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- 12h ago
नई दिल्ली। लाल किला मैदान स्थित माधव दास बगीची में आयोजित श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला में सोमवार को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव से लेकर महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा और सुबाहु वध तक के प्रसंगों का भव्य एवं भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय, संवाद और मंच प्रस्तुति के माध्यम से रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं को जीवंत कर दिया। राम जन्म के उल्लासपूर्ण दृश्यों के दौरान पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में सराबोर नजर आया और दर्शक भगवान श्रीराम के जयकारे लगाते दिखाई दिए।
रामलीला के दौरान पुत्रेष्टि यज्ञ, अयोध्या में चारों राजकुमारों के जन्म की खुशियां, नामकरण संस्कार और महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ में राक्षसों द्वारा विघ्न डालने जैसे प्रसंगों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया गया। प्रत्येक दृश्य में कलाकारों ने पात्रों की भावनाओं और घटनाओं के महत्व को प्रभावी ढंग से सामने रखा। दर्शकों ने भी मंचन का आनंद लेते हुए भगवान श्रीराम के आदर्शों और रामायण की शिक्षाओं को आत्मसात करने का संदेश प्राप्त किया।
श्री धार्मिक लीला कमेटी के महासचिव धीरजधर गुप्ता, सचिव प्रदीप शरण और प्रवक्ता रवि जैन ने बताया कि सोमवार की लीला का शुभारंभ राजा दशरथ और सुमंत के बीच संवाद से हुआ। इसके बाद श्रृंगी ऋषि के आश्रम में पुत्रेष्टि यज्ञ का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। कलाकारों ने यज्ञ की तैयारियों और संतान प्राप्ति की कामना से जुड़े घटनाक्रम को मंच पर सजीव रूप दिया।
पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात कौशल्या महल और राजा दशरथ के दरबार के दृश्यों का मंचन किया गया। इन दृश्यों में अयोध्या के राजपरिवार की भावनाओं और भगवान श्रीराम सहित चारों राजकुमारों के जन्म से जुड़े प्रसंगों को विशेष रूप से दर्शाया गया।
जैसे ही राम जन्म का प्रसंग सामने आया, रामलीला परिसर में उत्सव जैसा वातावरण बन गया। अयोध्या में खुशियां मनाने, प्रजावासियों के गीत-संगीत और राजमहल में उल्लास के दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इसके बाद चारों राजकुमारों के नामकरण संस्कार का मंचन किया गया, जिसने रामलीला की प्रस्तुति को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया।
भगवान श्रीराम का जन्म रामायण का एक प्रमुख प्रसंग है, जिसे भक्त श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाते हैं। रामलीला में इस प्रसंग को उत्सवपूर्ण वातावरण में प्रस्तुत किया गया। अयोध्या में खुशियों का संचार, राजपरिवार की प्रसन्नता और प्रजाजनों के उत्साह को कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से दर्शाया।
राम जन्मोत्सव के दृश्यों ने दर्शकों को भगवान श्रीराम के जीवन की शुरुआत से परिचित कराया। रामायण में श्रीराम को मर्यादा, धर्म, कर्तव्य और आदर्श जीवन का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में उनके जन्म से जुड़े प्रसंगों का मंचन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों के अनुसार, इन प्रस्तुतियों का उद्देश्य केवल धार्मिक कथाओं का मंचन करना नहीं, बल्कि उनके माध्यम से समाज में सकारात्मक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को बढ़ावा देना भी है।
राम जन्मोत्सव और नामकरण संस्कार के बाद लीला में महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। राक्षसों द्वारा यज्ञ में बार-बार विघ्न डालने से परेशान महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार पहुंचे। उन्होंने यज्ञ की रक्षा के लिए भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ भेजने का अनुरोध किया।
राजा दशरथ के दरबार में हुए संवाद के माध्यम से कलाकारों ने उस घटनाक्रम को प्रस्तुत किया, जिसमें महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने की अनुमति मांगते हैं। इसके बाद दोनों राजकुमारों के महर्षि के साथ आश्रम की ओर प्रस्थान करने का दृश्य दिखाया गया।
यह प्रसंग भगवान श्रीराम के जीवन में कर्तव्यपालन, साहस और धर्म की रक्षा की भावना को रेखांकित करता है। कम उम्र में ही श्रीराम और लक्ष्मण का महर्षि विश्वामित्र के साथ जाना तथा यज्ञ की रक्षा का दायित्व निभाना उनके पराक्रम और अनुशासन का परिचायक माना जाता है।
महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में यज्ञ की रक्षा से जुड़े दृश्यों के दौरान राक्षसों के व्यवधान और उनके विरुद्ध श्रीराम-लक्ष्मण के संघर्ष को मंच पर प्रस्तुत किया गया। सुबाहु और मारीच से संबंधित प्रसंगों के माध्यम से यज्ञ को बाधित करने वाली शक्तियों का चित्रण किया गया।
अंत में यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षस सुबाहु के वध का मंचन किया गया। इस दृश्य के साथ सोमवार की लीला का समापन हुआ। कलाकारों ने संवाद और अभिनय के माध्यम से धर्म की रक्षा तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संदेश प्रस्तुत किया।
रामायण के इन प्रसंगों में यह शिक्षा निहित है कि कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। सत्य, साहस और धर्म के मार्ग पर चलते हुए समाज और जनकल्याण की रक्षा करना महत्वपूर्ण है।
श्री धार्मिक लीला कमेटी के पदाधिकारियों ने कहा कि रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी है। भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, कर्तव्यपालन, साहस, त्याग और धर्म की रक्षा की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि रामायण के प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत करने से बच्चों और युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर मिलता है। रामलीला के माध्यम से पारिवारिक संबंधों, सामाजिक जिम्मेदारियों, आदर्श आचरण और मानवीय मूल्यों को सरल एवं प्रभावी तरीके से समाज तक पहुंचाया जा सकता है।
पदाधिकारियों के अनुसार, ऐसे आयोजनों से धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी प्रोत्साहन मिलता है। रामलीला देखने के लिए एकत्रित होने वाले लोग विभिन्न पीढ़ियों और वर्गों के बीच संवाद तथा सांस्कृतिक परंपराओं के आदान-प्रदान का अवसर प्राप्त करते हैं।
लाल किला मैदान की माधव दास बगीची में आयोजित श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला में सोमवार का मंचन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के उल्लास और धर्म की रक्षा के संदेश के लिए विशेष रहा। पुत्रेष्टि यज्ञ से शुरू होकर राम जन्म, नामकरण संस्कार, महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा और सुबाहु वध तक पहुंचे घटनाक्रम ने दर्शकों को रामायण की महत्वपूर्ण कड़ियों से जोड़ा।
कलाकारों की प्रस्तुति के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि भगवान श्रीराम का जीवन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि आदर्श आचरण, कर्तव्यनिष्ठा और समाज के प्रति जिम्मेदारी की प्रेरणा भी है। इसी उद्देश्य के साथ श्री धार्मिक लीला कमेटी रामायण के प्रसंगों को मंच पर जीवंत कर भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


