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- 12h ago
नई दिल्ली। रियल एस्टेट को अब केवल जमीन, प्लॉट और इमारत के निर्माण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। किसी भी आवासीय, वाणिज्यिक या मिश्रित उपयोग वाली परियोजना का सीधा प्रभाव उसके आसपास के पूरे शहरी तंत्र पर पड़ता है। सड़क, पानी, सीवेज, बिजली, सार्वजनिक परिवहन, पार्किंग, कचरा प्रबंधन और पर्यावरण जैसे सभी पहलू किसी परियोजना की वास्तविक उपयोगिता और मूल्य से जुड़े होते हैं। ऐसे में रियल एस्टेट विकास को व्यापक शहरी इकोसिस्टम के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है।
यह बात आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के कैपिटल डेवलपमेंट विभाग की सचिव डी. थारा ने भारतीय उद्योग परिसंघ की ओर से आयोजित ‘भारतीय रियल एस्टेट का बदलता परिदृश्य: विकास, इनोवेशन और संस्थागतकरण को समझना’ सम्मेलन में कही।
थारा ने कहा कि प्रत्येक विकास परियोजना का व्यापक शहरी पर्यावरण के साथ सीधा संबंध होता है। परियोजना चाहे शहर के किसी विकसित हिस्से में हो या तेजी से उभर रहे बाहरी क्षेत्र में, उसका प्रभाव केवल परियोजना की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। बड़ी परियोजनाओं के कारण पानी की मांग बढ़ती है, यातायात का दबाव बढ़ सकता है, सीवेज और ठोस कचरे की मात्रा बढ़ सकती है तथा ऊर्जा और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर अतिरिक्त भार पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि इन बाहरी प्रभावों को रियल एस्टेट परियोजना की योजना बनाते समय ही ध्यान में रखा जाना चाहिए। डेवलपर और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर तालमेल से ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है जिसमें परियोजना के साथ जरूरी बुनियादी ढांचे की क्षमता भी विकसित हो।
डी. थारा ने कहा कि किसी संपत्ति का मूल्य केवल उसकी बाजार कीमत, लोकेशन या निर्मित क्षेत्रफल से तय नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि उस परियोजना के निर्माण और संचालन में कितने प्राकृतिक संसाधनों की खपत हो रही है, स्थानीय बुनियादी ढांचे पर कितना दबाव पड़ रहा है और परियोजना अपने आसपास के शहरी वातावरण को किस प्रकार प्रभावित कर रही है।
इस दृष्टिकोण से रियल एस्टेट क्षेत्र में मूल्यांकन का दायरा व्यापक हो सकता है। ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट प्रबंधन, हरित क्षेत्र, सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच और संसाधनों के कुशल उपयोग जैसे तत्व भविष्य में किसी परियोजना की गुणवत्ता और मूल्य के महत्वपूर्ण संकेतक बन सकते हैं।
उन्होंने रियल एस्टेट डेवलपर्स से परियोजनाओं की सीमाओं से बाहर निकलकर पूरे शहरी प्रभाव का आकलन करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि शहर का विकास केवल अलग-अलग परियोजनाओं को जोड़कर नहीं होता, बल्कि सभी परियोजनाओं को एक साझा शहरी व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखना आवश्यक है।
सचिव ने रियल एस्टेट क्षेत्र में एक नए सार्वजनिक-निजी सहयोग मॉडल की जरूरत बताई। उन्होंने ऐसे ‘रियल एस्टेट विद वैल्यू’ की अवधारणा पर जोर दिया, जिसमें किसी परियोजना का आर्थिक मूल्य उसके सामाजिक और पर्यावरणीय योगदान से भी जुड़ा हो।
इस अवधारणा के तहत ऐसी परियोजनाओं को महत्व मिल सकता है जो कम संसाधनों में बेहतर परिणाम देती हों, आसपास के बुनियादी ढांचे पर अनावश्यक दबाव न डालें और स्थानीय स्तर पर जीवन की गुणवत्ता में सुधार करें। इससे रियल एस्टेट क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का आधार भी केवल कीमत और निर्माण की गति के बजाय गुणवत्ता, स्थिरता और दीर्घकालिक उपयोगिता की ओर बढ़ सकता है।
सम्मेलन में इस बात पर भी चर्चा हुई कि भारत तेजी से शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है। शहरों में आबादी और आर्थिक गतिविधियां बढ़ने के साथ आवास, कार्यालय, व्यावसायिक स्थान, परिवहन और सार्वजनिक सुविधाओं की मांग भी बढ़ रही है।
ऐसे में भविष्य का शहरी विकास केवल नए भवनों के निर्माण तक सीमित नहीं रह सकता। नए आवासीय क्षेत्रों के साथ स्कूल, अस्पताल, बाजार, सार्वजनिक परिवहन, सड़कें, पार्क, जलापूर्ति और सीवेज जैसी सुविधाओं की योजना भी समानांतर रूप से बनानी होगी।
सीआईआई ने कहा कि भारत का रियल एस्टेट क्षेत्र अब ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां शहरों को केवल निर्माण के विस्तार के रूप में नहीं, बल्कि लचीले, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार शहरी केंद्रों के रूप में विकसित करना होगा।
सीआईआई नेशनल कमेटी ऑन रियल एस्टेट एंड हाउसिंग के सह-अध्यक्ष श्रीराम खट्टर ने कहा कि रियल एस्टेट अब सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारतों का कारोबार नहीं रह गया है। यह समुदायों का ऐसा जीवंत ताना-बाना है जो लोगों के रहने, काम करने, जुड़ने, खरीदारी करने और मनोरंजन के तरीके को प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में डेवलपमेंट का जोर ऐसी जगहों के निर्माण पर होगा, जहां लोग केवल रहने के लिए नहीं बल्कि बेहतर जीवनशैली के लिए रहना पसंद करें। इसके लिए पैदल चलने योग्य क्षेत्र, सार्वजनिक स्थान, हरित क्षेत्र, सामुदायिक सुविधाएं और बेहतर कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण होंगे।
उन्होंने कहा कि अच्छी तरह नियोजित शहरी परियोजनाएं स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दे सकती हैं। इनके आसपास व्यापार, सेवाओं और रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं तथा शहर के विभिन्न हिस्सों के बीच आर्थिक गतिविधियों का बेहतर वितरण हो सकता है।
सम्मेलन में रियल एस्टेट परियोजनाओं की मंजूरी प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने की आवश्यकता प्रमुखता से उठाई गई। उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि कई विभागों और प्राधिकरणों से अलग-अलग अनुमति लेने की प्रक्रिया में लगने वाला समय परियोजना की लागत और समयसीमा दोनों को प्रभावित कर सकता है।
सीआईआई दिल्ली स्टेट के चेयरमैन हर्षवर्धन बंसल ने कहा कि बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट विकास के लिए मंजूरी व्यवस्था को तेज और एकीकृत करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक सिंगल विंडो प्रणाली केवल एक पोर्टल उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अलग-अलग विभागों और प्राधिकरणों की प्रक्रियाओं को एक-दूसरे से जोड़ना होगा, ताकि जहां संभव हो वहां आवेदन और जांच की प्रक्रियाएं समानांतर रूप से चल सकें।
इससे परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में लगने वाला समय कम हो सकता है। साथ ही डेवलपर्स के लिए समय और लागत का अनुमान लगाना भी आसान हो सकता है।
उद्योग प्रतिनिधियों के मुताबिक तेज मंजूरी के साथ पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि परियोजना की आवश्यकताओं, दस्तावेजों, समयसीमा और विभागीय जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाए तो आवेदन प्रक्रिया में अनिश्चितता कम हो सकती है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से आवेदन की स्थिति, लंबित चरण और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी उपलब्ध कराने से डेवलपर्स और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर किया जा सकता है।
सम्मेलन में किफायती आवास को रियल एस्टेट विकास के केंद्र में रखने पर भी जोर दिया गया। उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि केवल आवासीय इकाइयों की संख्या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
किफायती आवास की उपलब्धता भूमि की कीमत, निर्माण लागत, वित्तीय व्यवस्था, परिवहन सुविधा और रोजगार केंद्रों से दूरी जैसे कई कारकों से जुड़ी है। यदि कम कीमत वाले मकान शहर के रोजगार केंद्रों से बहुत दूर बनाए जाते हैं तो आवास की शुरुआती कीमत कम होने के बावजूद परिवहन और समय की लागत बढ़ सकती है।
इसलिए किफायती आवास की योजना बनाते समय रोजगार, परिवहन, सामाजिक सुविधाओं और बुनियादी ढांचे को भी साथ में देखना होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार शहरी विस्तार में भूमि उपयोग और परिवहन की योजना को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। जहां बड़े पैमाने पर आवासीय विकास हो रहा है, वहां सार्वजनिक परिवहन की क्षमता भी उसी अनुपात में विकसित करनी होगी।
मेट्रो, बस नेटवर्क, क्षेत्रीय परिवहन, पैदल मार्ग और साइकिल नेटवर्क जैसी सुविधाओं की उपलब्धता से निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे यातायात और प्रदूषण के दबाव को नियंत्रित करने में भी योगदान मिल सकता है।
शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी के साथ पानी की मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में भविष्य की रियल एस्टेट परियोजनाओं में जल संरक्षण और पुनर्चक्रण को शुरुआती योजना का हिस्सा बनाना आवश्यक होगा।
वर्षा जल संचयन, उपचारित जल का पुन: उपयोग, कम पानी खपत करने वाली तकनीक और रिसाव नियंत्रण जैसे उपायों से परियोजनाओं की जल जरूरतों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है।
बड़ी परियोजनाओं में जल की मांग और उपलब्ध आपूर्ति क्षमता का आकलन पहले से करने से भविष्य में स्थानीय जल व्यवस्था पर अचानक बढ़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
शहरी विस्तार के साथ सीवेज और ठोस कचरे की मात्रा में भी वृद्धि होती है। इसलिए नई परियोजनाओं में सीवेज उपचार, कचरा पृथक्करण और पुनर्चक्रण जैसी व्यवस्थाओं को केवल औपचारिक आवश्यकता के रूप में नहीं, बल्कि शहरी बुनियादी ढांचे के अभिन्न हिस्से के रूप में देखने की जरूरत है।
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी क्षेत्र में नई आबादी बसने से पहले वहां कचरा प्रबंधन और सीवेज की क्षमता का आकलन किया जाना चाहिए। इससे भविष्य में स्थानीय निकायों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम किया जा सकता है।
रियल एस्टेट क्षेत्र में ऊर्जा की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। आवासीय परिसरों, कार्यालयों, मॉल और अन्य वाणिज्यिक भवनों में बिजली की मांग को देखते हुए ऊर्जा दक्ष डिजाइन और तकनीकों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो सकता है।
प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन, ऊर्जा दक्ष उपकरण, स्मार्ट बिल्डिंग सिस्टम और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे उपायों से भवनों की दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरत को कम करने की दिशा में काम किया जा सकता है।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हरित क्षेत्र और सार्वजनिक खुले स्थान भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पार्क, खुले क्षेत्र, पेड़-पौधे और सार्वजनिक स्थान शहरों की रहने योग्य क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं।
इसलिए रियल एस्टेट परियोजनाओं में हरित क्षेत्र को केवल सजावटी तत्व के रूप में नहीं बल्कि शहरी पर्यावरण के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
सम्मेलन में इस बात पर भी चर्चा हुई कि नए आर्थिक कॉरिडोर, औद्योगिक क्षेत्र, एक्सप्रेसवे, लॉजिस्टिक्स हब और उभरते कारोबारी केंद्र देश में रियल एस्टेट की मांग का भूगोल बदल रहे हैं।
अब रियल एस्टेट विकास केवल पारंपरिक महानगरों तक सीमित नहीं रह गया है। नए आर्थिक केंद्रों के आसपास आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार हो रहा है। इससे छोटे और मध्यम शहरों तथा महानगरों के बाहरी क्षेत्रों में भी नई संभावनाएं बन सकती हैं।
हालांकि ऐसे विस्तार के साथ नियोजित विकास की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। यदि परिवहन और सार्वजनिक सुविधाओं के विकास की तुलना में आबादी और निर्माण तेजी से बढ़ता है तो बाद में बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है।
रियल एस्टेट क्षेत्र के बदलते स्वरूप का असर छोटे और मध्यम शहरों पर भी पड़ सकता है। बेहतर सड़क संपर्क, डिजिटल कनेक्टिविटी, औद्योगिक निवेश और नए रोजगार केंद्रों के कारण इन शहरों में आवास और वाणिज्यिक संपत्तियों की मांग बढ़ सकती है।
इस तरह के विकास से स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलने की संभावना रहती है, लेकिन इसके लिए नगर नियोजन, भूमि उपयोग, सार्वजनिक परिवहन और जल-सीवेज व्यवस्था को पहले से मजबूत करना जरूरी होगा।
डिजिटल तकनीक रियल एस्टेट क्षेत्र में निर्माण और संचालन दोनों स्तरों पर बदलाव ला सकती है। बिल्डिंग इंफॉर्मेशन मॉडलिंग, डिजिटल परियोजना निगरानी, स्मार्ट मीटरिंग और डेटा आधारित शहरी नियोजन जैसी तकनीकों का उपयोग परियोजनाओं की दक्षता बढ़ाने में किया जा सकता है।
डिजिटल सिस्टम के माध्यम से परियोजना की प्रगति, संसाधनों की खपत और बुनियादी ढांचे की जरूरतों की निगरानी अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकती है।
सम्मेलन के शीर्षक में शामिल ‘संस्थागतकरण’ का एक महत्वपूर्ण पहलू रियल एस्टेट में दीर्घकालिक निवेश को बढ़ावा देना भी है। इसके लिए परियोजनाओं में पारदर्शिता, बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस, स्पष्ट दस्तावेजीकरण और नियामकीय स्थिरता आवश्यक होगी।
संस्थागत निवेशक आम तौर पर लंबी अवधि के लिए पूंजी लगाते हैं। ऐसे में उन्हें परियोजना की वित्तीय स्थिति, मंजूरी प्रक्रिया, जोखिम और संभावित रिटर्न के बारे में स्पष्ट जानकारी की आवश्यकता होती है।
तेज शहरी विस्तार के साथ निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा। भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता और दीर्घकालिक रखरखाव जैसे पहलुओं को परियोजना की शुरुआत से ही महत्व देना होगा।
किसी भवन का वास्तविक मूल्य केवल उसके निर्माण के समय नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवनकाल में उसकी उपयोगिता, सुरक्षा और रखरखाव की लागत से भी जुड़ा होता है।
भविष्य के शहर केवल ऊंची इमारतों और आधुनिक कॉम्प्लेक्स से नहीं बनेंगे। इनमें विभिन्न आय वर्गों के लोगों के लिए आवास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुविधाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।
समावेशी शहरी विकास का अर्थ है कि शहर में रहने वाले विभिन्न सामाजिक और आर्थिक समूहों को बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच मिल सके। इसी दृष्टिकोण से रियल एस्टेट परियोजनाओं की योजना तैयार करने पर शहरों में सामाजिक और आर्थिक दूरी कम करने में मदद मिल सकती है।
सम्मेलन का व्यापक संदेश रहा कि भारत का अगला शहरी विस्तार केवल निर्माण की गति से निर्धारित नहीं होना चाहिए। विकास की गुणवत्ता, पर्यावरणीय स्थिरता, संसाधनों की दक्षता, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की क्षमता और नागरिकों की जीवन गुणवत्ता को भी समान महत्व देना होगा।
रियल एस्टेट डेवलपर्स, नगर निकायों, राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय इस बदलाव के लिए महत्वपूर्ण होगा। परियोजनाओं की योजना यदि व्यापक शहर की जरूरतों के साथ जोड़कर बनाई जाती है तो विकास के साथ पैदा होने वाली कई बुनियादी चुनौतियों का पहले ही समाधान किया जा सकता है।
आने वाले वर्षों में भारत के शहरों का विस्तार तेज होने की संभावना के बीच रियल एस्टेट क्षेत्र की भूमिका भी बदल रही है। अब डेवलपर के लिए केवल जमीन खरीदना, निर्माण करना और संपत्ति बेचना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह भी देखना होगा कि उसकी परियोजना जिस शहर और समुदाय का हिस्सा बन रही है, वहां पानी, परिवहन, ऊर्जा, पर्यावरण और सार्वजनिक सुविधाओं पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
इसी बदलाव को रियल एस्टेट के नए मॉडल के रूप में देखा जा रहा है, जहां जमीन और इमारत के साथ-साथ संसाधन दक्षता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी, सामाजिक उपयोगिता और शहरी बुनियादी ढांचे के साथ तालमेल भी संपत्ति के वास्तविक मूल्य का हिस्सा बनेगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


