यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था यानी क्रिएटिव इकोनॉमी देश के आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया कंटेंट, ओटीटी प्लेटफॉर्म, वीडियो गेमिंग, एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और लाइव एंटरटेनमेंट जैसे क्षेत्रों के विस्तार के साथ इस अर्थव्यवस्था का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र के वास्तविक आर्थिक योगदान, रोजगार सृजन की क्षमता और बौद्धिक संपदा के मूल्यांकन के लिए विश्वसनीय आंकड़े जुटाना जरूरी हो गया है।
केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव डॉ. सौरभ गर्ग ने गुरुवार को 13वें सीआईआई बिग पिक्चर समिट को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार देश की आधिकारिक सांख्यिकी व्यवस्था को इस तरह विकसित करने की दिशा में काम कर रही है, जिससे डिजिटल मंचों, कंटेंट क्रिएटर्स और बौद्धिक संपदा से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों का अधिक प्रभावी ढंग से आकलन किया जा सके।
गर्ग के अनुसार, रचनात्मकता अब केवल कला, मनोरंजन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह आर्थिक मूल्य सृजित करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभर रही है। इस क्षेत्र की गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से मापने से इसके वास्तविक आकार, रोजगार में योगदान, निर्यात क्षमता और भविष्य में विकास की संभावनाओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।
उन्होंने कहा कि सटीक आंकड़े किसी भी क्षेत्र के लिए प्रभावी नीतियां बनाने का आधार होते हैं। जब किसी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के योगदान का विश्वसनीय आकलन उपलब्ध होता है, तो सरकार को निवेश, कौशल विकास, वित्तीय सहायता और बुनियादी सुविधाओं से संबंधित निर्णय लेने में मदद मिलती है। रचनात्मक अर्थव्यवस्था के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होता है।
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था का मूल्य लगभग 30 अरब डॉलर आंका गया है। यह देश के करीब आठ प्रतिशत कार्यबल को रोजगार प्रदान करती है। रचनात्मक गतिविधियों के बढ़ते दायरे और डिजिटल तकनीक के प्रसार को देखते हुए यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में रोजगार और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
रचनात्मक अर्थव्यवस्था में ऐसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं, जिनमें विचारों, कहानियों, डिजाइन, संगीत, दृश्य सामग्री और डिजिटल उत्पादों को आर्थिक मूल्य में बदला जाता है। फिल्म निर्माण, टेलीविजन, विज्ञापन, संगीत, सोशल मीडिया, डिजिटल प्रकाशन, गेमिंग और एनीमेशन इस व्यापक अर्थव्यवस्था के प्रमुख हिस्से हैं।
इस क्षेत्र की खासियत यह है कि इसमें बड़े उद्योगों के साथ-साथ छोटे व्यवसायों, स्वतंत्र कलाकारों, फ्रीलांसरों और व्यक्तिगत कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी अवसर मौजूद हैं। कोई व्यक्ति वीडियो निर्माण, ग्राफिक डिजाइन, संगीत, लेखन, गेम डिजाइन या डिजिटल मार्केटिंग के माध्यम से अपनी रचनात्मक क्षमता को आय के स्रोत में बदल सकता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस प्रक्रिया को और आसान बनाया है। अब किसी कलाकार या कंटेंट क्रिएटर के लिए अपनी सामग्री को केवल स्थानीय दर्शकों तक सीमित रखना जरूरी नहीं है। इंटरनेट के माध्यम से भारतीय रचनाकार वैश्विक दर्शकों तक पहुंच सकते हैं और विज्ञापन, सदस्यता, लाइसेंसिंग तथा डिजिटल उत्पादों के जरिए कमाई कर सकते हैं।
हालांकि, इस अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पारंपरिक आर्थिक आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देता। कई रचनाकार स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, जबकि कुछ प्लेटफॉर्म के माध्यम से आय अर्जित करते हैं। ऐसे में उनकी वास्तविक कमाई, काम के घंटे, रोजगार की स्थिति और आर्थिक योगदान का आकलन करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। सरकार की नई सांख्यिकीय पहलों का उद्देश्य इसी अंतर को कम करना है।
भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था की वृद्धि केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है। रचनात्मक सेवाओं के निर्यात में भी उल्लेखनीय विस्तार दर्ज किया जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में रचनात्मक सेवाओं का निर्यात 11 अरब डॉलर तक पहुंच गया और इसमें सालाना लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा रही है।
रचनात्मक सेवाओं के निर्यात में एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, डिजाइन, डिजिटल सामग्री निर्माण, गेमिंग से संबंधित सेवाओं और अन्य रचनात्मक गतिविधियों का योगदान हो सकता है। भारतीय प्रतिभाओं की तकनीकी दक्षता और अपेक्षाकृत व्यापक पेशेवर आधार ने वैश्विक कंपनियों के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण सेवा केंद्र बनाया है।
भारतीय कंपनियां और पेशेवर अंतरराष्ट्रीय फिल्म परियोजनाओं, विज्ञापन अभियानों, डिजिटल मनोरंजन और गेमिंग उद्योग के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। इससे विदेशी मुद्रा अर्जित करने के साथ-साथ देश में तकनीकी कौशल और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलता है।
लेकिन इस क्षेत्र के सामने अब एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या भारत वैश्विक कंपनियों के लिए सेवाएं उपलब्ध कराने वाले प्रमुख केंद्र से आगे बढ़कर अपनी मौलिक रचनाओं और बौद्धिक संपदा के जरिए भी वैश्विक बाजार में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है।
यदि भारतीय कंपनियां अपने मौलिक पात्रों, कहानियों, गेमिंग ब्रांडों, एनीमेशन फ्रेंचाइजी और अन्य रचनात्मक उत्पादों का स्वामित्व विकसित करती हैं, तो उनके लिए लंबे समय तक आय अर्जित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था के आर्थिक आकलन में बौद्धिक संपदा के निर्माण, स्वामित्व और निर्यात को शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
भारत का मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र रचनात्मक अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभों में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में इस उद्योग का कारोबार लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये रहा। इसमें डिजिटल मीडिया की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई थी।
डिजिटल मीडिया के विस्तार ने मनोरंजन उद्योग के काम करने के तरीके में व्यापक बदलाव किया है। पहले जहां दर्शकों की पहुंच मुख्य रूप से टेलीविजन, सिनेमाघरों और पारंपरिक माध्यमों तक सीमित थी, वहीं अब मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए मनोरंजन सामग्री की खपत तेजी से बढ़ी है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म, वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाएं, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन ने सामग्री तैयार करने तथा उसे दर्शकों तक पहुंचाने के नए रास्ते खोले हैं। इसके साथ ही विज्ञापन, सदस्यता और डिजिटल वितरण से जुड़े कारोबार का महत्व भी बढ़ा है।
डिजिटल मीडिया ने स्वतंत्र रचनाकारों को भी नए अवसर दिए हैं। छोटे वीडियो, पॉडकास्ट, वेब सीरीज, ऑनलाइन संगीत और अन्य डिजिटल प्रारूपों के जरिए बड़ी संख्या में लोग अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। इन गतिविधियों से लेखन, संपादन, कैमरा संचालन, ग्राफिक डिजाइन, ध्वनि निर्माण और डिजिटल मार्केटिंग जैसे कामों की मांग बढ़ सकती है।
हालांकि, डिजिटल अर्थव्यवस्था में वास्तविक कमाई का आकलन आसान नहीं है। कई प्लेटफॉर्म अलग-अलग प्रकार के भुगतान मॉडल अपनाते हैं। कुछ रचनाकार विज्ञापन से कमाते हैं, जबकि अन्य को ब्रांड सहयोग, सदस्यता, प्रायोजन या अपनी सामग्री के लाइसेंस से आय होती है। इन सभी स्रोतों का समुचित आकलन रचनात्मक अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में मदद कर सकता है।
भारत के रचनात्मक उद्योग में गेमिंग, एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और लाइव एंटरटेनमेंट जैसे क्षेत्रों का महत्व तेजी से बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में गेमिंग क्षेत्र का आकार लगभग 23,200 करोड़ रुपये था, जबकि एनीमेशन और विजुअल इफेक्ट्स क्षेत्र का मूल्य करीब 10,300 करोड़ रुपये आंका गया। लाइव एंटरटेनमेंट क्षेत्र का कारोबार 10,000 करोड़ रुपये से अधिक रहा।
ये क्षेत्र तकनीक और रचनात्मकता के मेल का उदाहरण हैं। वीडियो गेम विकसित करने में प्रोग्रामिंग के साथ-साथ कहानी लेखन, चरित्र निर्माण, संगीत, ग्राफिक डिजाइन और उपयोगकर्ता अनुभव जैसे कई पहलुओं की भूमिका होती है। इसी तरह, एनीमेशन और विजुअल इफेक्ट्स में कलाकारों, तकनीकी विशेषज्ञों और डिजिटल डिजाइनरों की संयुक्त भागीदारी आवश्यक होती है।
लाइव एंटरटेनमेंट के अंतर्गत संगीत कार्यक्रमों, मंचीय प्रस्तुतियों और अन्य प्रत्यक्ष मनोरंजन गतिविधियों से जुड़े व्यवसायों को अवसर मिलते हैं। इन आयोजनों से कलाकारों के अलावा आयोजन प्रबंधन, तकनीकी उपकरण, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि, सुरक्षा और विपणन जैसे क्षेत्रों में भी काम पैदा होता है।
इन क्षेत्रों के विस्तार से युवाओं के लिए रोजगार के नए विकल्प तैयार हो सकते हैं। पारंपरिक रोजगार के अतिरिक्त रचनात्मक उद्योग कौशल आधारित और परियोजना आधारित काम के अवसर भी उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, इस क्षेत्र में टिकाऊ रोजगार के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकास जरूरी है।
डॉ. सौरभ गर्ग ने रचनात्मक अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को आधिकारिक आंकड़ों में बेहतर ढंग से शामिल करने के लिए चार प्रमुख पहलों का उल्लेख किया। इनका उद्देश्य बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप सांख्यिकीय व्यवस्था को मजबूत करना और उन गतिविधियों की पहचान करना है, जिन्हें पारंपरिक आंकड़ों में पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं किया जा पाता।
पहली पहल के तहत संशोधित राष्ट्रीय औद्योगिक वर्गीकरण में डिजिटल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, इन-ऐप खरीदारी वाले वीडियो गेम प्रकाशन, ओटीटी स्ट्रीमिंग सेवाओं और कंटेंट साझा करने वाले डिजिटल मंचों जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया है।
राष्ट्रीय औद्योगिक वर्गीकरण का महत्व इसलिए है, क्योंकि इसके माध्यम से विभिन्न आर्थिक गतिविधियों की पहचान और वर्गीकरण किया जाता है। जब नई गतिविधियों को उचित श्रेणियां मिलती हैं, तो उनके बारे में आंकड़े एकत्र करने और अलग-अलग क्षेत्रों के योगदान का विश्लेषण करने में सुविधा होती है।
उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर आय अर्जित करने वाले व्यक्ति की आर्थिक गतिविधि पारंपरिक मीडिया संस्थान में काम करने वाले कर्मचारी से अलग हो सकती है। इसी तरह, इन-ऐप खरीदारी वाले गेम विकसित करने वाली कंपनियों का कारोबारी मॉडल भी पारंपरिक सॉफ्टवेयर सेवाओं से अलग हो सकता है।
इन गतिविधियों को स्पष्ट रूप से वर्गीकृत करने से डिजिटल अर्थव्यवस्था के नए स्वरूपों को समझने में मदद मिल सकती है। इससे नीति निर्माताओं को यह जानने में भी सहायता मिलेगी कि रचनात्मक उद्योगों में किन क्षेत्रों का विस्तार हो रहा है और किन क्षेत्रों में अधिक समर्थन की आवश्यकता है।
दूसरी पहल के तहत सेवा उत्पादन सूचकांक को नए आधार वर्ष 2024-25 के साथ विकसित किया जा रहा है। इसके माध्यम से प्रसारण और मनोरंजन सहित सेवा क्षेत्र की 19 उप-श्रेणियों के मासिक संकेतक उपलब्ध कराने की योजना का उल्लेख किया गया।
सेवा क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें व्यापार, परिवहन, संचार, वित्तीय सेवाओं और मनोरंजन सहित अनेक गतिविधियां शामिल हैं। इस क्षेत्र के प्रदर्शन को नियमित रूप से मापने के लिए समयबद्ध और तुलनीय आंकड़ों की आवश्यकता होती है।
मासिक संकेतकों की उपलब्धता से नीति निर्माताओं को सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है। इससे यह आकलन करना आसान हो सकता है कि किसी क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ रही हैं या उनमें सुस्ती आ रही है।
प्रसारण और मनोरंजन जैसी गतिविधियों को बेहतर सांख्यिकीय कवरेज मिलने से रचनात्मक अर्थव्यवस्था की वृद्धि को समझने में भी सहायता मिल सकती है। इससे नीतिगत निर्णयों के लिए अधिक व्यवस्थित आधार तैयार होगा।
तीसरी पहल के तहत जनवरी 2026 से आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण में प्रायोगिक आधार पर प्लेटफॉर्म आधारित कामगारों से संबंधित आंकड़े जुटाने शुरू किए गए हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार ने रोजगार के नए स्वरूप पैदा किए हैं। कई लोग ऑनलाइन माध्यम से सेवाएं प्रदान करते हैं या डिजिटल मंचों के जरिए ग्राहकों तक पहुंचते हैं। कुछ लोग पूर्णकालिक रूप से काम करते हैं, जबकि अन्य इसे अतिरिक्त आय के साधन के रूप में अपनाते हैं।
प्लेटफॉर्म आधारित कामगारों की वास्तविक संख्या, कार्य की प्रकृति, आय और रोजगार की परिस्थितियों का आकलन करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए श्रम संबंधी सर्वेक्षणों में उपयुक्त प्रश्नों और वर्गीकरण का उपयोग करना जरूरी होता है।
रचनात्मक अर्थव्यवस्था में भी स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स, डिजिटल कलाकारों और परियोजना आधारित काम करने वाले पेशेवरों की भूमिका बढ़ रही है। बेहतर श्रम आंकड़े इनकी आर्थिक स्थिति और रोजगार संबंधी चुनौतियों को समझने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, प्रायोगिक आंकड़ों के आधार पर प्राप्त निष्कर्षों को समझते समय उनके दायरे और पद्धति को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। समय के साथ आंकड़ों की गुणवत्ता और कवरेज में सुधार होने से इस क्षेत्र की अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।
चौथी पहल के अंतर्गत पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों सहित ज्ञान अर्थव्यवस्था का आकलन करने के लिए एक रूपरेखा तैयार की जा रही है।
ज्ञान अर्थव्यवस्था में ज्ञान, अनुसंधान, कौशल, नवाचार और बौद्धिक संपदा से जुड़ी गतिविधियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों में भी ऐसी सामग्री और विधियां शामिल हो सकती हैं, जिनका सांस्कृतिक, शैक्षणिक या व्यावसायिक महत्व है।
इन गतिविधियों का व्यवस्थित आकलन करने के लिए यह समझना जरूरी है कि ज्ञान का सृजन कैसे होता है, उसका संरक्षण कैसे किया जाता है और उसका उपयोग किस प्रकार आर्थिक या सामाजिक मूल्य उत्पन्न करता है।
ऐसी रूपरेखा विकसित होने से ज्ञान आधारित गतिविधियों के योगदान को बेहतर तरीके से समझने और उनके संरक्षण तथा विकास से जुड़ी नीतियों को दिशा देने में मदद मिल सकती है।
डॉ. सौरभ गर्ग ने रचनात्मक अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा कि भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती केवल कंटेंट तैयार करने तक सीमित न रहकर अपनी बौद्धिक संपदा का स्वामित्व विकसित करना है।
बौद्धिक संपदा में मौलिक कहानियां, पात्र, संगीत, डिजाइन, फिल्में, गेम, ब्रांड और अन्य रचनात्मक उत्पाद शामिल हो सकते हैं, जिन पर कानूनी अधिकार स्थापित किए जा सकते हैं। इनके स्वामित्व और लाइसेंसिंग के माध्यम से लंबे समय तक आर्थिक मूल्य उत्पन्न करने की संभावनाएं बनती हैं।
भारत वैश्विक मनोरंजन उद्योग के लिए कई प्रकार की सेवाएं उपलब्ध कराता है। लेकिन यदि भारतीय कंपनियां मौलिक कहानियों, एनीमेशन पात्रों, गेमिंग फ्रेंचाइजी और अन्य रचनात्मक उत्पादों का निर्माण करके उनका स्वामित्व अपने पास रखती हैं, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
उदाहरण के तौर पर, किसी भारतीय कंपनी द्वारा तैयार किए गए मौलिक एनिमेटेड पात्र का उपयोग फिल्म, टेलीविजन, वीडियो गेम, खिलौनों और अन्य उत्पादों में किया जा सकता है। यदि उस पात्र के अधिकार कंपनी के पास हैं, तो वह विभिन्न माध्यमों से लाइसेंसिंग और व्यावसायिक साझेदारी के जरिए आय अर्जित कर सकती है।
इसी तरह, भारतीय कहानियों और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित गेम, डिजिटल सामग्री और मनोरंजन उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इससे भारत की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ आर्थिक अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
गर्ग के अनुसार, भारत को यदि वैश्विक स्टूडियो के लिए सेवाएं देने से आगे बढ़कर अपनी बौद्धिक संपदा के लाइसेंस और निर्यात में मजबूत स्थिति बनानी है, तो आंकड़ों में बौद्धिक संपदा के निर्माण, स्वामित्व, लाइसेंसिंग और निर्यात को भी शामिल करना होगा।
गर्ग ने केंद्रीय बजट 2026-27 में 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स यानी एवीजीसी से जुड़ी क्रिएटर लैब स्थापित करने के समर्थन का भी उल्लेख किया।
एवीजीसी क्षेत्र में रचनात्मकता और तकनीकी कौशल दोनों की आवश्यकता होती है। एनीमेशन, गेम डिजाइन, विजुअल इफेक्ट्स और कॉमिक्स निर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करने के लिए कहानी लेखन, चित्रांकन, डिजिटल डिजाइन, सॉफ्टवेयर संचालन और अन्य विशेष कौशलों का ज्ञान आवश्यक होता है।
शैक्षणिक संस्थानों में क्रिएटर लैब की स्थापना का उद्देश्य विद्यार्थियों को इन क्षेत्रों से परिचित कराने और व्यावहारिक कौशल विकसित करने के अवसर उपलब्ध कराने से जुड़ा है। इससे विद्यार्थियों को कम उम्र से ही रचनात्मक तकनीकों के साथ काम करने का अनुभव मिल सकता है।
यदि ऐसी प्रयोगशालाओं में गुणवत्तापूर्ण उपकरण, प्रशिक्षित शिक्षक, उद्योग से जुड़ा प्रशिक्षण और व्यावहारिक परियोजनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, तो विद्यार्थियों को रोजगार तथा उद्यमिता के लिए तैयार करने में सहायता मिल सकती है।
स्कूलों और कॉलेजों में रचनात्मक कौशल को प्रोत्साहन देने से उन युवाओं के लिए भी नए रास्ते खुल सकते हैं, जिनकी रुचि पारंपरिक शैक्षणिक विषयों के अतिरिक्त डिजाइन, कला, गेमिंग और डिजिटल सामग्री निर्माण में है।
हालांकि, इन पहलों का वास्तविक प्रभाव उनके क्रियान्वयन, संसाधनों की उपलब्धता और उद्योग की जरूरतों के साथ तालमेल पर निर्भर करेगा।
डॉ. सौरभ गर्ग के अनुसार, एवीजीसी क्षेत्र को वर्ष 2030 तक करीब 20 लाख पेशेवरों की आवश्यकता होगी। यह अनुमान इस क्षेत्र में भविष्य की संभावित कौशल मांग और रोजगार की संभावनाओं को रेखांकित करता है।
एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स उद्योग के विस्तार के साथ कई प्रकार के पेशेवरों की जरूरत हो सकती है। इनमें एनिमेटर, गेम डेवलपर, कॉन्सेप्ट आर्टिस्ट, ग्राफिक डिजाइनर, विजुअल इफेक्ट्स विशेषज्ञ, पटकथा लेखक, ध्वनि विशेषज्ञ और डिजिटल प्रोडक्शन से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त परियोजना प्रबंधन, डिजिटल मार्केटिंग, उत्पाद डिजाइन और बौद्धिक संपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी कुशल पेशेवरों की आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार एवीजीसी उद्योग केवल कलाकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें तकनीकी, व्यावसायिक और प्रबंधकीय कौशलों का भी योगदान होता है।
इस मांग को पूरा करने के लिए उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी होगा। पाठ्यक्रमों को बदलती तकनीक के अनुरूप तैयार करना, विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देना और उद्योग में काम करने के अवसर उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
यदि भारत इस क्षेत्र के लिए आवश्यक प्रतिभाओं को तैयार करने में सफल रहता है, तो घरेलू कंपनियों को विकास के नए अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, भारतीय पेशेवरों की वैश्विक बाजार में भागीदारी बढ़ने की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं।
रचनात्मक अर्थव्यवस्था के विस्तार में स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स की भूमिका तेजी से महत्वपूर्ण हुई है। सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म ने लोगों को अपनी रचनात्मक सामग्री सीधे दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर दिया है।
आज कोई व्यक्ति समाचार विश्लेषण, शिक्षा, मनोरंजन, संगीत, यात्रा, संस्कृति या अन्य विषयों पर डिजिटल सामग्री तैयार कर सकता है। इससे पारंपरिक मीडिया संस्थानों के बाहर भी रचनात्मक कार्यों और उद्यमिता के अवसर विकसित हुए हैं।
हालांकि, सभी कंटेंट क्रिएटर्स की आय नियमित नहीं होती। कई लोगों की कमाई विज्ञापन, व्यूज, ब्रांड सहयोग और प्लेटफॉर्म की नीतियों पर निर्भर करती है। कुछ रचनाकारों को काम की अनिश्चितता, भुगतान में उतार-चढ़ाव और सामग्री के अधिकारों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में आधिकारिक आंकड़ों में इन गतिविधियों को बेहतर तरीके से शामिल करने से सरकार को यह समझने में मदद मिल सकती है कि डिजिटल मंचों पर काम करने वाले लोगों की संख्या कितनी है, उनकी आर्थिक गतिविधियां किस प्रकार की हैं और इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं कहां विकसित हो रही हैं।
विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर कौशल विकास, उद्यमिता सहायता और रचनात्मक उद्योगों के लिए उपयुक्त नीतियों को तैयार करना भी आसान हो सकता है।
किसी भी उभरते क्षेत्र के विकास के लिए केवल कारोबार में वृद्धि का अनुमान पर्याप्त नहीं होता। यह जानना भी जरूरी है कि क्षेत्र में कितने लोग काम कर रहे हैं, रोजगार किस प्रकार का है, कितनी आय उत्पन्न हो रही है और आर्थिक गतिविधियों का कितना हिस्सा देश के भीतर मूल्य सृजित कर रहा है।
रचनात्मक अर्थव्यवस्था में यह चुनौती अधिक जटिल है, क्योंकि इसमें बड़े मीडिया समूहों से लेकर स्वतंत्र कलाकारों तक अनेक प्रकार के प्रतिभागी शामिल होते हैं। कुछ गतिविधियां औपचारिक कंपनियों के माध्यम से संचालित होती हैं, जबकि कई डिजिटल गतिविधियां व्यक्तिगत स्तर पर होती हैं।
सटीक आंकड़ों के अभाव में नीति निर्माताओं के लिए यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि किस क्षेत्र को प्रशिक्षण, निवेश, तकनीकी सहयोग या अन्य प्रकार के समर्थन की सबसे अधिक आवश्यकता है।
बेहतर आंकड़ों से रचनात्मक उद्योगों की वृद्धि का नियमित आकलन किया जा सकता है। इससे विभिन्न क्षेत्रों के बीच तुलना करने, रोजगार की मांग समझने और भविष्य की संभावनाओं का अनुमान लगाने में भी मदद मिल सकती है।
इसी प्रकार, बौद्धिक संपदा के निर्माण और निर्यात के आंकड़े उपलब्ध होने से यह समझा जा सकेगा कि भारत केवल रचनात्मक सेवाएं उपलब्ध करा रहा है या अपने मौलिक उत्पादों और अधिकारों के माध्यम से भी वैश्विक बाजार में आर्थिक मूल्य अर्जित कर रहा है।
भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और कलात्मक विविधता रचनात्मक अर्थव्यवस्था के लिए व्यापक आधार प्रदान करती है। देश में लोककथाओं, साहित्य, संगीत, पारंपरिक कलाओं, ऐतिहासिक कथाओं और आधुनिक डिजिटल अभिव्यक्तियों की समृद्ध परंपरा मौजूद है।
डिजिटल तकनीक के विस्तार से इन रचनात्मक संसाधनों को नए स्वरूप में प्रस्तुत करने की संभावनाएं बढ़ी हैं। भारतीय कहानियों पर आधारित फिल्में, वेब सीरीज, एनीमेशन, वीडियो गेम और डिजिटल उत्पाद घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंच सकते हैं।
लेकिन वैश्विक स्तर पर मजबूत उपस्थिति बनाने के लिए केवल सांस्कृतिक सामग्री उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, तकनीकी दक्षता, प्रभावी वितरण, बौद्धिक संपदा संरक्षण और व्यावसायिक रणनीति भी आवश्यक हैं।
यदि इन क्षेत्रों में समन्वित प्रयास किए जाते हैं, तो रचनात्मक अर्थव्यवस्था देश के लिए रोजगार और निर्यात के नए स्रोत विकसित कर सकती है। इसके साथ ही भारतीय संस्कृति और मौलिक विचारों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने में भी मदद मिल सकती है।
डॉ. सौरभ गर्ग के संबोधन का केंद्रीय संदेश भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण है कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था की वास्तविक क्षमता को समझने और उसके लिए प्रभावी नीतियां बनाने के लिए विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत है।
रचनात्मक अर्थव्यवस्था आज ऐसे दौर में है, जहां तकनीकी बदलाव और डिजिटल मंच नए अवसर पैदा कर रहे हैं। गेमिंग, एनीमेशन, सोशल मीडिया, ओटीटी और लाइव एंटरटेनमेंट जैसे क्षेत्रों में वृद्धि के साथ आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप भी बदल रहे हैं।
इस बदलाव के अनुरूप सांख्यिकीय व्यवस्था को विकसित करना जरूरी है, ताकि नए प्रकार के रोजगार और कारोबार को आधिकारिक आंकड़ों में उचित स्थान मिल सके। संशोधित औद्योगिक वर्गीकरण, सेवा उत्पादन सूचकांक, श्रम बल सर्वेक्षण और ज्ञान अर्थव्यवस्था के आकलन से जुड़ी पहलें इसी आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
इसके साथ ही भारतीय बौद्धिक संपदा के निर्माण, स्वामित्व और निर्यात को मापने पर जोर देना भी जरूरी है। इससे रचनात्मक क्षेत्र के आर्थिक योगदान की अधिक व्यापक तस्वीर सामने आ सकती है।
कुल मिलाकर, भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था केवल मनोरंजन उद्योग की वृद्धि की कहानी नहीं है, बल्कि रोजगार, तकनीकी कौशल, उद्यमिता, निर्यात और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा एक व्यापक आर्थिक अवसर है। यदि विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर प्रभावी नीतियां तैयार की जाती हैं और युवाओं को आवश्यक कौशल उपलब्ध कराया जाता है, तो यह क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


