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नई दिल्ली। देश में बीजों की गुणवत्ता, किसानों के अधिकार और नकली एवं घटिया बीजों की समस्या को लेकर केंद्र सरकार प्रस्तावित नए ‘सीड बिल’ को अंतिम रूप देने से पहले किसान संगठनों के साथ व्यापक स्तर पर संवाद कर रही है। इसी क्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गुरुवार को नई दिल्ली स्थित कृषि भवन में देशभर के प्रमुख किसान संगठनों के शीर्ष नेताओं के साथ विस्तृत बैठक की। बैठक में लगभग सभी राज्यों से आए किसान प्रतिनिधियों ने प्रस्तावित कानून के विभिन्न प्रावधानों पर अपने सुझाव और आपत्तियां रखीं।
केंद्रीय मंत्री ने किसान संगठनों की बातों को विस्तार से सुना और भरोसा दिलाया कि किसानों से प्राप्त सुझावों पर गंभीरता से विचार करने के बाद ही कानून को अंतिम रूप दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस महत्वपूर्ण कानून को लागू करने में किसी तरह की जल्दबाजी नहीं करेगी। किसानों, किसान संगठनों और संबंधित पक्षों से सुझाव लेने की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
बैठक का मुख्य फोकस देश में बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, नकली और घटिया बीजों पर प्रभावी कार्रवाई की व्यवस्था तैयार करना तथा किसानों के पारंपरिक बीजों और उनके अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रहा।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि देश में मौजूदा बीज अधिनियम 1966 में बनाया गया था, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में लागू हुआ था। उस समय कृषि क्षेत्र की परिस्थितियां आज की तुलना में काफी अलग थीं। पिछले कई दशकों में खेती की तकनीक, फसल पैटर्न, बीज उत्पादन, निजी क्षेत्र की भागीदारी, अनुसंधान, नई किस्मों और कृषि बाजार में बड़े बदलाव हुए हैं।
उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में बदलाव के साथ बीजों से जुड़ी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। ऐसे में पुराने कानून की सीमाओं को देखते हुए एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जो किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराने के साथ-साथ बीजों की गुणवत्ता और जवाबदेही को भी सुनिश्चित कर सके।
मंत्री ने कहा कि खराब या नकली बीज किसानों के लिए केवल आर्थिक नुकसान का कारण नहीं बनते, बल्कि इससे उनकी पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। किसान एक मौसम में अपनी मेहनत, लागत और समय लगाता है। यदि बीज की गुणवत्ता खराब निकलती है तो उसका असर पूरे कृषि चक्र और किसान की आय पर पड़ सकता है।
कृषि मंत्री ने बताया कि प्रस्तावित सीड बिल के मसौदे पर नवंबर-दिसंबर 2025 में सार्वजनिक सुझाव मांगे गए थे। इस दौरान किसानों, किसान संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से करीब 18 हजार सुझाव प्राप्त हुए।
सरकार अब इन सुझावों को केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित रखने के बजाय किसान संगठनों के साथ सीधे संवाद के माध्यम से समझना चाहती है। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसान संगठनों के प्रतिनिधि देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों के बीच काम करते हैं और उन्हें खेत स्तर पर आने वाली वास्तविक समस्याओं की जानकारी होती है।
इसलिए प्रस्तावित कानून के प्रावधानों को अंतिम रूप देने से पहले किसानों की जमीनी चिंताओं को समझना जरूरी है। सरकार का प्रयास है कि नया कानून किसानों की वास्तविक जरूरतों और कृषि क्षेत्र में आए बदलावों के अनुरूप तैयार हो।
बैठक में केंद्रीय मंत्री ने मौजूदा व्यवस्था की एक बड़ी कमी की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में करीब 70 प्रतिशत बीज मौजूदा बीज अधिनियम के दायरे से बाहर हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में बीजों से संबंधित प्रक्रियाओं में भी अंतर है।
ऐसी स्थिति में बीजों की गुणवत्ता को लेकर एक समान और प्रभावी व्यवस्था लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। किसानों को कई बार यह पता लगाने में कठिनाई होती है कि उन्हें उपलब्ध कराया गया बीज निर्धारित गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
मंत्री ने कहा कि मौजूदा कानून में दंड के प्रावधान भी पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। इसी वजह से नकली या घटिया बीजों की बिक्री करने वालों के खिलाफ प्रभावी जवाबदेही तय करने में समस्याएं सामने आती हैं।
प्रस्तावित सीड बिल का एक प्रमुख उद्देश्य बीजों की गुणवत्ता को लेकर जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था को मजबूत करना है। सरकार चाहती है कि यदि किसी किसान को खराब या नकली बीज के कारण नुकसान होता है तो दोषी पक्ष की जवाबदेही तय करने के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था मौजूद हो।
बीज केवल कृषि उत्पादन का एक साधन नहीं है, बल्कि पूरी फसल की नींव है। बीज की गुणवत्ता बेहतर होने पर किसान की उत्पादन क्षमता, फसल की गुणवत्ता और संभावित आय पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके विपरीत घटिया बीज किसान के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकता है।
इसीलिए सरकार नए कानून के माध्यम से बीज क्षेत्र में गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने पर जोर दे रही है।
किसान संगठनों की सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में किसानों के पारंपरिक बीजों और कृषक किस्मों के अधिकारों का मुद्दा भी शामिल रहा है। इस संबंध में शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कानून से किसानों के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
उन्होंने कहा कि किसान अपने पारंपरिक और कृषक किस्मों के बीजों का इस्तेमाल, आपस में आदान-प्रदान और विक्रय स्वतंत्र रूप से कर सकेंगे। पारंपरिक बीजों के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा।
इससे उन किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है जो पीढ़ियों से स्थानीय और पारंपरिक बीजों का संरक्षण करते आए हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों के पास स्थानीय जलवायु, मिट्टी और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित अनेक पारंपरिक बीज हैं। इनका संरक्षण कृषि विविधता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई किसान अपनी विकसित की गई किसी किस्म का पंजीकरण कराना चाहता है तो उसके लिए स्वैच्छिक पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध होगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को उनकी विकसित किस्मों को पहचान और संरक्षण देने का अवसर प्रदान करना है, जबकि उन पर अनिवार्य पंजीकरण का बोझ नहीं डाला जाएगा।
किसानों के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि कई किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बीजों का संरक्षण और विकास करते हैं। स्वैच्छिक पंजीकरण के जरिए ऐसे किसान अपनी किस्मों को औपचारिक पहचान दिलाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
शिवराज सिंह चौहान ने किसानों की एक अन्य बड़ी चिंता को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि किसान को अपने इस्तेमाल के लिए बीज तैयार करने की स्थिति में अनिवार्य डिजिटल पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी।
इसी तरह गांव में बीज बांटने या किसी कंपनी के लिए बीज का उत्पादन करने की स्थिति को लेकर भी किसानों के अधिकारों और प्रक्रियाओं को लेकर सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। मंत्री ने कहा कि किसानों के पारंपरिक बीजों और उनके अधिकारों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
सरकार का प्रयास है कि नया कानून गुणवत्ता और जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत करे, लेकिन किसानों के पारंपरिक तौर-तरीकों और वैध अधिकारों पर अनावश्यक बोझ न डाले।
कृषि मंत्री ने कहा कि नया कानून तैयार करना केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं है। इसका सीधा संबंध करोड़ों किसानों और देश की कृषि व्यवस्था से है। इसलिए व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है।
बैठक में विभिन्न राज्यों के किसान प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के अनुभव साझा किए। बीज की उपलब्धता, गुणवत्ता, बाजार में बिक्री, किसानों की पारंपरिक किस्मों, निजी कंपनियों की भूमिका और कानून के संभावित प्रभाव जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
सरकार का रुख है कि किसान संगठनों से प्राप्त सुझावों का अध्ययन किया जाएगा और उपयोगी सुझावों को प्रस्तावित कानून में शामिल करने की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा।
देश में कृषि राज्यों का विषय है और अलग-अलग राज्यों में बीजों की निगरानी एवं नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्थाएं अलग-अलग तरीके से काम करती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी बीज कानून बनाते समय राज्यों की भूमिका और उनके अनुभवों को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।
नए कानून के सामने चुनौती यह होगी कि गुणवत्ता नियंत्रण और कार्रवाई की व्यवस्था मजबूत होने के साथ राज्यों की प्रशासनिक जरूरतों को भी समुचित स्थान मिले। किसानों के लिए प्रक्रिया जितनी सरल और पारदर्शी होगी, कानून का प्रभाव जमीन पर उतना ही बेहतर दिखाई दे सकता है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बीज की गुणवत्ता सीधे किसान की आय और कृषि उत्पादन से जुड़ी हुई है। किसान खेती शुरू करने से पहले बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य संसाधनों पर खर्च करता है। ऐसे में यदि बीज स्तर पर ही समस्या हो जाए तो बाद की पूरी मेहनत प्रभावित हो सकती है।
नकली बीजों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग लंबे समय से किसानों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। किसान संगठनों का जोर इस बात पर रहा है कि बीज बेचने वाली कंपनियों और विक्रेताओं की जवाबदेही स्पष्ट हो तथा शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था प्रभावी बनाई जाए।
प्रस्तावित कानून में सरकार इसी दिशा में अधिक प्रभावी व्यवस्था तैयार करने की कोशिश कर रही है।
केवल नकली और घटिया बीजों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। किसानों को समय पर प्रमाणित और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई क्षेत्रों में किसान फसल के मौसम के दौरान बीज की उपलब्धता को लेकर परेशान होते हैं।
ऐसे में नए कानून के साथ बीज की आपूर्ति व्यवस्था, गुणवत्ता परीक्षण, निगरानी और बाजार में उपलब्धता के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होगी। किसान संगठनों से प्राप्त सुझाव इस व्यवस्था को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने में उपयोगी हो सकते हैं।
देश में बीज क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। नई किस्मों के विकास, अनुसंधान और तकनीक के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है। वहीं किसानों के हितों की सुरक्षा और बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है।
प्रस्तावित सीड बिल के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती यह होगी कि निजी निवेश और नवाचार को प्रोत्साहन देने के साथ किसानों के अधिकारों और हितों की रक्षा के बीच उचित संतुलन बनाया जाए।
किसानों द्वारा संरक्षित पारंपरिक बीज देश की कृषि विविधता की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय मौसम, मिट्टी और खेती की परिस्थितियों के अनुसार कई किस्मों का उपयोग किया जाता रहा है।
यदि ऐसी किस्मों के इस्तेमाल और आदान-प्रदान पर अनावश्यक कानूनी बोझ पड़ता है तो किसानों के बीच चिंता पैदा हो सकती है। यही वजह है कि सरकार की ओर से पारंपरिक और कृषक किस्मों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर दिया गया आश्वासन बैठक का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
सरकार के मुताबिक प्रस्तावित सीड बिल का उद्देश्य किसानों की पारंपरिक गतिविधियों पर नियंत्रण लगाना नहीं, बल्कि बीज बाजार में गुणवत्ता और जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत करना है।
किसानों को अपने पारंपरिक बीजों का उपयोग, आपसी आदान-प्रदान और विक्रय करने की स्वतंत्रता देने की बात इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। वहीं बाजार में व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध कराए जाने वाले बीजों की गुणवत्ता को लेकर सख्त व्यवस्था बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि सरकार कानून को जल्दबाजी में अंतिम रूप देने के पक्ष में नहीं है। पहले सार्वजनिक सुझाव लिए गए और अब किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ सीधे संवाद किया जा रहा है।
करीब 18 हजार सुझावों के बाद किसान संगठनों से संवाद की यह प्रक्रिया यह संकेत देती है कि सरकार प्रस्तावित कानून के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।
कृषि क्षेत्र में बीज कानून का असर लंबे समय तक रहेगा। इसलिए किसानों की चिंताओं को समझकर, राज्यों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और बीज क्षेत्र में तकनीकी बदलावों को शामिल करते हुए कानून तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।
बैठक से यह स्पष्ट हुआ कि प्रस्तावित सीड बिल केवल बीजों की बिक्री और गुणवत्ता का विषय नहीं है, बल्कि इसमें किसान अधिकार, पारंपरिक बीजों का संरक्षण, निजी क्षेत्र की जवाबदेही, तकनीकी बदलाव, गुणवत्ता नियंत्रण और कृषि उत्पादन जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं।
केंद्र सरकार अब किसान संगठनों से मिले सुझावों के आधार पर मसौदे की समीक्षा करेगी। यदि सरकार किसानों की जमीनी समस्याओं को कानून की व्यवस्था में प्रभावी रूप से शामिल करने में सफल होती है तो नया सीड बिल देश में बीजों की गुणवत्ता और किसानों के हितों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
फिलहाल सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून बनाने की प्रक्रिया संवाद के जरिए आगे बढ़ेगी और किसानों के सुझावों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। सबसे बड़ा लक्ष्य यही होगा कि किसान को गुणवत्तापूर्ण बीज मिले, नकली और घटिया बीजों पर प्रभावी कार्रवाई हो और साथ ही पीढ़ियों से चले आ रहे किसानों के पारंपरिक बीज अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहें।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


