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- 12h ago
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा और पुलिस कार्रवाई के आरोपों की जांच अब आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई पावर्ड इंक्वायरी कमेटी 29 अक्टूबर को बैठक कर हिंसा से प्रभावित लोगों की शिकायतें सुनेगी। इस दौरान पैलेट गन के कथित इस्तेमाल, चुनिंदा लोगों को निशाना बनाकर हिंसा किए जाने और महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न से जुड़े सबूत दर्ज किए जाएंगे। समिति ने प्रभावित लोगों और आम नागरिकों को अपने आवेदन, शिकायतें और उपलब्ध साक्ष्य पेश करने का अवसर दिया है।
अधिकारियों के मुताबिक, समिति की कार्यवाही सुबह 11 बजे शिक्षा सदन, 17 राउज एवेन्यू इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली स्थित कार्यालय में शुरू होगी। प्रभावित लोग और अन्य संबंधित व्यक्ति सुबह 11:30 बजे से दोपहर 3 बजे तक वहां पहुंचकर अपनी शिकायतें और सबूत प्रस्तुत कर सकेंगे। इसके लिए वैध पहचान पत्र साथ लाना अनिवार्य होगा।
समिति की जांच में पैलेट गन के कथित इस्तेमाल का मुद्दा प्रमुखता से शामिल रहेगा। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि क्या प्रदर्शन के दौरान किसी व्यक्ति या समूह को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया गया था। महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित उत्पीड़न से जुड़े मामलों की भी जांच की जाएगी।
प्रभावित लोगों को अपने साथ उपलब्ध दस्तावेज, तस्वीरें, वीडियो और अन्य प्रासंगिक साक्ष्य लाने का अवसर मिलेगा। समिति इन शिकायतों और प्रस्तुत सामग्री को अपनी जांच के हिस्से के रूप में दर्ज करेगी।
पैलेट गन के कथित इस्तेमाल का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस तरह के हथियारों से निकले छर्रों के कारण गंभीर चोटें लग सकती हैं। हालांकि, इस मामले में पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था या नहीं और यदि हुआ तो किन परिस्थितियों में हुआ, इसका निर्धारण जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है।
जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में महिला प्रदर्शनकारियों के कथित उत्पीड़न के आरोपों की भी जांच की जाएगी। समिति इस संबंध में प्रभावित महिलाओं और अन्य संबंधित व्यक्तियों की बात सुनेगी तथा उपलब्ध साक्ष्यों को दर्ज करेगी।
ऐसे मामलों में शिकायतकर्ताओं के बयान, घटनाओं से संबंधित दस्तावेज और अन्य उपलब्ध सामग्री महत्वपूर्ण हो सकती है। जांच का उद्देश्य आरोपों से जुड़े तथ्यों को सामने लाना और घटनाओं की परिस्थितियों को समझना है।
हालांकि, महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न से जुड़े आरोपों की सत्यता और जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच के निष्कर्षों का इंतजार करना होगा।
समिति की जांच केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगी। अधिकारियों के अनुसार, विरोध प्रदर्शन के दौरान दोनों पक्षों की ओर से जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किए जाने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की भी पड़ताल की जाएगी।
इसका अर्थ है कि जांच के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों से जुड़े आरोपों को भी ध्यान में रखा जाएगा। एक ओर पुलिस की कथित ज्यादती और प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाए जाने के आरोप हैं, तो दूसरी ओर पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोप भी लगाए गए हैं।
समिति के सामने प्रस्तुत होने वाले बयान और साक्ष्य घटनाओं के अलग-अलग पहलुओं को समझने में मदद कर सकते हैं। जांच में आरोपों और उपलब्ध तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।
अधिकारियों ने पहले बताया था कि समिति की सुनवाई 29 और 30 अक्टूबर को दो दिन तक चलेगी। हालांकि, बाद में स्पष्ट किया गया कि यह कार्यवाही 29 अक्टूबर को एक ही दिन होगी।
इस संबंध में प्रभावित लोगों को निर्धारित समय के भीतर समिति के कार्यालय पहुंचकर अपनी शिकायतें दर्ज कराने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है। जो लोग अपनी बात समिति के सामने रखना चाहते हैं, उन्हें निर्धारित समय और पहचान संबंधी आवश्यकताओं का ध्यान रखना होगा।
जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।
समिति में न्यायपालिका, केंद्रीय जांच एजेंसी और पुलिस प्रशासन में काम कर चुके अनुभवी अधिकारियों को शामिल किया गया है। इसके पांच सदस्य हैं:
आर. सुभाष रेड्डी: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और समिति के अध्यक्ष।
रवि शंकर झा: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश।
शालिंदर कौर: दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश।
ऋषि कुमार शुक्ला: सीबीआई के पूर्व निदेशक।
एल. आर. बिश्नोई: मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक।
समिति में अलग-अलग क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को शामिल करने का उद्देश्य मामले से जुड़े आरोपों और घटनाओं की जांच करना है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में आंदोलन के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती के आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों के साथ पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा किए जाने की शिकायतें भी सामने आई थीं।
ऐसे मामलों में जांच समिति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि उसे संबंधित पक्षों के दावों, बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल करनी होती है। केवल आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय घटनाओं की परिस्थितियों और साक्ष्यों का परीक्षण करना आवश्यक है।
29 अक्टूबर को होने वाली कार्यवाही इसी प्रक्रिया का हिस्सा होगी। इस दौरान प्रभावित लोगों को अपनी शिकायतें और उपलब्ध सबूत समिति के समक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़े आरोपों की जांच में 29 अक्टूबर की कार्यवाही अहम पड़ाव हो सकती है। पैलेट गन के कथित इस्तेमाल, महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न, चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मुद्दे जांच के दायरे में हैं।
समिति प्रभावित लोगों की बात सुनकर और उपलब्ध साक्ष्य दर्ज करके मामले के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करेगी। इसके बाद जांच से जुड़े निष्कर्षों और आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।
फिलहाल, प्रभावित लोगों के लिए 29 अक्टूबर को सुबह 11:30 बजे से दोपहर 3 बजे तक शिकायतें और सबूत प्रस्तुत करने का अवसर निर्धारित किया गया है। समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने वाले लोगों को वैध पहचान पत्र साथ ले जाना होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


