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- 12h ago
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के पर्यावरण और हरित क्षेत्र को लेकर दिल्ली सरकार ने महत्वपूर्ण फैसला लिया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दक्षिणी रिज की करीब 1,000 एकड़ यानी लगभग 400 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित करने की मंजूरी दी है। इस फैसले के बाद दिल्ली में अधिसूचित रिज क्षेत्र का कुल दायरा बढ़कर करीब 13,000 एकड़ यानी लगभग 5,250 हेक्टेयर हो जाएगा।
सरकार के मुताबिक यह कदम दिल्ली के प्राकृतिक हरित क्षेत्र को कानूनी संरक्षण देने के साथ-साथ रिज के पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। दिल्ली रिज राजधानी के प्राकृतिक पर्यावरण का अहम हिस्सा है और अरावली पर्वतमाला के विस्तार के रूप में इसे विशेष पर्यावरणीय महत्व प्राप्त है।
दक्षिणी रिज की अतिरिक्त भूमि को आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित करने की प्रक्रिया भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 20 के तहत आगे बढ़ाई जा रही है। आरक्षित वन का दर्जा मिलने के बाद संबंधित भूमि को वैधानिक संरक्षण प्राप्त होगा और वन क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों को निर्धारित कानूनी प्रावधानों के तहत नियंत्रित किया जा सकेगा।
दिल्ली सरकार का कहना है कि रिज क्षेत्रों की अंतिम अधिसूचना की प्रक्रिया लंबे समय से लंबित थी। अब इस प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि पात्र रिज क्षेत्रों को स्थायी कानूनी संरक्षण के दायरे में लाया जा सके।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि रिज को केवल पेड़-पौधों या वन भूमि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह दिल्ली की प्राकृतिक विरासत के साथ-साथ राजधानी के लिए हरित सुरक्षा कवच की भूमिका निभाता है। सरकार के अनुसार रिज का संरक्षण स्वच्छ हवा, जैव विविधता, तापमान नियंत्रण और पर्यावरणीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है।
दिल्ली रिज अरावली पर्वतमाला का विस्तार है और राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक हरित क्षेत्रों में शामिल है। दक्षिणी रिज रिज प्रणाली का सबसे बड़ा हिस्सा है और लगभग 6,200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है।
रिज का महत्व केवल हरियाली तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र विभिन्न वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराता है। इसके अलावा राजधानी जैसे अत्यधिक शहरीकृत क्षेत्र में प्राकृतिक वन क्षेत्र तापमान नियंत्रण, धूल और प्रदूषण को कम करने तथा जैव विविधता को बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।
इसी वजह से दिल्ली रिज को लंबे समय से राजधानी के पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
दक्षिणी रिज सहित दिल्ली रिज के बड़े हिस्से को वन संरक्षण के लिए चिन्हित करने की प्रक्रिया करीब तीन दशक पहले शुरू हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 1994 में दिल्ली रिज के बड़े हिस्से को भारतीय वन अधिनियम की धारा 4 के तहत संरक्षण प्रक्रिया में लाया गया था, लेकिन कई हिस्सों को अंतिम रूप से आरक्षित वन का दर्जा देने की प्रक्रिया वर्षों तक लंबित रही।
इसके बाद अलग-अलग चरणों में रिज के हिस्सों को अंतिम वैधानिक संरक्षण देने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस वर्ष भी दक्षिणी रिज और सेंट्रल रिज के विभिन्न हिस्सों को लेकर अधिसूचना की प्रक्रिया में तेजी आई है। अब दक्षिणी रिज की करीब 400 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि रिज को आरक्षित वन का दर्जा देना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है। इसके साथ उन हिस्सों के पारिस्थितिक पुनरुद्धार पर भी ध्यान दिया जाएगा जो वर्षों के दौरान क्षतिग्रस्त या कमजोर हुए हैं।
सरकारी योजना में स्थानीय और देशज प्रजातियों को बढ़ावा देना, खराब हो चुके हिस्सों का पुनरुद्धार तथा बाहरी अथवा आक्रामक वनस्पति प्रजातियों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन शामिल है। यह काम रिज वर्किंग प्लान के अनुरूप किए जाने की बात कही गई है।
इसका उद्देश्य केवल क्षेत्रफल के आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि रिज के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करना है।
रिज के पुनरुद्धार में स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। पर्यावरणीय दृष्टि से इसका उद्देश्य ऐसी वनस्पतियों को बढ़ावा देना है जो स्थानीय परिस्थितियों और पारिस्थितिक तंत्र के अनुकूल हों।
सरकार के अनुसार क्षतिग्रस्त क्षेत्रों की बहाली और आक्रामक प्रजातियों के वैज्ञानिक प्रबंधन से रिज की प्राकृतिक संरचना को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
दिल्ली के संजय वन में भी रिज के पारिस्थितिक पुनरुद्धार से जुड़ा काम शुरू किया गया है, जिसमें विदेशी/आक्रामक प्रजाति विलायती कीकर को हटाने और स्थानीय जैव विविधता को पुनर्स्थापित करने पर काम हो रहा है।
दिल्ली रिज के संरक्षण, पुनरुद्धार और प्रबंधन के लिए इस वर्ष दिल्ली रिज मैनेजमेंट बोर्ड का गठन भी किया गया है। सरकार के अनुसार बोर्ड के दायित्वों में रिज का संरक्षण, वैज्ञानिक पारिस्थितिक पुनरुद्धार, वनीकरण और आवास संरक्षण जैसे कार्य शामिल हैं।
इस व्यवस्था के जरिए रिज क्षेत्र में अलग-अलग विभागों और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा संरक्षण संबंधी कार्यों की निगरानी करने का प्रयास किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने संकेत दिया है कि रिज संरक्षण की प्रक्रिया 1,000 एकड़ भूमि की अधिसूचना के साथ समाप्त नहीं होगी। दिल्ली रिज के अन्य पात्र क्षेत्रों को भी चरणबद्ध तरीके से आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित करने की प्रक्रिया जारी रहेगी।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में उन अन्य भूमि क्षेत्रों को भी कानूनी संरक्षण के दायरे में लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है, जो निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं।
सरकार का कहना है कि विकास कार्यों के साथ दिल्ली की प्राकृतिक विरासत का संरक्षण भी जरूरी है। इसी दृष्टिकोण के तहत रिज के पात्र क्षेत्रों को स्थायी वैधानिक संरक्षण देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।
रिज का संरक्षण आसान प्रक्रिया नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दक्षिणी रिज के कुछ हिस्से अतिक्रमण, गांवों, अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-झोपड़ी समूहों, धार्मिक संरचनाओं और अन्य भूमि उपयोग से जुड़े मामलों के कारण जटिल स्थिति में हैं। ऐसे क्षेत्रों की भूमि स्थिति को लेकर संबंधित विभागों की ओर से पुनः सत्यापन भी किया जा रहा है।
इसलिए सभी पात्र क्षेत्रों को एक साथ आरक्षित वन का दर्जा देने के बजाय प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। भूमि की स्थिति, रिकॉर्ड और मौजूदा उपयोग की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जा रही है।
दिल्ली में बढ़ता शहरीकरण, वाहनों की संख्या और प्रदूषण की समस्या के बीच प्राकृतिक हरित क्षेत्रों का संरक्षण पर्यावरण नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रिज क्षेत्र इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह राजधानी के बीच मौजूद बड़े प्राकृतिक भू-दृश्यों में से एक है।
सरकार का कहना है कि रिज को कानूनी संरक्षण देने से भविष्य में इसके अनियंत्रित उपयोग पर रोक लगाने और संरक्षण संबंधी कार्रवाई को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, वास्तविक पर्यावरणीय लाभ इस बात पर निर्भर करेंगे कि अधिसूचित क्षेत्र का संरक्षण, निगरानी, पुनरुद्धार और प्रबंधन जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि दिल्ली को विकास की गति के साथ अपनी प्राकृतिक विरासत को भी सुरक्षित रखना होगा। सरकार के मुताबिक रिज संरक्षण का उद्देश्य विकास को रोकना नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना है।
दक्षिणी रिज की अतिरिक्त भूमि को आरक्षित वन का दर्जा मिलने से एक ओर जहां संरक्षित रिज क्षेत्र का दायरा बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर सरकार के सामने इन क्षेत्रों की नियमित निगरानी और प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी होगी।
अब संबंधित विभाग आरक्षित वन की अधिसूचना से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे। इसके बाद संबंधित भूमि पर वन संरक्षण से जुड़े नियम लागू होंगे। साथ ही रिज वर्किंग प्लान के तहत पारिस्थितिक पुनरुद्धार, देशज प्रजातियों को बढ़ावा देने और खराब क्षेत्रों को बहाल करने के प्रयास किए जाएंगे।
सरकार की योजना भविष्य में रिज के अन्य पात्र क्षेत्रों को भी इसी तरह संरक्षण के दायरे में लाने की है। ऐसे में दक्षिणी रिज की 1,000 एकड़ अतिरिक्त भूमि को आरक्षित वन का दर्जा देने का फैसला दिल्ली के रिज संरक्षण अभियान के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, दक्षिणी रिज की करीब 1,000 एकड़ अतिरिक्त भूमि को आरक्षित वन के दायरे में लाने से दिल्ली के अधिसूचित रिज क्षेत्र का विस्तार करीब 13,000 एकड़ तक हो जाएगा। अब इस फैसले के साथ सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका प्रभावी क्रियान्वयन, प्राकृतिक वनस्पतियों का संरक्षण, अतिक्रमण की निगरानी और क्षतिग्रस्त क्षेत्रों का वैज्ञानिक पुनरुद्धार रहेगा।


