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- 10h ago
नई दिल्ली। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर शनिवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। करीब सात वर्षों के अंतराल के बाद चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा और गलवान संघर्ष के बाद दोनों नेताओं की आमने-सामने हुई इस बातचीत को भारत-चीन संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। बैठक में दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने, आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत बढ़ाने और मतभेदों को प्रभावी तरीके से प्रबंधित करने पर चर्चा हुई।
बैठक के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि भारत और चीन को एक-दूसरे की खूबियों से सीखते हुए साझा विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की राष्ट्रीय परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन दोनों पक्ष एक-दूसरे की ताकत और अनुभवों से सीख सकते हैं तथा एक-दूसरे का समर्थन करते हुए विकास के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
शी ने भारत-चीन संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि चीन हमेशा भारत के साथ संबंधों को बेहतर और स्थिर बनाए रखने का समर्थन करता रहा है।
चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि भारत और चीन को ‘ग्रेटर ब्रिक्स सहयोग’ के तहत उच्च गुणवत्ता वाले विकास के लिए मिलकर काम करना चाहिए। उनके मुताबिक, दोनों देशों के बीच सहयोग केवल द्विपक्षीय स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी इसका विस्तार होना चाहिए।
शी ने कहा कि भारत और चीन दुनिया के दो बड़े विकासशील देश हैं और दोनों की भूमिका वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने में महत्वपूर्ण है। ऐसे में दोनों देशों के बीच सहयोग से विकासशील देशों के लिए नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि दोनों देश अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुरूप विकास के रास्ते तलाशते हुए एक-दूसरे के अनुभवों का लाभ उठा सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति के सकारात्मक वक्तव्य के लिए उनका धन्यवाद किया। उन्होंने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान चीन की ओर से मिले सहयोग और समर्थन की सराहना की।
प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग का भारत में गर्मजोशी से स्वागत करते हुए कहा कि दोनों देशों के पास अब द्विपक्षीय सहयोग से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से बातचीत करने का अवसर है।
पीएम मोदी ने कहा कि भारत हमेशा इस बात पर जोर देता रहा है कि दोनों देशों के संबंधों में स्थिरता के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता बेहद जरूरी है। सीमा पर किसी भी तरह का तनाव द्विपक्षीय संबंधों के दूसरे क्षेत्रों पर भी असर डाल सकता है। इसलिए सीमा संबंधी मुद्दों के समाधान और सैन्य स्तर पर संवाद के साथ-साथ व्यापक संबंधों को मजबूत करने की जरूरत है।
भारत और चीन के रिश्तों में सीमा विवाद सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक रहा है। भारत का लगातार रुख रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों में वास्तविक सुधार संभव नहीं है।
वहीं चीन की ओर से कई बार यह तर्क दिया जाता रहा है कि सीमा विवाद को दोनों देशों के अन्य द्विपक्षीय संबंधों से अलग रखकर देखा जाना चाहिए। ऐसे में दोनों नेताओं की बैठक में सीमा पर शांति, स्थिरता और संवाद का मुद्दा महत्वपूर्ण रहा।
दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के बावजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से जुड़े मुद्दे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व की बातचीत को आगे की वार्ताओं के लिए राजनीतिक दिशा देने की दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 15 जून 2020 की रात पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। गलवान की घटना के बाद दोनों देशों के संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हुआ था।
इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती बढ़ी और दोनों देशों के बीच कई दौर की सैन्य एवं कूटनीतिक बातचीत हुई। लंबे समय तक चले तनाव के बाद संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में धीरे-धीरे कदम उठाए गए।
ऐसे में लगभग सात वर्ष बाद शी जिनपिंग का भारत दौरा और प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी आमने-सामने बैठक को दोनों देशों के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
बैठक में सीमा से जुड़े हालिया घटनाक्रम पर भी बातचीत हुई। जुलाई में अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबानसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र से जुड़े तनाव और उसके बाद हुई सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत को लेकर भी दोनों पक्षों ने अपने-अपने दृष्टिकोण रखे।
सीमा से जुड़े किसी भी घटनाक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच त्वरित संवाद और सैन्य स्तर पर संपर्क बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया गया। माना जा रहा है कि इस तरह की व्यवस्थाओं का उद्देश्य स्थानीय स्तर की घटनाओं को बड़े विवाद में बदलने से रोकना है।
प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की बैठक में आर्थिक और व्यापारिक संबंध भी महत्वपूर्ण एजेंडे में रहे। भारत ने चीनी बाजार में भारतीय सामानों की बेहतर पहुंच का मुद्दा उठाया।
भारत लंबे समय से चीन के साथ व्यापार में मौजूद असंतुलन को लेकर चिंता जताता रहा है। ऐसे में भारतीय उत्पादों के लिए चीन के बाजार को अधिक खुला और सुगम बनाने का मुद्दा द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध व्यापक हैं और कई भारतीय उद्योग चीन से मशीनरी, उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक घटकों तथा अन्य औद्योगिक सामग्री पर निर्भर हैं। इसलिए आपूर्ति व्यवस्था को स्थिर और भरोसेमंद बनाना दोनों देशों के कारोबार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बैठक में सप्लाई चेन से जुड़ी निर्भरता का मुद्दा भी उठाया गया। भारतीय उद्योगों के सामने चीन से मशीनरी, उपकरण और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता से संबंधित कई तरह की चुनौतियां सामने आती रही हैं।
भारत का प्रयास रहा है कि महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखला अधिक विविध और भरोसेमंद बने। इसके साथ ही जिन क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग से भारतीय उद्योगों को लाभ हो सकता है, वहां स्थिरता बनाए रखने पर भी जोर दिया जा रहा है।
माना जा रहा है कि बातचीत में चीन की ओर से कुछ प्रमुख तकनीकों और उपकरणों के निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों से जुड़े मुद्दे भी उठे।
दोनों नेताओं के बीच भारतीय कारोबारियों और उद्योग जगत से जुड़े लोगों की चीन यात्रा तथा वीजा से संबंधित समस्याओं पर भी चर्चा होने की बात कही गई। कारोबारी गतिविधियों को सुगम बनाने के लिए लोगों की आवाजाही को आसान बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल जैसे कुछ क्षेत्रों में पाबंदियों में ढील दिए जाने के संकेत मिले हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में अब भी सरकारी मंजूरियों और प्रक्रियाओं को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।
भारत का जोर इस बात पर रहा है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को अधिक संतुलित, पारदर्शी और स्थिर बनाया जाए।
हाल में डिक्सन टेक्नोलॉजीज और वीवो के बीच हुई साझेदारी को भारत-चीन कारोबारी संबंधों के संदर्भ में सकारात्मक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में नए अवसर बनने की उम्मीद जताई जा रही है।
भारत लगातार देश में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और वैश्विक कंपनियों को भारत में उत्पादन के लिए आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में चीन की कंपनियों और भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के बीच नियंत्रित एवं पारदर्शी सहयोग आर्थिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
मोदी-शी बैठक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दोनों देशों ने मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। भारत और चीन के बीच सीमा, व्यापार, तकनीक, निवेश और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।
ऐसे में शीर्ष स्तर पर बातचीत का उद्देश्य हर मुद्दे का तत्काल समाधान निकालना ही नहीं, बल्कि विवादों को नियंत्रित रखने के लिए संवाद की स्थायी व्यवस्था मजबूत करना भी है।
भारत की ओर से यह संदेश स्पष्ट रहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता को नजरअंदाज कर आर्थिक एवं अन्य क्षेत्रों में रिश्तों को पूरी तरह सामान्य नहीं किया जा सकता। वहीं चीन की ओर से व्यापक द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग के अनुसार राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की कि अगले वर्ष चीन ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेगा और 19वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
चीन ने संकेत दिया है कि वह अपनी अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स देशों के बीच आम सहमति मजबूत करने और भविष्य की योजनाओं पर मिलकर काम करने को प्राथमिकता देगा।
भारत के बाद चीन की अध्यक्षता ब्रिक्स के भीतर दोनों प्रमुख एशियाई देशों की भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाती है। ब्रिक्स के विस्तार के बाद संगठन में विभिन्न उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी बढ़ी है, जिससे इसका वैश्विक प्रभाव भी व्यापक हुआ है।
शी जिनपिंग ने कहा कि लगभग दो दशकों में ब्रिक्स सहयोग तंत्र लगातार विकसित और विस्तारित हुआ है। उन्होंने इसे उभरते बाजारों और विकासशील देशों के बीच सहयोग के लिए दुनिया के प्रभावशाली मंचों में से एक बताया।
शी के अनुसार ब्रिक्स देशों ने अपनी-अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप विकास के रास्ते तलाशे हैं और आत्मनिर्भरता तथा अपनी क्षमता को मजबूत करने पर ध्यान दिया है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच एकजुटता और सहयोग ने उभरते बाजारों तथा विकासशील देशों के लिए एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है।
मोदी और शी की बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देशों के बीच संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिशें जारी हैं। सीमा पर तनाव कम करने और सैन्य स्तर पर संवाद बढ़ाने के साथ अब आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधों को भी स्थिरता देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
दोनों देशों के सामने चुनौती यह है कि वे रणनीतिक मतभेदों को संभालते हुए उन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाएं जहां पारस्परिक हित जुड़े हुए हैं।
भारत के लिए सीमा पर शांति, निष्पक्ष व्यापार, बाजार तक बेहतर पहुंच और महत्वपूर्ण सप्लाई चेन की विश्वसनीयता अहम मुद्दे हैं। वहीं चीन भारत के साथ व्यापक आर्थिक और बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने की इच्छा जताता रहा है।
मोदी-शी वार्ता का व्यापक संदेश यही रहा कि भारत और चीन के संबंधों को केवल तात्कालिक संकटों के प्रबंधन तक सीमित नहीं रखा जा सकता। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के बावजूद स्थायी संवाद और स्पष्ट नियमों के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाना जरूरी है।
दोनों पक्षों के बीच बातचीत बढ़ने से सीमा पर तनाव को नियंत्रित करने, व्यापारिक बाधाओं को कम करने और आर्थिक सहयोग के नए रास्ते तलाशने की संभावना बन सकती है।
भारत और चीन एशिया की दो बड़ी शक्तियां हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में दोनों देशों के बीच स्थिर संबंधों का प्रभाव केवल द्विपक्षीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया और वैश्विक दक्षिण की राजनीति एवं अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ेगा।
मोदी-शी बैठक से फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही सामने आया कि दोनों देश अपने मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग की प्रक्रिया को जारी रखना चाहते हैं। शी जिनपिंग का एक-दूसरे की खूबियों से सीखने और साझा विकास की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश तथा प्रधानमंत्री मोदी का सीमा पर शांति और स्थिरता को संबंधों की बुनियाद बताना, दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं को सामने रखता है।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि शीर्ष स्तर की इस बातचीत के बाद सीमा, व्यापार, वीजा, तकनीक और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर जमीनी स्तर पर कितनी प्रगति होती है। यदि दोनों देश संवाद की इस प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाते हैं, तो आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों में अधिक स्थिरता और सहयोग का नया दौर देखने को मिल सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


