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- 12h ago
नई दिल्ली। राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपने दो उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल से कोयल मल्लिक और उत्तराखंड से दिनेश आर्य को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना प्रत्याशी बनाया है। दोनों नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग तरह के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। एक ओर बंगाल में पार्टी ने चर्चित अभिनेत्री और पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेता कोयल मल्लिक पर भरोसा जताया है, वहीं उत्तराखंड में अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले संगठन से जुड़े नेता दिनेश आर्य को राज्यसभा भेजने का फैसला किया गया है।
राज्यसभा की 12 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान प्रस्तावित है। इनमें उत्तर प्रदेश की 10, पश्चिम बंगाल की एक और उत्तराखंड की एक सीट शामिल है। बीजेपी ने फिलहाल पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड के लिए अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं। माना जा रहा है कि पार्टी जल्द ही उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए भी अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर सकती है।
दोनों राज्यों में बीजेपी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए पार्टी के उम्मीदवारों की जीत की संभावना मजबूत मानी जा रही है। ऐसे में कोयल मल्लिक और दिनेश आर्य का नामांकन केवल राज्यसभा की एक सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पार्टी की आगामी राजनीतिक रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
पश्चिम बंगाल से बीजेपी ने कोयल मल्लिक को राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। कोयल मल्लिक बंगाल की जानी-मानी अभिनेत्री हैं और उनका राजनीतिक सफर तृणमूल कांग्रेस से शुरू हुआ था। वह टीएमसी के टिकट पर राज्यसभा सांसद भी रह चुकी हैं। बाद में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था।
अब बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा का टिकट देकर पार्टी में शामिल होने के बाद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने का फैसला किया है। राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी की ओर से उनके राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाने और बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
कोयल मल्लिक का नाम बंगाली फिल्म और सांस्कृतिक जगत से भी जुड़ा रहा है। ऐसे में उनके जरिए बीजेपी को राज्य की कला और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े वर्गों तक अपनी पहुंच मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
कोयल मल्लिक का राजनीतिक सफर काफी चर्चा में रहा है। वह पहले तृणमूल कांग्रेस के साथ थीं और पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुंची थीं। बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के बीच उन्होंने टीएमसी से दूरी बनाकर बीजेपी में प्रवेश किया।
बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्हें अब राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। इसे पार्टी के प्रति उनके राजनीतिक रुख और नए सियासी समीकरणों में उनकी भूमिका के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
बंगाल की राजनीति में फिल्मी सितारों की भूमिका पहले भी महत्वपूर्ण रही है। तृणमूल कांग्रेस ने लंबे समय से फिल्म और मनोरंजन जगत के कई चेहरों को राजनीति में जगह दी है। ऐसे में बीजेपी का कोयल मल्लिक को राज्यसभा भेजने का फैसला बंगाल की इसी राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल लंबे समय से बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। राज्यसभा के लिए कोयल मल्लिक को प्रत्याशी बनाए जाने को इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पार्टी की कोशिश है कि बंगाल में संगठनात्मक विस्तार के साथ-साथ समाज के अलग-अलग वर्गों में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाई जाए। कोयल मल्लिक जैसे चर्चित चेहरे को संसद के उच्च सदन में भेजने से पार्टी को राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद की जा सकती है।
कोयल मल्लिक के पास पहले राज्यसभा का अनुभव भी रहा है। ऐसे में संसद के उच्च सदन की कार्यप्रणाली से उनका परिचय पहले से है। पार्टी को इसका लाभ मिल सकता है।
बीजेपी ने उत्तराखंड से दिनेश आर्य को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। उनका नाम सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। दिनेश आर्य अनुसूचित जाति वर्ग से आते हैं और बीजेपी संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।
वह नैनीताल के जिला अध्यक्ष भी रह चुके हैं। संगठन में काम करने के अनुभव के कारण उन्हें पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठनात्मक ढांचे की अच्छी समझ रखने वाला नेता माना जाता है।
राजनीतिक रूप से उनका नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आगामी समय में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में पार्टी द्वारा अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले नेता को राज्यसभा के लिए मौका देना सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे समय में बीजेपी ने दिनेश आर्य को राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर कई राजनीतिक संकेत दिए हैं। अनुसूचित जाति समुदाय के बीच पार्टी की पहुंच और प्रतिनिधित्व को मजबूत करना इनमें से एक प्रमुख पहलू माना जा रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में दिनेश आर्य को उच्च सदन के लिए उम्मीदवार बनाए जाने से पार्टी के सामाजिक प्रतिनिधित्व के संदेश को मजबूती मिल सकती है।
बीजेपी के लिए यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने वाली है। संगठन के पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण पद और जिम्मेदारी देकर पार्टी अपने कार्यकर्ताओं में भी उत्साह बढ़ाने का प्रयास कर सकती है।
दिनेश आर्य के राजनीतिक सफर में एक महत्वपूर्ण मोड़ उस समय आया था जब पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया था। टिकट नहीं मिलने के बाद उनके नाराज होने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि अब पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक अवसर दिया है।
राज्यसभा की उम्मीदवारी को उनके राजनीतिक करियर में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी संगठन में पुराने नेताओं और विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
दिनेश आर्य का संगठनात्मक अनुभव उनके पक्ष में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नैनीताल जिले में पार्टी संगठन के साथ काम करने और जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के कारण उन्हें जमीनी राजनीति की समझ है।
बीजेपी में संगठनात्मक भूमिका निभाने वाले नेताओं को राज्यसभा जैसे मंच पर भेजने की परंपरा रही है। ऐसे में आर्य की उम्मीदवारी को संगठन में उनकी लंबी भूमिका के सम्मान के तौर पर भी देखा जा सकता है।
उनकी उम्मीदवारी से पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं को भी यह संदेश जा सकता है कि संगठन में लंबे समय तक काम करने वाले नेताओं के लिए पार्टी में आगे बढ़ने के अवसर मौजूद हैं।
उत्तराखंड में अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। विधानसभा चुनाव से पहले इस वर्ग से आने वाले नेता को राज्यसभा भेजने का फैसला पार्टी की सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखें तो बीजेपी एक ओर अपने परंपरागत समर्थन आधार को मजबूत करने की कोशिश करती है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न सामाजिक समूहों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर भी जोर देती रही है।
दिनेश आर्य की उम्मीदवारी इसी व्यापक रणनीति के तहत महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि संगठन में सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को महत्व दिया जा रहा है।
बीजेपी द्वारा पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड के उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जाने के बाद अब सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य होने के कारण राज्यसभा चुनाव में भी उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है।
बीजेपी के सामने यूपी की 10 सीटों के लिए उम्मीदवारों का चयन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला होगा। माना जा रहा है कि पार्टी उम्मीदवार तय करते समय जातीय और सामाजिक समीकरण, संगठनात्मक अनुभव, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रख सकती है।
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हलकों में भी उत्सुकता बनी हुई है। अब देखना होगा कि बीजेपी किन चेहरों पर भरोसा जताती है।
राज्यसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच गतिविधियां तेज होने की संभावना है। हालांकि राज्यसभा चुनाव सीधे जनता के मतदान से नहीं होते, लेकिन इनके परिणाम राजनीतिक दलों की सदन में ताकत पर असर डालते हैं।
विधानसभा सदस्यों के वोटों के आधार पर होने वाले इस चुनाव में पार्टियों की संख्या बल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में जिन राज्यों में बीजेपी की स्थिति मजबूत है, वहां पार्टी अपने उम्मीदवारों को आसानी से उच्च सदन तक पहुंचाने की स्थिति में है।
उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के लिए बीजेपी के उम्मीदवारों की घोषणा इसी क्रम में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
बीजेपी के दोनों उम्मीदवारों को देखें तो पार्टी ने दो अलग-अलग राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। पश्चिम बंगाल में पार्टी ने एक चर्चित महिला चेहरे और फिल्म जगत से जुड़ी नेता को मौका दिया है, जबकि उत्तराखंड में संगठनात्मक पृष्ठभूमि और अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले नेता पर भरोसा जताया गया है।
कोयल मल्लिक की उम्मीदवारी जहां बंगाल की सांस्कृतिक और राजनीतिक जमीन से जुड़ी दिखाई देती है, वहीं दिनेश आर्य की उम्मीदवारी उत्तराखंड के सामाजिक और संगठनात्मक समीकरणों को ध्यान में रखकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
राज्यसभा में संख्या बढ़ाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण होता है। उच्च सदन में मजबूत संख्या होने से सरकार को कई विधायी प्रक्रियाओं में राजनीतिक लाभ मिल सकता है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव को बीजेपी भी व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में देख रही होगी।
पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड में उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अब उत्तर प्रदेश पर नजर है। यदि पार्टी यूपी की 10 सीटों के लिए भी रणनीतिक रूप से उम्मीदवारों का चयन करती है तो यह चुनाव आगामी राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकता है।
बीजेपी की ओर से दिनेश आर्य को उत्तराखंड से उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पार्टी के स्थानीय संगठन में भी उत्साह बढ़ने की संभावना है। संगठन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेताओं को भी राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका मिल सकती है।
वहीं कोयल मल्लिक को प्रत्याशी बनाए जाने से बंगाल में पार्टी के सांस्कृतिक और महिला प्रतिनिधित्व से जुड़े संदेश को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
राज्यसभा की 12 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होने वाले मतदान पर अब सभी की नजरें रहेंगी। बीजेपी ने अपने दो उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुनावी प्रक्रिया की दिशा स्पष्ट कर दी है।
उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में पार्टी के उम्मीदवारों की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। ऐसे में इन दोनों सीटों के लिए मुकाबले की तस्वीर काफी हद तक साफ दिखाई दे रही है। अब राजनीतिक दिलचस्पी उत्तर प्रदेश की 10 सीटों और बीजेपी के संभावित उम्मीदवारों को लेकर बढ़ गई है।
कोयल मल्लिक के लिए राज्यसभा उम्मीदवार बनाया जाना राजनीतिक सफर में एक नया अध्याय है। टीएमसी से राजनीतिक शुरुआत करने और बाद में बीजेपी में शामिल होने के बाद अब उन्हें बीजेपी ने उच्च सदन में भेजने का फैसला किया है। बंगाल की राजनीति में उनका फिल्मी और सार्वजनिक जीवन से जुड़ा चेहरा पार्टी के लिए अतिरिक्त राजनीतिक पहचान का माध्यम बन सकता है।
दिनेश आर्य के लिए भी राज्यसभा की उम्मीदवारी राजनीतिक करियर में बड़ा अवसर है। विधानसभा टिकट से वंचित रहने के बाद अब पार्टी ने उन्हें राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। अनुसूचित जाति वर्ग से आने और संगठन में काम करने के अनुभव के कारण उनकी उम्मीदवारी को उत्तराखंड के आगामी राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर बीजेपी के इन दोनों नामों में पार्टी की रणनीति की झलक दिखाई देती है। बंगाल में चर्चित और सांस्कृतिक चेहरे को आगे बढ़ाना और उत्तराखंड में संगठन तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े नेता को अवसर देना, दोनों फैसले अलग-अलग राजनीतिक संदेश देते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश की 10 सीटों को लेकर है। बीजेपी किन चेहरों को मैदान में उतारती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


