यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 12h ago
नई दिल्ली। देश की चिकित्सा व्यवस्था में सात दशक से अधिक समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स नई दिल्ली अब केवल उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं का प्रमुख केंद्र नहीं, बल्कि देशभर में मेडिकल शिक्षा, चिकित्सा शोध, नवाचार और स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता निर्माण का राष्ट्रीय मार्गदर्शक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। एम्स के 71वें स्थापना दिवस समारोह में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने संस्थान की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए कहा कि एम्स की गौरवपूर्ण विरासत के साथ भविष्य की जिम्मेदारियां भी लगातार बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि बदलते स्वास्थ्य परिदृश्य में एम्स को अपनी विशेषज्ञता और अनुभव का लाभ देश के दूसरे चिकित्सा संस्थानों और स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचाना होगा। संस्थान की भूमिका अब एक अस्पताल तक सीमित नहीं रह सकती। मेडिकल शिक्षा, रिसर्च, तकनीकी नवाचार और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की नई पीढ़ी तैयार करने में भी एम्स को नेतृत्व करना होगा।
1956 में स्थापित एम्स नई दिल्ली ने भारत में आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्थापना के बाद से संस्थान ने मेडिकल शिक्षा, सुपर स्पेशियलिटी उपचार, चिकित्सा अनुसंधान और मरीजों की देखभाल के क्षेत्र में कई मानक स्थापित किए।
अनुप्रिया पटेल ने कहा कि अपनी स्थापना के समय से ही एम्स ने देश की हेल्थकेयर यात्रा में विशेष स्थान बनाया है। संस्थान ने चिकित्सा शिक्षा को नए स्तर पर पहुंचाने, उच्च गुणवत्ता वाले शोध को बढ़ावा देने और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अत्याधुनिक सेवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि समय के साथ एम्स का नाम क्लिनिकल उत्कृष्टता और जनता के भरोसे से जुड़ गया है। हालांकि, सात दशक से अधिक की यह विरासत केवल उपलब्धियों का प्रतीक नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आती है।
केंद्रीय मंत्री ने स्वास्थ्य क्षेत्र में पिछले वर्षों में हुए विस्तार का उल्लेख करते हुए बताया कि देश में एम्स की संख्या बढ़कर 23 हो गई है। इससे चिकित्सा सेवाओं और उच्च स्तरीय मेडिकल शिक्षा को देश के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाने की दिशा में विस्तार हुआ है।
उन्होंने कहा कि किसी एक संस्थान पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और क्षेत्रीय स्तर पर विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने के लिए देश में उच्च चिकित्सा संस्थानों का नेटवर्क विकसित करना जरूरी है। नए एम्स इसी व्यापक स्वास्थ्य ढांचे का हिस्सा हैं।
हालांकि, नए संस्थानों की स्थापना के साथ-साथ उनमें पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर, फैकल्टी, नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मचारी, आधुनिक उपकरण और शोध सुविधाएं उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है। भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में इन संस्थानों की क्षमता का प्रभावी इस्तेमाल बड़ी चुनौती और अवसर दोनों होगा।
अनुप्रिया पटेल ने बताया कि 2014 के बाद देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 800 से अधिक हो गई है। इसी अवधि में स्नातक मेडिकल सीटों की संख्या करीब 51 हजार से बढ़कर लगभग 1.3 लाख हो गई है।
सरकार आने वाले चरण में 75 हजार और मेडिकल सीटें जोड़ने की दिशा में काम कर रही है। इससे मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में सीटों की उपलब्धता बढ़ाने और डॉक्टरों की संख्या में वृद्धि करने का लक्ष्य है।
उन्होंने कहा कि मेडिकल शिक्षा का विस्तार केवल आंकड़ों की वृद्धि नहीं है। इसका सीधा संबंध इस बात से है कि देश के नागरिकों को अपने आसपास कितनी अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं मिल पाती हैं।
देश की बड़ी आबादी को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे शहरों और दूरदराज के इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता अब भी स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है।
मंत्री ने कहा कि हर क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण मेडिकल शिक्षा, नागरिकों के नजदीक उन्नत चिकित्सा सुविधाएं और डॉक्टरों, नर्सों, वैज्ञानिकों तथा अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की मजबूत टीम तैयार करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मेडिकल शिक्षा का विस्तार तभी प्रभावी होगा जब इसका लाभ देश की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचे। नए डॉक्टरों के साथ-साथ प्रशिक्षित नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, तकनीकी विशेषज्ञ और शोधकर्ता भी स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र में तेजी से बढ़ती तकनीकी संभावनाओं के बीच अनुप्रिया पटेल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक सर्जरी, अंग प्रत्यारोपण और आधुनिक डायग्नोस्टिक्स का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि तकनीक मरीजों की बेहतर देखभाल का साधन है, लेकिन डॉक्टर के निर्णय का विकल्प नहीं हो सकती। उनके अनुसार, एआई डॉक्टर की चिकित्सकीय समझ की जगह नहीं ले सकता, रोबोटिक तकनीक सर्जन के निर्णय का स्थान नहीं ले सकती और तकनीकी व्यवस्था नर्स की मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं हो सकती।
इस दृष्टिकोण में आधुनिक चिकित्सा तकनीक और मानवीय देखभाल के बीच संतुलन पर जोर दिया गया। तकनीक से निदान, उपचार की योजना और सर्जरी में सहायता मिल सकती है, लेकिन मरीज के साथ संवाद, उसकी परिस्थितियों को समझना और उपचार के दौरान मानवीय संवेदना स्वास्थ्य सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेगी।
एम्स के निदेशक डॉ. (प्रो.) निखिल टंडन ने संस्थान की पिछले वर्ष की उपलब्धियों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एम्स में रोबोटिक सर्जरी का आंकड़ा 1,000 से अधिक हो चुका है।
संस्थान ने सार्वजनिक क्षेत्र में देश का पहला रिपोर्टेड रोबोट-सहायित किडनी प्रत्यारोपण भी किया। यह उपलब्धि आधुनिक सर्जिकल तकनीकों को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में इस्तेमाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।
रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल जटिल ऑपरेशन में सर्जनों को अधिक सटीकता और नियंत्रण उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। हालांकि, इसके प्रभावी उपयोग के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों, महंगे उपकरणों और मजबूत तकनीकी ढांचे की जरूरत होती है।
डॉ. टंडन के अनुसार, पिछले वर्ष एम्स में 50 लाख से अधिक ओपीडी विजिट दर्ज की गईं। इस दौरान 3.5 लाख से अधिक मरीजों को अस्पताल में भर्ती किया गया, जबकि करीब 3 लाख सर्जरी हुईं।
इन आंकड़ों से एम्स पर पड़ने वाले मरीजों के भारी दबाव का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। देशभर से गंभीर और जटिल बीमारियों के मरीज उपचार के लिए यहां पहुंचते हैं।
इतने बड़े मरीज भार के बीच चिकित्सा गुणवत्ता बनाए रखना, प्रतीक्षा समय कम करना, मरीजों और परिजनों को उचित जानकारी देना तथा अस्पताल की सेवाओं को अधिक सुगम बनाना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
एम्स ने पिछले वर्ष अपनी डायलिसिस क्षमता दोगुनी की। किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों के बढ़ते मामलों के बीच डायलिसिस जैसी सेवाओं की क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
संस्थान ने वर्ष के दौरान 300 से अधिक अत्यंत जटिल सुपर-माइक्रोसर्जिकल प्रक्रियाएं भी कीं। सुपर-माइक्रोसर्जरी में बेहद छोटी रक्त वाहिकाओं और ऊतकों पर अत्यधिक सूक्ष्म स्तर पर काम किया जाता है और इसके लिए विशेष प्रशिक्षण तथा उपकरणों की आवश्यकता होती है।
एम्स में पिछले वर्ष करीब 1,000 नए विद्यार्थियों का प्रवेश हुआ। इसके अलावा 300 से अधिक फैकल्टी की नियुक्ति की गई।
मेडिकल शिक्षा के विस्तार के लिए पर्याप्त फैकल्टी उपलब्ध होना बेहद महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ शिक्षकों, क्लिनिकल प्रशिक्षण सुविधाओं, प्रयोगशालाओं और शोध अवसरों का विस्तार भी जरूरी है।
एम्स जैसे संस्थान में फैकल्टी की भूमिका केवल कक्षा तक सीमित नहीं होती। डॉक्टरों को क्लिनिकल प्रशिक्षण देने, शोध परियोजनाओं का संचालन करने, नई उपचार पद्धतियां विकसित करने और युवा चिकित्सा पेशेवरों का मार्गदर्शन करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
अनुप्रिया पटेल ने एम्स से चिकित्सा अनुसंधान और मरीजों के बीच की दूरी कम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में होने वाला शोध तब अधिक उपयोगी बनता है जब उसका लाभ मरीज तक पहुंचता है।
उन्होंने भारतीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप स्वदेशी मेडिकल तकनीक विकसित करने पर जोर दिया। इसके लिए अकादमिक संस्थानों, अस्पतालों और भारतीय उद्योग के बीच सहयोग को आवश्यक बताया।
भारत जैसे बड़े और विविध देश में विदेशों में विकसित हर तकनीक को उसी रूप में लागू करना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए स्थानीय जरूरतों, लागत, उपलब्ध संसाधनों और मरीजों की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य तकनीक विकसित करना महत्वपूर्ण है।
एम्स की विशेषज्ञता को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल हेल्थ, टेलीमेडिसिन और प्रशिक्षण का विस्तार करने पर भी जोर दिया गया।
टेलीमेडिसिन के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टर दूरदराज के क्षेत्रों में मौजूद स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों से जुड़ सकते हैं। इससे गंभीर मामलों में विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध कराने और स्थानीय स्तर पर उपचार क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
एम्स जैसे राष्ट्रीय संस्थान के लिए यह भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के हर हिस्से में समान संख्या में सुपर स्पेशियलिटी विशेषज्ञ उपलब्ध कराना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
मंत्री ने अस्पताल में मरीजों के अनुभव को बेहतर बनाने पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि अच्छी स्वास्थ्य सेवा केवल सही दवा या सफल सर्जरी तक सीमित नहीं है।
अस्पताल में मरीज को स्पष्ट जानकारी मिलना, उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार होना, उपचार प्रक्रिया समझाई जाना और उसकी चिंताओं को सुना जाना भी स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता का हिस्सा है।
विशेष रूप से बड़े सरकारी अस्पतालों में जहां बड़ी संख्या में मरीज आते हैं, वहां पंजीकरण, जांच, रिपोर्ट, भर्ती, दवा और डिस्चार्ज जैसी प्रक्रियाओं को सरल बनाना मरीजों और उनके परिजनों के लिए महत्वपूर्ण है।
अनुप्रिया पटेल ने डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की सेहत और मानसिक-सामाजिक कल्याण पर भी जोर दिया।
स्वास्थ्यकर्मी लगातार लंबे समय तक काम करते हैं और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के साथ सीधे जुड़े रहते हैं। ऐसे में उनके कार्यस्थल, काम के घंटे, मानसिक तनाव, सुरक्षा और आराम से जुड़े पहलुओं पर ध्यान देना भी मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा है।
मंत्री ने कहा कि मरीजों की सेवा करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों का स्वस्थ और सुरक्षित रहना भी उतना ही जरूरी है।
स्थापना दिवस समारोह के साथ एम्स ने स्वास्थ्य जागरूकता को आम लोगों और विद्यार्थियों तक पहुंचाने की पहल भी की है।
‘एम्स: हेल्थकेयर इनोवेशन के सात दशक’ नाम से प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। इसमें 95 पोस्टरों के माध्यम से एम्स की सात दशक से अधिक की उपलब्धियों और चिकित्सा क्षेत्र में संस्थान के योगदान को प्रदर्शित किया गया है।
यह प्रदर्शनी 25 से 27 सितंबर तक चलेगी। इसमें 1,500 से अधिक स्कूली विद्यार्थियों के भाग लेने की योजना है।
विद्यार्थियों को स्वास्थ्य शिक्षा के साथ-साथ पोषण, बीएमआई, ब्लड शुगर, आंखों की देखभाल, दंत स्वास्थ्य, अंगदान और सीपीआर जैसी गतिविधियों के बारे में जानकारी दी जाएगी।
स्कूली विद्यार्थियों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देने का उद्देश्य उन्हें कम उम्र में ही स्वस्थ जीवनशैली और प्राथमिक स्वास्थ्य उपायों के प्रति जागरूक करना है।
बीएमआई और पोषण जैसी गतिविधियां बच्चों को शरीर और स्वास्थ्य के बीच संबंध समझाने में मदद कर सकती हैं। वहीं सीपीआर और प्राथमिक चिकित्सा जैसी जानकारी आपात स्थिति में उपयोगी हो सकती है।
अंगदान जैसे विषयों पर जागरूकता भी समाज में स्वास्थ्य और मानवीय जिम्मेदारी को लेकर समझ विकसित करने में भूमिका निभा सकती है।
एम्स के 71 साल पूरे होने के अवसर पर सामने आया संदेश यह है कि संस्थान की उपलब्धियां अब उसके लिए भविष्य की बड़ी जिम्मेदारियों का आधार बन रही हैं।
एक ओर एम्स को गंभीर और जटिल बीमारियों के इलाज में अपनी विशेषज्ञता बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर देशभर में मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी है।
इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, डिजिटल हेल्थ, जीनोमिक्स, आधुनिक डायग्नोस्टिक्स और नई सर्जिकल तकनीकों जैसे क्षेत्रों में शोध और प्रशिक्षण को आगे बढ़ाना होगा।
आने वाले समय में चिकित्सा अनुसंधान की सफलता केवल वैज्ञानिक पत्रों या प्रयोगशाला की उपलब्धियों से नहीं मापी जाएगी। नई तकनीक और उपचार पद्धति मरीजों के लिए कितनी उपयोगी, सुरक्षित, सुलभ और किफायती बनती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
इसीलिए एम्स के सामने एक साथ कई जिम्मेदारियां हैं—मरीजों को उच्च स्तरीय इलाज देना, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी तैयार करना, नए उपचार पर शोध करना, तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देना और अपनी विशेषज्ञता को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाना।
71 वर्ष पूरे कर चुका एम्स नई दिल्ली भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था के विकास की लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अब देश में एम्स संस्थानों की संख्या बढ़ने, मेडिकल कॉलेजों और सीटों के विस्तार तथा तकनीकी बदलाव के बीच नई दिल्ली स्थित एम्स की भूमिका भी व्यापक हो रही है।
केंद्रीय मंत्री का संदेश इसी बदलती भूमिका की ओर संकेत करता है कि एम्स को अपनी उत्कृष्टता को देश की व्यापक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना होगा।
एम्स का अतीत उपलब्धियों से भरा रहा है, वर्तमान में उसके सामने मरीजों की बड़ी जिम्मेदारी है और भविष्य में उसे मेडिकल शिक्षा, शोध, नवाचार तथा उन्नत उपचार के क्षेत्र में देश को दिशा देने की चुनौती है।
स्थापना दिवस समारोह में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले लोगों को पुरस्कार दिए गए और सात दशक की उपलब्धियों को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनी की शुरुआत हुई। यह आयोजन केवल संस्थान की पुरानी उपलब्धियों का स्मरण नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में एम्स की भूमिका को लेकर एक व्यापक दृष्टि का संकेत भी रहा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


