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नई दिल्ली। भारत ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अपने दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव किया है। अब आपदा आने के बाद राहत और पुनर्वास तक सीमित रहने के बजाय सरकार का जोर आपदा के जोखिम को पहले से पहचानने, उसे कम करने, समय रहते चेतावनी देने और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने पर है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों में देश के आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण में आमूल-चूल परिवर्तन आया है और भारत अब ‘जीरो कैजुअल्टी’ के लक्ष्य के साथ आपदा प्रबंधन के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
गुरुवार को नई दिल्ली में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) के संस्थान निकाय की तीसरी बैठक की अध्यक्षता करते हुए अमित शाह ने कहा कि देश का लक्ष्य अब केवल आपदा के बाद नुकसान की भरपाई करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिससे आपदा के दौरान जान-माल का नुकसान न्यूनतम किया जा सके।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में आपदा रोधी गांव और आपदा रोधी शहर तैयार करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ सभी विभागों, स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और समाज को मिलकर काम करना होगा।
अमित शाह ने कहा कि आपदा प्रबंधन को लेकर देश की सोच में मूलभूत परिवर्तन आया है। पहले किसी आपदा के बाद राहत पहुंचाना, लोगों को सुरक्षित निकालना और पुनर्वास करना ही आपदा प्रबंधन का मुख्य हिस्सा माना जाता था।
अब इसका दायरा काफी व्यापक हो गया है। इसमें जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व चेतावनी प्रणाली, तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया, स्थानीय स्तर पर क्षमता निर्माण और आपदा के बाद पुनर्निर्माण जैसे पहलुओं को एक साथ जोड़ा जा रहा है।
गृह मंत्री ने कहा कि यदि किसी संभावित आपदा के बारे में पहले से जानकारी उपलब्ध हो और लोगों को समय पर चेतावनी दी जा सके, तो बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाई जा सकती है। यही सोच ‘जीरो कैजुअल्टी’ के लक्ष्य की बुनियाद है।
उन्होंने कहा कि भारत ने कई आपदाओं का ‘जीरो कैजुअल्टी’ के साथ सफलतापूर्वक सामना किया है। इसे देश के आपदा प्रबंधन तंत्र की बड़ी उपलब्धि बताते हुए उन्होंने कहा कि अब इसी क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत है।
आपदा प्रबंधन में ‘जीरो कैजुअल्टी’ का अर्थ केवल एक आंकड़ा हासिल करना नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें आपदा के खतरे को पहले से समझा जाए और संभावित प्रभावित आबादी को समय रहते सुरक्षित किया जा सके।
चक्रवात, बाढ़, भूस्खलन, भूकंप, बादल फटने, अत्यधिक बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सबसे बड़ा खतरा मानव जीवन को होता है। यदि पूर्व चेतावनी और बचाव व्यवस्था मजबूत हो तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
अमित शाह ने इसी दिशा में आगे बढ़ने पर जोर देते हुए कहा कि देश को अब ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें आपदा के आने का इंतजार न किया जाए, बल्कि उससे पहले तैयारी पूरी हो।
गृह मंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य देश में आपदा रोधी गांव और शहर तैयार करना है। इसके लिए केवल राहत एजेंसियों को मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि शहरी नियोजन, भवन निर्माण, सड़क, बिजली, जल निकासी, स्वास्थ्य सेवाओं और संचार व्यवस्था को भी आपदा जोखिम के अनुरूप तैयार करना होगा।
शहरों में बढ़ती आबादी और तेजी से हो रहे निर्माण के कारण आपदा प्रबंधन की चुनौती भी बढ़ रही है। ऐसे में भविष्य के शहरों की योजना बनाते समय आपदा जोखिम को शुरुआती स्तर पर ही ध्यान में रखना जरूरी होगा।
इसी तरह गांवों में भी बाढ़, सूखा, भूस्खलन और अन्य स्थानीय आपदाओं को ध्यान में रखकर बुनियादी ढांचे और स्थानीय प्रशासन की क्षमता विकसित करनी होगी।
अमित शाह ने कहा कि आपदा प्रबंधन किसी एक मंत्रालय या विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। इसके लिए सरकार के सभी विभागों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
उन्होंने ‘Whole of Government’ यानी पूरी सरकार के दृष्टिकोण को और मजबूत करने की जरूरत बताई। इसका मतलब है कि गृह मंत्रालय, स्वास्थ्य, सड़क, रेलवे, बिजली, दूरसंचार, जल संसाधन, ग्रामीण विकास, शहरी विकास और अन्य विभाग आपदा के समय अलग-अलग नहीं बल्कि एक समन्वित व्यवस्था के तहत काम करें।
आपदा के दौरान कुछ मिनट और घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में यदि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय पहले से तय हो तो राहत और बचाव अभियान को अधिक तेजी से संचालित किया जा सकता है।
अमित शाह ने आपदा प्रबंधन को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि आपदाओं की रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय पर्यावरण संरक्षण है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण, जोखिम न्यूनीकरण, लचीलापन और व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के कारण भारत धीरे-धीरे दुनिया में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर रहा है।
प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, पर्यावरणीय असंतुलन और बदलता मौसम आपदाओं की तीव्रता तथा प्रकृति को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना भी आपदा जोखिम को कम करने की रणनीति का हिस्सा है।
गृह मंत्री ने भविष्य की चुनौतियों को लेकर भी आगाह किया। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले समय में आपदाओं की संख्या बढ़ने की संभावना है।
जलवायु में बदलाव के साथ मौसम के स्वरूप में भी परिवर्तन देखने को मिल सकता है। अत्यधिक बारिश, लंबे समय तक सूखा, गर्मी की तीव्रता, अचानक आने वाली बाढ़ और अन्य मौसम संबंधी घटनाएं आपदा प्रबंधन के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।
उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक आपदाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। विज्ञान और तकनीक में हो रहे बदलावों के साथ नई तरह की आपदाएं भी सामने आ सकती हैं। इसलिए देश को भविष्य की चुनौतियों के लिए पहले से तैयार रहना होगा।
अमित शाह ने कहा कि बदलते आपदा परिदृश्य में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
NIDM को उन्होंने अनुसंधान, नवाचार, नीति समर्थन, प्रशिक्षण और विभागीय सहयोग का राष्ट्रीय केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि संस्थान को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपनी क्षमता लगातार बढ़ानी होगी।
आपदा प्रबंधन में केवल सरकारी तंत्र की क्षमता पर्याप्त नहीं होती। वैज्ञानिक शोध, स्थानीय अनुभव, आधुनिक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हो रही व्यवस्थाओं को भी देश की आपदा प्रबंधन रणनीति में शामिल करना जरूरी है।
गृह मंत्री ने विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को NIDM से जोड़कर नए क्षेत्रों में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग-अलग देशों में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में हो रहे शोध का अध्ययन किया जाना चाहिए और वहां से प्राप्त निष्कर्षों को भारत की स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए।
भारत में हिमालयी क्षेत्र से लेकर तटीय इलाके, रेगिस्तानी क्षेत्र, बाढ़ प्रभावित मैदान और घनी आबादी वाले महानगर तक अलग-अलग तरह की भौगोलिक परिस्थितियां हैं। इसलिए आपदा प्रबंधन की एक ही रणनीति हर क्षेत्र में समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकती।
स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक और रणनीति विकसित करना जरूरी होगा।
अमित शाह ने NIDM के विकास की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि एक समय इसका पूर्ववर्ती रूप राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन केंद्र कृषि भवन के एक कोने में लगभग निष्क्रिय पड़ा था।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे गृह मंत्रालय के अधीन लाकर नया जीवन दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संस्थान को मजबूत आधार देने के लिए भूमि आवंटित की और आज NIDM एक सशक्त संस्थान के रूप में देश के सामने है।
गृह मंत्री ने संस्थान के इस विकास को आपदा प्रबंधन के प्रति बदलती सरकारी प्राथमिकता से जोड़ते हुए कहा कि आज NIDM राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण, अनुसंधान और नीति समर्थन की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
आज के समय में तकनीक आपदा प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। मौसम की निगरानी, संभावित खतरे का आकलन, संचार व्यवस्था और लोगों तक समय पर चेतावनी पहुंचाने में तकनीकी प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ा है।
अमित शाह के जोर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि भारत को भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए विज्ञान और तकनीक आधारित व्यवस्था को और मजबूत करना होगा।
पूर्व चेतावनी तभी प्रभावी होगी जब चेतावनी सही समय पर सही व्यक्ति तक पहुंचे और उसके बाद स्थानीय प्रशासन के पास लोगों को सुरक्षित निकालने की पर्याप्त क्षमता भी हो।
इसलिए तकनीक, प्रशासन और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय जरूरी है।
आपदा के समय सबसे पहले प्रभावित होने वाले लोग स्थानीय समुदाय ही होते हैं। बाहरी राहत दलों के पहुंचने में समय लग सकता है। ऐसे में यदि गांव और शहर के स्तर पर स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित किया जाए तो वे शुरुआती घंटों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आपदा प्रबंधन में स्थानीय स्वयंसेवकों, पंचायतों, शहरी स्थानीय निकायों, स्वास्थ्यकर्मियों और सामुदायिक संगठनों की भूमिका को मजबूत करना भी जरूरी है।
आपदा रोधी गांव और शहर बनाने का लक्ष्य तभी प्रभावी होगा जब स्थानीय स्तर पर लोगों में तैयारी और जागरूकता बढ़े।
आपदा के बाद राहत अभियान चलाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है आपदा से पहले तैयारी करना। यही कारण है कि भारत की आपदा प्रबंधन रणनीति अब राहत-केंद्रित मॉडल से जोखिम-केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ रही है।
इसमें जोखिम की पहचान, संवेदनशील क्षेत्रों का आकलन, जरूरी बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, आपदा प्रतिक्रिया बलों की तैयारी और नियमित अभ्यास जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।
यदि प्रशासन पहले से तैयार हो तो किसी आपदा के दौरान निर्णय लेने में लगने वाला समय कम किया जा सकता है।
अमित शाह ने स्पष्ट किया कि आने वाले वर्षों में आपदा प्रबंधन के सामने चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ तेजी से बदलती तकनीक और बढ़ता शहरीकरण नए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
ऐसे में आपदा प्रबंधन को केवल मौजूदा समस्याओं के समाधान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। भविष्य में आने वाले संभावित खतरों की पहचान करके पहले से तैयारी करना आवश्यक होगा।
NIDM और NDMA को इस दिशा में अनुसंधान, प्रशिक्षण और नीति निर्माण के स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।
अमित शाह ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण, जोखिम न्यूनीकरण, लचीलापन और व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के कारण भारत धीरे-धीरे दुनिया में एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर रहा है।
भारत के लिए आपदा प्रबंधन अब केवल घरेलू प्रशासन का विषय नहीं रह गया है। बदलते जलवायु परिदृश्य के बीच दुनिया के अनेक देश आपदा जोखिम कम करने के लिए नई रणनीतियां अपना रहे हैं।
ऐसे में भारत अपने अनुभव, तकनीकी क्षमता और संस्थागत मॉडल के जरिए वैश्विक स्तर पर भी योगदान दे सकता है।
अमित शाह के संदेश का मूल केंद्र यही रहा कि भारत को अब आपदा के बाद प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर आपदा से पहले जोखिम कम करने वाली व्यवस्था बनानी होगी।
‘जीरो कैजुअल्टी’ का लक्ष्य इसी परिवर्तन का प्रतीक है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी आपदा के दौरान अधिक से अधिक लोगों की जान बचाई जा सके और नुकसान को न्यूनतम स्तर पर रखा जा सके।
इसके लिए मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित प्रशासन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सभी सरकारी विभागों के बीच समन्वय जरूरी होगा।
गृह मंत्री ने जिस आपदा रोधी गांव और शहर की कल्पना सामने रखी है, वह केवल भवनों और बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में ऐसी पूरी व्यवस्था विकसित करना है जो खतरे को पहचान सके, समय पर चेतावनी दे सके, तेजी से प्रतिक्रिया कर सके और आपदा के बाद सामान्य जीवन को जल्द से जल्द बहाल कर सके।
बदलते जलवायु और बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों के बीच भारत के लिए यह दृष्टिकोण आने वाले वर्षों में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यदि ‘Whole of Government’ अप्रोच, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और स्थानीय भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाया जाता है, तो ‘जीरो कैजुअल्टी’ का लक्ष्य भारत की आपदा प्रबंधन नीति को एक नए स्तर पर ले जा सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


