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- 12h ago
मथुरा। माध्यमिक विद्यालय में आयोग से चयनित होकर पहुंचे अभ्यर्थियों को अध्यापक पद पर कार्यभार ग्रहण कराने के नाम पर कथित रूप से धन की मांग किए जाने का मामला सामने आने के बाद अब घटनाक्रम तेजी से बदल गया है। इस संबंध में समाचार प्रकाशित होने के बाद विद्यालय प्रबंधन की ओर से कुछ चयनित अभ्यर्थियों को बुलाकर कार्यभार ग्रहण कराने की जानकारी सामने आई है। वहीं, मामले से जुड़े लोगों ने विद्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरों को हटाए जाने और रिकॉर्डिंग गायब किए जाने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
मामले में चयनित अभ्यर्थियों और उनके परिजनों ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित तिथियों की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित कर जांची जाए तो कार्यभार ग्रहण कराने और कथित रूप से अभ्यर्थियों को रोकने से जुड़े घटनाक्रम की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
मथुरा शहर की अग्रवाल शिक्षा मंडल द्वारा संचालित चंपा अग्रवाल इंटर कॉलेज में आयोग से चयनित होकर करीब एक दर्जन अध्यापक पहुंचे हैं। अभ्यर्थियों और उनके परिजनों का आरोप है कि इनमें से कुछ अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराने में कथित तौर पर टालमटोल की गई, जबकि जिन अभ्यर्थियों ने कथित मांग पूरी नहीं की, उनका कार्यभार ग्रहण नहीं कराया गया।
परिजनों का आरोप है कि उनसे तीन-तीन लाख रुपये की व्यवस्था करने को कहा गया। इसी मामले को लेकर पहले समाचार प्रकाशित होने के बाद विद्यालय प्रबंधन की ओर से कुछ चयनित अभ्यर्थियों को बुलाया गया और उन्हें कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।
अभ्यर्थियों के परिजनों का कहना है कि यदि संबंधित तिथियों की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग उपलब्ध हो तो यह भी स्पष्ट हो सकता है कि कौन से अभ्यर्थी किस समय विद्यालय पहुंचे, किस अधिकारी या पदाधिकारी से मिले और कार्यभार ग्रहण की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी की गई।
अभ्यर्थियों के परिजनों के अनुसार जिस दिन कुछ चयनित अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराया गया, उस दिन प्रधानाचार्य विद्यालय में मौजूद नहीं थे। ऐसे में उनका सवाल है कि प्रधानाचार्य की अनुपस्थिति में कार्यभार ग्रहण की प्रक्रिया किसके स्तर से और किस आधार पर पूरी कराई गई।
परिजनों का दावा है कि संबंधित अभ्यर्थी दोपहर करीब 1:30 बजे के बाद विद्यालय पहुंचे थे। उनका आरोप है कि उन्हें संस्था प्रधान की ओर से नियुक्ति पत्र उपलब्ध कराए बिना ही कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।
दूसरी ओर, अन्य चयनित अभ्यर्थियों के बारे में बताया गया कि वे 28 सितंबर को दोपहर करीब 1:30 बजे से शाम चार बजे तक विद्यालय में मौजूद रहे, लेकिन उनका कार्यभार ग्रहण नहीं कराया गया।
इन परिस्थितियों ने चयन प्रक्रिया के बाद कार्यभार ग्रहण कराने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभ्यर्थियों और उनके परिजनों की मांग है कि विद्यालय के अभिलेखों, उपस्थिति रजिस्टर, पत्राचार और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए।
बताया गया कि चयनित अभ्यर्थी और उनके परिजन अपनी शिकायत लेकर जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय भी पहुंचे थे। उनका कहना है कि वहां भी उन्हें नियुक्ति पत्र उपलब्ध नहीं कराया गया।
परिजनों का आरोप है कि अभ्यर्थियों की समस्या सामने आने के बावजूद मामले में तत्काल ऐसी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे कार्यभार ग्रहण से संबंधित विवाद का समाधान हो सके।
उनकी मांग है कि जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय को पूरे मामले की समयबद्ध जांच करानी चाहिए और विद्यालय प्रबंधन से संबंधित सभी अभिलेख सुरक्षित कराने चाहिए, ताकि बाद में किसी प्रकार के दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य में बदलाव की आशंका न रहे।
अभ्यर्थियों और उनके परिजनों ने मांग की है कि 25 सितंबर और 28 सितंबर को दोपहर 1:30 बजे से शाम पांच बजे तक प्रधानाचार्य कक्ष और प्रबंधक कक्ष के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित कराया जाए।
उनका कहना है कि इन रिकॉर्डिंग से यह पता चल सकता है कि संबंधित दिनों में कौन-कौन लोग विद्यालय पहुंचे, किससे उनकी मुलाकात हुई और कार्यभार ग्रहण से संबंधित क्या प्रक्रिया अपनाई गई।
परिजनों ने यह भी मांग की है कि यदि रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है तो उसकी तकनीकी जांच कराई जाए कि वह कब और किस कारण से उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से छेड़छाड़ की आशंका होने की स्थिति में संबंधित डीवीआर, हार्ड डिस्क या अन्य रिकॉर्डिंग डिवाइस को सुरक्षित कर विशेषज्ञों से जांच कराई जानी चाहिए।
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह सामने आया है कि प्रबंधक कक्ष में लगे सीसीटीवी कैमरों को कथित तौर पर हटवा दिया गया और उनकी रिकॉर्डिंग भी नष्ट कर दी गई।
सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, प्रधानाचार्य की अनुपस्थिति में प्रबंधक ने कुछ चयनित अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराया। इसके बाद प्रबंधक कक्ष में लगे कैमरों को हटाए जाने और रिकॉर्डिंग नष्ट किए जाने की बात कही जा रही है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में जांच एजेंसियों के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वे सीसीटीवी सिस्टम, डीवीआर, हार्ड डिस्क और संबंधित तकनीकी रिकॉर्ड की जांच कर यह पता लगाएं कि कैमरे कब हटाए गए और रिकॉर्डिंग उपलब्ध क्यों नहीं है।
अभ्यर्थियों के परिजनों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सबसे पहले सभी संभावित साक्ष्यों को सुरक्षित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि विद्यालय में उपलब्ध नियुक्ति संबंधी पत्रावली, चयन आयोग से प्राप्त पत्र, डाक रजिस्टर, आवक-जावक रजिस्टर, उपस्थिति पंजिका, कार्यभार ग्रहण संबंधी दस्तावेज और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को जांच के दायरे में लिया जाना चाहिए।
परिजनों की मांग है कि जांच पूरी होने तक संबंधित रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के लिए विभागीय स्तर पर स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं।
उनका कहना है कि यदि रिकॉर्डिंग या दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं तो इसकी भी जांच होनी चाहिए कि वे किसके कब्जे में थे और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी किस अधिकारी या पदाधिकारी की थी।
अभ्यर्थियों के परिजनों ने प्रबंधक और प्रधानाचार्य की भूमिका की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी चयनित अभ्यर्थी को नियमों के विपरीत कार्यभार ग्रहण कराया गया और किसी अन्य अभ्यर्थी को रोका गया तो इसकी वजह सामने आनी चाहिए।
उनका यह भी कहना है कि यदि किसी स्तर पर धन की मांग की गई है तो उसके संबंध में भी जांच की जानी चाहिए। परिजनों ने कथित धन मांग से जुड़े साक्ष्य, बातचीत और अन्य उपलब्ध जानकारी को जांच का हिस्सा बनाने की मांग की है।
परिजनों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विद्यालय के प्रशासनिक कामकाज और रिकॉर्ड पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है। उन्होंने मांग की है कि जांच पूरी होने तक विभाग को नियमों के अनुसार आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाने चाहिए, ताकि किसी भी संभावित साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ न हो।
उनका कहना है कि यदि विद्यालय प्रबंधन को ही रिकॉर्ड उपलब्ध कराने और जांच में सहयोग करने की जिम्मेदारी दी जाती है तो इलेक्ट्रॉनिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सक्षम विभागीय या कानूनी जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
पूरे मामले में अग्रवाल शिक्षा मंडल की भूमिका को लेकर भी अभ्यर्थियों और उनके परिजनों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि संस्था के स्तर से अब तक मामले को लेकर सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है।
अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि कार्यभार ग्रहण कराने की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार हुई है तो संस्था को संबंधित अभिलेख और प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि भ्रम की स्थिति समाप्त हो।
वहीं, यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए विभागीय जांच आवश्यक है।
मामले की जानकारी विभागीय अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने को लेकर भी अभ्यर्थियों के परिजनों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय को मामले में तत्काल अभिलेख सुरक्षित कराने और विद्यालय प्रबंधन से जवाब मांगने की कार्रवाई करनी चाहिए थी।
परिजनों की मांग है कि विभाग पूरे प्रकरण की लिखित शिकायत लेकर उसका परीक्षण करे और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करे। इसके साथ ही चयन आयोग से प्राप्त पत्रावली और विद्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए।
बताया गया कि जिस दिन मामले से संबंधित समाचार प्रकाशित हुआ, उसी दिन माध्यमिक शिक्षा मंत्री गुलाब देवी मथुरा में मौजूद थीं। उनके संज्ञान में भी प्रकरण लाए जाने की जानकारी सामने आई है।
अब अभ्यर्थियों और उनके परिजनों को उम्मीद है कि शासन स्तर से मामले को गंभीरता से लेते हुए विभागीय अधिकारियों को निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए जाएंगे।
इस मामले में नियुक्ति पत्र से जुड़ा रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हो सकता है। अभ्यर्थियों के परिजनों का आरोप है कि संस्था की ओर से उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिए गए, जबकि कुछ अभ्यर्थियों को बाद में कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।
ऐसे में नियुक्ति पत्र कब जारी हुए, किस माध्यम से भेजे गए, किस तारीख को प्राप्त हुए और संस्था के डाक रजिस्टर में उनकी क्या प्रविष्टि है—इन सभी बिंदुओं की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
इसके अलावा चयन आयोग से विद्यालय को भेजे गए पत्र, विद्यालय की प्राप्ति रसीद, डाक रजिस्टर और संबंधित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का भी मिलान कराया जाना जरूरी बताया जा रहा है।
अभ्यर्थियों और उनके परिजनों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया के बाद कार्यभार ग्रहण से जुड़ी स्थिति को स्पष्ट कराना है। उनका कहना है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो निष्पक्ष जांच से यह बात सामने आ जाएगी और यदि कोई अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी भी तय हो सकेगी।
परिजनों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए तथा जांच पूरी होने तक सभी दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं।
अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि चयनित सभी अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराने की प्रक्रिया में समान मानदंड अपनाए गए या नहीं और यदि किसी अभ्यर्थी को रोका गया तो उसका लिखित कारण क्या था। इसके अलावा सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की उपलब्धता अथवा उसके गायब होने की स्थिति भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। संबंधित विद्यालय प्रबंधन, अग्रवाल शिक्षा मंडल और जिला विद्यालय निरीक्षक का आधिकारिक पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।


