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- 12h ago
नई दिल्ली। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल आगे बढ़ रही है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली और गूगल के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल को लेकर सहयोग लगातार विकसित हो रहा है। इसी कड़ी में गूगल इंडिया की वाइस प्रेसिडेंट एवं प्रमुख प्रीति लोबाना ने गूगल टीम के साथ एम्स का दौरा किया और संस्थान के विशेषज्ञों के साथ एआई आधारित स्वास्थ्य समाधानों के विकास और उनके क्लिनिकल इस्तेमाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
दौरे के दौरान विशेष रूप से इंडस डर्मा और आरोग्यम जैसे डिजिटल स्वास्थ्य समाधानों पर ध्यान केंद्रित किया गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, एम्स और गूगल मिलकर ऐसे समाधान विकसित कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को मरीजों की देखभाल में तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना है।
इनमें इंडस डर्मा को त्वचा रोगों से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। प्रस्तावित समाधान में मरीज की त्वचा की तस्वीर के साथ उसकी उम्र, लक्षणों की अवधि, खुजली या दर्द जैसी प्रारंभिक जानकारी का इस्तेमाल किया जा सकता है। एआई आधारित इमेज एनालिसिस के माध्यम से संभावित त्वचा संबंधी समस्या की पहचान में सहायता देने और आगे की चिकित्सकीय प्रक्रिया के बारे में मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई है।
इस तकनीक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि मरीज को यह समझने में सहायता मिल सके कि उसे तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता है या प्रारंभिक स्तर पर स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र अथवा सामान्य चिकित्सक से परामर्श लिया जा सकता है। हालांकि, ऐसे एआई उपकरणों की भूमिका चिकित्सक का स्थान लेना नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहयोग करना है। उपलब्ध रिपोर्टों में भी इंडस डर्मा को डॉक्टरों के विकल्प के बजाय निर्णय-सहायक उपकरण के रूप में बताया गया है।
त्वचा रोगों के मामले में विशेषज्ञ चिकित्सकों तक पहुंच हर क्षेत्र में समान नहीं है। बड़े शहरों में त्वचा रोग विशेषज्ञों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि ग्रामीण, दूरदराज और छोटे शहरों में मरीजों को कई बार विशेषज्ञ परामर्श के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
ऐसे में एआई आधारित प्रारंभिक स्क्रीनिंग और ट्रायेज सिस्टम स्वास्थ्यकर्मियों के लिए उपयोगी हो सकता है। यदि किसी मरीज के मामले में विशेषज्ञ परामर्श आवश्यक दिखाई देता है, तो उसे समय रहते रेफर किया जा सकता है। दूसरी ओर, ऐसे मामले जिनमें तत्काल विशेषज्ञ हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, उनके लिए प्राथमिक स्तर पर उचित सलाह और फॉलोअप की व्यवस्था की जा सकती है।
इससे स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीजों की प्राथमिकता तय करने, रेफरल सिस्टम को व्यवस्थित करने और विशेषज्ञ सेवाओं पर अनावश्यक दबाव कम करने में मदद मिलने की संभावना है।
एआई आधारित त्वचा रोग पहचान में एक बड़ी चुनौती प्रशिक्षण डेटा से जुड़ी है। दुनिया में विकसित कई कंप्यूटर-विजन मॉडल ऐसे डेटासेट पर प्रशिक्षित हुए हैं, जिनमें हल्की त्वचा के चित्रों का प्रतिनिधित्व अधिक रहा है। भारतीय आबादी की विविध त्वचा-रंग और यहां पाए जाने वाले त्वचा रोगों के अनुरूप स्थानीय डेटा का महत्व इसी वजह से बढ़ जाता है।
एम्स और गूगल की पहल में भारतीय परिस्थितियों और भारतीय मरीजों से संबंधित डेटा को ध्यान में रखने पर जोर दिया जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय त्वचा के रंगों और यहां पाए जाने वाले त्वचा संबंधी रोगों को ध्यान में रखते हुए मॉडल विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एआई मॉडल केवल दूसरे देशों के डेटा पर आधारित न रहे, बल्कि भारत में वास्तविक मरीजों की विविधता और यहां की स्वास्थ्य परिस्थितियों के अनुरूप अधिक उपयोगी बनाया जा सके।
एम्स और गूगल के सहयोग में आरोग्यम भी महत्वपूर्ण डिजिटल स्वास्थ्य समाधान के रूप में सामने आया है। फरवरी 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों में एम्स नई दिल्ली और Dimension NXG द्वारा Google AI आधारित Aarogyam और Indus Derma विकसित किए जाने का उल्लेख किया गया था। इन समाधानों का व्यापक उद्देश्य चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में तकनीकी सहायता देना बताया गया था।
आरोग्यम जैसे समाधान का महत्व इस बात में है कि आधुनिक अस्पतालों में मरीज से जुड़ी जानकारी लगातार कई स्तरों पर तैयार होती है। मरीज की प्रारंभिक शिकायत, मेडिकल हिस्ट्री, जांच रिपोर्ट, चिकित्सकीय निरीक्षण, उपचार और फॉलोअप—इन सभी चरणों को व्यवस्थित तरीके से डिजिटल रूप में जोड़ने की जरूरत बढ़ रही है।
यदि एआई इन प्रक्रियाओं में उचित तरीके से एकीकृत होता है, तो चिकित्सकों को मरीज से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी तेजी से समझने, प्राथमिकता तय करने और आवश्यक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता मिल सकती है।
स्वास्थ्य सेवाओं में मरीज की पहली जानकारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। कई बार अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टर से मिलने से पहले मरीज की समस्या, लक्षणों की अवधि, पुराने उपचार और अन्य जरूरी जानकारी अलग-अलग स्तरों पर दर्ज की जाती है।
डिजिटल स्वास्थ्य समाधान इस प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बना सकते हैं। मरीज से प्रारंभिक जानकारी डिजिटल माध्यम से जुटाकर उसे चिकित्सकीय टीम तक पहुंचाया जा सकता है। इससे डॉक्टर के पास मरीज से संबंधित जरूरी जानकारी पहले से उपलब्ध होने की संभावना रहती है और परामर्श के दौरान समय का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
हालांकि, ऐसी किसी भी व्यवस्था में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि एआई द्वारा एकत्र या व्यवस्थित की गई जानकारी सही, सुरक्षित और चिकित्सकीय रूप से उपयोगी हो।
अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं और सभी मरीजों की चिकित्सकीय प्राथमिकता एक जैसी नहीं होती। ट्रायेज का उद्देश्य मरीज की स्थिति और आवश्यकता के आधार पर प्राथमिकता तय करना होता है।
एआई आधारित सिस्टम इस प्रक्रिया में सहायक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी मरीज के लक्षणों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर सिस्टम संभावित रूप से यह संकेत दे सकता है कि मामला सामान्य परामर्श का है, विशेषज्ञ से जल्द परामर्श की जरूरत है या तत्काल चिकित्सा ध्यान आवश्यक हो सकता है।
यहां अंतिम चिकित्सकीय निर्णय प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी या डॉक्टर का ही रहना महत्वपूर्ण है। एआई का उपयोग सहायता के तौर पर किया जाना चाहिए, न कि बिना चिकित्सकीय निगरानी के अंतिम निर्णय के लिए।
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल और सामान्य डिजिटल एप्लीकेशन के बीच बड़ा अंतर है। स्वास्थ्य संबंधी तकनीक का सीधे मरीजों पर इस्तेमाल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता और उपयोगिता को वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय मानकों पर परखना आवश्यक होता है।
इसी वजह से एम्स और गूगल के बीच चल रहे सहयोग में क्लिनिकल फीडबैक और वैलिडेशन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों से मिलने वाली वास्तविक दुनिया की प्रतिक्रिया के आधार पर सिस्टम में सुधार किया जा सकता है।
किसी भी एआई मॉडल के लिए केवल तकनीकी प्रदर्शन पर्याप्त नहीं होता। यह देखना भी जरूरी है कि वह अलग-अलग आयु वर्ग, त्वचा के रंग, लक्षणों और वास्तविक मरीजों की परिस्थितियों में किस प्रकार काम करता है।
एआई के स्वास्थ्य क्षेत्र में आने के साथ सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इसका डॉक्टरों की भूमिका पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इस तरह के समाधान का उद्देश्य डॉक्टरों को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना है।
विशेषकर इंडस डर्मा के संदर्भ में उपलब्ध रिपोर्टों में स्पष्ट किया गया है कि एआई से मिलने वाली संभावित जानकारी को चिकित्सकीय विशेषज्ञ द्वारा सत्यापित किया जाना आवश्यक होगा। रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित सिस्टम कानूनी रूप से वैध प्रिस्क्रिप्शन जारी करने वाले डॉक्टर का विकल्प नहीं है।
इसका अर्थ यह है कि एआई मरीज की तस्वीर, लक्षण और उपलब्ध जानकारी के आधार पर एक प्रारंभिक विश्लेषण दे सकता है, लेकिन अंतिम चिकित्सकीय निर्णय डॉक्टर के विवेक, जांच और मरीज की पूरी स्थिति के आधार पर ही होना चाहिए।
स्वास्थ्य संबंधी डेटा अत्यंत संवेदनशील होता है। मरीज की बीमारी, मेडिकल हिस्ट्री, तस्वीरें, जांच रिपोर्ट और उपचार से जुड़ी जानकारी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करते समय डेटा सुरक्षा और गोपनीयता महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाते हैं।
एआई आधारित स्वास्थ्य प्रणालियों के विकास में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि मरीज की जानकारी सुरक्षित रहे, अनधिकृत लोगों तक न पहुंचे और उसका इस्तेमाल स्पष्ट चिकित्सकीय उद्देश्य के अनुरूप हो।
इसके साथ ही एआई सिस्टम में किसी संभावित गलती की स्थिति में जिम्मेदारी, मानव निगरानी और सुधार की व्यवस्था भी स्पष्ट होना आवश्यक है।
बैठक में केवल एप्लीकेशन तैयार करने तक सीमित रहने के बजाय उन्हें अस्पताल की वास्तविक कार्यप्रणाली में प्रभावी ढंग से शामिल करने पर भी चर्चा हुई। किसी भी डिजिटल स्वास्थ्य तकनीक की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि डॉक्टर, नर्स, तकनीकी कर्मचारी और मरीज उसे कितनी आसानी से इस्तेमाल कर पाते हैं।
यदि कोई तकनीक अस्पताल की मौजूदा प्रक्रिया को और जटिल बना देती है, तो उसका उपयोग सीमित हो सकता है। इसलिए तकनीक को अस्पताल की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना, यूजर इंटरफेस को सरल रखना और चिकित्सकीय कर्मचारियों के फीडबैक के आधार पर लगातार बदलाव करना जरूरी होगा।
एआई आधारित सिस्टम स्थिर तकनीक नहीं होते। इनके प्रदर्शन को वास्तविक परिस्थितियों में मिलने वाले डेटा और फीडबैक के आधार पर लगातार बेहतर किया जा सकता है।
एम्स के विशेषज्ञों और गूगल की टीम के बीच चर्चा में मरीजों तथा चिकित्सकों के अनुभवों को विकास प्रक्रिया में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि सिस्टम कहां उपयोगी साबित हो रहा है और किन परिस्थितियों में अतिरिक्त मानवीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है।
एम्स और गूगल की यह पहल ऐसे समय में सामने आ रही है जब भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में एआई के उपयोग से जुड़े कई प्रयोग आगे बढ़ रहे हैं। हाल ही में एम्स द्वारा विकसित एआई आधारित मैमोग्राफी तकनीक के क्लिनिकल इस्तेमाल की दिशा में भी प्रगति की खबर सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि एआई का इस्तेमाल केवल शोध प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहकर वास्तविक चिकित्सा प्रक्रियाओं में शामिल होने की दिशा में बढ़ रहा है।
भविष्य में इमेजिंग, स्क्रीनिंग, दस्तावेजीकरण, मरीजों की प्राथमिकता तय करने, मेडिकल रिकॉर्ड के विश्लेषण और फॉलोअप जैसे कई क्षेत्रों में एआई की भूमिका बढ़ सकती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई विकसित करने के लिए केवल तकनीकी विशेषज्ञता पर्याप्त नहीं है। इसमें डॉक्टरों, शोधकर्ताओं, डेटा वैज्ञानिकों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है।
एम्स जैसी चिकित्सा संस्था के पास क्लिनिकल अनुभव और मरीजों की वास्तविक परिस्थितियों की समझ है, जबकि गूगल जैसी तकनीकी कंपनी के पास एआई, मशीन लर्निंग और कंप्यूटर विजन जैसी तकनीकों के विकास का अनुभव है। दोनों क्षेत्रों की विशेषज्ञता को जोड़कर ऐसे समाधान विकसित करने की कोशिश की जा रही है जो तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ चिकित्सकीय जरूरतों के अनुरूप भी हों।
आने वाले समय में इन तकनीकों की वास्तविक उपयोगिता इस बात से तय होगी कि क्लिनिकल परीक्षणों और वास्तविक अस्पताल परिस्थितियों में इनके परिणाम कैसे रहते हैं। एआई मॉडल की सटीकता, अलग-अलग मरीज समूहों में उसका प्रदर्शन, चिकित्सकों के लिए उसकी उपयोगिता, डेटा सुरक्षा और अस्पताल की मौजूदा व्यवस्था के साथ उसका एकीकरण—ये सभी पहलू महत्वपूर्ण होंगे।
एम्स और गूगल का सहयोग इस लिहाज से स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के प्रयोग को शोध से आगे ले जाकर वास्तविक क्लिनिकल परिस्थितियों से जोड़ने की दिशा में एक प्रयास है। यदि तकनीक को वैज्ञानिक वैलिडेशन, चिकित्सकीय निगरानी और मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जाता है, तो डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के नए मॉडल विकसित हो सकते हैं।
फिलहाल इस पहल का मूल फोकस यही दिखाई देता है कि एआई को डॉक्टर का विकल्प बनाने के बजाय डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी के लिए एक उपयोगी सहयोगी तकनीक के रूप में विकसित किया जाए। मरीजों की वास्तविक जरूरतों, चिकित्सकों के अनुभव और क्लिनिकल फीडबैक को केंद्र में रखकर तैयार किए जाने वाले ऐसे समाधान भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में डिजिटल तकनीक की भूमिका को और व्यापक बना सकते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


