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नई दिल्ली। भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की चर्चा अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रह गई है कि महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में कैसे शामिल किया जाए, बल्कि देश अब इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच चुका है कि जब महिलाएं विकास की बागडोर संभालती हैं तो आर्थिक और सामाजिक विकास की गति किस तरह तेज होती है। महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया, उद्यमिता, तकनीक, वित्त, उद्योग और शासन में बराबर की भूमिका देने से न केवल महिलाओं का जीवन बदलता है, बल्कि परिवार, समाज और पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है।
यह बात लोकसभा सांसद बांसुरी स्वराज ने फिक्की, ब्रिक्स डब्ल्यूबीए और भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से संयुक्त रूप से आयोजित ‘ब्रिक्स डब्ल्यूबीए महिला-नेतृत्व विकास शिखर सम्मेलन और प्रदर्शनी’ को संबोधित करते हुए कही।
बांसुरी स्वराज ने कहा कि भारत अब महिलाओं को विकास की कहानी का केवल लाभार्थी मानने के बजाय उन्हें विकास का निर्माता और नेतृत्वकर्ता बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का विजन समावेशिता और स्थिरता पर आधारित है और इस लक्ष्य को हासिल करने में महिलाओं की बराबर की भागीदारी अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स में शामिल प्रत्येक अर्थव्यवस्था का अपना अलग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अनुभव है। इन देशों के अनुभवों को साझा करके महिला-नेतृत्व वाले विकास के लिए नए मॉडल तैयार किए जा सकते हैं।
सांसद बांसुरी स्वराज ने आर्थिक विकास में महिलाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्ष 2025 में ब्रिक्स नेताओं के घोषणापत्र में भी सतत विकास के लिए महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के महत्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया था।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया तकनीक और डिजिटल अर्थव्यवस्था के ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां संस्थानों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अर्थव्यवस्थाएं डिजिटल और तकनीक आधारित हो रही हैं और देशों की महत्वाकांक्षाएं पहले से कहीं अधिक वैश्विक हैं।
उन्होंने कहा, “आज हम इतिहास के एक बिल्कुल अलग मोड़ पर खड़े हैं। हमारे संस्थान आधुनिक हैं; अर्थव्यवस्थाएं तेजी से डिजिटल और तकनीक-संचालित हो रही हैं और हमारी महत्वाकांक्षाएं वैश्विक हैं। हमारी विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि एक ऐसी ताकत है जो ब्रिक्स परिवार को आगे बढ़ाती है।”
उनके मुताबिक ब्रिक्स देशों के बीच महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को लेकर सहयोग केवल महिला कल्याण का विषय नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
बांसुरी स्वराज ने महिला-नेतृत्व वाले विकास की अवधारणा को व्यापक बनाते हुए कहा कि भारत में इसका अर्थ केवल महिलाओं का व्यापार और उद्योग में आगे बढ़ना नहीं है। महिलाओं की भागीदारी नीति-निर्माण और शासन में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, “भारत में महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का मतलब महिलाओं के नेतृत्व वाला शासन भी है। हमें नीति-निर्माण के क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी की आवश्यकता है।”
उन्होंने कहा कि जब महिलाएं नीति निर्माण की प्रक्रिया में शामिल होती हैं तो परिवार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक कल्याण जैसे विषयों को लेकर जमीनी अनुभव नीति में अधिक प्रभावी ढंग से शामिल हो सकते हैं।
इसलिए महिलाओं को केवल योजनाओं की लाभार्थी के रूप में देखने के बजाय उन्हें योजनाएं बनाने और निर्णय लेने वाली व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
बांसुरी स्वराज ने महिला आर्थिक सशक्तिकरण के सामाजिक प्रभाव पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी महिला को आर्थिक रूप से मजबूत करने का असर केवल उसकी व्यक्तिगत आय या रोजगार तक सीमित नहीं रहता।
उन्होंने कहा, “जब भी आप किसी महिला को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं, तो आप केवल एक व्यक्ति की कहानी शुरू नहीं कर रहे होते, बल्कि इसका असर उस महिला के पूरे परिवार पर पड़ता है। जब परिवार सशक्त होते हैं, तो समाज सशक्त होता है; सशक्त समाज से सशक्त राष्ट्र बनते हैं और सशक्त राष्ट्रों से एक शांतिपूर्ण दुनिया का निर्माण होता है।”
उन्होंने कहा कि महिला की आर्थिक स्वतंत्रता परिवार में निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाती है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य में निवेश की संभावनाएं भी मजबूत होती हैं।
ब्रिक्स डब्ल्यूबीए की ग्लोबल चेयरपर्सन अवर्णा जैन ने कहा कि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत मजबूती, नवाचार, सहयोग और टिकाऊपन पर विशेष जोर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि जब महिलाएं पूरी तरह आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकती हैं, कारोबार स्थापित कर सकती हैं, रोजगार पैदा कर सकती हैं, नवाचार कर सकती हैं, निवेश कर सकती हैं और नेतृत्व कर सकती हैं तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
अवर्णा जैन ने कहा कि महिला-नेतृत्व वाला विकास अधिक मजबूत, नवोन्मेषी, समावेशी और टिकाऊ आर्थिक व्यवस्था बनाने में योगदान देता है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच महिला उद्यमियों और महिला नेतृत्व वाले कारोबारों को जोड़ने के लिए नेटवर्क तैयार करने की जरूरत है। इससे कारोबारी अनुभव, तकनीक, पूंजी और बाजार तक पहुंच को बढ़ाया जा सकता है।
फिक्की आदित्य बिड़ला सीएसआर सेंटर फॉर एक्सीलेंस और आदित्य बिड़ला सेंटर फॉर कम्युनिटी इनिशिएटिव्स एंड रूरल डेवलपमेंट की चेयरपर्सन राजश्री बिड़ला ने कहा कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भारत की प्रगति किसी एक संस्था के प्रयास का परिणाम नहीं है।
उन्होंने कहा कि सरकार, उद्योग जगत और परोपकारी संस्थाओं ने मिलकर महिलाओं के विकास के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया है।
राजश्री बिड़ला के अनुसार, महिला सशक्तिकरण एक साझा जिम्मेदारी है और इसके लिए सरकारी नीतियों के साथ-साथ उद्योगों और सामाजिक संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार और उद्यमिता के लिए लगातार निवेश किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की प्रक्रिया और तेज हो।
फिक्की-लेडीज ऑर्गनाइजेशन की नेशनल प्रेसिडेंट पूजा गर्ग ने कहा कि महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास का अगला चरण केवल भागीदारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को बिजनेस शुरू करने, तकनीक अपनाने, मैन्युफैक्चरिंग में उतरने, पूंजी तक पहुंच बनाने, वैश्विक वैल्यू चेन में शामिल होने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए सक्षम बनाना जरूरी है।
उनके अनुसार, महिलाओं को उद्यमिता के क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद कारोबार बढ़ाने के लिए भी आवश्यक संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। केवल कारोबार शुरू करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि महिला उद्यमियों के लिए बाजार, तकनीक, वित्त, प्रशिक्षण और मेंटरशिप की उपलब्धता को एक साथ मजबूत किया जाना चाहिए।
फिक्की की पूर्व प्रेसिडेंट नैना लाल किदवई ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में पूंजी तक पहुंच को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बताया।
उन्होंने कहा, “कैपिटल को टैलेंट मिल जाता है, लेकिन टैलेंट को हमेशा कैपिटल नहीं मिलता। इन दोनों के बीच कहीं ‘एक्सेस’ होती है—नेटवर्क, मेंटर्स, बोर्डरूम और उन कमरों तक पहुंच जहां फैसले लिए जाते हैं। हमारा काम, व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से, उस दूरी को कम करना है।”
उन्होंने कहा कि कई प्रतिभाशाली महिला उद्यमियों के पास बेहतरीन कारोबारी विचार और क्षमता होती है, लेकिन उन्हें निवेशकों, सलाहकारों, बड़े कारोबारी नेटवर्क और निर्णय लेने वाले मंचों तक आसानी से पहुंच नहीं मिलती।
ऐसे में महिला उद्यमियों को वित्तीय संस्थानों और निवेशकों से जोड़ने के साथ-साथ मेंटरशिप और कारोबारी नेटवर्क उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
फिक्की की पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. ज्योत्सना सूरी ने कहा कि किसी भी देश के लिए अपनी मनचाही जीडीपी हासिल करने की कोशिश में महिलाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि महिलाएं आज भी ऐसी कार्यशक्ति का बड़ा हिस्सा हैं, जिसका पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल नहीं हुआ है। इसलिए अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता बढ़ाने के लिए महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी और नेतृत्व दोनों को बढ़ाना होगा।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने के साथ-साथ सुरक्षित कार्यस्थल, कौशल प्रशिक्षण, करियर में आगे बढ़ने के अवसर और नेतृत्व की भूमिकाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
फिक्की के सेक्रेटरी जनरल अनंत स्वरूप ने कहा कि महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास अब विकास की कहानी का केवल एक अध्याय नहीं रह गया है, बल्कि तेजी से मुख्य कहानी बनता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत में महिलाएं बिजनेस, तकनीक, वित्त और सार्वजनिक जीवन में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। वे केवल विकास के लाभ प्राप्त करने वाली नहीं हैं, बल्कि विकास की निर्माता बन रही हैं।
उन्होंने कहा कि महिला उद्यमिता और महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने से अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा आएगी और अधिक समावेशी विकास मॉडल तैयार होगा।
शिखर सम्मेलन के दौरान ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर: महिलाओं के नेतृत्व में विकास को बढ़ावा’ विषय पर फिक्की-ब्रिक्स-ईवाई नॉलेज पेपर भी जारी किया गया।
डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा महिलाओं को वित्तीय सेवाओं, डिजिटल भुगतान, सरकारी योजनाओं, बाजारों और कारोबार से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से महिला उद्यमियों को अपने उत्पादों और सेवाओं को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का अवसर मिल सकता है। डिजिटल भुगतान व्यवस्था से छोटे कारोबारों के लिए लेनदेन अधिक आसान और पारदर्शी हो सकता है।
ग्रामीण और छोटे शहरों की महिलाओं के लिए डिजिटल तकनीक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से वे अपने स्थानीय बाजार से बाहर निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़ सकती हैं।
शिखर सम्मेलन में चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि महिलाओं को केवल छोटे कारोबार या घरेलू स्तर के उद्यमों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
महिला उद्यमियों को मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात, टेक्नोलॉजी, वित्त, लॉजिस्टिक्स और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ने की जरूरत है।
यदि महिलाओं के नेतृत्व वाले कारोबार वैश्विक वैल्यू चेन में प्रवेश करते हैं तो इससे उनके कारोबार का आकार बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय महिला उद्यमिता की पहचान मजबूत होगी।
इसके लिए निर्यात प्रशिक्षण, गुणवत्ता मानक, डिजिटल कॉमर्स, अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन, वित्त और विदेशी खरीदारों तक पहुंच को आसान बनाना महत्वपूर्ण होगा।
कार्यक्रम के दौरान ‘एक्सेस से आगे: ब्रिक्स देशों में महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण और लचीलापन’ विषय पर फिक्की-ब्रिक्स डब्ल्यूबीए-महिला विश्व बैंकिंग का पेपर भी जारी किया गया।
यह विषय इस बात को रेखांकित करता है कि महिलाओं को केवल संसाधनों तक पहुंच उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें आर्थिक झटकों का सामना करने, कारोबार को टिकाऊ बनाने और बदलती परिस्थितियों में नए अवसरों का लाभ उठाने के लिए सक्षम बनाना भी जरूरी है।
आर्थिक लचीलापन का अर्थ है कि महिला उद्यमी बाजार में उतार-चढ़ाव, तकनीकी बदलाव, वित्तीय दबाव और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद अपने कारोबार को आगे बढ़ा सकें।
ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ने से महिला उद्यमियों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं। भारत के महिला नेतृत्व वाले कारोबारों के लिए ब्रिक्स देशों में टेक्सटाइल, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, डिजिटल सेवाएं, हेल्थकेयर, शिक्षा, सौंदर्य एवं वेलनेस, तकनीकी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में अवसर पैदा हो सकते हैं।
इसी तरह ब्रिक्स देशों की महिला उद्यमियों को भारतीय बाजार और भारतीय डिजिटल इकोसिस्टम से जोड़ने के अवसर भी तलाशे जा सकते हैं।
यदि महिला व्यापार नेटवर्क, निवेश मंच, बिजनेस एक्सचेंज और संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा दिया जाता है तो ब्रिक्स महिला आर्थिक सहयोग के लिए एक प्रभावी मंच बन सकता है।
कार्यक्रम में सामने आई चर्चाओं का व्यापक संदेश यही रहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल रोजगार और आय बढ़ाने का विषय नहीं है। यह निर्णय लेने की शक्ति से भी जुड़ा हुआ है।
महिलाओं की संख्या संसद, स्थानीय निकायों, कॉरपोरेट बोर्ड, स्टार्टअप नेतृत्व, वित्तीय संस्थानों और सार्वजनिक प्रशासन में बढ़ने से नीतियों में विविध दृष्टिकोण शामिल होंगे।
बांसुरी स्वराज का महिलाओं के नेतृत्व वाले शासन पर जोर इसी व्यापक बदलाव की ओर संकेत करता है।
भारत के विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य में महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि आधी आबादी की प्रतिभा, श्रमशक्ति और उद्यमिता का पूरा उपयोग किया जाता है तो देश की आर्थिक क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार की संभावना है।
महिलाओं की शिक्षा से लेकर कौशल, रोजगार, उद्यमिता, वित्तीय समावेशन और नेतृत्व तक एक सतत श्रृंखला तैयार करनी होगी।
यही कारण है कि महिला-नेतृत्व वाला विकास अब सामाजिक कल्याण का विषय भर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
ब्रिक्स डब्ल्यूबीए सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बढ़ाना केवल भारत की प्राथमिकता नहीं है, बल्कि ब्रिक्स के सभी देशों के लिए साझा विकास एजेंडा बन सकता है।
अलग-अलग देशों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन महिला उद्यमिता, डिजिटल समावेशन, वित्त तक पहुंच, कौशल विकास और नेतृत्व के अवसर जैसी चुनौतियां कई स्तरों पर समान हैं।
ऐसे में ब्रिक्स देशों के बीच अनुभव और नीतियों का आदान-प्रदान नई संभावनाएं पैदा कर सकता है।
शिखर सम्मेलन से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यही है कि महिलाओं को विकास का लाभ पाने वाली आबादी के रूप में देखने का दौर पीछे छूट रहा है। अब उन्हें विकास की दिशा तय करने, कारोबार बनाने, रोजगार पैदा करने, तकनीक विकसित करने, निवेश करने और शासन में निर्णय लेने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है।
बांसुरी स्वराज के शब्दों में, एक महिला को आर्थिक रूप से सशक्त करने का प्रभाव उसके परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक पहुंचता है। यही विचार यदि ब्रिक्स देशों के साझा आर्थिक एजेंडे का हिस्सा बनता है तो महिला-नेतृत्व वाला विकास आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक सहयोग की एक नई धुरी बन सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


