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- 10h ago
नई दिल्ली। भारत में तेजी से बदलती खान-पान की आदतों, बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और पोषण सुरक्षा की जरूरतों के बीच प्रोटीन को लेकर देश में चर्चा लगातार तेज हो रही है। इसी विषय को केंद्र में रखते हुए आयोजित ‘भारत के लिए प्रोटीन पर फिक्की संगोष्ठी: पोषण, व्यवसाय, स्थिरता और नीतिगत परिप्रेक्ष्य’ में विशेषज्ञों ने प्रोटीन को केवल एक खाद्य या न्यूट्रिशन ट्रेंड के बजाय देश की स्वास्थ्य, उत्पादकता और खाद्य अर्थव्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के संयुक्त सचिव रंजीत सिंह ने कहा कि प्रोटीन को केवल पोषण के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। यह पोषण, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, तकनीकी नवाचार, सस्टेनेबिलिटी, व्यवसाय और सार्वजनिक नीति के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभर रहा है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "प्रोटीन कोई ट्रेंड नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ और प्रोडक्टिव आबादी का बुनियादी हिस्सा है।"
रंजीत सिंह ने कहा कि भारत में प्रोटीन आधारित खाद्य पदार्थों की संभावनाएं काफी व्यापक हैं, लेकिन इसके लिए बाजार को केवल महंगे या प्रीमियम उत्पादों तक सीमित रखने के बजाय आम उपभोक्ता की जरूरतों को ध्यान में रखना होगा।
उन्होंने कहा कि इनोवेशन तभी प्रभावी माना जाएगा, जब उससे ऐसे उत्पाद तैयार हों जिन्हें समाज के अलग-अलग आय वर्ग के लोग खरीद सकें और जिनकी उपलब्धता केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहे।
उनके अनुसार प्रोटीन आधारित खाद्य पदार्थ पौष्टिक, सुरक्षित, किफायती और सुविधाजनक होने के साथ भारतीय खान-पान की आदतों और स्वाद के अनुरूप भी होने चाहिए।
इस दिशा में स्थानीय खाद्य परंपराओं, दालों, अनाजों, डेयरी उत्पादों और अन्य प्रोटीन स्रोतों को आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण तकनीक के साथ जोड़ने की बड़ी संभावना है।
सिंह ने प्रोटीन के मुद्दे को केवल उपभोक्ता की थाली तक सीमित न रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रोटीन का पूरा इकोसिस्टम किसानों से शुरू होकर प्रोसेसर्स, टेक्नोलॉजी कंपनियों, स्टार्टअप्स, लॉजिस्टिक्स और रिटेल तक फैला हुआ है।
यदि इस क्षेत्र को व्यवस्थित तरीके से विकसित किया जाता है तो इसका लाभ केवल उपभोक्ताओं को ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित व्यवसायों को भी मिल सकता है।
प्रोटीन आधारित खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग किसानों के लिए नई वैल्यू चेन तैयार कर सकती है। वहीं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को नए उत्पाद विकसित करने, स्टार्टअप्स को नई तकनीक और बिजनेस मॉडल तैयार करने तथा लॉजिस्टिक्स और रिटेल क्षेत्र को नए बाजार विकसित करने के अवसर मिल सकते हैं।
संयुक्त सचिव ने केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए पीएलआई योजना और प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना का औपचारिकरण देश के खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इन योजनाओं के जरिए खाद्य प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने, छोटे उद्यमों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने, वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने और खाद्य क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
प्रोटीन क्षेत्र में भी इन योजनाओं का उपयोग स्थानीय स्तर पर उत्पादन और प्रसंस्करण क्षमता को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
विशेष रूप से छोटे और ग्रामीण खाद्य उद्यमों को आधुनिक तकनीक, पैकेजिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने से स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
रंजीत सिंह ने कहा कि प्रोटीन से जुड़े उत्पादों के विस्तार के साथ खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता और वैज्ञानिक प्रमाणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि बाजार में किसी भी नए प्रोटीन उत्पाद को बढ़ावा देने से पहले उसकी गुणवत्ता, सुरक्षा, पोषण संबंधी दावों और वास्तविक उपयोगिता का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भविष्य की खाद्य प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो मजबूत, संसाधनों का कुशल इस्तेमाल करने वाली और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार हो।
यानी प्रोटीन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि उत्पादन और प्रसंस्करण की पूरी प्रक्रिया कितनी टिकाऊ है और प्राकृतिक संसाधनों पर उसका कितना दबाव पड़ता है।
सिंह ने प्रोटीन को पूरे खाद्य प्रसंस्करण इकोसिस्टम को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखने की जरूरत बताई।
उनके अनुसार इसके जरिए किसानों, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों, टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स, स्टार्टअप्स, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और रिटेलर्स के लिए वैल्यू पैदा की जा सकती है।
प्रोटीन क्षेत्र में नए उत्पादों के विकास के साथ-साथ बेहतर प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, स्टोरेज, सप्लाई चेन और वितरण प्रणाली की जरूरत बढ़ेगी। इससे तकनीकी नवाचार और नए उद्यमों के लिए भी बाजार का विस्तार हो सकता है।
संगोष्ठी में भारत के लिए प्रोटीन आधारित खाद्य पदार्थों के निर्यात की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
रंजीत सिंह ने कहा कि यदि भारत प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी, क्वालिटी सिस्टम, ब्रांडिंग और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुपालन में निवेश करता है, तो भारतीय कंपनियां वैश्विक वैल्यू चेन में ऊपर जा सकती हैं।
वैल्यू-एडेड और प्रोटीन से भरपूर खाद्य उत्पाद इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि इसके लिए वैज्ञानिक मान्यता, खाद्य सुरक्षा, प्रतिस्पर्धी कीमत और वैश्विक मानकों का पालन जरूरी होगा।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह केवल कच्चे कृषि उत्पादों का निर्यात करने के बजाय उनमें अधिक वैल्यू जोड़कर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार करे।
सिंह ने कहा कि भारत की अपनी पारंपरिक खाद्य प्रणालियां और भोजन की विविधता उसकी बड़ी ताकत हैं। जरूरत इस बात की है कि इन्हें आधुनिक खाद्य विज्ञान, प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और कुशल सप्लाई चेन से जोड़ा जाए।
भारत में दालों, अनाजों, डेयरी और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों की विविधता मौजूद है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से इनके पोषण मूल्य, शेल्फ लाइफ, सुविधा और बाजार क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।
इससे ऐसे उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं जो भारतीय उपभोक्ताओं की आदतों के अनुरूप होने के साथ आधुनिक जीवनशैली की जरूरतों को भी पूरा करें।
एफएसएसएआई के एडवाइज़र (क्वालिटी एश्योरेंस) और साइंस, स्टैंडर्ड्स एवं रेगुलेशंस डिवीजन का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे डॉ. सत्येन कुमार पांडा ने कहा कि प्रोटीन एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए केवल लोगों को प्रोटीन के महत्व के बारे में बताना पर्याप्त नहीं है। प्रोटीन की गुणवत्ता और उसके वास्तविक पोषण मूल्य को समझना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि उपभोक्ता जागरूकता का केंद्र एक संतुलित आहार के संदर्भ में सही चुनाव करने पर होना चाहिए।
उनके मुताबिक प्रोटीन को लेकर होने वाली बातचीत सबूत आधारित होनी चाहिए। किसी एक पोषक तत्व या किसी एक उत्पाद को ऐसा समाधान बताने से बचना चाहिए, जो अकेले व्यक्ति की सभी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने का दावा करे।
उन्होंने कहा कि देश में बातचीत को ‘प्रोटीन अवेयरनेस’ से ‘प्रोटीन लिटरेसी’ की ओर ले जाने की जरूरत है। यानी लोगों को सिर्फ यह नहीं बताया जाए कि प्रोटीन जरूरी है, बल्कि यह भी समझाया जाए कि किस प्रकार के खाद्य पदार्थों से कितना और किस गुणवत्ता का प्रोटीन प्राप्त होता है तथा संतुलित आहार में उसकी क्या भूमिका है।
प्रोफेसर अनूपा सिद्धू, पूर्व डायरेक्टर, लेडी इरविन कॉलेज और हेड, डिपार्टमेंट ऑफ होम साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी ने प्रोटीन की जरूरतों से जुड़े व्यापक ढांचे पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि भारतीय आहार के संदर्भ में एक बड़ी चुनौती यह है कि कई लोगों के भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक और प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोटीन पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आवश्यकता से अधिक प्रोटीन लिया जाए।
उन्होंने कहा कि प्रोटीन की तलाश करने वाले उपभोक्ताओं को केवल शहरी या उच्च आय वर्ग से जोड़कर देखना सही नहीं है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोगों में भी प्रोटीन आधारित भोजन की जरूरत और मांग मौजूद है।
उनके अनुसार खाद्य कंपनियों को ऐसे उत्पाद विकसित करने चाहिए जो समाज के बड़े हिस्से तक पहुंच सकें और वास्तव में उन लोगों के लिए उपयोगी हों जिन्हें इसकी अधिक जरूरत है।
प्रोटीन आधारित खाद्य उत्पादों के बढ़ते बाजार के साथ खाद्य कंपनियों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। कंपनियों को अपने उत्पादों के पोषण संबंधी दावों में पारदर्शिता रखनी होगी और उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
उत्पाद की कीमत, उपलब्धता, गुणवत्ता, स्वाद और सुविधा जैसे पहलुओं के साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उपभोक्ता समझ सके कि वह वास्तव में क्या खा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बाजार में प्रोटीन शब्द का इस्तेमाल बढ़ने के साथ उपभोक्ताओं को लेबल पढ़ने, पोषण संबंधी जानकारी समझने और संतुलित आहार का महत्व जानने के लिए भी सक्षम बनाना जरूरी होगा।
सिफ्टी-फिक्की के प्रेसिडेंट तरुण अरोड़ा ने कहा कि जैसे-जैसे भारत अधिक आय और अधिक एस्पिरेशनल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भोजन से जुड़ी चर्चा भी बदल रही है।
अब केवल यह सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है कि लोगों को पर्याप्त भोजन मिले। चर्चा धीरे-धीरे फूड सिक्योरिटी से न्यूट्रिशन सिक्योरिटी की ओर बढ़ रही है।
इसका मतलब है कि लोगों तक पर्याप्त मात्रा में भोजन पहुंचने के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भोजन में जरूरी पोषक तत्व मौजूद हों और लोगों को गुणवत्तापूर्ण एवं विविध आहार उपलब्ध हो।
भारत में शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और कामकाजी आबादी में वृद्धि के साथ ऐसे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है जो तैयार करने में आसान हों और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद करें।
इसी कारण प्रोटीन से भरपूर स्नैक्स, रेडी-टू-कुक उत्पाद, फोर्टिफाइड फूड, डेयरी आधारित उत्पाद और अन्य वैल्यू-एडेड खाद्य पदार्थों का बाजार विकसित होने की संभावना है।
हालांकि विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि सुविधा के साथ उत्पाद की वास्तविक पोषण गुणवत्ता भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
प्रोटीन आधारित उत्पादों के विस्तार का अगला बड़ा चरण केवल महानगरों में नहीं, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण बाजारों में भी हो सकता है।
यदि कंपनियां स्थानीय स्वाद, स्थानीय खाद्य आदतों और स्थानीय क्रय क्षमता को ध्यान में रखकर उत्पाद विकसित करती हैं, तो प्रोटीन आधारित खाद्य पदार्थों की पहुंच काफी व्यापक हो सकती है।
कम कीमत वाले छोटे पैक, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल और मजबूत वितरण नेटवर्क इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
प्रोटीन सेक्टर में स्टार्टअप्स के लिए भी कई नए अवसर पैदा हो रहे हैं। खाद्य तकनीक, वैकल्पिक प्रोटीन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, सप्लाई चेन, न्यूट्रिशन एनालिटिक्स और फूड टेस्टिंग जैसे क्षेत्रों में नई कंपनियां समाधान विकसित कर सकती हैं।
विशेष रूप से ऐसी तकनीकों की मांग बढ़ सकती है जो कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार करने, खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने और उत्पादन प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने में मदद करें।
प्रोटीन की बढ़ती मांग के साथ पर्यावरणीय प्रभाव का सवाल भी महत्वपूर्ण होगा। भविष्य में खाद्य उद्योग के सामने चुनौती होगी कि बढ़ती आबादी और बदलती उपभोक्ता जरूरतों के लिए पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल कैसे किया जाए।
इसलिए भविष्य के प्रोटीन इकोसिस्टम में उत्पादन के साथ पानी, ऊर्जा, भूमि, पैकेजिंग, परिवहन और खाद्य अपशिष्ट जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा।
संगोष्ठी से एक महत्वपूर्ण संदेश यह सामने आया कि प्रोटीन को लेकर भारत में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ वैज्ञानिक समझ विकसित करना भी जरूरी है।
प्रोटीन निश्चित रूप से संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन स्वस्थ जीवन के लिए केवल प्रोटीन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। शरीर को कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज, फाइबर और पर्याप्त पानी सहित विभिन्न पोषक तत्वों की जरूरत होती है।
इसलिए प्रोटीन आधारित उत्पादों के बाजार को बढ़ाते समय संतुलित आहार और वैज्ञानिक पोषण शिक्षा को भी केंद्र में रखना होगा।
भारत के लिए प्रोटीन का मुद्दा आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य के साथ-साथ आर्थिक अवसर का भी बड़ा क्षेत्र बन सकता है। यदि किसान, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां, वैज्ञानिक संस्थान, स्टार्टअप्स, सरकार और रिटेल सेक्टर मिलकर काम करते हैं तो एक ऐसी वैल्यू चेन तैयार की जा सकती है, जो पोषण सुधारने के साथ रोजगार, ग्रामीण आय और औद्योगिक विकास को भी गति दे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि प्रोटीन को केवल एक नए बाजार या फैशन के रूप में नहीं देखा जाए। इसे व्यापक न्यूट्रिशन सिक्योरिटी, फूड प्रोसेसिंग और कृषि वैल्यू चेन के हिस्से के रूप में विकसित किया जाए।
फिक्की की इस संगोष्ठी में विशेषज्ञों की चर्चा से यही संकेत मिला कि भारत के सामने प्रोटीन के क्षेत्र में एक साथ कई अवसर मौजूद हैं—बेहतर पोषण, मजबूत कृषि वैल्यू चेन, आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण, नए स्टार्टअप, रोजगार, निर्यात और टिकाऊ खाद्य प्रणाली।
आने वाले समय में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश इन अवसरों को किस तरह वैज्ञानिक प्रमाण, किफायती उत्पाद, मजबूत गुणवत्ता मानकों और व्यापक उपभोक्ता पहुंच के साथ जोड़ पाता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


