त निगरानी की जरूरत होती है।
त्योहारों के दौरान बाजारों, पूजा स्थलों, सार्वजनिक परिवहन, पार्किंग क्षेत्रों, भीड़भाड़ वाले इलाकों और महिलाओं की अधिक आवाजाही वाले स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता होती है।
अदालत ने पुलिस को चुनौती के रूप में इस स्थिति को लेने की बात कही और कहा कि सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद कमियों को समय रहते दूर किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हर सार्वजनिक स्थान के प्रत्येक हिस्से में सीसीटीवी लगाना संभव नहीं हो सकता, लेकिन जहां संभव हो वहां रणनीतिक स्थानों पर कैमरे लगाए जा सकते हैं।
अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर पूरे पार्क को कैमरों से कवर करना संभव नहीं है तो कम से कम उसके मुख्य प्रवेश और निकास द्वारों पर कैमरे लगाए जाएं।
इससे संदिग्ध लोगों की आवाजाही पर नजर रखने में मदद मिल सकती है और किसी घटना की स्थिति में जांच के लिए महत्वपूर्ण सुराग भी मिल सकते हैं।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैमरा लगाना अपने आप में समाधान नहीं है। उसके साथ 24 घंटे की मॉनिटरिंग और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था भी होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से अपेक्षा जताई कि वह महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
अदालत ने पुलिस को यह संदेश दिया कि सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की लापरवाही का खामियाजा आम नागरिकों को नहीं भुगतना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि छेड़छाड़ या दुष्कर्म की शिकार होने वाली हर महिला और लड़की की सुरक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। पुलिस को इस चुनौती को गंभीरता से लेना होगा और किसी भी संभावित खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
दिल्ली-एनसीआर में हाल में सामने आए मामलों में नोएडा से दिल्ली के बीच चलती स्लीपर बस में नाबालिग के साथ दुष्कर्म का मामला भी बेहद गंभीर है। आरोपों के मुताबिक बस के चालक और क्लीनर पर नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगा था।
इस तरह की घटना ने सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
चलती बस में इस तरह की वारदात सामने आने के बाद परिवहन व्यवस्था, बसों की निगरानी, चालक-कंडक्टर के सत्यापन, यात्रियों की सुरक्षा और आपातकालीन सहायता व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठते हैं।
दिल्ली के कालकाजी इलाके में नाबालिग बच्ची के साथ पुलिसकर्मी बनकर गैंगरेप किए जाने का मामला भी सामने आया था। इस घटना ने अपराधियों द्वारा पुलिस की पहचान का दुरुपयोग करने और महिलाओं तथा बच्चों को निशाना बनाने के खतरे को उजागर किया।
ऐसी घटनाओं को देखते हुए पुलिस व्यवस्था में केवल अपराध के बाद जांच ही नहीं, बल्कि संदिग्ध गतिविधियों पर पहले से नजर रखने की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहा कि पुलिस अपराध होने के बाद कितनी तेजी से कार्रवाई करती है, इसके साथ-साथ अपराध होने से पहले उसे रोकने के लिए क्या कर रही है।
अदालत ने पुलिस से यह जानने की कोशिश की कि क्या उसके पास संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी का कोई ठोस सिस्टम है? क्या सीसीटीवी से मिलने वाली जानकारी पर तत्काल प्रतिक्रिया देने की व्यवस्था है? क्या पुलिस को ऐसे अपराधियों और असामाजिक तत्वों की गतिविधियों की पहले से जानकारी रहती है?
इन सवालों का उद्देश्य केवल किसी एक घटना की जांच नहीं, बल्कि राजधानी की समग्र सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।
राजधानी दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रही है। सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा, रात में पुलिस गश्त, सार्वजनिक परिवहन में निगरानी, सीसीटीवी कैमरे, आपातकालीन सहायता और त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया—ये सभी सुरक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
लेकिन किसी भी सुरक्षा व्यवस्था की सफलता तभी मानी जाएगी जब आम महिला बिना डर के स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, बाजार या किसी अन्य स्थान पर आ-जा सके।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में केवल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रिवेंटिव पुलिसिंग यानी अपराध को पहले ही रोकने की जरूरत पर जोर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद दिल्ली पुलिस के सामने अपनी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की चुनौती है।
संवेदनशील स्थानों की पहचान, सीसीटीवी मॉनिटरिंग, पुलिस गश्त, स्थानीय लोगों से संवाद, त्योहारों के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन की जांच और अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई जैसे कदम आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अदालत का संदेश स्पष्ट है कि अपराध होने का इंतजार करने के बजाय पुलिस को पहले से सक्रिय रहना होगा।
दिल्ली-एनसीआर में हाल के दुष्कर्म मामलों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिए जाने के बाद मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।
आने वाली सुनवाई में दिल्ली पुलिस की ओर से सुरक्षा व्यवस्था और अपराध रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि राजधानी जैसे बड़े महानगर में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त है या फिर जमीन पर लगातार निगरानी, पुलिस की मौजूदगी और त्वरित कार्रवाई का मजबूत तंत्र भी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की पूरी चिंता का केंद्र यही है—अपराध होने के बाद अपराधी को पकड़ना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि अपराधी अपराध करने से पहले ही कानून के डर से रुक जाए।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


