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- 12h ago
नई दिल्ली। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष की कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत INDIA गठबंधन के 11 नेताओं की ओर से दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को तत्काल प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है। याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), मतदाता सूची में बदलाव, चुनाव आयोग के निर्णयों की वैधानिकता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, याचिका 12 अक्टूबर 2026 को शाम 4:37 बजे दाखिल की गई और इसे डायरी नंबर 64196/2026 दिया गया। बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि याचिका की आवश्यक प्रक्रिया उसी दिन पूरी की जाए। यदि दस्तावेजों में कोई कमी हो तो उसे दूर कराया जाए, ताकि मामले को मंगलवार, 13 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर विचार किया जा सके।
हालांकि, याचिका का सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होना और अदालत द्वारा उस पर कोई अंतरिम आदेश पारित किया जाना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए एसआईआर पर रोक या चुनाव आयोग के खिलाफ किसी कार्रवाई को लेकर अंतिम स्थिति अदालत के आधिकारिक आदेश से ही स्पष्ट होगी।
इस याचिका में राहुल गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, एमए बेबी, डी. राजा, महुआ माजी, सुप्रिया सुले और ई.टी. मोहम्मद बशीर के नाम याचिकाकर्ताओं के रूप में बताए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रसन्ना एस. के पैरवी करने की जानकारी दी गई है। याचिका में कुल चार प्रतिवादियों को शामिल किया गया है। इनमें भारत निर्वाचन आयोग के अलावा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं।
विपक्षी नेताओं का मुख्य जोर इस बात पर है कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की प्रक्रिया स्पष्ट नियमों के अनुसार संचालित होनी चाहिए। याचिका में चुनाव आयोग से एसआईआर से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने, निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच कराने और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर सवाल नहीं उठाए गए हैं, बल्कि आयोग के निर्णयों के वैधानिक आधार, प्रशासनिक रिकॉर्ड और तकनीकी प्रणालियों की जांच की भी मांग की गई है।
याचिका में विभिन्न राहतों की मांग की गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इसकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि निर्वाचन आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी सभी संबंधित फाइलें, समझौते, बैठक की कार्यवाही, मिनट्स, आपत्तियों के रिकॉर्ड और फाइल नोटिंग प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए।
इसमें 24 जून 2025 को एसआईआर शुरू करने के निर्णय से संबंधित ईसीआईनेट और एरोनेट के प्रासंगिक एक्सेस लॉग भी शामिल करने की मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि इन रिकॉर्डों के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि संबंधित निर्णय किन परिस्थितियों में लिए गए और उनके पीछे क्या प्रशासनिक तथा वैधानिक आधार थे। याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत अधिकारों की सुरक्षा तथा अनुच्छेद 324 के प्रवर्तन के संदर्भ में निर्देश देने का अनुरोध किया है।
दूसरी प्रमुख मांग एसआईआर से संबंधित निर्णयों की संवैधानिक और वैधानिक वैधता की जांच कराने की है।
याचिकाकर्ताओं ने अनुरोध किया है कि इन फैसलों की समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 324, मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 तथा टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में घोषित कानूनी सिद्धांतों के संदर्भ में की जाए।
यदि किसी निर्णय को उचित वैधानिक प्राधिकार के बिना लिया गया पाया जाता है, तो उसे निरस्त करने के लिए उचित आदेश जारी करने की मांग भी की गई है।
याचिका में मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों के कथित उल्लंघन के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की गई है।
इस संबंध में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत आवश्यक कार्रवाई किए जाने का अनुरोध भी शामिल बताया गया है।
यह मांग इस आधार पर उठाई गई है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए और किसी भी अनियमितता की स्थिति में जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि निर्वाचन आयोग को वर्तमान याचिका और उससे संबंधित मामलों में उठाई गई शिकायतों पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया जाए।
इसके साथ यह सुनिश्चित करने की मांग की गई है कि एसआईआर से जुड़े आयोग के प्रत्येक निर्णय को 2023 के अधिनियम की धारा 18 के अनुरूप लिया जाए और उसका विधिवत रिकॉर्ड रखा जाए।
विपक्ष का तर्क है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्पष्टता और दस्तावेजी जवाबदेही होने से मतदाता सूची की विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले सवालों का समाधान करने में मदद मिल सकती है।
याचिका में ऑनलाइन फॉर्म-6 को निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित प्रपत्र के अनुरूप रखने का निर्देश देने की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ताओं का अनुरोध है कि जब तक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करके नियमों में विधिवत संशोधन नहीं किया जाता, तब तक निर्धारित प्रपत्र से अलग बदलाव नहीं किए जाएं।
फॉर्म-6 का संबंध मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के आवेदन से है। इसलिए इस मांग का उद्देश्य आवेदन प्रक्रिया को निर्धारित नियमों के अनुरूप बनाए रखना और पात्र नागरिकों के लिए नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया में स्पष्टता सुनिश्चित करना है।
याचिका की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में एक स्वतंत्र समिति के गठन की भी है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति बनाने का अनुरोध किया गया है। इसमें तकनीकी विशेषज्ञों और प्रतिष्ठित नागरिकों को भी शामिल करने की मांग है।
प्रस्तावित समिति को निर्धारित समय-सीमा के भीतर कई महत्वपूर्ण कार्य सौंपने का अनुरोध किया गया है।
एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों और किए गए संशोधनों की स्वतंत्र जांच तथा ऑडिट।
मतदाता सूची के डेटाबेस और उसमें किए गए बदलावों की जांच, जिसमें ईसीआईनेट और एरोनेट भी शामिल हों।
चुनाव आयोग के निर्णयों, नीतियों, प्रक्रियाओं और प्रोटोकॉल की समीक्षा।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के उपयोग, तैनाती, तकनीकी डिजाइन और संरचना की व्यापक समीक्षा।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का अध्ययन।
इस मांग के जरिए विपक्ष चुनावी प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक और तकनीकी पहलुओं की स्वतंत्र समीक्षा कराना चाहता है। हालांकि, समिति के गठन और उसके अधिकार क्षेत्र पर अंतिम निर्णय अदालत को करना होगा।
याचिका में निर्वाचन आयोग को एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए सभी मतदाताओं के नाम बूथवार प्रकाशित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
इसके साथ निम्नलिखित जानकारी सार्वजनिक करने का अनुरोध भी किया गया है:
प्रत्येक मतदाता का नाम हटाने का कारण।
हटाए गए मतदाताओं का लिंग और आयु के आधार पर वर्गीकरण।
पात्र पाए जाने वाले मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल कराने के लिए प्रभावी व्यवस्था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नाम हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता रहने से प्रभावित मतदाताओं को अपनी स्थिति समझने और आवश्यक सुधार के लिए कदम उठाने में मदद मिल सकती है।
यह मांग मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ी हुई है।
याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई है कि कानून के अनुसार नोटिस दिए बिना और सुनवाई का उचित अवसर प्रदान किए बिना किसी मतदाता का नाम सूची से न हटाया जाए।
इसके अतिरिक्त पंजाब और अन्य उन राज्यों में, जहां चुनाव होने वाले हैं, पात्र लोगों को निर्धारित अंतिम तारीख तक मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया है।
इस मांग का केंद्र यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान किसी योग्य नागरिक का नाम अनुचित तरीके से न हटे और प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिले।
विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि याचिका में उठाए गए सवालों पर विचार और अंतिम निर्णय होने तक सभी राज्यों में चल रही एसआईआर प्रक्रिया को स्थगित करने के लिए अंतरिम निर्देश जारी किया जाए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मामले का समाधान होने तक पात्र मतदाताओं के अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की रक्षा के लिए अंतरिम राहत आवश्यक है।
यह मांग इस मामले का एक अहम पहलू है, क्योंकि यदि अदालत इस पर विचार करती है तो इसका प्रभाव संबंधित पुनरीक्षण प्रक्रिया पर पड़ सकता है। हालांकि, रोक लगाने का अनुरोध किया जाना और अदालत द्वारा रोक लगा देना दो अलग बातें हैं। फिलहाल इस मांग पर किसी आदेश की पुष्टि आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड से ही की जा सकती है।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कोई अन्य या अतिरिक्त आदेश पारित किया जाए, जिसे अदालत उचित और आवश्यक समझे।
इसका घोषित उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया की अखंडता की रक्षा करना और प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार को सुरक्षित रखना है।
कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ विपक्ष ने सड़कों पर भी अपना विरोध दर्ज कराया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च कर रहे INDIA गठबंधन के नेताओं और कार्यकर्ताओं को सोमवार को भगवान दास रोड पर पुलिस ने रोक दिया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस ने सड़क पर दो स्थानों पर बैरिकेडिंग की थी। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस और सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं ने पहले बैरिकेड को हटा दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निकट लगाए गए दूसरे बैरिकेड पर नेताओं और कार्यकर्ताओं को रोक दिया गया।
मार्च में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेता शामिल थे। इस दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, कथित वोट चोरी और एसआईआर को लेकर विरोध दर्ज कराया गया।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनावी व्यवस्था से जुड़े सवालों का समाधान लोकतांत्रिक और कानूनी तरीके से होना चाहिए। वहीं, प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने रास्ते पर अवरोध लगाए।
राहुल गांधी पिछले समय में कई मौकों पर चुनाव आयोग और मतदाता सूची की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं और उनका जवाब मिलना चाहिए।
अब 11 विपक्षी नेताओं की संयुक्त याचिका के जरिए इन सवालों को न्यायिक मंच पर उठाया गया है। इससे राजनीतिक बहस के साथ-साथ कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो गई है।
इस मामले में अदालत के सामने यह प्रश्न होगा कि याचिका में मांगी गई राहतों पर विचार करने के लिए कौन-से कानूनी आधार और रिकॉर्ड प्रासंगिक हैं। साथ ही, चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका, एसआईआर की प्रक्रिया और मतदाता सूची में संशोधन से जुड़े नियमों के बीच संबंध भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
याचिका की प्रक्रिया शीघ्र पूरी करने के निर्देश की जानकारी के बाद अब इस बात पर नजर है कि मामला 13 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होता है या नहीं। यदि सुनवाई होती है, तो अदालत के समक्ष रखी गई मांगों और संबंधित पक्षों के तर्कों पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल, विपक्ष ने एसआईआर से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक कराने, स्वतंत्र ऑडिट कराने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों का विवरण प्रकाशित करने और पुनरीक्षण प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने जैसी व्यापक राहतें मांगी हैं।
इस पूरे मामले का महत्व केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों का मतदान का अधिकार, चुनाव आयोग की जवाबदेही और चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल प्रश्न हैं।
हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों और मांगी गई राहतों पर अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तथा मामले में सामने आने वाले आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगी। अब देखना होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और एसआईआर से जुड़े विवाद पर आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


