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- 12h ago
मुंबई। प्यार में किसी अपने का साथ छूट जाना शायद जिंदगी के उन अनुभवों में से है, जिनसे बाहर निकलना आसान नहीं होता। रिश्ता खत्म हो जाता है, मुलाकातें थम जाती हैं, लेकिन साथ बिताए पल और उनसे जुड़ी यादें लंबे समय तक मन में बनी रहती हैं। इसी एहसास, इसी खालीपन और खुद को संभालकर आगे बढ़ने की कोशिश को पंजाबी गीत ‘छड देने आ’ में भावनात्मक अंदाज में पेश किया गया है।
टी-सीरीज़ प्रस्तुत और द आर्टिस्ट जंक्शन द्वारा निर्मित यह गीत प्रेम, जुदाई, यादों और रिश्ते को स्वीकार करने की कहानी को सुरों के माध्यम से सामने लाता है। गीत में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किसी रिश्ते का खत्म होना हमेशा उस रिश्ते से जुड़ी भावनाओं का खत्म होना नहीं होता।
‘छड देने आ’ की कहानी उस मोड़ के आसपास घूमती है, जहां दो लोग एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। रिश्ता पीछे छूट जाता है, लेकिन उसकी यादें साथ चलती रहती हैं।
सागर मल्होत्रा और निया चौहान गीत में मुख्य किरदारों के रूप में नजर आते हैं। दोनों के किरदारों के जरिए रिश्ते के बनने, भावनात्मक जुड़ाव और फिर अलगाव के बाद पैदा होने वाली मनःस्थिति को पर्दे पर उतारने की कोशिश की गई है।
कहानी का भाव केवल आंसुओं और दर्द तक सीमित नहीं रहता। इसमें धीरे-धीरे उस स्वीकार्यता की ओर बढ़ने की कोशिश दिखाई देती है, जहां इंसान समझने लगता है कि हर रिश्ता जिंदगी भर साथ रहने के लिए नहीं होता।
गीत को अपनी आवाज दी है मोहित जोशी ने। उनकी भावपूर्ण गायकी गीत के जुदाई वाले हिस्से को प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाती है।
गीत की धुन में एक तरह की सहजता रखी गई है, जो कहानी के भावनात्मक पक्ष के साथ चलती है। आवाज में मौजूद भावुकता रिश्ते के टूटने के बाद पैदा होने वाले खालीपन और यादों को सामने लाने का काम करती है।
गीत को सुनते हुए श्रोता को ऐसा महसूस हो सकता है कि कहानी केवल पर्दे पर मौजूद किरदारों की नहीं, बल्कि उन भावनाओं की भी है जिनसे कई लोग अपनी जिंदगी में कभी न कभी गुजरते हैं।
‘छड देने आ’ के संगीत की जिम्मेदारी सुयश और डैनी ने संभाली है। गीत की धुन को कहानी के भावनात्मक मूड के अनुरूप रखा गया है।
संगीत में जरूरत से ज्यादा शोर या जटिलता के बजाय भावनाओं को उभरने की जगह दी गई है। आवाज, बोल और दृश्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश गीत की प्रस्तुति में दिखाई देती है।
यही वजह है कि गीत का संगीत कहानी से अलग महसूस नहीं होता, बल्कि उसके भावनात्मक सफर का हिस्सा बनकर सामने आता है।
गीत के बोल अव्वी बलागन ने लिखे हैं। शब्दों में रिश्ते के टूटने के बाद बची यादों और भावनात्मक उलझन को जगह दी गई है।
गीत का केंद्रीय भाव यह है कि किसी को जिंदगी से जाने देना और उसे दिल से पूरी तरह भूल जाना दो अलग बातें हैं। कई बार इंसान सामने वाले को अपनी जिंदगी से जाने देता है, लेकिन उसके साथ बिताए समय की यादें उसके भीतर बनी रहती हैं।
यही भाव ‘छड देने आ’ की कहानी को सिर्फ एक सामान्य ब्रेकअप सॉन्ग से आगे ले जाने की कोशिश करता है।
गीत का निर्देशन हिमांशु यादव ने किया है। निर्देशक ने कहानी को केवल संवादों के जरिए बताने के बजाय दृश्यों, वातावरण और किरदारों की भावनात्मक स्थिति के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश की है।
रिश्ते से जुड़े खुशनुमा पलों और उसके बाद आने वाले अकेलेपन के बीच का अंतर कहानी को भावनात्मक गहराई देता है। दृश्य यह बताने का प्रयास करते हैं कि किसी रिश्ते के खत्म होने के बाद व्यक्ति के भीतर कितनी तरह की भावनाएं चल सकती हैं।
कहीं यादें हैं, कहीं खालीपन है और कहीं खुद को समझाने की कोशिश—इन भावनाओं को सिनेमाई भाषा में सामने लाने की कोशिश की गई है।
‘छड देने आ’ को केवल दिल टूटने या जुदाई का गीत मानना इसकी कहानी को सीमित कर देगा। इसके केंद्र में एक और भावना है—स्वीकार करना।
किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश करने के बाद जब यह एहसास होता है कि साथ आगे नहीं चल सकता, तब इंसान के सामने दो रास्ते होते हैं। वह अतीत में अटका रह सकता है या फिर यादों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने की कोशिश कर सकता है।
गीत इसी दूसरे रास्ते की कहानी कहता है।
गीत का एक प्रमुख भाव यह भी है कि जिंदगी से किसी व्यक्ति का चले जाना उसकी मौजूदगी के हर निशान को खत्म नहीं करता। साथ बिताए पल, बातचीत, जगहें और छोटी-छोटी यादें लंबे समय तक व्यक्ति के साथ बनी रह सकती हैं।
लेकिन समय के साथ इन्हीं यादों को दर्द के बजाय जिंदगी का हिस्सा मानकर स्वीकार करना भी संभव है। ‘छड देने आ’ इसी बदलाव को भावनात्मक अंदाज में पेश करने की कोशिश करता है।
आज के दौर में रिश्तों पर आधारित कई गाने सामने आते हैं, लेकिन हर रिश्ते का टूटना एक जैसा नहीं होता। कहीं अलगाव मजबूरी होता है, कहीं परिस्थितियां वजह बनती हैं और कहीं दो लोग यह समझ जाते हैं कि उनकी राहें अलग हैं।
‘छड देने आ’ इसी व्यापक भावना को पकड़ने की कोशिश करता है। इसमें किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय अलगाव के बाद पैदा होने वाली भावनाओं को केंद्र में रखा गया है।
गीत का भावनात्मक पक्ष धीरे-धीरे एक सकारात्मक संदेश की तरफ जाता है। अतीत को मिटाना जरूरी नहीं, लेकिन उसमें हमेशा के लिए फंसे रहना भी जरूरी नहीं।
कई बार जिंदगी आगे बढ़ाने के लिए यह स्वीकार करना पड़ता है कि कुछ रिश्ते हमारी कहानी का हिस्सा होते हैं, पूरी कहानी नहीं।
यही सोच गीत को जुदाई के दर्द से आगे ले जाती है और आत्मस्वीकार की तरफ मोड़ती है।
सागर मल्होत्रा और निया चौहान की जोड़ी कहानी के भावनात्मक हिस्से को पर्दे पर आगे बढ़ाती है। दोनों के किरदारों के बीच रिश्ते के अलग-अलग पड़ावों को दिखाने की कोशिश की गई है।
खुशियों से लेकर दूरी और फिर अलगाव तक का सफर गीत के दृश्यों में दिखाई देता है। खास बात यह है कि कहानी में भावनाओं को बड़े संवादों के बजाय चेहरे के हावभाव, वातावरण और दृश्यों के माध्यम से व्यक्त करने पर जोर दिया गया है।
‘छड देने आ’ की सबसे बड़ी ताकत उसका परिचित भाव हो सकता है। प्यार में बिछड़ने का अनुभव भले ही हर व्यक्ति के लिए अलग हो, लेकिन उससे जुड़ी कई भावनाएं समान होती हैं—किसी की याद आना, पुराने पलों को याद करना, खुद को समझाना और अंततः जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश करना।
इसी वजह से गीत उन श्रोताओं को खास तौर पर छू सकता है, जिन्होंने कभी किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश की हो, उसे खोया हो और फिर खुद को दोबारा संभालना सीखा हो।
‘छड देने आ’ का सफर दर्द से शुरू होकर स्वीकार्यता की तरफ जाता है। गीत यह बताने की कोशिश करता है कि हर अंत के साथ जिंदगी खत्म नहीं होती। कुछ रिश्ते भले ही खत्म हो जाएं, लेकिन वे इंसान को कुछ सिखाकर जाते हैं।
कभी वे हमें प्यार का मतलब समझाते हैं, कभी रिश्तों की अहमियत और कभी खुद को प्राथमिकता देना।
भावपूर्ण आवाज, सुकून देने वाली धुन, संवेदनशील बोल और सिनेमाई प्रस्तुति के जरिए ‘छड देने आ’ इसी भाव को सामने लाता है कि किसी को छोड़ देना हमेशा उसे भूल जाना नहीं होता। कई बार आगे बढ़ने का मतलब यादों को मिटाना नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार करके जिंदगी को फिर से जीना होता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


