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- 12h ago
नई दिल्ली। सारकॉइडोसिस से पीड़ित मरीजों में हृदय की शुरुआती भागीदारी की पहचान चिकित्सा विज्ञान के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। इसी दिशा में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नई दिल्ली के एक अध्ययन ने नई संभावनाओं की ओर संकेत किया है। शोध में एडवांस्ड कार्डियक मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (सीएमआर) की मात्रात्मक टी1 और टी2 मैपिंग तकनीकों ने ऐसे मरीजों में भी हृदय की मांसपेशियों में सूक्ष्म बदलावों के संकेत दिए, जिनकी पारंपरिक लेट गैडोलिनियम एन्हांसमेंट (एलजीई) आधारित एमआरआई जांच में स्पष्ट असामान्यता दिखाई नहीं दी थी।
2026 में इंडियन जर्नल ऑफ रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग में प्रकाशित इस अध्ययन में बायोप्सी से पुष्ट पल्मोनरी सारकॉइडोसिस और संदिग्ध कार्डियक भागीदारी वाले 19 मरीजों के साथ छह स्वस्थ नियंत्रणों का मूल्यांकन किया गया। शोधकर्ताओं ने कार्डियक एमआरआई में एलजीई के साथ-साथ नेटिव टी1 और टी2 मैपिंग का इस्तेमाल किया, ताकि हृदय की मांसपेशियों के ऊतक स्तर पर होने वाले संभावित बदलावों को अधिक सूक्ष्मता से समझा जा सके।
अध्ययन का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि कार्डियक सारकॉइडोसिस में बीमारी के शुरुआती चरण में हृदय की संरचना या सामान्य इमेजिंग पर स्पष्ट बदलाव हमेशा दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है। ऐसे में मात्रात्मक इमेजिंग भविष्य में उन मरीजों की पहचान में सहायक हो सकती है, जिनमें बीमारी के शुरुआती ऊतक संबंधी परिवर्तन मौजूद हैं।
अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष उन सात मरीजों से जुड़े हैं, जिनमें चिकित्सकीय रूप से कार्डियक सारकॉइडोसिस का संदेह था, लेकिन पारंपरिक एलजीई आधारित कार्डियक एमआरआई में हृदय की मांसपेशियों में स्पष्ट असामान्यता नहीं मिली।
इन सातों मरीजों में कम-से-कम एक मायोकार्डियल सेगमेंट में टी1 मैपिंग बढ़ी हुई पाई गई। शोध में कुल 112 मायोकार्डियल सेगमेंट का मूल्यांकन किया गया, जिनमें 38 सेगमेंट में टी1 मान बढ़ा हुआ पाया गया।
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह रहा कि इन मरीजों में से दो की एलजीई जांच में मायोकार्डियल इंफ्लेमेशन के प्रमाण भी मिले। इससे शोधकर्ताओं को यह संकेत मिला कि टी1 मैपिंग कुछ ऐसे सूक्ष्म ऊतक परिवर्तनों को पकड़ सकती है, जो पारंपरिक इमेजिंग में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते।
हालांकि शोधकर्ताओं ने इस निष्कर्ष को कार्डियक सारकॉइडोसिस के निश्चित निदान के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। बढ़ा हुआ टी1 मान अपने आप में इस बीमारी की पुष्टि नहीं करता। इसका महत्व मुख्य रूप से इस बात में है कि यह चिकित्सकों को आगे की जांच, निगरानी या अन्य इमेजिंग की आवश्यकता के बारे में अतिरिक्त जानकारी दे सकता है।
कार्डियक एमआरआई लंबे समय से हृदय की संरचना और कार्यप्रणाली के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। एलजीई तकनीक विशेष रूप से फाइब्रोसिस, चोट या असामान्य ऊतक क्षेत्रों की पहचान में उपयोगी मानी जाती है। लेकिन हर शुरुआती ऊतक परिवर्तन एलजीई में दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है।
यहीं पर टी1 और टी2 मैपिंग जैसी मात्रात्मक तकनीकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इन तकनीकों में हृदय की मांसपेशियों के अलग-अलग हिस्सों के ऊतक गुणों को संख्यात्मक रूप में मापा जाता है। इससे चिकित्सकों को केवल यह देखने तक सीमित नहीं रहना पड़ता कि एमआरआई में कोई स्पष्ट निशान दिखाई दे रहा है या नहीं, बल्कि वे ऊतक स्तर पर होने वाले बदलावों को भी माप सकते हैं।
एम्स नई दिल्ली के रेडियोडायग्नोसिस एवं इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के अध्ययन के प्रथम लेखक डॉ. अमरिंदर सिंह मल्ही के अनुसार, टी1 और टी2 मैपिंग हृदय की मांसपेशियों में होने वाले ऊतक संबंधी बदलावों की अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध करा सकती है। विशेष रूप से ऐसे मरीजों में यह तकनीक आगे के मूल्यांकन और निगरानी का आधार बन सकती है, जिनकी पारंपरिक एलजीई जांच नकारात्मक आती है, लेकिन चिकित्सकीय रूप से हृदय की भागीदारी का संदेह बना रहता है।
अध्ययन में नेटिव टी1 मैपिंग का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। शोधकर्ताओं ने टी1 के लिए 0.95 का एरिया अंडर द कर्व (एयूसी) दर्ज किया।
अध्ययन में 1,029 मिलीसेकंड का टी1 कटऑफ एलजीई से जुड़े मायोकार्डियल सेगमेंट की पहचान के लिए 87.5 प्रतिशत संवेदनशीलता और 96.9 प्रतिशत विशेषता से जुड़ा पाया गया।
सरल शब्दों में, अध्ययन के इस हिस्से से संकेत मिलता है कि निर्धारित शोध परिस्थितियों में टी1 मैपिंग ने उन मायोकार्डियल क्षेत्रों को अलग करने की अच्छी क्षमता दिखाई, जिनमें एलजीई से संबंधित बदलाव मौजूद थे।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी है। 1,029 मिलीसेकंड का कटऑफ किसी भी मरीज या हर अस्पताल के लिए सार्वभौमिक सीमा नहीं माना जा सकता। टी1 के मान एमआरआई मशीन, चुंबकीय क्षेत्र की ताकत, इस्तेमाल किए गए प्रोटोकॉल, सॉफ्टवेयर और अन्य तकनीकी परिस्थितियों के आधार पर बदल सकते हैं।
इसलिए अध्ययन के शोधकर्ताओं के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम ऐसे बड़े अध्ययनों से इन निष्कर्षों की पुष्टि करना होगा, जिनमें अलग-अलग केंद्रों और अलग-अलग एमआरआई प्रणालियों से प्राप्त आंकड़े शामिल हों।
अध्ययन में टी2 मैपिंग को भी शामिल किया गया। टी2 मैपिंग विशेष रूप से ऊतक में पानी की मात्रा और सूजन से जुड़े बदलावों के आकलन में उपयोगी हो सकती है।
शोध में टी2 मैपिंग ने भी मायोकार्डियल इंफ्लेमेशन से जुड़े बदलावों को पहचानने की क्षमता दिखाई, हालांकि उसका नैदानिक प्रदर्शन टी1 मैपिंग की तुलना में कम रहा।
इससे यह संभावना सामने आती है कि कार्डियक सारकॉइडोसिस के मूल्यांकन में केवल एक इमेजिंग पैरामीटर पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग मात्रात्मक संकेतकों को एक साथ देखा जा सकता है। इससे रोग की गतिविधि और हृदय के ऊतक पर उसके प्रभाव को समझने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
अध्ययन में कुछ मरीजों में कार्डियक एमआरआई के साथ एफडीजी-पीईटी की तुलना भी की गई। कुल 10 मरीजों की दोनों जांचें उपलब्ध थीं। इनमें एफडीजी-पीईटी ने आठ मरीजों में सक्रिय बीमारी के संकेत दिखाए, जबकि एमआरआई ने पांच मरीजों में सक्रिय कार्डियक भागीदारी की पहचान की।
हालांकि दोनों तकनीकों के बीच यह अंतर छोटे नमूने के कारण सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। इसलिए इसे किसी एक तकनीक की श्रेष्ठता के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।
दोनों जांचों की प्रकृति अलग है। एफडीजी-पीईटी सक्रिय चयापचय और सूजन से संबंधित गतिविधि का पता लगाने में उपयोगी हो सकती है, जबकि कार्डियक एमआरआई हृदय की संरचना, कार्यप्रणाली और मायोकार्डियल ऊतक की प्रकृति के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराता है।
इस वजह से विशेषज्ञों के लिए इन दोनों जांचों को एक-दूसरे के विकल्प के बजाय कई परिस्थितियों में पूरक जांच के रूप में देखना अधिक उपयोगी हो सकता है। मरीज की स्थिति, उपलब्ध संसाधनों और चिकित्सकीय प्रश्न के आधार पर जांच का चुनाव किया जा सकता है।
सारकॉइडोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों में ग्रैन्युलोमा यानी विशेष प्रकार की सूजन संबंधी संरचनाएं बन सकती हैं। फेफड़े इसका सबसे आम प्रभावित अंग हैं, लेकिन कुछ मरीजों में हृदय सहित अन्य अंग भी प्रभावित हो सकते हैं।
जब बीमारी हृदय की मांसपेशियों या हृदय की विद्युत प्रणाली को प्रभावित करती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। मरीजों में हृदय की धड़कन की अनियमितता, चालन संबंधी समस्या, हृदय की पंपिंग क्षमता में कमी और अन्य कार्डियक जटिलताएं सामने आ सकती हैं।
चुनौती यह है कि शुरुआती कार्डियक भागीदारी हमेशा स्पष्ट लक्षणों के साथ सामने नहीं आती। कुछ मरीजों में हृदय संबंधी शिकायतें कम हो सकती हैं या बीमारी का संकेत किसी अन्य जांच के दौरान मिल सकता है।
इसी कारण जोखिम वाले मरीजों में समय पर पहचान और उपयुक्त निगरानी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
एम्स के अध्ययन का एक अहम संदेश यह भी है कि किसी एक इमेजिंग तकनीक पर सामान्य परिणाम मिलने से हर परिस्थिति में कार्डियक सारकॉइडोसिस की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं मानी जा सकती।
यदि मरीज में बीमारी से संबंधित चिकित्सकीय संकेत मौजूद हों और पारंपरिक एलजीई आधारित सीएमआर सामान्य हो, तो मात्रात्मक टी1 और टी2 मैपिंग जैसी अतिरिक्त तकनीकें चिकित्सक को अधिक जानकारी दे सकती हैं।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सारकॉइडोसिस मरीज को अनिवार्य रूप से उन्नत कार्डियक एमआरआई या पीईटी करानी चाहिए। जांच का निर्णय मरीज के लक्षण, बीमारी के स्वरूप, जोखिम कारकों, अन्य परीक्षणों और विशेषज्ञ चिकित्सकीय मूल्यांकन पर निर्भर करता है।
अध्ययन के निष्कर्ष उत्साहजनक संकेत जरूर देते हैं, लेकिन इनके आधार पर तुरंत व्यापक नैदानिक प्रोटोकॉल बदलने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सबसे पहली सीमा अध्ययन का छोटा नमूना है। इसमें केवल 19 सारकॉइडोसिस मरीज और छह स्वस्थ नियंत्रण शामिल थे। इतने छोटे समूह से प्राप्त परिणामों को व्यापक मरीज आबादी पर सीधे लागू करने से पहले बड़े अध्ययनों में पुष्टि आवश्यक होगी।
दूसरी महत्वपूर्ण सीमा लंबे समय तक फॉलो-अप का उपलब्ध नहीं होना है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि एलजीई-नकारात्मक लेकिन टी1 बढ़े हुए मरीजों में आगे चलकर कितने मरीजों में वास्तविक कार्डियक बीमारी विकसित होती है या उनके उपचार और रोग परिणामों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
इसके अलावा, एलजीई-नकारात्मक और बढ़े हुए टी1 वाले सात मरीजों में से केवल दो की एफडीजी-पीईटी उपलब्ध थी। इसलिए इस समूह में टी1 मैपिंग और पीईटी के बीच संबंध पर मजबूत निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
भविष्य के शोध में अलग-अलग अस्पतालों, एमआरआई प्रणालियों और मरीज समूहों को शामिल करना महत्वपूर्ण होगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि टी1 और टी2 मैपिंग के कौन से मान वास्तव में कार्डियक सारकॉइडोसिस की पहचान के लिए उपयोगी हैं।
इसके साथ ही लंबे समय तक मरीजों की निगरानी करने वाले अध्ययन भी जरूरी होंगे। ऐसे शोध से यह समझने में मदद मिल सकती है कि जिन मरीजों में पारंपरिक एलजीई सामान्य लेकिन टी1 या टी2 असामान्य है, उनमें समय के साथ बीमारी का क्या स्वरूप विकसित होता है।
यह भी महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य के अध्ययन यह देखें कि मात्रात्मक एमआरआई से प्राप्त जानकारी उपचार के निर्णयों को किस हद तक प्रभावित कर सकती है और क्या इससे मरीजों के दीर्घकालिक परिणामों में सुधार होता है।
एम्स के अध्ययन का व्यापक महत्व इस बात में है कि कार्डियक सारकॉइडोसिस के मूल्यांकन में इमेजिंग की भूमिका केवल दिखाई देने वाले घावों या संरचनात्मक बदलावों तक सीमित नहीं रह सकती।
मात्रात्मक सीएमआर तकनीकें हृदय के ऊतक में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को संख्यात्मक रूप से दर्ज करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। इससे भविष्य में चिकित्सकों को बीमारी के शुरुआती चरण, सूजन, संभावित फाइब्रोसिस और समय के साथ होने वाले बदलावों को अधिक व्यवस्थित ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।
यदि बड़े अध्ययनों में मौजूदा निष्कर्षों की पुष्टि होती है, तो टी1 और टी2 मैपिंग उन मरीजों के मूल्यांकन में अतिरिक्त भूमिका निभा सकती है, जिनमें कार्डियक भागीदारी का संदेह है लेकिन पारंपरिक इमेजिंग से स्पष्ट निष्कर्ष नहीं मिलते।
एम्स का यह अध्ययन कार्डियक सारकॉइडोसिस की जल्द पहचान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध संकेत प्रस्तुत करता है। खास तौर पर उन सात मरीजों में टी1 मैपिंग के असामान्य परिणाम, जिनमें एलजीई पर स्पष्ट बदलाव नहीं मिले थे, यह संभावना उठाते हैं कि मात्रात्मक सीएमआर पारंपरिक इमेजिंग से पहले कुछ मायोकार्डियल परिवर्तन पकड़ सकती है।
लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि टी1 मैपिंग अकेले कार्डियक सारकॉइडोसिस का शुरुआती निदान कर सकती है। अध्ययन छोटा है, दीर्घकालिक परिणाम सीमित हैं और अलग-अलग इमेजिंग तकनीकों के बीच संबंध को समझने के लिए बड़े प्रमाण की जरूरत है।
फिर भी शोध यह दिशा जरूर दिखाता है कि भविष्य में कार्डियक सारकॉइडोसिस की जांच अधिक सूक्ष्म, मात्रात्मक और ऊतक-आधारित हो सकती है। इससे जोखिम वाले मरीजों की निगरानी, अतिरिक्त जांच के चयन और संभावित रूप से व्यक्तिगत उपचार रणनीतियों के विकास के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं।
चिकित्सकीय सावधानी: अध्ययन के निष्कर्ष शोध स्तर के हैं। किसी मरीज में सारकॉइडोसिस या हृदय की भागीदारी का निदान केवल टी1/टी2 मैपिंग के आधार पर नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत जांच और उपचार का निर्णय संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा मरीज की पूरी clinical स्थिति को देखते हुए किया जाना चाहिए।


