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- 12h ago
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मंगलवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे दोनों नेताओं को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। इसके बाद उन्हें स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसईएम) अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजने के आदेश दिए गए। मामले में तीसरे नेता अजिंक्य शिंदे को नया बेल बॉन्ड भरने के बाद राहत मिलने की बात सामने आई है।
इस कार्रवाई के बाद सीजेपी ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराने और नारे लगाने के कारण उनके साथ कार्रवाई की गई। वहीं, पुलिस की ओर से नेताओं पर पहले से निर्धारित बेल बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है। इस मामले में दोनों पक्षों के दावों के बीच जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति, सार्वजनिक व्यवस्था और विरोध करने के संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है।
जानकारी के अनुसार, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली की स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट अदालत में पेश किया गया था। अदालत ने दोनों को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने के आदेश दिए। दोनों नेताओं पर आरोप है कि उन्होंने पहले से निर्धारित बेल बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया।
इसी मामले में शामिल सीजेपी नेता अजिंक्य शिंदे को अदालत से राहत मिली। उनके संबंध में नया बेल बॉन्ड भरवाकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की गई। इस घटनाक्रम के बाद सीजेपी ने पुलिस की कार्रवाई और बेल बॉन्ड की शर्तों की व्याख्या पर सवाल उठाए हैं।
न्यायिक हिरासत का आदेश ऐसे समय आया है, जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के अधिकार और निर्धारित प्रदर्शन स्थलों को लेकर राजनीतिक विवाद चल रहा है। सीजेपी नेताओं का कहना है कि वे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी आवाज उठाना चाहते थे।
सीजेपी नेताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकील अभिष्ट हेले ने पुलिस की कार्रवाई पर आपत्ति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने इस आशंका के आधार पर नेताओं को हिरासत में भिजवाया कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।
वकील के अनुसार, पुलिस ने अदालत के सामने यह दावा किया कि तीनों नेताओं ने आम जनता से संबंधित स्थान पर जुटने की अपील की थी। उन्होंने इस दावे को गलत बताते हुए कहा कि नेताओं ने न तो ऐसी कोई अपील की और न ही बेल बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया।
सीजेपी के पक्ष की दलील है कि विरोध प्रदर्शन करना अपने आप में अपराध नहीं है और किसी भी कार्रवाई का आधार स्पष्ट होना चाहिए। हालांकि, पुलिस के आरोपों और बचाव पक्ष की दलीलों पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
सीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का फैसला उस समय किया, जब दिल्ली पुलिस ने इस स्थान को विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटाने की घोषणा की थी।
पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बैरिकेडिंग पार कर प्रदर्शन स्थल में प्रवेश किया। इस दौरान तिरंगा लहराया गया और नारेबाजी की गई। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।
यह घटनाक्रम एसआईआर को लेकर चल रहे राजनीतिक विरोध के बीच हुआ। सीजेपी और कुछ विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं और निर्वाचन प्रक्रिया में जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने आशुतोष रांका और सौरव दास को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब राष्ट्रीय ध्वज फहराना भी गैरकानूनी हो गया है।
दिपके ने दोनों नेताओं को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए कहा कि यदि सरकार विरोध की आवाज को दबाना चाहती है, तो उसे ऐसे तरीकों के बजाय आधिकारिक रूप से आपातकाल घोषित करने की हिम्मत दिखानी चाहिए।
उनकी यह टिप्पणी पुलिस कार्रवाई के विरोध में पार्टी के राजनीतिक रुख को दर्शाती है। सीजेपी का आरोप है कि उसके नेताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई विरोध की आवाज को सीमित करने का प्रयास है। हालांकि, पुलिस की ओर से कार्रवाई का आधार बेल बॉन्ड की शर्तों का कथित उल्लंघन बताया गया है।
सीजेपी नेता अजिंक्य शिंदे ने भी आशुतोष रांका और सौरव दास को हिरासत में भेजे जाने पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने और 'भारत माता की जय' के नारे लगाने के कारण दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की गई।
शिंदे ने कहा कि आशुतोष रांका का जन्मदिन भी इसी दिन था, जब उन्हें जेल भेजने का आदेश दिया गया। उन्होंने केंद्र की मोदी-शाह सरकार पर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने और लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया।
शिंदे ने कहा कि जेल भेजे जाने से पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर नहीं होगा और वे अपने मुद्दों को उठाते रहेंगे। उन्होंने इस कार्रवाई को विरोध करने वाले नेताओं को डराने का प्रयास बताया।
हालांकि, तिरंगा लहराने और नारे लगाने को लेकर सीजेपी नेताओं के आरोप तथा पुलिस की ओर से बताई गई कार्रवाई की वजह अलग-अलग हैं। मामले में कानूनी स्थिति का आकलन संबंधित आदेशों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
सीजेपी और कुछ विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इन दलों का आरोप है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसकी शिकायत का उचित समाधान होना चाहिए।
इस मुद्दे को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने की मांग भी उठाई गई है। सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा देने की मांग की है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। आयोग की ओर से कहा गया है कि जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोबारा नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इस प्रकार विवाद के दो प्रमुख पहलू हैं—एक ओर मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता को लेकर विपक्ष की आपत्तियां हैं, तो दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की ओर से प्रक्रिया का बचाव किया जा रहा है। इस मुद्दे पर वास्तविक स्थिति समझने के लिए हटाए गए नामों के आंकड़ों, शिकायतों और उनके निस्तारण से संबंधित आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर विवाद तब और बढ़ गया, जब दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर को इस स्थान को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला किया। अधिकारियों ने प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थानों का उल्लेख किया।
सीजेपी ने इस फैसले पर आपत्ति जताई और जंतर-मंतर पर ही प्रदर्शन करने की मांग की। पार्टी ने पुलिस को प्रदर्शन की तारीख तय करने के लिए समय देने की बात भी कही थी।
जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल रहा है। ऐसे में यहां प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े फैसले ने राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा को जन्म दिया है।
प्रदर्शन स्थलों के निर्धारण में प्रशासन को सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और सुरक्षा जैसे पहलुओं पर विचार करना होता है। वहीं, प्रदर्शनकारियों के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से रखने का अवसर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मामले में विवाद इसी संतुलन और निर्धारित नियमों के पालन को लेकर सामने आया है।
इस घटनाक्रम से पहले 10 अक्टूबर को भी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को पुलिस ने हिरासत में लिया था। बाद में 11 अक्टूबर को उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
हालांकि, अभिजीत दिपके ने दावा किया था कि उन्होंने ऐसा कोई बेल बॉन्ड नहीं भरा, जो उन्हें आगे विरोध प्रदर्शन करने से रोकता हो। इसके बाद पार्टी ने प्रदर्शन जारी रखने का फैसला किया।
मौजूदा मामले में पुलिस ने बेल बॉन्ड की शर्तों के कथित उल्लंघन को कार्रवाई का आधार बताया है, जबकि सीजेपी का कहना है कि उसके नेताओं ने किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया। इसी विरोधाभास के चलते मामले में पुलिस की कार्रवाई और नेताओं के अधिकारों को लेकर विवाद बना हुआ है।
सीजेपी नेताओं को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी प्रतिक्रिया दी। बुधवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर उन्होंने लिखा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है और इसके लिए युवाओं को जेल में डालना कायरतापूर्ण काम है।
राहुल गांधी ने अपने संदेश में कहा कि छात्र, युवा, पत्रकार और इंडिया ब्लॉक अलग-अलग बैनरों के तहत विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनका मकसद एक है। उनके अनुसार, ये प्रदर्शन नागरिकों की ओर से अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग का हिस्सा हैं।
राहुल गांधी की इस प्रतिक्रिया से मामला और राजनीतिक चर्चा में आ गया है। विपक्षी नेताओं ने इसे विरोध करने के अधिकार से जोड़कर देखा है, जबकि इस प्रकरण में पुलिस की ओर से बेल बॉन्ड की कथित शर्तों के उल्लंघन का तर्क दिया गया है।
जंतर-मंतर की घटना ने एक बार फिर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग, प्रशासनिक प्रतिबंधों और कानूनी शर्तों के पालन से जुड़े सवालों को चर्चा में ला दिया है।
सीजेपी नेताओं का कहना है कि वे एसआईआर और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखना चाहते थे। पार्टी ने कार्रवाई को अनुचित बताते हुए विरोध जारी रखने का संकेत दिया है। दूसरी ओर, पुलिस की कार्रवाई के पीछे बेल बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन का आरोप बताया गया है।
इस मामले में महत्वपूर्ण यह है कि आरोपों, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और न्यायिक आदेशों के बीच अंतर स्पष्ट रखा जाए। किसी व्यक्ति को न्यायिक हिरासत में भेजा जाना अपने आप में उसके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं करता। इसी तरह, प्रदर्शनकारियों के आरोपों का मूल्यांकन भी उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
फिलहाल आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर विवाद जारी है। आने वाले समय में इस मामले की कानूनी प्रक्रिया और एसआईआर को लेकर राजनीतिक घटनाक्रम पर सभी पक्षों की नजर रहेगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


